१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ २७९
अध्याय २ ब्राह्मण ६ मन्त्र ३ २७९
उन शरीरों में प्रविष्ट हो गया। इसी कारण पुरुष को "पुरिशय" (पुरों-शरीरों में स्थित) कहते हैं।
इस सृष्टि में ऐसा कोई नहीं है, जिसके अन्दर वह प्रविष्ट न हो ॥ १८ ॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचद्रूपं रूपं प्रतिरूपो
बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय। इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता
दशेत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमन-
न्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥
इस मधु का उपदेश दध्यङ् आथर्वण ने अश्विनीकुमारों को दिया था। मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने कहा कि
शरीरधारी को उसके (वास्तविक) स्वरूप में प्रकट करने के लिए वह पुरुष शरीरधारी का प्रतिरूप (जल,
वायु या आकाश की तरह पात्र के आकार का) हो जाता है। वह परमात्मा एक होते हुए भी माया से अनेक
रूपों वाला प्रतिभासित होता है। शरीर रूपी रथ में जुते इन्द्रियों रूपी अश्व-दस, सहस्र और अनन्त हैं। वह
ब्रह्म कारण विहीन, कार्यविहीन, अन्तर और बाहर से भी विहीन है। समस्त विषयों का अनुभव करने वाला
आत्मा ही ब्रह्मरूप है। समस्त वेदान्तों का उपदेश भी यही है ॥ १९ ॥
॥ षष्ठं ब्राह्मणम् ॥
अथ वंशः पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः पौतिमाष्यात्पौतिमाष्यो गौपवनाद्गौपवनः
कौशिकात्कौशिकः कौण्डिन्यात्कौण्डिन्यः शाण्डिल्याच्छाण्डिल्यः कौशिकाच्च
गौतमाच्च गौतमः ॥ १ ॥ आग्निवेश्यादाग्निवेश्यः शाण्डिल्याच्चानभिम्लाताच्चानभिम्लात
आनभिम्ला-तादानभिम्लात-आनभिम्लातादानभिम्लातो गौतमाद्गौतमः सैतवप्राची-
नयोग्याभ्याँ सैतवप्राचीनयोग्यौ पाराशर्यात्पाराशर्यो भारद्वाजाद्भारद्वाजो भारद्वाजाच्च
गौतमाच्च गौतमो भारद्वाजाद्भारद्वाजः पाराशर्यात् पाराशर्यो बैजवापायनाद्वैजवापायनः
कौशिकायनेः कौशिकायनिः ॥ २॥ घृतकौशिकाद्घृतकौशिकः पाराशर्यायणा-
त्पाराशर्यायणः पाराशर्यात् पाराशर्यो जातूकर्ण्याज्जातूकर्ण्य आसुरायणाच्च यास्का-
च्चासुरायणस्त्रैवणेस्त्रैवणिरौपजन्धनेरौपजन्धनिरासुरेरासुरिर्भारद्वाजाद्भारद्वाज
आत्रेयादात्रेयो माण्टेर्माण्टिर्गौतमाद्गौतमो गौतमाद्गौतमो वात्स्याद्वात्स्यः शाण्डिल्या-
च्छाण्डिल्यः कैशोर्यात्काप्यात्कैशोर्यः काप्यः कुमारहारितात्कुमारहारितो गालवाद्गालवो
विदर्भीकौण्डिन्याद्विदर्भीकौण्डिन्यो वत्सनपातो बाभ्रवाद्बत्सनपाद्बाभ्रवः पथः
सौभरात्पन्थाः सौभरोऽयास्यादाङ्गिरसादयास्य आङ्गिरस आभूतेस्त्वाष्ट्रादाभूतिस्त्वाष्ट्रो
विश्वरूपात्त्वाष्ट्राद्विश्वरूपस्त्वाष्ट्रोऽश्विभ्यामश्विनौ दधीच आथर्वणाद्दध्यङ्डाथर्वणोऽथर्वणो
दैवादथर्वा दैवो मृत्योः प्राध्वंसनान्मृत्युः प्राध्वंसनः प्रध्वंसनात्प्रध्वंसन
एकर्षेरैकर्षिर्विप्रचित्तेर्विप्रचित्तिर्व्यष्टेर्व्यष्टिः सनारोः सनारुः सनातनात्सनातनः सनगात्सनगः
परमेष्ठिनः परमेष्ठी ब्रह्मणो ब्रह्म स्वयंभु ब्रह्मणे नमः ॥ ३ ॥
२८० बृहदारण्यकोपनिषद्
अब इस (मधुकाण्ड) की वंशावली का वर्णन किया जाता है। पौतिमाष्य ने गौपवन से विद्या पायी।
गौपवन ने पौतिमाष्य से और पौतिमाष्य ने गौपवन से विद्या पायी। गौपवन ने कौशिक से, कौशिक ने
कौण्डिन्य से विद्या अर्जित की। कौण्डिन्य ने शाण्डिल्य से और शाण्डिल्य ने कौशिक से और गौतम से
विद्या प्राप्त की। गौतम ने आग्निवेश्य से, आग्निवेश्य ने शाण्डिल्य और आनभिम्लात से ज्ञान प्राप्त किया।
आनभिम्लात ने आनभिम्लात से, आनभिम्लात ने आनभिम्लात से विद्या प्राप्त की। आनभिम्लात ने गौतम
के माध्यम से, गौतम ने सैतव और प्राचीनयोग्य से ज्ञानार्जन किया। सैतव और प्राचीनयोग्य ने पाराशर्य से,
पाराशर्य ने भारद्वाज से विद्या पायी। भारद्वाज ने भारद्वाज और गौतम ऋषि से, गौतम ने भारद्वाज से, भारद्वाज
ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने बैजवापायन से और बैजवापायन ने कौशिकायनि से विद्यार्जन किया। कौशिकायनि
ने घृतकौशिक से, घृतकौशिक ने पाराशर्यायण से ज्ञानार्जन किया। पाराशर्यायण ने पाराशर्य से, पाराशर्य ने
जातूकर्ण्य से, जातूकर्ण्य ने आसुरायण और यास्कमुनि से, आसुरायण ने त्रैवणि से, त्रैवणि ने औपजन्धनि
से ज्ञानार्जन किया। औपजन्धनि ने आसुरि से, आसुरि ने भारद्वाज से, भारद्वाज ने आत्रेय से, आत्रेय ने माण्टि
से विद्या प्राप्त की। माण्टि ने गौतम से, गौतम ने वात्स्य से, वात्स्य ने शाण्डिल्य से, शाण्डिल्य ने कैशोर्य
काप्य से ज्ञान लाभ प्राप्त किया। कैशोर्य काप्य ने कुमार हारित से, कुमार हारित ने गालव से, गालव ने
विदर्भी कौण्डिन्य से, विदर्भी कौण्डिन्य ने वत्सनपात् बाभ्रव से, वत्सनपात् बाभ्रव ने पन्थासौभर से,
पन्थासौभर ने अयास्य आङ्गिरस से, अयास्य आङ्गिरस ने आभूति त्वाष्ट्र से विद्यार्जन किया। आभूति त्वाष्ट्र
ने विश्वरूप त्वाष्ट्र से, विश्वरूप त्वाष्ट्र ने अश्विनीकुमारों के द्वारा, अश्विनीकुमारों ने दध्यङ् आथर्वण से,
दध्यङ् आथर्वण ने अथर्वादेव से, अथर्वादेव ने मृत्यु प्राध्वंसन से ज्ञान प्राप्त किया। मृत्यु प्राध्वंसन ने
प्रध्वंसन से एवं प्रध्वंसन ने एकर्षि से, एकर्षि ने विप्रचित्ति के द्वारा ज्ञान पाया। विप्रचित्ति ने व्यष्टि से, व्यष्टि
ने सनारु से, सनारु ने सनातन से, सनातन ने सनग के माध्यम से, सनग ने परमेष्ठी के द्वारा और परमेष्ठी ने
इस दिव्य ज्ञान को ब्रह्मा के द्वारा प्राप्त किया। ब्रह्मा स्वयंभू हैं। उन ब्रह्मा को नमन है॥ १-३॥
[ इस ब्राह्मण में ज्ञान-प्राप्त करने वाले ऋषियों की परम्परा का उल्लेख है। किसी-किसी ऋषि का परस्पर एक
दूसरे से ज्ञान प्राप्त करने का तथा किसी-किसी को एकाधिक बार परस्पर ज्ञान प्राप्त करने का उल्लेख है। लगता है
कि सर्वोच्च शक्तिमान् की जैसी अनुभूति जिसे हुई, उन्होंने एक दूसरे को उससे लाभान्वित किया और यह
एकाधिक बार भी हुआ होगा।]