१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य द्वारा
स्रोत: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (उद्गम)
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५
अध्याय १ खण्ड ३ मन्त्र १० ४५
तद्घ्राणेनाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोद्घ्राणेन ग्रहीतुम्।
स यद्धैनत्प्राणेनाग्रहैष्यदभिप्राय हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ४ ॥
इसके पश्चात् उसने अन्न को घ्राण द्वारा पकड़ने की चेष्टा की, पर वह इसमें भी सफल न हो सका।
यदि वह इसे घ्राण से ग्रहण कर लेता, तो इस युग में भी पुरुष प्राण-प्रक्रिया से ही सूँघकर अन्न ग्रहण करके
परितृप्त हो जाया करते ॥ ४ ॥
तच्चक्षुषाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्चक्षुषा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्चक्षुषाग्रहैष्यद् दृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ५॥
फिर उस पुरुष ने नेत्रों द्वारा अन्न ग्रहण करने अर्थात् देखकर ही अन्न की शक्ति ग्रहण करने की चेष्टा
की; किन्तु ऐसा भी सम्भव न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे नेत्रों से ग्रहण कर सकता, तो अब भी
मनुष्य अन्न को देखने मात्र से ही तृप्त हो जाया करते ॥ ५ ॥
तच्छ्रोत्रेणाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोच्छ्रोत्रेण ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्छ्रोत्रेणाग्रहैष्यच्छ्रुत्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ६ ॥
तदुपरान्त उस पुरुष ने उस अन्न को श्रोत्रेन्द्रिय द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु वह उसमें भी
सफल न हो सका। यदि वह (पूर्ण पुरुष) उसे कानों द्वारा ग्रहण कर सका होता, तो अब भी लोग इसे
कानों द्वारा ग्रहण कर सकते (अर्थात् अन्न के विषय में सुनकर ही तृप्त हो जाते ) ॥ ६ ॥
तत्त्वचाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोत्त्वचा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनत्त्वचाग्रहैष्यत्स्पृष्ट्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ७॥
तब उस पुरुष ने इस (अन्न) को त्वचा द्वारा ग्रहण करने की चेष्टा की; किन्तु उसे इसमें भी सफलता
न मिली। यदि वह उस समय त्वचा द्वारा अन्न को पकड़ने अर्थात् ग्रहण करने में सफल हो गया होता,तो
अब भी लोग इसे छू लेने मात्र से ही परितृप्त हो जाते ॥ ७ ॥
तन्मनसाजिघृक्षत् तन्नाशक्नोन्मनसा ग्रहीतुम्।
स यद्धैनन्मनसाग्रहैष्यद्ध्यात्वा हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ८॥
तदनन्तर उस पुरुष ने उसको मन द्वारा प्राप्त करने की चेष्टा की; लेकिन उसे इसमें भी सफलता नहीं मिली।
यदि वह इसको मन द्वारा ग्रहण कर पाता, तो अब भी मनुष्य अन्न के चिन्तन मात्र से तृप्ति अनुभव करते ॥ ८ ॥
तच्छिश्नेनाजिघृक्षत्तन्नाशक्नोच्छिश्नेन ग्रहीतुम्।
स यद्धैनच्छिश्नेनाग्रहैष्यद्विसृज्य हैवान्नमत्रप्स्यत् ॥ ९॥
इसके बाद उस पुरुष ने अन्न को शिश्न द्वारा ग्रहण करने का प्रयत्न किया; किन्तु इसके द्वारा भी वह
उसे ग्रहण करने में समर्थ न हो सका। यदि वह उस समय उसे शिश्न द्वारा ग्रहण कर पाया होता, तो आज
भी मनुष्य अन्न का विसर्जन करके ही तृप्त हो जाया करते ॥ ९॥
तदपानेनाजिघृक्षत् तदावयत्। सैषोऽन्नस्य ग्रहो यद्वायुरन्नायुर्वा एष यद्वायुः ॥ १० ॥
उसके बाद उस (पुरुष) ने अपान वायु के द्वारा (मुँह से होकर) इसे (अन्न को) ग्रहण करने की
चेष्टा की, अपान वायु के द्वारा उसने अन्न को ग्रहण कर लिया। अपान वायु ही अन्न को ग्रहण करने में
समर्थ है। जो अन्न के द्वारा जीवन की रक्षा करने में समर्थ है, वह यही वायु है ॥ १०॥
४६ ऐतरेयोपनिषद
[ शंकराचार्य जी ने अपान का अर्थ मुख छिद्र किया है। वाचस्पत्यम् में अपान को प्राण का धारक कहा गया
है। आयुर्वेद में पाचन, मल उत्सर्जन आदि कर्म अपान द्वारा ही सम्पन्न होना माना गया है। अतः वही अन्न का धारक
है। अन्न के माध्यम से आयुष्य बढ़ाने वाला यही वायु अन्नायु कहा जाता है। ]
स ईक्षत कथं न्विदं मदृते स्यादिति स ईक्षत कतरेण प्रपद्या इति। स ईक्षत यदि
वाचाभिव्याहृतं यदि प्राणेनाभिप्राणितं यदि चक्षुषा दृष्टं यदि श्रोत्रेण श्रुतं यदि त्वचा
स्पृष्टं यदि मनसा ध्यातं यद्यपानेनाभ्यपानितं यदि शिश्नेन विसृष्टमथ कोऽहमिति ॥ ११ ॥
उस परमात्मा ने विचार किया कि यदि इस पुरुष ने वाणी से बोलने का प्रयोजन पूरा कर लिया, यदि प्राण
(वायु) से सूँघ लिया, यदि नेत्रों से देख लिया, यदि कानों से सुन लिया, यदि त्वचा से स्पर्श कर लिया, यदि मन
से सोच लिया, यदि अपान से आहार ग्रहण कर लिया और उपस्थ से विसर्जन कृत्य पूर्ण कर लिया, तो मैं (उसके
लिए) कौन रहा ? (मेरे बिना ये कैसे रह पायेगा?) मैं किधर से प्रविष्ट होऊँ ? ॥ ११ ॥
[ समस्त व्यवस्था बन जाने पर भी आत्मा के रूप में परमात्मा के अंश की स्थापना के बगैर व्यक्ति का
अस्तित्व नहीं बनता। 'कोऽहम्' (फिर मैं कौन हूँ?) का उत्तर 'सोऽहम् इति' (मैं वही आत्म तत्त्व हूँ) यह तथ्य
इस प्रकरण से सिद्ध होता है।]
स एतमेव सीमानं विदार्यैतया द्वारा प्रापद्यत । सैषा विद्रुतिर्नाम द्वास्तदेतन्नान्दनम्।
तस्य त्रय आवसथास्त्रयः स्वप्ना अयमावसथोऽयमावसथोऽयमावसथ इति ॥ १२ ॥
वह परमात्मा मानव शरीर की सीमा मूर्धा (ब्रह्मरन्ध्र) को विदीर्ण करके (चीरकर) उसमें प्रविष्ट हो
गया। विदीर्ण करके जाने के कारण इस द्वार को 'विद्रुति' नाम से जाना जाता है। यह विद्रुति नामक द्वार
आनन्दप्रद अर्थात् आनन्दस्वरूप परमात्मा की प्राप्ति कराने वाला है। उस परमेश्वर के तीन आश्रयस्थल और
तीन स्वप्न हैं। उसका यही आवास स्थल है। यही आवासस्थल है, यही आवासस्थल है ॥ १२ ॥
['यही वह स्थल है', यह बात तीन बार कही गयी है। बात पर बल देने के लिए 'त्रिवाचा' कहने की परम्परा
है, अर्थात् यह देह निश्चित रूप से उस परमात्मा का आवास है। अन्य भाव यह है कि शरीर में तीन स्वचालित तंत्र,
तीन ग्रंथियों में आत्मा का सीधा नियंत्रण कहा जा सकता है, वे हैं-मस्तिष्क में सहस्रार (रैटिकुलर एक्टिवेटिंग
सिस्टम), हृदय (पेस मेकर) तथा नाभि ग्रंथि (पाचन-प्रजनन चक्र) अथवा शरीर, ब्रह्माण्ड और परम व्योम इन
तीन स्थानों को उसके स्थान तथा स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण स्वरूपों को अथवा सृजन, पालन, परिवर्तन को उसके
तीन स्वप्न कहा जा सकता है।]
स जातो भूतान्यभिव्यैख्यत् किमिहान्यं वावदिषदिति ।
स एतमेव पुरुषं ब्रह्म ततममपश्यदिदमदर्शमिती३ ॥ १३ ॥
मानव शरीर में प्रकट उस पुरुष ने भूतों (सृष्टि) को चारों ओर से देखा और यह कहा कि मेरे अतिरिक्त यहाँ
दूसरा कौन है ? मैंने इसे भली-भाँति देखकर यह बोध प्राप्त कर लिया है कि यह परम पुरुष परब्रह्म ही है ॥ १३ ॥
तस्मादिदन्द्रो नामेदन्द्रो ह वै नाम तमिदन्द्रं सन्तमिन्द्र ।
इत्याचक्षते परोक्षेण परोक्षप्रिया इव हि देवाः परोक्षप्रिया इव हि देवाः ॥ १४ ॥
मानुष-देह में उत्पन्न हुए उस पुरुष ने परब्रह्म परमेश्वर का पूर्व वर्णित रीति से साक्षात्कार कर लिया;
इसलिए उसका मैंने दर्शन कर लिया, इस व्युत्पत्ति के आधार पर ही उस का नाम इदन्द्र है। परन्तु लोग उसे
'इन्द्र' कहकर ही सम्बोधित करते हैं, क्योंकि देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं, देवगण परोक्ष प्रिय होते हैं ॥ १४ ॥