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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र १३ २७७

अध्याय २ ब्राह्मण ५ मन्त्र १३ २७७
इयं विद्युत्सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युत: सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति
तेजोमयोऽमृतमय: पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमय: पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ८ ॥
यह विद्युत् समस्त भूतों का मधु और समस्त भूत इस विद्युत् के लिए मधुरूप हैं। विद्युत् स्थित जो
तेजोमय और अमर्त्य पुरुष है एवं शरीर स्थित (तैजस) जो तेजःसम्पन्न और अमर पुरुष है, वही
सर्वव्यापक और कभी नष्ट न होने वाला आत्मा है, यही अमृत, यही ब्रह्म और यही सब कुछ है ॥ ८॥
अयँ स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्स्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ शाब्दः
सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँसर्वम् ॥ ९ ॥
गरजते हुए मेघ प्राणियो के मधु हैं और प्राणी मेघों के मधु हैं। इस मेघ में जो तेजस्वी और अविनाशी
पुरुष है तथा शरीर में जो तेजोमय-अविनाशी पुरुष है, वही आत्मा है, अनश्वर है और सब कुछ है ॥ ९ ॥
अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु
यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ हृद्याकाशस्तेजो
मयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १० ॥
यह आकाश समस्त जीवों का मधु है और समस्त जीव आकाश के लिए मधुरूप हैं। इस अन्तरिक्ष
में जो तेजोयुक्त अविनाशी पुरुष स्थित है और इस शरीर में जो हृदयाकाश स्थित तेजः सम्पन्न और अनश्वर
आत्मा विद्यमान है, वही सर्वव्यापक ब्रह्म और समस्त भूतों से युक्त है, यही सब कुछ है ॥ १० ॥
अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्धर्मे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ ११ ॥
यह धर्म प्राणियों का मधु है और प्राणी धर्म के मधुरूप हैं। धर्म स्थित तेजोमय और अविनाशी पुरुष
तथा शरीर स्थित तेजोमय और अमर्त्य पुरुष ही सर्वव्यापी, अविनाशी परमात्मा है। यही सभी कुछ है ॥ ११ ॥
इदँ सत्यँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्सत्ये
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मँ सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १२ ॥
यह सत्य सभी भूतों (प्राणियों) के लिए मधु है तथा समस्त भूत (प्राणी) सत्य के लिए मधु स्वरूप
हैं। सत्य स्थित जो तेजः सम्पन्न अविनाशी पुरुष विद्यमान है और शरीर में स्थित जो सत्य स्वरूप तेजः
सम्पन्न अनश्वर आत्मा है, वही अविनाशी और सर्वस्वरूप ब्रह्म है, सब कुछ यही है ॥ १२ ॥
इदं मानुषँ सर्वेषां भूतानां मध्वस्व मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्मानुषे
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषः यश्चायमध्यात्मं मानुषः तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदँ सर्वम् ॥ १३ ॥

२७८ बृहदारण्यकोपनिषद्
यह मनुष्य समुदाय समस्त प्राणियों का मधु है और समस्त प्राणी मानव समुदाय के लिए मधु हैं।
मनुष्य समुदाय में स्थित जो अविनाशी और तेजःसम्पन्न पुरुष है तथा इस मानव शरीर में जो भावयुक्त
तेजस्वी, अमर्त्य पुरुष है, वही सर्वव्यापक अविनाशी ब्रह्म है और सब कुछ यही है॥ १३॥
अयमात्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि
तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमात्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स
योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम्॥ १४॥
यह आत्मा जीवों का मधु है और जीव इस आत्मा के मधु हैं। आत्मा में स्थित जो तेजस्वी और
अविनाशी पुरुष है तथा आत्मा रूप में तेजस्वी और अविनाशी परब्रह्म है, वही सर्वव्यापक अविनाशी ब्रह्म
है, यही सब कुछ है ॥१४॥
स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिः सर्वेषां भूतानाꣳ राजा तद्यथा रथनाभौ
च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिता एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्वे देवाः सर्वे
लोकाः सर्वे प्राणाः सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५॥
निश्चित रूप से आत्मा ही समस्त प्राणियों का अधिपति और राजा है। जिस प्रकार रथ की नाभि में
एवं नेमि में सभी अरे जुड़े रहते हैं, उसी प्रकार समस्त जीव, समस्त देवता, समस्त लोक और समस्त प्राण
आत्मा से जुड़े रहते हैं अथवा आत्मा में सन्निहित हैं॥ १५ ॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । तद्वां नरा
सनये दꣳस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् । दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य
शीर्ष्णा प्रयदिमुवाचेति ॥ १६॥
इस मधु (आत्मविद्या) का वर्णन दध्यङ् आथर्वण ने अश्विनीकुमारों से किया था। ऋषि ने उनसे
कहा कि हे अश्विनीकुमारो ! जिस प्रकार मेघ वृष्टि को प्रकट करते हैं, उसी प्रकार मैं तुम्हारे उग्र कर्म को
प्रकट करता हूँ। अश्व के मस्तक वाले तुम दोनों के लिए यह आथर्वण मधु विद्या प्रदान कर रहा हूँ॥ १६॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचदाथर्वणायाश्विना
दधीचेऽश्व्यꣳशिरः प्रत्यैरयतम्। स वां मधु प्रवोचदृतायन्त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७॥
इस मधु विद्या को आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारो को प्रदान किया था। मंत्रद्रष्टा ऋषि बोले- हे
अश्विनीकुमारो ! आप आथर्वण के निमित्त अश्व का मस्तक लाएँ। उन्होंने सत्य की रक्षा करते हुए आपको
त्वाष्ट्रोपदेश (अर्थात् सूर्य सम्बन्धी मधुविद्या का उपदेश) किया, वह ज्ञान गोपनीय था ॥ १७॥
इदं वै तन्मधु दध्यङ्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् । पुरश्चक्रे
द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः पुरःस पक्षी भूत्वा पुरःपुरुष आविशदिति । स वा अयं पुरुषः
सर्वासु पूर्षु पुरिशयो नैनेन किंचनानावृतम् ॥ १८॥
इस मधुविद्या का उपदेश आथर्वण दध्यङ् ने अश्विनीकुमारों के प्रति किया था। मन्त्रद्रष्टा ने कहा कि
परब्रह्म ने सर्वप्रथम द्विपादों और चतुष्पादों वाले शरीरों का निर्माण किया। इसके पश्चात् वह विराट् पुरुष