१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र १८ ६९
अध्याय २ वल्ली ३ मन्त्र १८ ६९
अस्ति (वह है) और नास्ति (वह नहीं है) इन दो मान्यताओं में तत्त्वभाव (समस्त इन्द्रियादि सहित
मन-बुद्धि को एक करके अनुभव करने की क्षमता) द्वारा 'अस्ति' भाव ही प्राप्त करने योग्य है। इस प्रकार
की उपलब्धि करने वाले से (अन्तःचेतन) प्रसन्न होता है। (वह आत्मदेव ही प्रसन्न होकर ब्रह्मानुभूति का
मार्ग खोल देता है) ॥ १३ ॥
यदा सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा येऽस्य हृदि श्रिताः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यत्र ब्रह्म समश्नुते।
व्यक्ति के हृदय में अनेक प्रकार की सांसारिक कामनाएँ रहती हैं, जब इनका समूल विनाश हो जाता
है, तब मनुष्य यहीं (इसी संसार में) ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है और अमर हो जाता है ॥१४॥
[ अन्य कामनाएँ रहते तत्त्वभाव बिखरा रहता है। उसके एक होने पर ही साक्षात्कार की स्थिति बनती है।]
यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः। अथ मर्त्योऽमृतो भवत्येतावद्ध्यनुशासनम्॥ १५॥
जब हृदय-ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं, तब यह मरणधर्मा मनुष्य अमरत्व को प्राप्त करता है, यही वेदान्त
का अनुशासन है ॥ १५॥
शतं चैका च हृदयस्य नाड्यस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका ।
तयोर्ध्वमायन्नमृतत्वमेति विष्वङ्डन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥ १६ ॥
हृदय में एक सौ एक नाड़ियों का समूह है, उसमें से एक मूर्धा (कपाल) का भेदन करके बाहर
निकलती है। उसके द्वारा ऊर्ध्वगमन करने वाला साधक अमृतत्व को प्राप्त करता है। अन्य अवशिष्ट नाड़ियाँ
प्राणोत्सर्ग में सहायक होती हैं। (उनसे निकला प्राण कामनाओं के अनुरूप विभिन्न योनियों में जाता है) ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः। तं स्वाच्छरीरात्
प्रवृहेन्मुञ्जादिवेषीकां धैर्येण। तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृतमिति ॥ १७॥
सबका अन्तरात्मा अङ्गुष्ठ परिमाण वाला है, जो परम पुरुष (परब्रह्म) के रूप में सदैव सबके हृदय
देश में प्रतिष्ठित है। जिस प्रकार मूँज से उसकी सींक अलग की जाती है, उसी प्रकार मनुष्य के लिए
उचित है कि वह धैर्यपूर्वक अपनी आत्मा को शरीर से पृथक् करे (पृथक् करके देखे-अनुभव करे), उसे
अमृत रूप और शुक्र (शुद्ध) समझे । वह अमृत स्वरूप ही है ॥ १७॥
मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधिं च कृत्स्नम्।
ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥ १८ ॥
मृत्यु (अर्थात् यमराज) द्वारा उपदिष्ट इस विद्या को पाकर नचिकेता समस्त विकारों से रहित और
सर्वथा शुद्ध होकर जन्म-मृत्यु के बन्धन से मुक्त हो गया और ब्रह्मभाव (ब्रह्मत्व) को प्राप्त हो गया । अन्य
कोई जो इस अध्यात्म तत्त्व को इस प्रकार समझेगा, वह भी ऐसी ही स्थिति प्राप्त करेगा अर्थात् वह भी
ब्रह्मरूप होकर भवबन्धनों से मुक्त हो जायेगा ॥ १८॥
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ सह नाववतु .......इति शान्तिः ॥
॥ इति कठोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ कनोपानषद् ॥
यह उपनिषद् सामवेदीय 'तलवकार ब्राह्मण' के नवें अध्याय के अन्तर्गत है। इसे तलवकार उपनिषद् तथा
'ब्राह्मणोपनिषद्' भी कहा जाता है। उपनिषद् का प्रारम्भ प्रश्न 'केनेषितं......' ( यह जीवन किसके द्वारा प्रेरित है ? )
से हुआ है। इसमें उस 'केन' ( किसके द्वारा ) का विवेचन होने से इसे 'केनोपनिषद्' कहा गया है। सर्वप्रेरक उस
परब्रह्म की महिमा और उसके स्वरूप का बोध कराते हुए ऋषि ने स्पष्ट किया है कि कहने-सुनने में ब्रह्म तत्त्व
जितना सुगम है, अनुभूति में वह उतना ही दुरूह है। प्रथम एवं द्वितीय खण्ड में गुरु-शिष्य संवाद के रूप में सुन्दर
ढंग से उस प्रेरक सत्ता की विशेषताओं, उसकी अनुभूति तथा उसे जान लेने की अनिवार्य आवश्यकताओं का
वर्णन किया गया है। तीसरे और चौथे खण्ड में देवताओं के अभिमान तथा मानमर्दन के लिए यक्ष रूप में ब्राह्मी
चेतना के प्रकट होने का उपाख्यान है। बाद में उमादेवी द्वारा प्रकट होकर देवों के लिए ब्रह्म तत्त्व का वर्णन किया
गया है। अन्त में परब्रह्म की उपासना के ढंग और फल का उल्लेख करते हुए ब्रह्मविद्या के संसाधनों के साथ उस
रहस्य को जानने की महिमा का वर्णन है।
॥ शान्तिपाठः ॥
ॐ आप्यायन्तु ममाङ्गानि वाक् प्राणश्चक्षुः श्रोत्रमथो बलमिन्द्रियाणि च सर्वाणि
सर्वं ब्रह्मोपनिषदं माहं ब्रह्म निराकुर्यां मा मा ब्रह्म निराकरोदनिराकरणमस्त्वनिराकरणं
मेऽस्तु तदात्मनि निरते य उपनिषत्सु धर्मास्ते मयि सन्तु ते मयि सन्तु ॥
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
हे परमात्मन् ! हमारे सभी अङ्ग पुष्ट हों, हमारी वाणी, प्राण, नेत्र, श्रोत्र, बल और सम्पूर्ण इन्द्रियाँ
पुष्ट हों । यह उपनिषद् ( प्रतिपादित ज्ञान ) ब्रह्म है, हम इसे अस्वीकार न करें । यह हमारा परित्याग न करे ।
हमारा इसके साथ अथवा इसका हमारे साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध हो । उपनिषदों में जो ( धर्म, ज्ञान आदि )
वर्णित हैं, वे हममें प्रविष्ट हों, हममें समाविष्ट हों । त्रिविध तापों की शान्ति हो।
॥ प्रथमः खण्डः ॥
ॐ केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः ।
केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥ १ ॥
किसके द्वारा प्रेरित किया हुआ यह मन अपने विषयों तक पहुँचता है ? किसके द्वारा नियोजित किया
हुआ यह श्रेष्ठ प्राण चलता है ? किसके द्वारा प्रेरित की हुई वाणी को मनुष्य बोलते हैं ? कौन सा अव्यक्त
देव हमारे नेत्रों और कानों को कार्य में नियुक्त करता है ? ॥ १॥
श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचः स उ प्राणस्य प्राणः ।
चक्षुषश्चक्षुरतिमुच्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ २ ॥
जो ( परमात्मतत्त्व ) कर्णेन्द्रिय का श्रोत्र ( श्रवण शक्ति ) है, मन का मन ( मनन क्षमता ) है, वागिन्द्रिय
की वाणी ( वाक् शक्ति ), प्राण का प्राण ( संचालक ) है, चक्षु का चक्षु ( दर्शन क्षमता ) है, अर्थात् जो इन
सबका कारणभूत तत्त्व है, ( उसे जानने वाले ) धीर पुरुष ( जो चक्षु, श्रोत्र, मन आदि के आवेगों से
उद्वेलित नहीं होते ) इस लोक से जाते हुए ( अथवा जीवन मुक्त होकर ) अमर हो जाते हैं ॥ २ ॥
न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो न विजानीमो यथैतदनुशिष्या-
दन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि। इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तद्व्याचचक्षिरे॥ ३ ॥
वहाँ (परब्रह्म परमात्मा तक) चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों, वाक् आदि कर्मेन्द्रियों तथा मन की भी पहुँच
नहीं है। उसे जानने की बुद्धि हममें नहीं है, न ही किसी अन्य की व्याख्या से यह संभव हो सकता है,
क्योंकि वह ज्ञात और अज्ञात सभी तत्त्वों से सर्वथा परे है- ऐसा हमने अपने पूर्वाचार्यों के मुख से सुना है,
जिन्होंने हमें उस ब्रह्म के विषय में भली-भाँति व्याख्या करके समझाया है ॥ ३ ॥
यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ४ ॥
जो वाणी के द्वारा वर्णित नहीं किया जा सकता; अपितु वाणी ही जिसकी महिमा से प्रकट होती है,
उसे ही तुम ब्रह्म समझो। वाणी द्वारा निरूपित जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥ ५ ॥
मन से जिसका मनन नहीं किया जा सकता; अपितु मन जिसकी महत्ता से मनन करता है,
उसी को ब्रह्म समझो। मन द्वारा मनन किए हुए जिसकी लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
जिसे चक्षु के द्वारा नहीं देखा जा सकता; अपितु चक्षु जिसकी महिमा से देखने में सक्षम होता है, उसे
ही तुम ब्रह्म जानो । चक्षु के द्वारा द्रष्टव्य जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ६ ॥
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
श्रोत्र से जिसे नहीं सुना जा सकता; अपितु श्रोत्र जिसकी महत्ता से सुनने में सक्षम होता है, उसे ही
तुम ब्रह्म जानो। श्रोत्रेन्द्रियगम्य जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ७ ॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
जो प्राण के द्वारा प्रेरित नहीं होता; किन्तु प्राण जिससे प्रेरित होते हैं, उसे ही तुम ब्रह्म जानो । प्राण
शक्ति से क्रियाशील जिस तत्त्व की लोग उपासना करते हैं, वह ब्रह्म नहीं है ॥ ८ ॥
॥ द्वितीयः खण्डः ॥
यदि मन्यसे सुवेदेति दभ्रमेवापि नूनं त्वं वेत्थ ब्रह्मणो रूपम्।
यदस्य त्वं यदस्य च देवेष्वथ नु मीमांस्यमेव ते मन्ये विदितम्॥ १ ॥
(आचार्य का कथन) यदि तुम्हारी यह मान्यता हैं कि मैं ब्रह्म को भली-भाँति जान गया हूँ, तो निश्चय
ही तुमने ब्रह्म का अत्यल्प अंश जाना है, क्योंकि उस परब्रह्म का जो अंश तुझमें है और जो अंश देवताओं
में है, वह सब मिलकर भी ब्रह्म का पूर्ण स्वरूप नहीं है, अतः तुम्हारा जाना हुआ निश्चय ही विचारणीय है॥ १ ॥
नाहं मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च। यो नस्तद्वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥ २ ॥
(शिष्य का उत्तर) हमने ब्रह्म को भली-भाँति जान लिया है, ऐसा नहीं मानते और न ऐसा ही मानते
हैं कि हम उसे पूर्णतया नहीं जानते; क्योंकि उसे जानते भी हैं। हम जानते हैं अथवा नहीं जानते-दोनों
उत्तर अपूर्ण हैं। हमारे इस कथन को वही जानता है, जो उस ब्रह्म को जानता है ॥ २ ॥
७२ केनोपनिषद्
यस्यामतं तस्य मतं मतं यस्य न वेद सः । अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥
जो यह मानता है कि ब्रह्म जानने में नहीं आता, वह ब्रह्म को जानता है एवं जो यह मानता है कि मैं
ब्रह्म को जानता हूँ, वह उसे नहीं जानता; क्योंकि जानने का अभिमान करने वालों के लिए वह ब्रह्म जाना
हुआ नहीं है और जानने के अभिमान से रहित पुरुष के लिए वह जाना हुआ है ॥ ३ ॥
प्रतिबोधविदितं मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्यं विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥
वह बोध जिसके द्वारा प्रत्येक वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाता है , उसी से मनुष्य अमृत स्वरूप परब्रह्म
को प्राप्त करता है । आत्मा ( अथवा आत्मज्ञान ) के द्वारा मनुष्य बल को प्राप्त करता है, उसी आत्मा के बल
को जानने की विद्या से वह अमृतस्वरूप परमात्मा को प्राप्त कर लेता है ॥ ४ ॥
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति न चेदिहावेदीन्महती विनष्टिः ।
भूतेषु भूतेषु विचित्य धीराः प्रेत्यास्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥ ५ ॥
जिसने यदि इसी जन्म में उस परब्रह्म को प्राप्त कर लिया, तो उसने यथार्थ ( लक्ष्य ) पा लिया,
जो इस जीवन में उसे नहीं जान पाया, तो उसने ( अमूल्य अवसर गँवाकर ) अपनी महती हानि की ।
अतः बुद्धिमान् पुरुष प्रत्येक प्राणी में और प्रत्येक तत्त्व में उस परमात्म सत्ता को व्याप्त जानकर इस
लोक से प्रयाण कर अमर हो जाते हैं ॥ ५ ॥
॥ तृतीयः खण्डः ॥
पिछले दो खण्डों में प्रत्येक दिव्य प्रवाह की शक्ति के मूल कारण रूप जिस परमात्म तत्त्व की विवेचना की
गयी है, अगले दो खण्डों में उसी तथ्य को कथानक के माध्यम से स्पष्ट किया गया है-
ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त ।
त ऐक्षन्तास्माकमेवायं विजयोऽ स्माकमेवायं महिमेति ॥ १ ॥
( एक समय) उस ब्रह्म ने देवों को निमित्त बनाकर असुरों पर विजय प्राप्त की; परन्तु देवों को उस
विजय का अभिमान हो गया और वे इस विजय को अपनी ही महिमा का प्रभाव समझने लगे ॥ १ ॥
तद्धैषां विजज्ञौ तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव तन्न व्यजानत किमिदं यक्षमिति ॥ २ ॥
उस ब्रह्म ने देवों के उस अहं भाव को जान लिया और तब उनके सामने वह यक्ष रूप में प्रकट हुआ,
परन्तु देवगण उसे नहीं पहचान सके और कहने लगे -'यह दिव्य यक्ष कौन है' ॥ २ ॥
तेऽ ग्रिमब्रुवञ्जातवेद एतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ३ ॥
देवों ने अग्नि से कहा- हे देव ! आप पता लगाएँ कि यह कौन है ? इस पर उन्होंने कहा- बहुत अच्छा।
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽ सीत्यग्निर्वा अहमस्मीत्यब्रवीज्जातवेदा वा अहमस्मीति ॥
अग्निदेव तेजी से दौड़कर यक्षरूप ब्रह्म के पास पहुँचे । यक्ष ने पूछा- आप कौन हैं ? इस पर अग्निदेव
ने कहा- मैं अग्नि हूँ, मुझे ही लोग जातवेदा कहते हैं ॥ ४ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वं दहेयं यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ५ ॥
यक्ष ने अग्निदेव मे पूछा- आप में क्या शक्ति है ? ऐसा पूछे जाने पर अग्निदेव ने कहा- मैं चाहूँ तो
इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे भस्म कर सकता हूँ ॥ ५ ॥
खण्ड ४ मन्त्र १ ७३
तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाक दग्धुं स तत एव
निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ ६ ॥
तब यक्ष ने अग्निदेव के समक्ष एक तिनका रखकर उसे भस्म करने के लिए कहा; परन्तु अपनी पूरी
शक्ति लगाने पर भी वे उसे जलाने में समर्थ नहीं हुए। तब वे वहाँ से लौटकर देवों से कहने लगे- मैं इस
दिव्य यक्ष को जानने में असमर्थ रहा ॥ ६ ॥
अथ वायुमब्रुवन्वायवेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति तथेति ॥ ७ ॥
तदनन्तर देवों ने वायुदेव से कहा- हे वायुदेव ! इस रहस्य का आप ही पता लगाएँ। उस दिव्य यक्ष
के विषय में पता लगाना उन्होंने स्वीकार किया ॥ ७ ॥
तदभ्यद्रवत्तमभ्यवदत्कोऽसीति वायुर्वा अहमस्मीत्यब्रवीन्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥
वायुदेव द्रुतगति से दौड़कर उस यक्ष के पास पहुँचे। यक्ष द्वारा परिचय पूछा गया- आप कौन हैं ?
वायुदेव ने कहा- मैं प्रसिद्ध वायुदेव हूँ। मुझे ही मातरिश्वा कहते हैं ॥ ८ ॥
तस्मिंस्त्वयि किं वीर्यमित्यपीदं सर्वमाददीय यदिदं पृथिव्यामिति ॥ ९ ॥
यक्ष ने पूछा- आपमें क्या सामर्थ्य है ? वायुदेव बोले- इस पृथ्वी पर जो कुछ भी है, मैं उसे उड़ा ले
जा सकता हूँ ॥ ९ ॥
तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन तन्न शशाकादातुं स तत एव
निववृते नैतदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥ १० ॥
तब उस यक्ष ने उनके सामने तिनका रखकर उसे उड़ाने के लिए कहा; परन्तु अपनी सारी शक्ति
लगाकर भी वायुदेव उसे उड़ा सकने में समर्थ नहीं हुए। तब वहाँ से लौटकर उन्होंने देवों के सामने उस
यक्ष को समझ पाने में अपनी असमर्थता व्यक्त की ॥ १० ॥
अथेन्द्रमब्रुवन्मघवन्नेतद्विजानीहि किमेतद्यक्षमिति। तथेति तदभ्यद्रवत्तस्मात्तिरोदधे ॥
तब देवों ने इन्द्रदेव से कहा- हे मघवन् ! आप ही इस बात का पता लगाएँ कि यह यक्ष कौन है ?
इन्द्रदेव ने यक्ष के विषय में पता लगाना स्वीकार किया और यक्ष की ओर दौड़े; परन्तु इन्द्रदेव के वहाँ
पहुँचते ही यक्ष अन्तर्धान हो गया ॥ ११ ॥
स तस्मिन्नेवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानामुमाꣳ हैमवतीं ताꣳ होवाच
किमेतद्यक्षमिति ॥ १२ ॥
तब इन्द्रदेव उसी आकाश में स्थित अतिशय शोभामयी भगवती हैमवती (हिमाचल पुत्री) उमादेवी
के पास (आ) गये और उनसे पूछने लगे-यह यक्ष कौन था ? ॥ १२ ॥
॥ चतुर्थः खण्डः ॥
सा ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयध्वमिति ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥
उमादेवी बोलीं- वे ब्रह्म हैं, उनकी विजय को तुम लोगों ने अपने अहम्भाव से अपनी विजय मान लिया था।
देवी उमा के इस उत्तर से इन्द्रदेव ने स्पष्ट समझ लिया कि वह दिव्य यक्ष निश्चय ही ब्रह्म थे ॥ १ ॥
७४ केनोपनिषद्
तस्माद्वा एते देवा अतितरामिवान्यान्देवान्यदग्निर्वायुरिन्द्रस्तेन ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पृशुस्ते
ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥ २ ॥
ये तीनों देव-अग्नि, वायु और इन्द्रदेव अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ माने जाते हैं; क्योंकि ब्रह्म को शक्ति
के रूप में इन्हीं देवों ने सर्वप्रथम समझा और ब्रह्म का निकट से साक्षात्कार किया ॥ २ ॥
तस्माद्वा इन्द्रोऽ तितरामिवान्यान्देवान्स ह्येनन्नेदिष्ठं पस्पर्श स ह्येनत्प्रथमो विदांचकार ब्रह्मेति ॥
निकट से ब्रह्म का स्पर्श करने से, सबसे पहले जान लेने से इन्द्रादि देवगण अन्य देवों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं ॥ ३ ॥
तस्यैष आदेशो यदेतद्विद्युतो व्यद्युतदा ३ इतीन्त्यमीमिषदा ३ इत्यधिदैवतम् ॥ ४ ॥
(इन्द्रदेव के सम्मुख यक्ष का अन्तर्धान हो जाना) ब्रह्म की उपस्थिति का संकेत बिजली के चमकने
और पलक के झपकने जैसा होता है । इसे उसका सूक्ष्म आधिदैविक संकेत समझना चाहिए ॥ ४ ॥
अथाध्यात्मं यदेतद्गच्छतीव च मनोऽ नेन चैतदुपस्मरत्यभीक्ष्णᳵ संकल्पः ॥ ५ ॥
आध्यात्मिक दृष्टि से यह समझना चाहिए कि मन जो ब्रह्म के पास जाता हुआ सा प्रतीत होता है और ब्रह्म
का स्मरण करता हुआ सा लगता है तथा ब्रह्म प्राप्ति का संकल्प करता हुआ सा भासित होता है । (यह भी ब्रह्म की
उपस्थिति का सूक्ष्म संकेत है ) ॥ ५ ॥
तद्ध तद्वनं नाम तद्वनमित्युपासितव्यं स य एतदेवं वेदाऽ भि हैनᳵ सर्वाणि भूतानि
संवाञ्छन्ति ॥ ६ ॥
समस्त प्राणी उस ब्रह्म से प्रेम करते हैं और उसे पाना चाहते हैं, वह तद्वन नाम से प्रसिद्ध है । ब्रह्म के
इसी 'तद्वन' स्वरूप की सभी को उपासना करनी चाहिए। जो साधक ब्रह्म के इस स्वरूप को जान लेता
है, उसे सब प्राणी अपना प्रिय मानने लगते हैं ॥ ६ ॥
[ ऋषि ने ब्रह्म को 'तद्वन' कहा है । आचार्य शंकर ने इसका अर्थ तद्-भजनीयम् (वह ध्यान करने योग्य है)
किया है । 'वन'- रस के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है, इस आधार पर ब्रह्म मूल रूप से 'रस स्वरूप' है - ऐसा बोध
होता है। ऋषि का मानना है कि जिस साधक की गति आत्म तत्त्व में हो जाती है, उसकी आत्मीयता का विस्तार
इतना हो जाता है कि उसके प्रभाव में सभी प्राणी आ जाते हैं।]
उपनिषदं भो ब्रूहीत्युक्ता य उपनिषद्ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥ ७ ॥
(ब्रह्म विद्या के इस सांकेतिक उपदेश को न समझ पाने के कारण पुनः शिष्य कहता है) हे गुरुदेव !
हमें ब्रह्मविद्या स्वरूप उपनिषद् का उपदेश दें। तब उन्होंने कहा कि अभी तक जो कुछ भी कहा गया है,
वही ब्रह्मविद्या है, तुम्हें निश्चय ही मैंने ब्रह्मविद्या सिखा दी है ॥ ७ ॥
तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदाः सर्वाङ्गानि सत्यमायतनम् ॥ ८ ॥
तपस्या, मन एवं इन्द्रियों का नियन्त्रण तथा आसक्ति रहित श्रेष्ठ कर्म-ये ही ब्रह्मविद्या प्राप्ति के आधार
हैं। वेद में इस विद्या का सविस्तार वर्णन है। सत्यस्वरूप ब्रह्म ही इस विद्या का प्राप्य-लक्ष्य है ॥ ८ ॥
यो वा एतामेवं वेदापहत्य पाप्मानमनन्ते स्वर्गे लोके ज्येये प्रतितिष्टति प्रतितिष्ठति ॥ ९ ॥
इस ब्रह्मविद्या के रहस्य को भली-भाँति जानने वाला साधक अपने समस्त पापसमूह को विनष्ट कर
अविनाशी, असीम एवं सर्वश्रेष्ठ स्थिति में पहुँच जाता है - परमधाम को प्राप्त कर लेता है ॥ ९ ॥
॥ इति केनोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ गायत्र्युपनिषद् ✪॥
यह उपनिषद् अथर्ववेद से सम्बद्ध गोपथ ब्राह्मण की ३१ से ३८ तक की आठ कण्डिकाओं के
संकलन रूप में है। इसमें मौद्गल्य और मैत्रेय ऋषियों के संवाद के माध्यम से गायत्री महाविद्या का
विवेचन किया गया है। पहली दूसरी कण्डिका में भूमिका भाग तथा गायत्री मंत्र के सवितुः, वरेण्यं, भर्गः,
देवस्य, धियः, प्रचोदयात् आदि शब्दों को परिभाषित किया गया है। तीसरी कण्डिका में सविता और
सावित्री की अभिन्नता तथा उनके विविध रूपों का वर्णन है। चौथी, पाँचवीं एवं छठवीं कण्डिकाओं में
क्रमशः गायत्री महामन्त्र के तीनों चरणों की व्याख्या और उनके विस्तार का उल्लेख है। सातवीं-आठवीं
कण्डिका में ब्रह्म, यज्ञ और ब्राह्मण की समस्वरता की व्याख्या की गई है।
॥ प्रथमा कण्डिका ॥
एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमेकादशाक्षम्मौद्गल्यं ग्लावो मैत्रेयोऽभ्याजगाम स तस्मिन् ब्रह्मचर्यं
वसतो विज्ञायोवाच किं स्विन्मर्या अयं तं मौद्गल्योऽध्येति यदस्मिन् ब्रह्मचर्ये वसतीति ॥
ग्यारह अक्षों (ज्ञान अथवा ज्ञानेन्द्रियों) वाले विद्वान् मौद्गल्य (मुद्गल वंशीय) के पास ग्लाव
मैत्रेय (मित्रयु के शिष्य अथवा गोत्र वाले) आये। वे मौद्गल्य के आश्रम में निवासरत ब्रह्मचारियों को
देखकर उनसे (उपहास करते हुए) कहने लगे- यह मौद्गल्य अपने ब्रह्मचारियों को क्या पढ़ाता है ? ॥१॥
[ 'ग्यारह अक्ष' यह सम्बोधन उनके विशेष ज्ञाता होने का प्रमाण है। दस इन्द्रियों या दस प्राणों (५ प्राण+५
उपप्राणों) के अतिरिक्त जिनका आत्म तत्त्व भी जाग्रत् है, उन्हें ११ अक्षों-पहलुओं वाला कहा गया है।]
तद्धि मौद्गल्यस्यान्तेवासी शुश्राव सः आचार्यायाव्रज्याचचक्षे दुरधीयानं वा अयं
भवन्तमवोचद्योऽयमद्यातिथिर्भवति किं सौम्य विद्वानिति। त्रीन् वेदान् ब्रूते भो३इति ॥ २ ॥
मौद्गल्य के ब्रह्मचारी ने यह बात सुनकर अपने आचार्य से जाकर कहा- जो आज यह अतिथि हैं,
उन्होंने आपको अज्ञानी बताया है। मौद्गल्य ने पूछा- क्या वे विद्वान् हैं ? शिष्य ने उत्तर दिया- हा देव ! वे
तीनों वेदों के उपदेशक हैं ॥ २ ॥
तस्य सौम्य यो विस्पष्टो विजिगीषोऽन्तेवासी तन्मे ह्वयेति ॥ ३ ॥
हे सौम्य ! उनका जो विद्वान्, तत्त्वदर्शी तथा विजयाकांक्षी शिष्य है, उसे तुम मेरे पास ले आओ,
मौद्गल्य ने अपने शिष्य से कहा ॥ ३ ॥
तमाजुहाव तमभ्युवाचासाविति भो३इति किं सौम्य त आचार्योऽध्येतीति, त्रीन्
वेदान् ब्रूते भो३इति ॥ ४ ॥
✪ इस नाम की २ उपनिषदें उपलब्ध होती हैं। एक शतपथ ब्राह्मण (१४.५.१.१-८) के बृहदारण्यकोपनिषद्
(५.१४.१-८) के अन्तर्गत आती है, दूसरी गोपथ ब्राह्मण (१.३१-३८) के अन्तर्गत। इस संग्रह में शतपथ ब्राह्मण
के अन्तर्गत वर्णित गायत्री उपनिषद् तो बृहदारण्यको० में उपलब्ध है ही। अस्तु, उसकी पुनरावृत्ति समीचीन न
मानकर गोपथ ब्राह्मण वाली उपनिषद् को ही चयनित किया गया है।
७६ गायत्रीप्युपनिषद्
वह उसे बुला लाया और आचार्य से कहने लगा- गुरुवर! वह यह है। उन्होंने उनसे पूछा- हे सोम्य!
तुम्हारे आचार्य तुम्हें क्या पढ़ाते हैं? शिष्य ने कहा- श्रीमन्! वे तीनों वेदों के उपदेशक हैं ॥ ४ ॥
यन्नु खलु सौम्यास्माभिः सर्वे वेदा मुखतो गृहीताः कथन्त एवमाचार्यो भाषते कथं
नु शिष्टाः शिष्टेभ्य एवं भाषेरन् यं होनमहं प्रश्नं प्रच्छामि न तं विवक्ष्यति न होनमध्यैतीति ॥
हे सोम्य! क्योंकि हमने सब वेद मुखाग्र ग्रहण किये हैं, तुम्हारे आचार्य ऐसा क्यों कहते हैं कि मैं
अज्ञानी हूँ। क्या उन्हें नहीं ज्ञात है कि शिष्ट लोग शिष्टों से कैसे वार्त्ता करते हैं? अब मैं जिस प्रश्न को पूछता
हूँ यदि वे नहीं बताएँगे, तो इसका तात्पर्य होगा कि वे वेद नहीं पढ़ाते हैं ॥ ५ ॥
तां भवान् प्रब्रवीत्विति स चेत्सौम्य दुरधीयानो भविष्यत्याचार्योवाच ब्रह्मचारी
ब्रह्मचारिणे सावित्रीं प्राहेति वक्ष्यति तत्त्वं ब्रूयात् दुरधीयानन्तं वै भवान् मौद्गल्यमवोचत्
स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः पुरा संवत्सरादार्त्तिमाकृष्यसीति ॥ ६ ॥
हे सोम्य! यदि वे अज्ञानी होंगे, तो कहेंगे कि आचार्य अपने बालब्रह्मचारी और ब्रह्मचारियों को
जिसका उद्बोधन देते हैं, वह सावित्री है। तुम कहना आपने उन मौद्गल्य को अज्ञानी कहा था, वे आपसे
एक प्रश्न पूछेंगे, यदि उसे आपने नहीं बताया, तो आपको एक वर्ष तक भारी पीड़ा सहनी होगी ॥ ६ ॥
॥ द्वितीया कण्डिका ॥
स ह मौद्गल्यः स्वमन्तेवासिनमुवाच, परेहि सौम्य ग्लावं मैत्रेयमुपसीदाधीहि भोः सावित्रीं
गायत्रीञ्चतुर्विंशतियोनिं द्वादशमिथुनां यस्या भृग्वङ्गिरसश्चक्षुर्यस्यां सर्वमिदं श्रितम् ॥ १ ॥
तदनन्तर मौद्गल्य ऋषि ने अपने शिष्य से कहा- हे सोम्य! तुम ग्लाव मैत्रेय के पास जाओ
और कहो- हे आचार्य! चौबीस सूक्ष्म केन्द्रों वाली, बारह जोड़ों वाली सावित्री-गायत्री के सम्बन्ध
में बताएँ, जिसके भृगु-आङ्गिरस (ज्ञान की विशिष्ट धाराएँ) नेत्र हैं, जिसमें यह सब आश्रित हैं,
आप उस गायत्री का हमें उपदेश करें ॥ १ ॥
स तत्राजगाम यत्रेत्तरो बभूव, तं ह पप्रच्छ स ह न प्रतिपेदे, तं होवाच दुरधीयानंतं वै
भवान् मौद्गल्यमवोचत् स त्वा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचः पुरासंवत्सरादार्त्तिमाकृष्यसीति ॥ २ ॥
वह (मौद्गल्य का शिष्य) वहाँ पहुँचा, जहाँ मैत्रेय का आश्रम था। उसने उनसे (मैत्रेय से) पूछा; किन्तु
वे उस प्रश्न का उत्तर न दे सके। तदनन्तर उसने उनसे कहा- भगवन्! आपने मौद्गल्य को अज्ञानी बताया था।
उन्होंने आपसे प्रश्न पूछा और आप न बता सके, सो आपको एक वर्ष तक पीड़ा सहनी होगी ॥ २ ॥
स ह मैत्रेयः स्वानन्तेवासिन उवाच यथार्थं भवन्तो यथागृहं यथामनो विप्रसृज्यन्तां
दुरधीयानं वा अहं मौद्गल्यमवोचं स मा यं प्रश्नमप्राक्षीन्न तं व्यवोचं तमुपैष्यामि शान्तिं
करिष्यामीति ॥ ३ ॥
उन मैत्रेय ऋषि ने अपने शिष्यों से यथार्थपूर्वक कहा- आप लोग अपने घर को इच्छानुसार प्रस्थान
करें। मैंने मौद्गल्य को अयोग्य बताया था, उन्होंने मुझसे जो प्रश्न पूछा है, वह मैं नहीं बता सका। अब मैं
उनके पास जाऊँगा और उन्हें शान्ति (सन्तुष्टि) प्रदान करूँगा ॥ ३ ॥
खण्ड २ मन्त्र ८ ७७
स ह मैत्रेयः प्रातः समित्पाणिर्मौद्गल्यमुपससादासावाग्रहं भो मैत्रेयः किमर्थमिति
दुरधीयानं वा अहं भवन्तमवोचं त्वं मा यम्पृश्रमप्राक्षीन्नं तं व्यवोचं त्वामुपेव्यामि शान्तिं
करिष्यामीति ॥ ४ ॥
वे हाथ में समिधा लिये प्रातःकाल ज्ञान के आग्रह के साथ मौद्गल्य के पास पहुँचे और बोले - हे
आचार्य ! मैं मैत्रेय हूँ। मौद्गल्य ने पूछा- कैसे आगमन हुआ ? (मैत्रेय) मैंने आपको अयोग्य बताया था।
आपने मुझसे जो प्रश्न पूछा था, वह मैं नहीं बता पाया। अब मैं आपके पास सेवा में उपस्थित होकर आपको
सन्तुष्ट करूँगा ॥ ४ ॥
स होवाचात्र वा उपेतञ्च सर्वञ्च कृतं पापकेन त्वा यानेन चरन्तमाहूरथोऽयं मम
कल्याणस्तंते ददामि तेन याहीति ॥ ५ ॥
मौद्गल्य ऋषि ने कहा- आप यहाँ आये हैं। लोग कहते हैं कि आप शुद्ध भाव से नहीं आये हैं;
तो भी मैं आपको कल्याणकारी भावों का रथ देता हूँ, इसी से चलें ॥ ५ ॥
[ रथ का अर्थ होता है संवाहक ( कैरियर )- जो लक्ष्य तक पहुँचाये। मनुष्य अपने भावों के अनुरूप ही
जीवन की गति प्राप्त करता है। कल्याण चाहने वालों को कल्याणकारी भावों का ही आश्रय लेना होता है।]
स होवाचैतदेवात्रात्विषञ्चानृशंस्यञ्च यथा भवानाहोपायामित्येवं भवन्तमिति तं
होपेयाय तं होपेत्य पप्रच्छ किंस्विदाहुर्भोः सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयः किमाहुर्धियो
विचक्ष्व यदि ताः प्रवेक्ष्य प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ६ ॥
मैत्रेय ऋषि ने कहा- आपका वचन अभयकारी और सत्य है। जैसा आप कहते हैं, वैसा ही करने
के लिए मैं आपके पास उपस्थित हूँ। वे मौद्गल्य ऋषि के पास विधिपूर्वक उपस्थित हुए और पास आकर
पूछने लगे- हे आचार्य ! सविता का वरणीय तत्त्व क्या है ? उस देव का भर्ग क्या है ? इसका उत्तर
क्रान्तदर्शी क्या बताते हैं ? धी संज्ञक तत्त्व की व्याख्या क्या करते हैं, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव
द्युलोक में प्रविष्ट होकर विचरण करता है ? ॥ ६ ॥
तस्मा एतत् प्रोवाच वेदाश्छन्दांसि सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य कवयोऽन्नमाहुः ।
कर्माणि धियस्तदु ते ब्रवीमि प्रचोदयात्सविता याभिरेतीति ॥ ७ ॥
उन मैत्रेय से मौद्गल्य ऋषि ने कहा- वैदिक छन्द सविता के वरणीय तत्त्व हैं। मेधावी पुरुष
अन्न को ही उस देव का भर्ग बताते हैं। कर्म ही वह धी तत्त्व है, जिन्हें प्रेरित करता हुआ वह देव
गमन करता है ॥ ७ ॥
[ सविता-सर्व प्रेरक है। छन्दों में जो उसके प्रेरक तत्त्व प्रकट हुए हैं, वे ही वरणीय हैं, अन्य अव्यक्त प्रवाह
मनुष्य की ग्रहण शक्ति के परे होने से वरणीय नहीं हैं। धी बुद्धि को कहते हैं। सविता देव कर्म प्रेरक बुद्धि युक्त
होकर विचरण करते हैं, ऐसा ऋषि का भाव प्रतीत होता है।]
तमुपसंगृह्य पप्रच्छाधीहि भोः कः सविता का सावित्री ॥ ८ ॥
उसे सुनकर मैत्रेय ने मौद्गल्य से आदरपूर्वक पूछा- हे आचार्य ! हमें बताएँ, सविता क्या है
और सावित्री क्या है ? ॥ ८ ॥
७८ गायत्र्युपनिषद्
॥ तृतीया कण्डिका ॥
मन एव सविता, वाक् सावित्री, यत्र ह्येव मनस्तद् वाक्, यत्र वै वाक् तन्मन इत्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १ ॥
मौद्गल्य ऋषि ने कहा- मन ही सविता (प्रेरक तत्त्व) और वाणी सावित्री (प्रेरित तत्त्व) है। जहाँ
पर मन है, वहाँ वाणी है, जहाँ वाणी है; वहाँ मन है। ये दो एक युग्म हैं, योनि (उत्पादक केन्द्र) रूप हैं॥
अग्नेिरेव सविता, पृथिवी सावित्री यत्र ह्येवाग्निस्तत्पृथिवी यत्र वे पृथिवी तदग्निरित्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ २ ॥
अग्नि ही सविता है और पृथ्वी सावित्री है। जहाँ पर अग्नि है, वहाँ पृथ्वी है, जहाँ पृथ्वी है; वहाँ
अग्नि है। ये दो (अग्नि और पृथ्वी) एक जोड़ा हैं, योनिरूप हैं॥ २ ॥
वायुरेव सविताऽन्तरिक्षं सावित्री यत्र ह्येव वायुस्तदन्तरिक्षं, यत्र वा अन्तरिक्षं
तद्वायुरित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ३ ॥
वायु ही सविता है और अन्तरिक्ष सावित्री है। जहाँ पर वायु है, वहाँ अन्तरिक्ष है; जहाँ अन्तरिक्ष है,
वहाँ वायु है। ये दो (वायु और अन्तरिक्ष) एक युग्म और उत्पादक केन्द्र हैं॥ ३ ॥
आदित्य एव सविता द्यौः सावित्री यत्र ह्येवादित्यस्तद्द्यौर्यत्र वै द्यौस्तदादित्य
इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ४ ॥
आदित्य ही सविता है और द्युलोक सावित्री है। जहाँ पर आदित्य है, वहाँ द्यौ है; जहाँ द्यौ है, वहाँ
आदित्य है। ये दोनों (द्यौ और आदित्य) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ४ ॥
चन्द्रमा एव सविता, नक्षत्राणि सावित्री, यत्र ह्येव चन्द्रमास्तन्नक्षत्राणि यत्र वै
नक्षत्राणि तच्चन्द्रमा, इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ५ ॥
चन्द्रमा ही सविता है और नक्षत्र सावित्री है। जहाँ चन्द्रमा है, वहाँ नक्षत्र है तथा जहाँ नक्षत्र है, वहाँ
चन्द्रमा है। ये दोनों (चन्द्रमा और नक्षत्र) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ५ ॥
अहुरेव सविता, रात्रिः सावित्री, यत्र ह्येवाहस्तद्रानिर्यत्र वै रात्रिस्तदहरित्येते द्वे
योनी एकं मिथुनम् ॥ ६ ॥
दिन ही सविता है और रात्रि सावित्री है। जहाँ पर दिन है, वहाँ रात्रि है; जहाँ रात्रि है, वहाँ दिन है।
ये दो (दिन और रात्रि) उत्पत्ति केन्द्र हैं, एक जोड़ा हैं॥ ६ ॥
उष्णामेव सविता, शीतं सावित्री, यत्र ह्येवोष्णं, तच्छीतं, यत्र वै शीतं तदुष्णमित्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ७ ॥
उष्णता ही सविता है और शीत सावित्री है। जहाँ उष्णता है, वहाँ शीत है; जहाँ शीत है, वहा
उष्णता है। ये दोनों (उष्णता और शीत) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ७ ॥
अब्भ्रमेव सविता वर्ष सावित्री यत्र ह्येवाब्भ्रन्तद्वर्षं यत्र वै वर्षं तदब्भ्रमित्येते द्वे योनी
एकं मिथुनम् ॥ ८ ॥
खण्ड ४ मन्त्र १ ७९
मेघ ही सविता है और वर्षण सावित्री है। जहाँ पर मेघ है, वहाँ वर्षण है; जहाँ वर्षण है, वहाँ मेघ
है। ये दोनों (मेघ और वर्षण) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ८ ॥
विद्युदेव सविता स्तनयित्नुः सावित्री यत्र ह्येव विद्युत् तत् स्तनयित्नुः यत्र वै
स्तनयित्नुस्तद्विद्युदित्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ९ ॥
विद्युत् ही सविता है और उसकी तड़क सावित्री है। जहाँ पर विद्युत् है, वहाँ तड़क है जहाँ पर
तड़क है, वहाँ विद्युत् है। ये दोनों (विद्युत् और तड़क) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ९ ॥
प्राण एव सविता अन्नं सावित्री, यत्र ह्येव प्राणस्तदन्नं यत्र वा अन्नं तत् प्राण इत्येते
द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १० ॥
प्राण सविता है और अन्न सावित्री है। जहाँ पर प्राण है, वहाँ अन्न है; जहाँ अन्न है, वहाँ प्राण है। ये
दोनों (प्राण और अन्न) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १०॥
वेदा एव सविता छन्दांसि सावित्री, यत्र ह्येव वेदास्तच्छन्दांसि यत्र वै छन्दांसि तद्
वेदा इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ ११॥
वेद ही सविता है और छन्द सावित्री है। जहाँ वेद हैं, वहाँ छन्द हैं, जहाँ छन्द हैं, वहाँ वेद हैं। दोनों
(वेद और छन्द) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ ११॥
यज्ञ एव सविता दक्षिणा सावित्री, यत्र ह्येव यज्ञस्तत् दक्षिणा यत्र वै दक्षिणास्तद्यज्ञ
इत्येते द्वे योनी एकं मिथुनम् ॥ १२ ॥
यज्ञ ही सविता है और दक्षिणा सावित्री। जहाँ यज्ञ है, वहाँ दक्षिणा है और जहाँ दक्षिणा है, वहाँ यज्ञ
है। ये दोनों (यज्ञ और दक्षिणा) एक जोड़ा और उत्पत्ति केन्द्र हैं॥ १२ ॥
एतद्ध स्मैतद्विद्वांसमोपाकारिमासस्तुर्ब्रह्मचारी ते संस्थित इत्यथैत आसस्तुराचित
इव चितो बभूवाथोत्थाय प्राव्राजीदित्येतद्वाऽहं वेद नैतासु योनिश्वित एतेभ्यो वा मिथुनेभ्यः
सम्भूतो ब्रह्मचारी मम पुरायुषः प्रेयादिति ॥ १३ ॥
(तदनन्तर ग्लाव मैत्रेय ने मौद्गल्य से कहा) हे विद्वान् आचार्य ! आपके द्वारा मैं उपकृत हुआ हूँ।
यह ब्रह्मचारी आपकी सेवा में (दक्षिणा हेतु) उपस्थित है। यह ब्रह्मचारी आपके यहाँ आकर ज्ञान से
परिपूर्ण हो गया है। ऐसा कहकर वे (मैत्रेय) वहाँ से उठकर टहलते हुए बोले- अब मैं यह जान गया हूँ,
इन जोड़ों तथा उत्पत्ति केन्द्रों से जुड़ा मेरा ब्रह्मचारी अल्पायु नहीं होगा॥ १३ ॥
॥ चतुर्थी कण्डिका ॥
ब्रह्म हेदं श्रियं प्रतिष्ठामायतनमैक्षत तत्तपस्व यदि तद् व्रते ध्रियेत तत्सत्ये प्रत्यतिष्ठत् ॥ १॥
मौद्गल्य ने मैत्रेय से कहा- यह ब्रह्म ही श्रीरूप, प्रतिष्ठा रूप और आश्रयरूप है, इसलिए आप तप
करें। यदि तपः-व्रत को धारण किया जाए, तो सत्य में प्रतिष्ठा होती है॥ १॥
८० गायत्रीउपनिषद्
स सविता सावित्र्या ब्राह्मणं सृष्ट्वा तत् सावित्रीं पर्यदधात् तत् सवितुर्वरेण्यमिति
सावित्र्याः प्रथमः पादः ॥ २ ॥
उन देव सविता ने सावित्री के साथ ब्राह्मण (ब्रह्मज्ञान सम्पन्न) को उत्पन्न कर उसे सावित्री (मन्त्र)
को धारण कराया- तत्सवितुर्वरेण्यं- यह सावित्री का पहला चरण है॥ २॥
पृथिव्यर्चं समदधादृचाऽग्निमग्निना श्रियं श्रिया स्त्रियं स्त्रिया मिथुनं मिथुनेन प्रजां
प्रजया कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं सत्येन ब्रह्म ब्रह्मणा ब्राह्मणं ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै
ब्राह्मणः संशितोभवत्यशून्यो भवत्यविच्छिन्नः ॥ ३ ॥
(देव सविता ने) पृथ्वी के साथ ऋक् को संयुक्त किया। ऋक् से अग्नि को, अग्नि से श्री को, श्री
से स्त्री को, स्त्री से जोड़े को, जोड़े के साथ प्रजा को, प्रजा से कर्म को, कर्म से तप को, तप से सत्य को
सत्य से ब्रह्म (वेदज्ञान) को, ब्रह्म (वेदज्ञान) से ब्राह्मण को, ब्राह्मण से व्रत को संयुक्त किया। व्रत से ही
वह ब्राह्मण तेजस्वी होता है, परिपूर्ण होता है और अविच्छिन्न होता है ॥ ३ ॥
भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं
विद्वानेवमेतं सावित्र्याः प्रथमं पादं व्याचष्टे ॥ ४ ॥
जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के प्रथम चरण (वरण करने योग्य) को जानता है और जानकर इस
प्रकार व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न होता है ॥ ४ ॥
॥ पञ्चमी कण्डिका ॥
भर्गो देवस्य धीमहीति सावित्र्या द्वितीयः पादोऽन्तरिक्षेण यजुः समदधात् यजुषा
वायुं, वायुनाऽभ्रमभ्रेण वर्षं, वर्षेणौषधिवनस्पतीनौषधि वनस्पतिभिः पशून् पशुभिः
कर्म कर्मणा तपस्तपसा सत्यं, सत्येन ब्रह्म, ब्रह्मणा ब्राह्मणं, ब्राह्मणेन व्रतं व्रतेन वै
ब्राह्मणः संशितो भवत्यशून्यो भवत्यविच्छिन्नः ॥ १ ॥
'भर्गो देवस्य धीमहि' - यह सावित्री का द्वितीय चरण है। देव सविता ने अन्तरिक्ष के साथ यजुष्
को संयुक्त किया। यजुष् के साथ वायु को, वायु के साथ मेघ को, मेघ के साथ वर्षा को, वर्षा के साथ
ओषधियों एवं वनस्पतियों को, ओषधियों एवं वनस्पतियों के साथ पशुओं को, पशुओं के साथ कर्म को,
कर्म के साथ तप को, तप के साथ सत्य को, सत्य के साथ ब्रह्म (वेदज्ञान) को, ब्रह्म (वेदज्ञान) से ब्राह्मण
को, ब्राह्मण से व्रत को संयुक्त किया। व्रत से ही ब्राह्मण तेजस्वी, परिपूर्ण और अविच्छिन्न होता है॥ १॥
भवत्यविच्छिन्नोऽस्य तन्तुरविच्छिन्नं जीवनं भवति य एवं वेद यश्चैवं विद्वानेवमेतं
सावित्र्या द्वितीयं पादं व्याचष्टे ॥ २ ॥
जो विद्वान् इस प्रकार सावित्री के द्वितीय चरण (धारण किये जाने वाले भर्ग तत्त्व) को जानता है और
इस प्रकार व्याख्या करता है, उसका वंश और उसका जीवन अविच्छिन्न होता है ॥ २ ॥