१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय २ खण्ड २४ मन्त्र ९ १११
अध्याय २ खण्ड २४ मन्त्र ९ १११
पुरा प्रातरनुवाकस्योपाकरणाज्जघनेन गार्हपत्यस्योदङ्मुख उपविश्य स वासवं
सामाभिगायति ॥ ३॥
प्रातःकाल अनुवाक (ऋचा) का पाठ करने से पूर्व वह यजमान गार्हपत्याग्नि के पीछे उत्तराभिमुख
बैठकर वसुदेवों के साम का भली प्रकार गान करता है ॥ ३॥
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँरा ३ ३ ३ ३ ३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३
यो ३ आ ३२१११ इति ॥ ४॥
हे अग्निदेव ! आप इस लोक (लौकिक सम्पदा) का द्वार खोल दें, जिससे हम राज्य प्राप्ति के निमित्त
आपका दर्शन करें ॥ ४॥
अथ जुहोति नमोऽग्नये पृथिवीक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै
यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ५॥
यजमान हवन करते हुए पृथ्वी लोक निवासी इस अग्निदेव को नमन करते हुए कहते हैं-हे अग्निदेव !
आपको हमारा नमन है। आप हमें इस लोक की प्राप्ति कराएँ, निश्चय ही यही यजमान का लोक है। हम
इसे प्राप्त करें ॥ ५॥
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै वसवः
प्रातःसवनं संप्रयच्छन्ति ॥ ६॥
यजमान हवन करते हुए कहते हैं- हम आयु समाप्त होने पर पुण्य लोक को प्राप्त हों, इस निमित्त
आहुति समर्पित है। बाधाओं (सीमाओं) को दूर करें, ऐसा कहकर वे उठते हैं। वसुगण उन्हें प्रातः सवन
प्रदान करते हैं ॥ ६॥
['वसुगण' आवास देने वाले देवता हैं। इस लोक में दैवी अनुशासन में सुखी-सम्पन्न जीवन की प्राप्ति के
लिए उनसे प्रार्थना की जाती है।]
पुरा माध्यन्दिनस्य सवनस्योपाकरणाज्जघनेनाग्नीध्रीयस्योदङ्मुख उपविश्य स रौद्रं
सामाभिगायति ॥ ७॥
मध्याह्न सवन के पूर्व यजमान दक्षिणाग्नि के पीछे उत्तराभिमुख होकर बैठकर रुद्रदेव सम्बन्धी साम
का गायन करता है ॥ ७ ॥
लो३कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयं वैरा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३ यो
३ आ ३२१११ इति ॥ ८॥
. हे वायो ! आप अन्तरिक्ष लोक का द्वार खोलें, जिससे हम वैराज्य पद की प्राप्ति हेतु आपका दर्शन करें॥
अथ जुहोति नमो वायवेऽन्तरिक्षक्षिते लोकक्षिते लोकं मे यजमानाय विन्दैष वै
यजमानस्य लोक एतास्मि ॥ ९॥
अब यजमान हवन करते हुए कहते हैं- अन्तरिक्ष लोक के निवासी हे वायुदेव ! आपको नमस्कार है।
हमें अन्तरिक्ष लोक (विभूतियाँ) प्राप्त कराएँ। यह निश्चय ही यजमान का लोक है, इसे हम प्राप्त करें ॥ ९॥
[सद्गृहस्थ के दायित्व पूरे करके जीवन के दूसरे सवन में साधक को वानप्रस्थ जीवन जीना चाहिए। रुद्र
विकार नाशक देवता हैं। उनकी साधना करके व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन से विकारों के निवारण का
सुधारात्मक पुरुषार्थ करना चाहिए।]
११२ छान्दोग्योपनिषद्
अत्र यजमानः परस्तादायुषः स्वाहाऽपजहि परिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति तस्मै रुद्रा
माध्यन्दिनँ सवनँ संप्रयच्छन्ति ॥ १०॥
अब यजमान हवन करते हुए कहते हैं- हम आयु समाप्त होने पर अन्तरिक्ष लोक प्राप्त करें, इस
निमित्त यह आहुति समर्पित है। वह यजमान जब इस लोक की प्राप्ति के निमित्त समस्त बाधाएँ दूर करने
के लिए तैयार हो जाते हैं, तब उन्हें रुद्रगण मध्याह्न सवन प्रदान करते हैं॥ १०॥
पुरा तृतीयसवनस्योपाकरणाज्जघनेनाहवनीयस्योदङ्मुख उपविश्य स आदित्यँ स
वैश्वदेवँ सामाभिगायति ॥ ११ ॥
तृतीय सवन के पूर्व यजमान आहवनीय अग्नि के पीछे उत्तराभिमुख बैठकर विश्वेदेवा सम्बन्धी साम
का गायन करते हैं॥ ११॥
लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँस्वारा ३३३३३ हुं ३ आ ३३ ज्या ३
यो ३ आ ३२१११ इति ॥ १२ ॥
हे आदित्य देव ! आप स्वर्गलोक का द्वार खोल दें, जिससे हम स्वाराज्य प्राप्ति के निमित्त
आपका दर्शन कर सकें ॥ १२ ॥
आदित्यमथ वैश्वदेवं लो ३ कद्वारमपावा ३ र्णू ३३ पश्येम त्वा वयँ साम्ना ३३३३३
हुं ३ आ ३३ज्या ३ यो ३ आ ३२१११ इति ॥ १३ ॥
यह आदित्य सम्बन्धी साम है, अब विश्वेदेवा सम्बन्धी साम का गायन करते हैं-हे देवगणो! आप
स्वर्गलोक का द्वार खोल दें, जिससे हम साम्राज्य प्राप्ति के निमित्त आपका दर्शन कर सकें॥ १३॥
अथ जुहोति नम आदित्येभ्यश्च विश्वेभ्यश्च देवेभ्यो दिविक्षिद्भ्यो लोकक्षिद्भ्यो
लोकं मे यजमानाय विन्दत ॥ १४ ॥
तदनन्तर यजमान यज्ञ करते हुए कहते हैं- स्वर्ग लोक निवासी आदित्यगण और विश्वेदेवा इस लोक
में रहने वाले इस यजमान का नमन स्वीकार करें। इस यजमान को पुण्यलोक की प्राप्ति कराएँ॥ १४॥
एष वै यजमानस्य लोक एतास्म्यत्र यजमानः परस्तादायुषः
स्वाहाऽपहतपरिघमित्युक्त्वोत्तिष्ठति ॥ १५ ॥
यह निश्चय ही यजमान का लोक है, इसे हम प्राप्त करें। यहाँ यजमान यज्ञ करते हुए कहते हैं- आयु
समाप्त होने पर हम स्वर्गलोक प्राप्त करें, इस निमित्त यह आहुति समर्पित है। 'हम स्वर्ग लोक प्राप्ति हेतु
आगे आयी सीमाएँ पार करेंगे' ऐसा कहकर यजमान तैयार हो जाते हैं॥ १५ ॥
तस्मा आदित्याश्च विश्वे च देवास्तृतीयँ सवनँ संप्रयच्छन्त्येष ह वै यज्ञस्य मात्रां वेद
य एवं वेद य एवं वेद ॥ १६ ॥
उस यजमान को आदित्यगण और विश्वेदेवा तृतीय सवन प्रदान करते हैं। जो इस प्रकार इन तथ्यों को
जानते हैं, वे यज्ञ के सार तत्त्व को जानते हैं॥ १६॥
[आदित्य एवं विश्वेदेवा की साधना द्वारा जीवन के अन्तिम चरण में साधक को 'वसुधैव कुटुम्बकम्' के
अनुरूप ज्ञान एवं प्रेरणा का संचार करना चाहिए।]