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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय ३ ब्राह्मण १ मन्त्र ३ २८१

अध्याय ३ ब्राह्मण १ मन्त्र ३ २८१
॥ अथ तृतीयोऽध्यायः ॥
॥ प्रथमं ब्राह्मणम् ॥
जनको ह वैदेहो बहुदक्षिणेन यज्ञेनेजे तत्र ह कुरुपञ्चालानां ब्राह्मणा अभिसमेता
बभूवुस्तस्य ह जनकस्य वैदेहस्य विजिज्ञासा बभूव कःस्विदेषां ब्राह्मणानामनूचानतम
इति स ह गवाँ सहस्रमवरुरोध दश दश पादा एकैकस्याः शृङ्गयोराबद्धा बभूवुः ॥ १ ॥
विदेहराज जनक ने एक महान् (बड़ी) दक्षिणा वाले यज्ञ (अश्वमेध) के द्वारा यजन किया। उस
यज्ञ में पाञ्चाल और कुरु प्रदेशों के बहुत से विद्वान् ब्राह्मण एकत्र हुए। तब राजा को यह ज्ञात करने की
इच्छा हुई कि इन विद्वानों में सर्वोत्कृष्ट कौन है ? इस निमित्त उनने अपनी गोशाला की एक सहस्र गौओं
के सींगों में दस-दस पाद (लगभग १०० ग्राम) स्वर्ण बँधवा दिया॥ १ ॥
तान्होवाच ब्राह्मणा भगवन्तो यो वो ब्रह्मिष्ठः स एता गा उदजतामिति ते ह ब्राह्मणा
न दधृषुरथ ह याज्ञवल्क्यः स्वमेव ब्रह्मचारिणमुवाचैताः सोम्योदज सामश्रवा ३ इति ता
होदाचकार ते ह ब्राह्मणाश्चुक्रुधुः कथं नो ब्रह्मिष्ठो ब्रुवीतेत्यथ ह जनकस्य वैदेहस्य होताश्वलो
बभूव स हैनं पप्रच्छ त्वं नु खलु नो याज्ञवल्क्य ब्रह्मिष्ठोऽसी३ति स होवाच नमो वयं
ब्रह्मिष्ठाय कुर्मो गोकामा एव वयँ स्म इति तँ ह तत एव प्रष्टुं दधे होताश्वलः ॥ २ ॥
राजा जनक ने उन ब्राह्मणों से कहा- हे पूज्य विद्वानो ! आप लोगों में जो सर्वाधिक ब्रह्मनिष्ठ हो, वह
इन गौओं को ले जाए। उन ब्राह्मणों में से किसी का भी अपने को श्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ कहने का साहस न हुआ।
तब महर्षि याज्ञवल्क्य ने अपने एक शिष्य ब्रह्मचारी सामश्रवा से कहा- हे सोम्य सामश्रवा ! तुम इन गौओं
को (हमारे निमित्त) हाँक ले जाओ। उस ब्रह्मचारी द्वारा गौओं को हाँक ले जाने पर अन्य विद्वान् ब्राह्मण
बहुत क्रोधित हुए और बोले कि इसने हममें से अपने को सर्वश्रेष्ठ ब्रह्मनिष्ठ कैसे समझ लिया ? इसके पश्चात्
राजा के यज्ञ के होता अश्वल ने ऋषि याज्ञवल्क्य से पूछा- हे ऋषे ! क्या आप हम सभी में उत्कृष्ट ब्रह्मज्ञानी
हैं ? ऋषि याज्ञवल्क्य बोले-ब्रह्मज्ञानियों को तो मेरा नमन है। हमें तो केवल गौओं की आकांक्षा है। तब
अश्वल ने दृढ़ निश्चय करके ऋषि से प्रश्न किया ॥ २ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदँ सर्वं मृत्युनाप्तँ सर्वं मृत्युनाभिपन्नं केन यजमानो
मृत्योराप्तिमतिमुच्यत इति होत्रर्त्विजाग्निना वाचा वाग्वै यज्ञस्य होता तद्येयं वाक् सोऽयमग्निः
स होता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ३ ॥
हे याज्ञवल्क्य ! यह समस्त विश्व जब मृत्यु से संव्याप्त और मृत्यु के द्वारा अधीन किया हुआ है, तब
केवल यजमान ही किस तरह मृत्यु के बन्धन का अतिक्रमण कर सकता है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा कि
होता नामक ऋत्विक् वाक् और अग्नि है, वह (होता-वाक् शक्ति और अग्नि के द्वारा) मृत्यु को पार कर
सकता है। वही मुक्ति और अतिमुक्ति है ॥ ३ ॥

२८२ बृहदारण्यकोपनिषद्
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद सर्वमहोरात्राभ्यामाप्त सर्वमहोरात्राभ्यामभिपन्नं केन
यजमानोऽहोरात्रयोराप्तिमतिमुच्यत इत्यध्वर्युणर्त्विजा चक्षुषादित्येन चक्षुर्वै यज्ञस्याध्व-
र्युस्तद्यदिदं चक्षुः सोऽसावादित्यः सोऽध्वर्युः स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ४ ॥
अश्वल ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! सब कुछ दिन और रात्रि से संव्याप्त है और सभी कुछ दिन और रात्रि
द्वारा अपने वश में किया हुआ है, फिर यजमान किस प्रकार दिन और रात्रि के बन्धन से मुक्त हो सकता
है ? ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा कि ऋत्विक् नेत्र और सूर्य के माध्यम से (यजमान दिन और रात्रि के बन्धन
से) मुक्त हो सकता है। अध्वर्यु ही यज्ञ का चक्षु है, अस्तु, नेत्र ही आदित्य और वही अध्वर्यु है। मुक्ति और
अतिमुक्ति भी वही है ॥ ४ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिद सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षाभ्यामाप्त सर्वं पूर्वपक्षापरपक्षा-
भ्यामभिपन्नं केन यजमानः पूर्वपक्षापरपक्षयोराप्तिमतिमुच्यत इत्युद्गात्रर्त्विजा वायुना प्राणेन
प्राणो वै यज्ञस्योद्गाता तद्योऽयं प्राणः स वायुः स उद्गाता स मुक्तिः सातिमुक्तिः ॥ ५ ॥
अश्वल ने प्रश्न किया- हे याज्ञवल्क्य ! सब कुछ पूर्वपक्ष (कृष्णपक्ष) और अपर पक्ष (शुक्लपक्ष) के
द्वारा आवृत है और उन्हीं के द्वारा ग्रसित है, फिर यजमान किस प्रकार कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष से मुक्त हो
सकता है ? तब ऋषि याज्ञवल्क्य ने कहा- ऋत्विज्, उद्गाता, वायु और प्राण के माध्यम से मुक्त हो सकता
है। उद्गाता को यज्ञ का प्राण कहा गया है तथा यह प्राण ही वायु और उद्गाता है। यही मुक्ति और
अतिमुक्ति स्वरूप है ॥ ५ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच यदिदमन्तरिक्षमनारम्बणमिव केनाक्रमेण यजमानः स्वर्गं
लोकमाक्रमत इति ब्रह्मणर्त्विजा मनसा चन्द्रेण मनो वै यज्ञस्य ब्रह्मा तद्यदिदं मनः सोऽसौ
चन्द्रः स ब्रह्मा स मुक्तिः सातिमुक्तिरित्यतिमोक्षा अथ संपदः ॥ ६ ॥
अश्वल ने कहा- हे याज्ञवल्क्य ! यह अन्तरिक्ष निरालम्ब प्रतीत होता है, फिर यजमान किस संसाधन
से स्वर्गारोहण करता है ? याज्ञवल्क्य बोले कि ऋत्विज्-ब्रह्मा और चन्द्रमा के माध्यम से स्वर्गारोहण करता
है। मन ही चन्द्रमा है। मन ही यज्ञ का ब्रह्मा है। मुक्ति और अतिमुक्ति भी वही है। यजमान इसी के द्वारा
अतिमुक्ति प्राप्त करता है। अब सम्पद निरूपण किया जाता है ॥ ६ ॥
याज्ञवल्क्येति होवाच कतिभिरयमद्यर्ग्भिर्होतास्मिन्यज्ञे करिष्यतीति तिसृभिरिति
कतमास्तास्तिस्त्र इति पुरोऽनुवाक्या च याज्या च शस्यैव तृतीया किं ताभिर्जयतीति
यत्किंचेदं प्राणभृदिति ॥ ७॥
अश्वल ने पूछा- हे याज्ञवल्क्य ! आज होता यज्ञ में कितनी ऋचाओं का शस्त्रशंसन (प्रयोग) करेगा ?
याज्ञवल्क्य ने कहा- तीन ऋचाओं के द्वारा। अश्वल ने पूछा- उन तीन ऋचाओं के क्या नाम हैं ? ऋषि ने
कहा- प्रथम- पुरोनुवाक्या (यजन से पहले वाली) है, द्वितीय- याज्या (यज्ञ के समय उच्चारित) है और
तृतीय - शस्या (यज्ञ के बाद की स्तुतियाँ) है। प्रश्नः- इनसे किसे जीता जाता है ? उत्तरः- यह जो भी
प्राणि-समुदाय है, वह सब (जीता जाता है) ॥ ७ ॥