१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय ३ खण्ड १६ मन्त्र ५ १२३
अध्याय ३ खण्ड १६ मन्त्र ५ १२३
अथ यदवोचꣳ स्वः प्रपद्य इत्यृग्वेदं प्रपद्ये यजुर्वेदं प्रपद्ये सामवेदं प्रपद्य
इत्येव तदवोचं तदवोचम्॥ ७॥
तथा जब हमने कहा कि हम स्वः के आश्रय में हैं, तो इसका आशय यह है कि हम ऋग्वेद के आश्रय
में हैं, हम यजुर्वेद के आश्रय में हैं तथा हम सामवेद के आश्रय में हैं। यहाँ यही कहा गया है॥ ७॥
॥ षोडशः खण्डः ॥
पुरुषो वाव यज्ञस्तस्य यानि चतुर्विꣳशतिवर्षाणि तत्प्रातःसवनं चतुर्विꣳशत्यक्षरा
गायत्री गायत्रं प्रातःसवनं तदस्य वसवोऽन्वायत्ताः प्राणा वाव वसव एते हीदꣳ सर्वं
वासयन्ति ॥ १ ॥
सुनिश्चित रूप से पुरुष ही यज्ञ है। पुरुष के जो प्रथम चौबीस वर्ष हैं, वे प्रातः सवन हैं, क्योंकि गायत्री
चौबीस अक्षरों वाली है और प्रातः सवन गायत्री छन्द से सम्बंधित है। वसुगण प्रातः सवन के अनुगामी हैं।
प्राण ही वसुगण हैं, क्योंकि ये सबको आवास देने वाले हैं ॥ १ ॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा वसव इदं मे प्रातःसवनं माध्यन्दिनꣳ
सवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानां वसूनां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो ह
भवति ॥ २ ॥
यदि इस प्रातः सवन की आयु (चौबीस वर्ष की अवधि) में कोई कष्ट उत्पन्न हो, तो इस प्रकार कहे-
प्राणरूप वसुगण हमारे प्रातः सवन को माध्यन्दिन सवन के साथ एकीकृत कर दें, जिससे हम प्राणरूप
वसुगणों के मध्य में ही यज्ञ करते हुए उनसे विमुख न हों (संयुक्त रहें)। ऐसा कहने पर वह उस कष्ट से
छूटकर नीरोग हो जाता है॥ २॥
अथ यानि चतुश्चत्वारिꣳशद्वर्षाणि तन्माध्यन्दिनꣳ सवनं चतुश्चत्वारिꣳशदक्षरा त्रिष्टुप्
त्रैष्टुभं माध्यन्दिनं सवनं तदस्य रुद्रा अन्वायत्ताः प्राणा वाव रुद्रा एते हीदꣳ सर्वꣳ
रोदयन्ति ॥ ३ ॥
तदनन्तर जो आगे- चौवालीस वर्ष की अवधि है, वह माध्यन्दिन सवन है। त्रिष्टुप् छन्द चौवालीस
अक्षरों का है और माध्यन्दिन सवन त्रिष्टुप् छन्द से सम्बन्धित है। रुद्रगण माध्यन्दिन सवन के अनुगामी हैं।
निश्चय ही प्राण रुद्र हैं, क्योंकि ये सम्पूर्ण प्राणियों को रुलाते हैं ॥ ३॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा रुद्रा इदं मे माध्यन्दिनꣳ सवनं
तृतीयसवनमनुसन्तनुतेति माहं प्राणानाꣳ रुद्राणां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत
एत्यगदो ह भवति ॥ ४॥
इस माध्यन्दिन सवन की आयु में कोई कष्ट उत्पन्न हो, तो इस प्रकार कहे- प्राणरूप रुद्रगण हमारे
माध्यन्दिन सवन को तृतीय सवन के साथ एकीकृत कर दें, जिससे हम प्राणरूप रुद्रगणों के मध्य यज्ञ करते
हुए उनसे विमुख न हों। ऐसा कहने पर वह उस कष्ट से छूटकर नीरोग हो जाता है॥ ४॥
अथ यान्यष्टाचत्वारिꣳशद्वर्षाणि तृतीयसवनमष्टाचत्वारिꣳशदक्षरा जगती जागतं
तृतीयसवनं तदस्यादित्या अन्वायत्ताः प्राणा वावादित्या एते हीदꣳ सर्वमाददते ॥ ५ ॥
१२४ छाान्दोग्यापनिषद्
अब जो अड़तालीस वर्ष की अवधि है, वह तृतीय सवन है। जगती छन्द अड़तालीस अक्षरों का है
तथा तृतीय सवन जगती छन्द से सम्बन्धित है। आदित्यगण इस तृतीय सवन के अनुगामी हैं। प्राण ही
आदित्यगण हैं, क्योंकि ये ही सम्पूर्ण विषयों को ग्रहण करते हैं॥ ६॥
तं चेदेतस्मिन्वयसि किंचिदुपतपेत्स ब्रूयात्प्राणा आदित्या इदं मे तृतीयसवन-
मायुरनुसन्तनुतेति माहं प्राणानामादित्यानां मध्ये यज्ञो विलोप्सीयेत्युद्धैव तत एत्यगदो
हैव भवति॥ ६॥
इस तृतीय सवन की आयु में यदि कोई कष्ट उत्पन्न हो तो इस प्रकार कहे- प्राणरूप आदित्यगण हमारे
तृतीय सवन को सम्पूर्ण आयु के साथ एकीकृत कर दें, हम प्राणरूप आदित्यगणों के मध्य यज्ञ करते हुए
उनसे विमुख न हों। ऐसा कहकर वे उस कष्ट से मुक्त होकर नीरोग हो जाते हैं॥ ६॥
एतद्ध स्म वै तद्विद्वानाह महिदास ऐतरेयः स किं म एतदुपतपसि योऽहमनेन न
प्रेष्यामीति स ह षोडशं वर्षशतमजीवत्प्रह षोडशं वर्षशतं जीवति य एवं वेद॥ ७॥
इस उपासना को जानने वाले ऐतरेय महिदास ने कहा था- हे रोग! तू मुझे क्यों सन्तप्त करता है, मैं निश्चय
ही इससे मृत्यु को नहीं प्राप्त कर सकता। ऐसा कहकर वे रोग से मुक्ति पा जाते थे और एक सौ सोलह वर्ष तक
जीवित रहे। जो साधक इस प्रकार इस उपासना को जानता है, वह एक सौ सोलह वर्ष तक जीवित रहता है॥ ७॥
॥ सप्तदशः खण्डः॥
स यदशिशिषति यत्पिपासति यन्न रमते ता अस्य दीक्षाः॥ १॥
जो साधक खाने एवं पीने की इच्छा तो करता है, पर जो इसमें आसक्त नहीं होता, यही उसकी दीक्षा है॥ १॥
अथ यदश्नाति यत्पिबति यद्रमते तदुपसदैरेति॥ २॥
फिर जो खाता है, जो पीता है और जो उसमें प्रसन्न होता है, वह उपसदों का स्थान प्राप्त करता है॥ २॥
अथ यद्धसति यज्जक्षति यन्मैथुनं चरति स्तुतशस्त्रैरेव तदेति॥ ३॥
तथा जो हँसता है, जो भक्षण करता है एवं जो मैथुन करता है, वह स्तुति के स्तोत्रों को प्राप्त करता है॥ ३॥
अथ यत्तपो दानमार्जवमहिंसा सत्यवचनमिति ता अस्य दक्षिणाः॥ ४॥
तथा जो तप, दान, सरल स्वभाव, अहिंसा और सत्यवचन से युक्त हैं, वे उस साधक की दक्षिणा हैं॥ ४॥
तस्मादाहुः सोष्यत्यसोष्टेति पुनरुत्पादनमेवास्य तन्मरणमेवास्यावभृथः॥ ५॥
प्रसूता माता को लोग कहते हैं- यह प्रसूता होगी अथवा यह प्रसूता हुई, वह काल पुरुष का पुनर्जन्म
है तथा मृत्यु अवभृथ स्नान के सदृश है॥ ५॥
तद्धैतद्घोर आङ्गिरसः कृष्णाय देवकीपुत्रायोक्त्वोवाचापिपास एव स बभूव
सोऽन्तवेलायामेतत्त्रयं प्रतिपद्येताक्षितमस्यच्युतमसि प्राणसंशितमसीति तत्रैते द्वे ऋचौ
भवतः॥ ६॥
घोर आङ्गिरस ऋषि ने देवकीपुत्र भगवान् कृष्ण को यह तत्त्वदर्शन समझाया, जिससे कि वे अन्य
उपासनाओं के सम्बन्ध में पिपासा मुक्त हो गये थे- साधक को मृत्युकाल में इन तीन मंत्रों का स्मरण
कराना चाहिए- १. तुम अक्षय अनश्वर स्वरूप हो, २. तुम अच्युत- अटल पतित न होने वाले हो, ३. तुम
अतिसूक्ष्म प्राणस्वरूप हो। इस विषय में दो ऋचाएँ निर्दिष्ट हैं॥ ६॥