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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा

स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished505 पृष्ठ

अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र १३ २६७

अध्याय २ ब्राह्मण १ मन्त्र १३ २६७
इसके बाद वे गर्गवंशी बालाकि बोले-दर्पण स्थित छाया पुरुष को ही ब्रह्म मानकर मैं उसकी
उपासना करता हूँ। इसके बाद अजातशत्रु ने कहा- ऐसा न कहें, मैं तो इसे देदीप्यमान (रोचिष्णु) मानकर
इसकी उपासना करता हूँ। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह प्रकाशमान होता है।
उसकी प्रजा (संतान) और सहचर भी प्रकाश सम्पन्न अर्थात् तेजस् सम्पन्न होते हैं॥ ९॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं यन्तं पश्चाच्छब्दोऽनूदेत्येतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा असुरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
सर्वं् हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालात्प्राणो जहाति ॥ १०॥
वे गार्ग्य बालाकि बोले- गमन करने वाले के पीछे जो शब्द होता है, मैं उसी को ब्रह्मरूप मानकर
उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा कि ऐसा न कहें, मैं तो उसे प्राण के रूप में उसकी उपासना
करता हूँ। जो इसे इस प्रकार जानकर इसकी उपासना करता है, वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है। उसकी
अकाल मृत्यु नहीं होती ॥ १०॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं दिक्षु पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स होवाचाजातशत्रुर्मा
मैतस्मिन्संवदिष्ठा द्वितीयोऽनपग इति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते द्वितीयवान्
ह भवति नास्माद्गणश्छिद्यते ॥ ११ ॥
वे बालाकि गार्ग्य बोले कि मैं दिशाओं में स्थित पुरुष (शक्ति) को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता
हूँ। इस पर अजातशत्रु ने कहा-नहीं-नहीं ऐसा न कहो, मैं इसे द्वितीय और वियुक्त न होने वाला मानकर उसकी
उपासना करता हूँ। उस ब्रह्म को इस प्रकार जानने वाले साथी युक्त होते हैं और वे साथी उन्हें कभी नहीं त्यागते ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायं छायामयः पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा मृत्युरिति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्ते
सर्वं् हैवास्मिँल्लोक आयुरेति नैनं पुरा कालान्मृत्युरागच्छति ॥ १२ ॥
गार्ग्य ने कहा मैं छायामय पुरुष को ही ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ। काशी नरेश
अजातशत्रु ने कहा कि व्यर्थ बात न करो, मैं तो छाया पुरुष को मृत्यु समझकर उसकी उपासना करता
हूँ। जो इसकी ऐसा जानकर उपासना करता है, वह पूर्ण आयु प्राप्त करता है तथा समय से पूर्व मृत्यु
उसे विनष्ट नहीं करती ॥ १२ ॥
स होवाच गार्ग्यो य एवायमात्मनि पुरुष एतमेवाहं ब्रह्मोपास इति स
होवाचाजातशत्रुर्मा मैतस्मिन्संवदिष्ठा आत्मन्वीति वा अहमेतमुपास इति स य एतमेवमुपास्त
आत्मन्वीह भवत्यात्मन्विनी हास्य प्रजा भवति स ह तूष्णीमास गार्ग्यः ॥ १३ ॥
बालाकि ने कहा- मैं आत्मस्थ पुरुष को ब्रह्म मानकर उसकी उपासना करता हूँ। अजातशत्रु ने कहा-
ऐसा न कहो। मैं तो उसे ब्रह्म जिज्ञासु (आत्मन्वी) मानकर उपासना करता हूँ। उसे इस प्रकार जानकर जो
उपासना करने वाला होता है, वह ब्रह्म जिज्ञासु होता है एवं उसकी प्रजा (सन्तान) भी ब्रह्म जिज्ञासु होती
है। यह सुनकर बालाकि ने मौन धारण कर लिया ॥ १३ ॥

२६८ बृहदारण्यकोपनिषद्
स होवाचाजातशत्रुरेतावन्नू३ इत्येतावद्धीति नैतावता विदितं भवतीति स होवाच
गार्ग्य उपत्वायानीति ॥ १४ ॥
यह स्थिति देखकर अजातशत्रु बोले कि क्या इतना ही ज्ञान है ? बालाकि गार्ग्य ने कहा कि हाँ केवल
इतना ही ज्ञान है। अजातशत्रु ने कहा कि इतने मात्र से तो ब्रह्मज्ञान असम्भव है। तब गार्ग्य बोले कि क्या
मैं आपकी सेवा के लिए तैयार होऊँ ? ॥ १४ ॥
स होवाचाजातशत्रुः प्रतिलोमं चैतद्यद्ब्राह्मणः क्षत्रियमुपेयाद्ब्रह्म मे वक्ष्यतीति
व्येव त्वा ज्ञपयिष्यामीति तं पाणावादायोत्तस्थौ तौ ह पुरुषः सुप्तमाजग्मतुस्त-
मेतैर्नामभिरामन्र्तयांचक्रे बृहन् पाण्डरवासः सोमराजन्निति स नोत्तस्थौ तं पाणिना पेषं
बोधयांचकार स होत्तस्थौ ॥ १५ ॥
(यह सुनकर) अजातशत्रु बोले- यह तो विपरीत तथ्य है कि कोई ब्राह्मण ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के
लिए किसी क्षत्रिय के पास जाए। तो भी मैं आपको ब्रह्म का उपदेश करूँगा (अर्थात् ब्रह्मज्ञान प्रदान
करूँगा)। तब अजातशत्रु उठे और बालाकि का हाथ पकड़कर एक सोते हुए पुरुष के पास ले गये। राजा
अजातशत्रु ने उस सोते हुए पुरुष को हे ब्रह्मन् ! हे श्वेताम्बरधारी, हे सोम !, हे राजन्,! आदि कहकर जगाने
का प्रयत्न किया, किन्तु वह जाग्रत् स्थिति में नहीं आया। इसके बाद अजातशत्रु ने उसे झकझोर कर उठाने
का प्रयत्न किया, तब वह जागकर उठ बैठा ॥ १५ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषः क्वैष तदाभूत्कुत
एतदागादिति तदु ह न मेने गार्ग्यः ॥ १६ ॥
इसके पश्चात् राजा अजातशत्रु ने बालाकि गार्ग्य से प्रश्न किया कि इस प्रसुप्त व्यक्ति का (जीवात्मा)
विज्ञानमय पुरुष उस समय कहाँ था, जब वह सो रहा था और अब कहाँ से (जागने पर) यहाँ आ गया;
किन्तु बालाकि गार्ग्य इसे नहीं जान सका अर्थात् इस प्रश्न का उत्तर न दे सका ॥ १६ ॥
स होवाचाजातशत्रुर्यत्रैष एतत्सुप्तोऽभूद्य एष विज्ञानमयः पुरुषस्तदेषां प्राणानां विज्ञानेन
विज्ञानमादाय य एषोऽन्तर्हृदय आकाशस्तस्मिञ्छेते तानि यदा गृह्णात्यथ हैतत्पुरुषः स्वपिति
नाम तद्गृहीत एव प्राणो भवति गृहीता वाग् गृहीतं चक्षुर्गृहीतः श्रोत्रं गृहीतं मनः ॥ १७॥
तब अजातशत्रु ने कहा- जब वह (जीवात्मा) विज्ञानमय पुरुष प्रसुप्तावस्था में था, तब अपनी विज्ञान
की शक्ति से समस्त इन्द्रियों की शक्ति को अपने में एकत्र कर लिया था। सुप्त स्थिति में जीवात्मा हृदयाकाश
में स्थित रहकर इन्द्रियों को ग्रहण करता है। उस समय इसे 'स्वपिति' कहते हैं। उस समय प्राण, नेत्र, श्रोत्र
और मन सभी गृहीत स्थिति में होते हैं ॥ १७ ॥
स यत्रैतत्स्वप्न्यायाचरति ते हास्य लोकास्तदुतेव महाराजो भवत्युतेव महाब्राह्मण
उतेवोच्चावचं निगच्छति स यथा महाराजो जानपदान् गृहीत्वा स्वे जनपदे यथाकामं
परिवर्तैतवमेवैष एतत्प्राणान् गृहीत्वा स्वे शरीरे यथाकामं परिवर्तते ॥ १८ ॥