१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९
अध्याय ४ ब्राह्मण ३ मन्त्र २ ३०९
[ दायें और बायें नेत्रों के पति-पत्नी जैसा ऋषि का यह कथन रहस्यात्मक है। वर्तमान विज्ञान इस सन्दर्भ में अभी
सीमित ज्ञान ही प्राप्त कर सका है। दोनों आँखों में सन्निहित शक्तियों को पुरुष ही कहा गया है, लेकिन वे पति-पत्नी की
तरह परस्पर पूरक हैं। एक को अर्धाङ्ग ही कहा जा सकता है। नेत्र विज्ञान के डॉक्टर यह बताते हैं कि दोनों आँखों के बीच
एक कोमल संवेदनात्मक रिश्ता है। यदि किसी कारण एक आँख की नर्वस् में खराबी आ जाये, तो उसके प्रति संवेदना
के नाते दूसरी ओर भी कमजोरी आने लगती है। डॉक्टर इसे आफ्थैल्मिक सिम्पैथी कहते हैं।]
तस्य प्राची दिक् प्राञ्चःप्राणा दक्षिणा दिग्दक्षिणे प्राणाः प्रतीची दिक् प्रत्यञ्चः
प्राणा उदीची दिगुदञ्चः प्राणा ऊर्ध्वा दिगूर्ध्वाः प्राणा अवाची दिग्वाञ्चः प्राणाः सर्वा
दिशः सर्वे प्राणाः स एष नेति नेत्यात्माऽगृह्यो नहि गृह्यतेऽशीर्यो नहि शीर्यतेऽसङ्गो नहि
सज्यतेऽसितो न व्यथते न रिष्यत्यभयं वै जनक प्राप्तोऽसीति होवाच याज्ञवल्क्यः स
होवाच जनको वैदेहोऽभयं त्वा गच्छताद्याज्ञवल्क्य यो नो भगवन्नभयं वेदयसे
नमस्तेऽस्त्विमे विदेहा अयमहमस्मि ॥ ४॥
उस विद्वान् पुरुष के लिए पूर्व दिशा-पूर्व प्राण, दक्षिण दिशा-दक्षिण प्राण, पश्चिम दिशा-पश्चिम
प्राण, उत्तर दिशा- उत्तर प्राण, ऊर्ध्व दिशा - ऊपरी प्राण, नीचे की दिशा- निचला प्राण है एवं समस्त
दिशाएँ - सम्पूर्ण प्राण हैं। वह आत्मा नेति-नेति रूप से वर्णित है, वह ग्रहण न किए जाने के कारण
'अग्राह्य' है, वह नष्ट न होने के कारण अशीर्य है, वह असङ्ग भी है तथा बन्धन रहित भी। वह कभी
व्यथित नहीं होता। याज्ञवल्क्य ने कहा- हे जनक! आप निश्चित ही अभय हो गये हैं। जनक ने कहा- हे
याज्ञवल्क्य! आपने मुझे अभय ब्रह्म का ज्ञान कराया है, अतः आप भी अभय हों, आपको नमस्कार है, यह
विदेहदेश और मैं (जनक) आपके अनुगामी हैं। ॥ ४॥
॥ तृतीयं ब्राह्मणम् ॥
जनकः ह वैदेहं याज्ञवल्क्यो जगाम स मेने न वदिष्य इत्यथ ह यज्जनकश्च वैदेहो
याज्ञवल्क्यश्चाग्निहोत्रे समूदाते तस्मै ह याज्ञवल्क्यो वरं ददौ स ह कामप्रश्नमेव वव्रे तꣳ
हास्मै ददौ तꣳ सम्राडेव पूर्वं पप्रच्छ ॥ १॥
महर्षि याज्ञवल्क्य विदेहराज जनक के पास गये। उन्होंने विचार किया कि वहाँ मैं कुछ न बोलूँगा; परन्तु पूर्व
में एक बार जनक और याज्ञवल्क्य का अग्निहोत्र के विषय में वार्तालाप हुआ था, तब याज्ञवल्क्य ने जनक को
इच्छानुसार प्रश्न करने का वरदान दिया था। अतः इस बार राजा जनक ने ही उनसे प्रश्न प्रारम्भ किया ॥ १॥
याज्ञवल्क्य किंज्योतिरयं पुरुष इति आदित्यज्योतिः सम्राडिति होवाचादित्येनैवायं
ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ २॥
विदेहराज जनक ने प्रश्न किया हे याज्ञवल्क्य ! यह पुरुष किस ज्योति से युक्त है।
याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- हे राजन्! यह पुरुष आदित्य रूप ज्योति से सम्पन्न है। यह पुरुष आदित्य
ज्योति से ही प्रतिष्ठित होता है, उसी से चतुर्दिक् जाता है, कर्म सम्पादित करता है और उसी से
वापस लौट आता है। जनक ने कहा- हाँ, यह उचित है ॥ २॥
३१० बृहदारण्यकोपनिषद्
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य किंज्योतिरेवायं पुरुष इति चन्द्रमा एवास्य
ज्योतिर्भवतीति चन्द्रमसैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येव-
मेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ३ ॥
इसके उपरान्त जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! सूर्यास्त हो जाने पर यह पुरुष किस ज्योति से
युक्त होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया कि उस समय यह पुरुष चन्द्रमा की ज्योति से सम्पन्न होता है। वह
चन्द्रमा की ज्योति से स्थित होता, आता-जाता, कर्म करता और उसी से वापस लौट आता है। जनक ने
कहा- हाँ, यह भी यथार्थ है ॥ ३ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यग्निरेवास्य
ज्योतिर्भवतीत्यग्निनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ४ ॥
जनक ने पुनः प्रश्न पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र दोनों अस्त हो जाते हैं, तब यह पुरुष
किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- उस समय यह अग्नि की ज्योति से सम्पन्न होता
है। यह उसी (अग्नि) की ज्योति से बैठता, गमन करता, कर्म करता और वापस भी लौट आता है। जनक
इसे स्वीकारते हुए बोले- हे याज्ञवल्क्य ! वस्तुतः यही सत्य है ॥ ४ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ किंज्योतिरेवायं पुरुष
इति वागेवास्य ज्योतिर्भवतीति वाचैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म कुरुते विपल्येतीति
तस्माद्वै सम्राडपि यत्र स्वः पाणिर्न विनिर्ज्ञायतैऽथ यत्र वागुच्चरत्युपैव तत्र
न्येतीत्येवमेवैतद्याज्ञवल्क्य ॥ ५ ॥
जनक ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य और चन्द्र अस्त हो जाते हैं तथा अग्नि भी शान्त हो
जाती है, तब यह पुरुष किस ज्योति से सम्पन्न होता है ? याज्ञवल्क्य ने उत्तर दिया- तब यह वाक् रूपी
ज्योति से सम्पन्न होता है। उसी से बैठता, गमन करता, कर्म सम्पादन करता और उसी से वापस लौट आता
है। हे राजन् ! जहाँ अँधेरे में हाथ भी दृष्टिगोचर नहीं होता, वहाँ वाणी का उच्चारण सुनते ही यह पहुँच
सकता है। जनक ने कहा- हे महात्मन् ! यह तथ्य भी उचित है ॥ ५ ॥
अस्तमित आदित्ये याज्ञवल्क्य चन्द्रमस्यस्तमिते शान्तेऽग्नौ शान्तायां वाचि
किंज्योतिरेवायं पुरुष इत्यात्मैवास्य ज्योतिर्भवतीत्यात्मनैवायं ज्योतिषास्ते पल्ययते कर्म
कुरुते विपल्येतीति ॥ ६ ॥
जनक ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! जब सूर्य, चन्द्र अस्त हो जाते हैं, अग्नि और वाक् भी शान्त हो जाती
है, तब इस पुरुष की कौन सी ज्योति होती है। याज्ञवल्क्य ने कहा- तब यह पुरुष आत्मज्योति से सम्पन्न
होता है। यह उसी के द्वारा बैठता, आता-जाता, कर्म सम्पन्न करता और फिर वापस भी लौट आता है ॥ ६ ॥
कतम आत्मेति योऽयं विज्ञानमयः प्राणेषु हृद्यन्तर्ज्योतिः पुरुषः स समानः
सन्नुभौ लोकावनुसंचरति ध्यायतीव लेलायतीव स हि स्वप्नो भूत्वेमं लोक-
मतिक्रामति मृत्यो रूपाणि ॥ ७ ॥