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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध पहला अध्याय
अदित्यै रास्नासि विष्णोर्वेषोऽस्यूर्जे त्वादब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामि.
अग्नेर्जिह्वासि सुहूर्देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने मे भव यजुषे यजुषे.. (३०)
हे अदिति देव! आप रसमय, विष्णु के वास स्थल व ऊर्जस्वी हैं. हम कमल
जैसे नेत्रों से बारबार आप को देखते हैं. आप अग्नि की जीभ, देवताओं के निवास
स्थल व सर्वत्र व्यापक हैं. हे यजमानो! आप धामधाम पर ऐसे देव को पुकारें व
आमंत्रित करें. ( ३० )
सवितुस्त्वा प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः.
सवितुर्वः प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः.
तेजोसि शुक्रमस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि (३१)
सविता ने यज्ञ साधनों को उत्पन्न किया है. बिना छेद वाली पवित्र सूर्य की किरणों
से इन यज्ञ-साधनों को शुद्ध करते हैं. आप तेजस्वी, चमकीले, अमृत देवताओं के प्रिय
तथा अधृष्ट (विनयी) हैं. आप देवताओं के लिए किए जा रहे इस यज्ञ के प्रमुख
साधन हैं. ( ३१ )
३८ - यजुर्वेद

दूसरा अध्याय

दूसरा अध्याय
कृष्णोस्याखरेष्ठोग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि वेदिरसि बर्हिषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि बर्हिरसि
स्रुग्भ्यस्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (१)
हे समिधा! हम यज्ञ में इष्ट होने के कारण आप को पवित्र करते हैं. हे वेदिका!
यज्ञ के लिए आप भी आवश्यक हैं. आप को भी ( प्रक्षालित कर के ) पवित्र करते
हैं. हे कुशा ( यज्ञ में प्रयोग आने वाली घास )! आप को भी हम ( प्रक्षालित कर
के ) पवित्र करते हैं. ( १ )
अदित्यै व्युन्दनमसि विष्णोः स्तूपोस्यूर्णम्म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थां देवेभ्यो
भुवपतये स्वाहा भुवनपतये स्वाहा भूतानां पतये स्वाहा.. (२)
हे यज्ञजल! आप अदिति ( पृथ्वी ) को सींचते हैं. आप ओषधियों को सींचते हैं.
हे स्तूप के आकार वाले कुशो! देवताओं के लिए नरम ( कोमल ) आसन के रूप में
आप को फैलाया जाता है. हे यजमानो! आप देवताओं, पृथ्वीपति, पृथ्वीपालक और
प्राणियों आदि के लिए आहुति अर्पित कीजिए. ( २ )
गन्धर्वस्त्वा विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड
ऽ ईडितः.
इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः.
मित्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधत्तां ध्रुवेण धर्मणा विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य
परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः.. (३)
विश्वावसु गंधर्व यज्ञ की परिधियों ( घेरों ) की रक्षा करने की कृपा करें.
यजमान के सभी प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) के निवारण के लिए अग्नि और यज्ञ
की परिधियों की उपासना करते हैं. यज्ञपरिधि इंद्र की दाईं भुजा है. यजमान को
संरक्षण देने वाली है. यजमान के सब प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) निवारण के
लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की उपासना करते हैं. मित्र और वरुण उत्तर से धर्म
के साथ यज्ञ की परिधि को धारण करने की कृपा करें. हम यजमान के सभी प्रकार
के अनिष्ट ( अमंगल ) का निवारण करने के लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की
उपासना करते हैं. ( ३ )
यजुर्वेद - ३९

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्त १८ समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (४)
हे अग्नि! आप यज्ञ में प्रमुख हैं. आप विशाल, तेजस्वी, कवि व भूत और
भविष्य को जानने वाले हैं. हम समिधा से आप को प्रज्वलित करते हैं. (४)
समिदसि सूर्यस्त्वा पुरस्तात् पातु कस्याश्चिदभिशस्त्यै.
सवितुर्बाहू स्थ ऽ ऊर्णम्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थं देवेभ्य ऽ आत्वा वसवो रुद्रा ऽ
आदित्याः सदन्तु.. (५)
हे समिधा! सूर्य आप की रक्षा करने की कृपा करे. हे कुश! सूर्य आप की रक्षा
करने की कृपा करे. समिधा और कुश दोनों ही सविता देव की दोनों भुजाएं हो
जाएं. हम यजमान भेड़ के बालों से बने आसन को बिछा रहे हैं. ये आसन हम
देवताओं के लिए बिछाते हैं ताकि देवता सुखपूर्वक विराज सकें. वसु, रुद्र व
आदित्य पधार कर आसन पर विराजने की कृपा करें. (५)
घृताच्यसि जुहूर्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यस्युपभृन्नाम्ना सेदं
प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यसि ध्रुवा नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८
सद ऽ आसीद् प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद्.
ध्रुवा असदन्नृतस्य योनौ ता विष्णो पाहि पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिं पाहि मां यज्ञन्यम्.. (६)
जुहू नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम
(यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. वह यजमानों को घृत देने की कृपा करें.
उपभृत नामक यज्ञ साधन को (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम (यज्ञस्थान)
पर पधारने की कृपा करें. ध्रुव नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. घृत-सिंचन के
बाद वह अपने प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. हे विष्णु! आप
यज्ञस्थान पर पधारने व विराजने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ, साधनों, उसे करने
वालों और उस के सहायकों की रक्षा कीजिए. (६)
अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा सरिष्यन्तं वाजजित १८ सम्मार्ज्मि.
नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः सुयमे मे भूयास्तम्.. (७)
हे अग्नि! आप अन्नदाता हैं. शक्तिमान लोग अन्न की प्राप्ति हेतु आप को
सम्मार्जित (शुद्ध) करते हैं. हम आहुति के साथ देवताओं व पितरों को नमस्कार
करते हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (७)
अस्कन्नमद्य देवेभ्य ऽ आज्य १८ संभ्रियासमङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषं
वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्थेषं विष्णोः स्थानमसीत ऽ इन्द्रो वीर्यमकृणोदूर्ध्वोध्वर ऽ
आस्थात्.. (८)
हे अग्नि! हम देवताओं को अर्पित करने के लिए पवित्र (शुद्ध) घी ले कर
आए हैं. हे अग्नि! इंद्र ने अपने बल से यज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ाई. विष्णु ने अपने बल
४० - यजुर्वेद

पूर्वाध दूसरा अध्याय

पूर्वाध दूसरा अध्याय
से यज्ञ को उन्नति दी. आप अन्नदाता हैं. आप यज्ञ स्थल पर विराजमान हैं. हम आप
की छत्रच्छाया में रहना चाहते हैं. हम सदैव यज्ञस्थल की पवित्रता को बनाए
रखेंगे.( ८ )
अग्ने वेर्होत्रं वेर्दूत्यमवतां त्वां द्यावापृथिवी अव त्वं द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्देवेभ्य ऽ
इन्द्र ऽ आज्येन हविषा भूत्स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः.. ( ९ )
हे अग्नि! आप यज्ञ की व्यवस्था और विधान को अच्छी तरह जानते हैं. आप
देवताओं के दूत हैं. आप पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक तक आहुति पहुंचाने की कृपा
करते हैं. आप पृथ्वीलोक व स्वर्गलोक की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इंद्र अन्य
देवताओं सहित घी की हवि से तृप्त व ज्योति से ज्योति में एकाकार होने की कृपा
करें. ( ९ )
मयीदमिन्द्र ऽ इन्द्रियं दधात्वस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम्.
अस्माक १७ सन्तवाशिषः सत्या नः सन्तवाशिष ऽ उपहूता पृथिवी मातोपमां पृथिवी
माता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा.. ( १० )
हे इंद्र! आप हमें इंद्रमय बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए धन धारण
करने, हमें धनवान बनाने, आशीर्वाद प्रदान करने व हमारी आशाएं फलीभूत
करने की कृपा कीजिए. आप हमें आशीर्वाद दीजिए. पृथ्वी माता के समान है. हम
ने पृथ्वी माता की उपासना की है. हम यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करते हैं. आप हमें
अपने जैसा तेजोमय बनाएं. हम आप को लोकहित के लिए आहुति समर्पित करते
हैं. ( १० )
उपहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा.
देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्.
प्रतिगृह्णाम्यग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि.. ( ११ )
हे यजमानो! हम ने स्वर्गलोक के पिता को अपने समीप ( पास ) आमंत्रित
किया है. हम ने उस के पिता की उपासना की है. हम अग्नि का आह्वान करते हैं.
आहुति हमारा कल्याण करने की कृपा करे. सविता देव ने आहुति उपजाई है.
अश्विनीकुमार अपनी भुजाओं से इस हवि को ग्रहण करते हैं. पूषा देव दोनों हाथों
से यज्ञ के इस अन्न को ग्रहण करते हैं. सभी देव अग्नि के मुख से अन्न ग्रहण करने
( खाने ) की कृपा करें. ( ११ )
एतन्ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे.
तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव.. (१२)
हे सविता! हम आप के लिए इस विशाल यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं. आप
यज्ञपति हैं. आप इस यज्ञ की व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( १२ )
यजुर्वेद - ४१

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञꣳ समिमं दधातु.
विश्वे देवास ऽ इह मादयन्तामो ३ म्प्रतिष्ठ.. (१३)
हे सविता! आप अपने वेगवान मन से घी का सेवन कीजिए. बृहस्पति देव इस
यज्ञ का विस्तार करने व इस को धारण करने की कृपा करें. यह यज्ञ सभी देवताओं
को आनंदित करने की कृपा करे. दोनों देव हमें प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (१३)
एषा ते अग्ने समित्तया वर्धस्व चा च प्यायस्व.
वर्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि.
अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा ससृवाꣳ सं वाजजितꣳ सम्मार्ज्मि.. (१४)
हे अग्नि! यह आप की बढ़ोतरी के लिए समिधा है. आप अपनी बढ़ोतरी के
साथ हमारी भी बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. हम आप की बढ़ोतरी करते हैं.
हम अपनी बढ़ोतरी पाते हैं. अग्नि अन्न उपजाते हैं. हम आप का सम्मार्जन करते हैं
अर्थात् आप को जल से सींचते हैं. (१४)
अग्नीषोमयोर्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि.
अग्नीषोमौ तमपनुदतां योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि.
इन्द्राग्न्योर्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि.
इन्द्राग्नी तमपनुदतां योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि.. (१५)
हे अग्नि! हम वैसी ही विजयश्री पाना चाहते हैं, जैसी विजय सोम और अग्नि
ने प्राप्त की है. अग्नि और सोम उन को दूर हटा दें जो हम से द्वेष करते हैं. वे उन
को दूर हटा दें जिन से हम द्वेष करते हैं. हम अन्न से उस विजय के लिए प्रेरणा
पाते हैं. (१५)
वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा संजानाथां द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम्.
व्यन्तु वयोक्तꣳ रिहाणा मरुतां पृषतीर्गच्छ वशा पृश्निर्र्भूत्वा दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह.
चक्षुष्पा ऽ अग्नेसि चक्षुर्मे पाहि.. (१६)
वसुगणों, रुद्रगणों और आदित्यगणों को ये तीन परिधियां अर्पित की जाती हैं.
मित्रगण और वरुण स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक की वर्षा से उन की रक्षा करने की
कृपा करें. पक्षी घी वाली हवि को खा कर मरुद्गणों का अनुकरण करने की कृपा
करें. किरणों की तरह स्वर्गलोक में पहुंचने का अनुकरण करने की कृपा करें. अग्नि
हमारे यज्ञ व हमारे नेत्रों के रक्षक हैं. वे हमारे यज्ञ व हमारे नेत्रों की रक्षा करें. (१६)
यं परिधिं पर्यधत्था ऽ अग्ने देव पणिभिर्गुह्यमानः.
तं त ऽ एतमनु जोषं भराम्येष नेत्त्वदपचेतयाता ऽ अग्नेः प्रियं पाथोपीतम्.. (१७)
(*मेत्त्वदपचेतयाता वै. य. अ.)
हे अग्नि! प्राणियों से बचाव के लिए आप के चारों ओर परिधि बनाई जाती
४२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
है. वह परिधि आप के अनुरूप है. वह परिधि गुप्त है. अग्नि इस परिधि को भरनेपूरने
की कृपा करें. अग्नि के लिए प्रिय पाथेय समर्पित किया गया है. वे उन्हें स्वीकार
करने की कृपा करें. ( १७ )
स ᳪ स्वभागा स्थेषा बृहन्तः प्रस्तरेष्ठाः परिधयाश्च देवाः.
इमां वाचमभि विश्वे गृणन्त ऽ आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्व ᳪ स्वाहा वाट्.. ( १८ )
हे देवगण! आप अपने आश्रम व अपनी परिधि ( मर्यादा ) में रहने की कृपा
करें. हम आप सब की वाणी से वंदना करते हैं. आप कुश के आसन पर विराजिए
और आनंदित होइए. आप सभी के लिए स्वाहा. ( १८ )
घृताची स्थो धुर्यौ पात ᳪ सुम्ने स्थः सुम्ने मा धत्तम्.
यज्ञ नमश्च त ऽ उप च यज्ञस्य शिवे संतिष्ठस्व स्विष्ठे मे संतिष्ठस्व.. (१९)
हे दो देव ( जुहू और उपभृत ) ! आप दोनों घी से पूर्ण होइए. आप दोनों अच्छे
मन वाले हो कर स्थित रहिए. आप हम लोगों के लिए अच्छा मन धारण करने की
कृपा कीजिए. यज्ञ व उस के देव उपभृत को नमस्कार. आप हमारा कल्याण करने
की भी कृपा कीजिए. आप हमारे इष्ट देव हैं. आप प्रतिष्ठित होने और हमें सुख
प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( १९ )
अग्नेदब्धायोशीतं पाहि मा दिद्योः पाहि प्रसित्यै पाहि दुरिष्ट्यै पाहि दुरद्मन्या अविषं
नः पितुं कृणु. सुषदा योनौ स्वाहा वाडग्नये संवेशपतये स्वाहा सरस्वत्यै यशोभगिन्यै
स्वाहा.. ( २० )
हे अग्नि! आप हमें शत्रुओं, शस्त्रों व दूषित ( विषैले ) भोजन से बचाइए. आप
भोजन के उन विषैले तत्त्वों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप का मूल स्थान
सुखद हो. आप के लिए स्वाहा. आप के संरक्षण में रहने वालों, देवी तथा यश की
बहन सरस्वती के लिए स्वाहा. ( २० )
वेदोसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः.
देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित. मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ ᳪ स्वाहा वाते
धाः.. ( २१ )
हे देवगण! आप ज्ञानमय हैं. आप हमें भी ज्ञानवान बनाने की कृपा कीजिए.
आप हमारे लिए ज्ञान स्वरूप होइए. हम आप के गुण गाते हैं. आप मन के पालक
हैं. यह यज्ञ देवों को समर्पित है. आप के लिए स्वाहा. वायु इस यज्ञ को धारण कर
के इस का विस्तार करने की कृपा करें. ( २१ )
संबर्हिरङ्क्ता ᳪ हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः सम्मरुद्भिः.
समिन्द्रो विश्वदेवोभिरङ्क्तां दिव्यं नभो गच्छतु यत् स्वाहा.. ( २२)
हे इंद्र! कुश के समूह को घी युक्त करते हैं. कुश के समूह को घी युक्त कर के
यजुर्वेद - ४३

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
समर्पित करते हैं. कुश के समूह विश्व के साथ दिव्य नभ, अरिष्यगण व वसुगणों के
साथ दिव्य नभ तक जाएं. उन के लिए स्वाहा. ( २२ )
कस्त्वा विमुञ्चति स त्वा विमुञ्चति कस्मै त्वा विमुञ्चति तस्मै त्वा विमुञ्चति.
पोषाय रक्षसां भागोसि.. (२३)
कौन आप को छोड़ता है ? किसलिए आप को छोड़ता है ? वह आप को अन्य
( याजकों और उन के परिजनों ) के लिए छोड़ता है. जो भाग अवशिष्ट है, वह
राक्षसों के पोषण के लिए है. ( २३ )
सं वर्चसा पयसा सं तनूभिरगन्महि मनसा सं ४श शिवेन.
त्वष्टा सुदत्रो विदधातु रायोनुमार्टु तन्वो यद्विलिष्टम्.. (२४)
हम वर्चस्वी हों. हम दूध से अपने तन को पोषित करें. हमारे मन कल्याणमयी
भावनाओं से युक्त हों. हमारे लिए धन धारण करने की कृपा करें. हमारे शरीर में
जो भी कमी हो, वह पूरी करने की कृपा करें. ( २४ )
दिवि विष्णोर्व्यक्र ४श स्त जागतेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मोन्तरिक्षे विष्णोर्व्यक्र ४श स्त त्रैष्टुभेन छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं
द्विष्मः पृथिव्यां विष्णोर्व्यक्र ४श स्त गायत्रेण छन्दसा ततो निर्भक्तो योस्मान्द्वेष्टि यं च
वयं द्विष्मोस्मादन्नादस्यै प्रतिष्ठाया ऽ अगन्म स्वः सं ज्योतिषाभूम.. (२५)
विष्णु ने जगती छंद से स्वर्गलोक में पूरा भ्रमण किया है. उन्होंने जो हम से द्वेष
करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन का नाश कर दिया है. उन्होंने त्रिष्टुप् का नाश
कर दिया है. वे गायत्री छंद पृथ्वी से समाप्त करने की कृपा करें. अन्न से ऐसे शत्रुओं
को हटा दिया गया है. हम स्वर्गलोक को पाएं तथा ज्योति संपन्न हो जाएं. ( २५ )
स्वयंभूरसि श्रेष्ठो रश्मिर्वर्चोदा ऽ असि वर्चो मे देहि. सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२६)
आप स्वयं भू, श्रेष्ठ भू, किरणमय भू व वर्चस्वी भू हैं. हम सूर्य की परिक्रमा
के अनुसार ही परिक्रमा करते हैं. ( २६ )
अग्ने गृहपते सुगृहपतिस्त्वयाग्नेहं गृहपतिना भूयास ४श सुगृहपतिस्त्वं मयाग्ने
गृहपतिना भूयाः.
अस्थूरि णौ गार्हपत्यानि सन्तु शत ४श हिमाः सूर्यस्यावृतमन्वावर्ते.. (२७)
हे अग्नि! आप घर के व अच्छे के स्वामी हैं. आप की कृपा से हम भी गृहपति
व अच्छे गृहपति बनें. आप की कृपा से हम भी बारंबार अच्छे गृहपति बनें. हम अच्छे
गृहस्थ हों. हम सौ वर्षों तक यज्ञ कर्म करें. हम सूर्य की परिक्रमा के अनुरूप
अनुशासन का पालन करें. ( २७ )
अग्ने व्रतपते व्रतमचारिषं तदशकं तन्मेराधी दमहं य ऽ एवास्मि सोस्मि.. (२८)
४४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
हे अग्नि! आप व्रतपति हैं. हम भी आप के व्रतों के अनुसार चल कर सामर्थ्यवान
बनते हैं. आप ने हमारी आकांक्षाएं फलीभूत की हैं. हम जैसे यज्ञ करते समय थे
( यज्ञफल प्राप्त हो जाने पर भी ) हम वैसे ही हैं. ( २८ )
अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा सोमाय पितृमते स्वाहा.
अपहता ऽ असुरा रक्षा १७ सि वेदिषदः.. ( २९ )
पितरों के लिए आहुति पहुंचाने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. पितरों के साथी
सोम के लिए स्वाहा. यज्ञ की वेदी से असुर और राक्षसगण दूर हो गए हैं. ( २९ )
ये रूपाणि प्रतिमुञ्चमाना ऽ असुराः सन्तः स्वधया चरन्ति.
परापुरो निपुरो ये भरन्त्यग्निष्टाँल्लोकात्प्रणुदात्यस्मात्.. ( ३० )
जो असुर रूप बदल कर या अन्य रूप में आ कर पितरों के लिए अर्पित आहुति
को खा जाते हैं, आप इस तरह अपना भरणपोषण करने वाले नीच कार्य करने वाले
राक्षसों को लोक से दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३० )
अत्र पितरो मादयध्वं यथाभागमावृषायध्वम्.
अमीमदन्त पितरो यथाभागमावृषायिषत.. ( ३१ )
जैसे बैल अपना भाग प्राप्त कर के मदमस्त हो जाते हैं, पुष्ट हो जाते हैं, वैसे
ही पितृगण अपना भाग पा कर पुष्ट एवं मदमस्त हो जाते हैं. ( ३१ )
नमो वः पितरो रसाय नमो वः पितरः शोषाय नमो वः पितरो जीवाय नमो वः पितरः
स्वधायै नमो वः पितरो घोराय नमो वः पितरो मन्यवे नमो वः पितरः पितरो नमो वो
गृहान्नः पितरो दत्त सतो वः पितरो देष्मैतद्वः पितरो वास ऽ आधत्त.. ( ३२ )
पितरों के रस रूप को नमन. पितरों के शुष्क रूप को नमन. पितरों के जीवन
रूप को नमन. पितरों के अन्न रूप को नमन. पितरों के पोषक रूप को नमन. पितरों
के उत्साह रूप को नमन. पितरों के क्रोध रूप को नमन. पितरों के मन्यु रूप को
नमन. हम पितरों को घर, वस्त्र आदि समर्पित करते हैं. पितर भी हमारे लिए घर,
वस्त्र आदि धारण करने की कृपा करें. ( ३२ )
आधत्त पितरो गर्भं कुमारं पुष्करस्रजम्. यथेह पुरुषोसत्.. ( ३३ )
हे पितृगण! आप गर्भ में ही बालक के लिए अजस्र ( भरपूर ) पोषण प्रदान
करने की कृपा कीजिए जिस से वह वीर बन सके. ( ३३ )
ऊर्जं वहन्तीरमृतं घृतं पयः कीलालं परिस्रुतुम्. स्वधा स्थ तर्पयत मे पितॄन्.. ( ३४ )
ऊर्जा वहन करने वाली व ऊर्जामयी करने वाली, दूधमयी तथा अन्नमयी करने
वाली जलधाराएं पितरों को तृप्त करने की कृपा करें. ( ३४ )
यजुर्वेद - ४५

तीसरा अध्याय

तीसरा अध्याय
समिधाग्निं दुवस्यत घृतैर्बोधयतातिथिम्. आस्मिन् हव्या जुहोतन.. (१)
हे यजमानो! आप समिधा से अग्नि को प्रज्वलित करने व उस को जगाने की
कृपा कीजिए. हे यजमानो! आप अतिथि से अग्नि को प्रज्वलित करने व उस में हवि
प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( १ )
सुसमिद्धाय शोचिषे घृतं तीव्रं जुहोतन. अग्नये जातवेदसे.. (२)
हे यजमानो! आप समिधाओं से अच्छी तरह प्रज्वलित सर्वज्ञ अग्नि में पवित्र घी
की आहुति प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( २ )
तं त्वा समिद्भिद्यिरो घृतेन वर्धयामसि. बृहच्छोचा यविष्ठ्य.. (३)
हे अग्नि! हम आप को समिधाओं व घी से प्रज्वलित कर बढ़ाते हैं. आप
विशाल जौमयी ज्वालाओं से ऊंचे और प्रकाशित होने की कृपा कीजिए. ( ३ )
उप त्वाग्ने हविष्मतीर्घृताचीर्यन्तु हर्यत. जुषस्व समिधो मम.. (४)
हे अग्नि! हवि एवं घृत वाली आहुतियां आप तक पहुंचें, आप का मन हरें.
आप हमारे द्वारा भेंट की गई समिधाओं को स्वीकार करने की कृपा करें. ( ४ )
भूर्भुवः स्वद्यौरिव भूम्ना पृथिवीव वरिम्या.
तस्यास्ते पृथिवि देवयजनि पृष्ठेग्निमन्नादमन्नाद्यायादधे.. (५)
हे अग्नि! आप भू, भुव ( अंतरिक्ष ) और स्वर्गलोक में विद्यमान हैं. पृथ्वी यज्ञ
करने के लिए श्रेष्ठ स्थान प्रदान करती है. हम उसी पृथ्वी पर यज्ञ करने के लिए
उस से पूर्व यज्ञ-वेदिका पर अग्नि को स्थापित करते हैं. हम अन्न से बल और
स्वर्गलोक से दिव्यता धारण करें. हम पृथ्वी के समान महिमा प्राप्त करें. ( ५ )
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसद्न् मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्स्वः.. (६)
अग्नि देव सर्वत्र भ्रमणशील व बहुरंगी लपटों वाले हैं. वह पृथ्वी माता के पास
आसन पर विराजमान हैं. यज्ञ में वह प्रयत्नपूर्वक स्वर्गलोक पिता के पास पहुंच गए
हैं. ( ६ )
४६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन् महिषो दिवम्.. (७)
अग्नि का तेज प्राणवायु और अपानवायु के रूप में सभी प्राणियों के भीतर
संचरण करता है. वे अपने उस तेज को और फैलाते हुए स्वर्गलोक को प्रकाशित
करते हैं. (७)
त्रि ँशद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (८)
वाणी रूप में अग्नि का तेज दस के तिगुने (यानी तीस) स्थानों पर शोभा पाता
है अर्थात् वाणी दिनरात के तीस मुहूर्त और महीने के तीस दिन के रूप में शोभित
होती है. सूर्य के लिए भी स्तुति के रूप में वाणी का तेज धारण किया जाता है. दिन
में प्रकाश रूप में अग्नि के लिए वाणी के रूप में स्तोत्र उचारे जाते हैं. (८)
अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा.
अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा.
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा.. (९)
अग्नि प्रकाश है. प्रकाश अग्नि है. प्रकाश स्वरूप अग्नि के लिए हम आहुति
प्रदान करते हैं. सूर्य प्रकाश है. प्रकाश सूर्य है. हम प्रकाश स्वरूप सूर्य के लिए
आहुति प्रदान करते हैं. वाणी अग्नि है. अग्नि वाणी है. वाणी स्वरूप अग्नि के लिए
आहुति प्रदान करते हैं. वाणी सूर्य रूप है. सूर्य वाणी रूप है. हम सूर्य को आहुति
प्रदान करते हैं. प्रकाश सूर्य रूप है. सूर्य प्रकाश रूप है. हम सूर्य को आहुति प्रदान
करते हैं. (९)
सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या.
जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा.
सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या.
जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा.. (१०)
सविता देव सहित और इंद्रयुक्त रात्रि सहित अग्नि को आहुति प्रदान करते हैं.
इन देवताओं से युक्त (जुड़े हुए) अग्नि इस आहुति को ग्रहण करने की कृपा करें.
सविता देव सहित इंद्रयुक्त उषा देवी के साथ सूर्य के लिए यह आहुति प्रदान करते
हैं. सूर्य इस आहुति को स्वीकार करने की कृपा करें. (१०)
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचे माग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (११)
हम यज्ञ के समीप प्रयास कर रहे हैं (जा रहे हैं). हम अग्नि के लिए मंत्र उच्चार
रहे हैं. वे हमारे समीप आने की कृपा करें और मंत्रों को सुनने की कृपा करें. (११)
अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्. अपा ँश रेता ँश सि जिन्वति.. (१२)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य (सर्वोच्च), स्वर्गलोक में स्थित, इस पृथ्वी के स्वामी
यजुर्वेद - ४७

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
और भरणपोषण करने वाले हैं. आप जल में प्राणदायी शक्ति डालते हैं व जीवों
को जिलाते हैं. ( १२ )
उभा वामिन्द्राग्नी आहुवध्या उभा राधसः सह मादयध्यै.
उभा दाताराविषा १७ं रयीणामुभा वाजस्य सातये हुवे वाम्.. (१३)
हे इंद्र! हे अग्नि! हम यजमान आप दोनों देवताओं को यज्ञ में आमंत्रित करते
हैं. हम आप दोनों को आहुति भेंट करते हैं. हम आप की आराधना करते हैं. आप
अन्नधनसहित हमें मदमस्त बनाइए. आप अन्न और धन के दाता हैं. हम आप दोनों
को ही अन्न और धन पाने के लिए यज्ञ में आमंत्रित करते हैं. ( १३ )
अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः.
तं जानन्नग्न ऽ आरोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (१४)
हे अग्नि! आप बारबार उत्पन्न होने वाले हैं. इसलिए यज्ञ की समाप्ति पर आप
पुनः गृहस्थ के यहां जन्म लें अर्थात् प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल प्रकट हों. बाद
में पुनः यज्ञ के लिए हमें समृद्ध करें. ( १४ )
अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः.
यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभ्वं विशेविशे.. (१५)
हे अग्नि! आप प्रथम हैं. आप देवताओं को आमंत्रित करते हैं. आप यज्ञवान
हैं. यज्ञ में पुरोहितों द्वारा आप की उपासना और स्थापना की जाती है. आप को
आप्नवान और भृगु आदि ऋषियों ने समय-समय पर वनों में प्रज्वलित किया. आप
विलक्षण हैं. ( १५ )
अस्य प्रत्नामनु द्युत १४ं शुक्रं दुदुहे अह्रयः. पयः सहस्रासामृषिम्.. (१६)
अग्नि देव चिरकाल से हैं. हम उन की कांति का अनुसरण करना चाहते हैं.
यजमान ने दूध, दही आदि हवि की सामग्री से हजारों यज्ञ करने वाले ऋषियों की
भांति दूध दुहा है. ( १६ )
तनूपा ऽ अग्नेसि तन्वं मे पाह्यायुर्दा ऽ अग्नेस्यायुर्मे देहि वर्चोदा ऽ अग्नेसि वर्चो मे देहि.
अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्म ऽ आपृण.. (१७)
हे अग्नि! आप पुरोहित के तन के रक्षक हैं. आप हमारे भी तन की रक्षा करने
की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप आयु देने वाले हैं. आप हमें ( दीर्घ ) आयु प्रदान
करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप वर्चस्व ( प्रभाव ) प्रदाता हैं. आप हमें
वर्चस्व प्रदान करने की कृपा कीजिए. हे अग्नि! आप हमारे शरीर की न्यूनता
( कमियां ) दूर कर के उसे पूर्ण करने की कृपा कीजिए. ( १७ )
इन्धानास्त्वा शत १७ं हिमा द्युमन्त १७ं समिधीमहि.
४८ - यजुर्वेद 632/3

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
वयस्वन्तो वयस्कृत १७ सहस्वन्तः सहस्कृतम्.
अग्ने सपत्नदम्भनमदब्धासो अदाभ्यम्.
चित्रावसो स्वस्ति ते पारमशीय.. (१८)
हे अग्नि! आप प्रकाशमान व धनवान हैं. आप की कृपा से यजमान सौ वर्ष की
आयु पाते हैं. आप आयुष्मान हैं. आप हमें भी आयुष्मान बनाने की कृपा कीजिए.
आप शक्तिमान हैं. हमें भी शक्तिमान बनाने की कृपा कीजिए. आप अदम्य हैं. आप
हमें पत्नी सहित सौ वर्षों तक प्रकाशित रखने की कृपा कीजिए. आप विलक्षण हैं.
आप हमें कल्याण के लिए अपनी शरण में रखने की कृपा कीजिए. (१८)
सं त्वमग्ने सूर्यस्य वर्चसागथाः समृषीणा १७ स्तुतेन.
सं प्रियेण धाम्ना समहमायुषा सं वर्चसा सं प्रजया स १७ रायस्पोषेण गमिषीय.. (१९)
हे अग्नि! आप सूर्य से प्रभावित हैं. आप ऋषियों की स्तुतियों से युक्त हैं.आप
आहुतिमय हैं. आप अपने प्रिय धाम से आयु, वर्चस्व, संतान, धनधान्य पोषण सहित
पधारने की कृपा कीजिए. (१९)
अन्धस्थान्धो वो भक्षीय महस्थ महो वो भक्षीयोर्जस्थोर्जं वो भक्षीय रायस्पोषस्थ
रायस्पोषं वो भक्षीय.. (२०)
हे गौओ! आप अन्न स्वरूपा हैं. आप की कृपा से अन्न हमारे लिए खाने योग्य
होता है. आप रस से युक्त हैं. आप की कृपा से घी, दूध आदि रसीली चीजें खाने
योग्य होती हैं. आप आदरणीया हैं. हमें आदर योग्य बनाने की कृपा कीजिए. आप
धनवती हैं. आप हमें धनी बनाने की कृपा कीजिए. आप बलवती हैं. आप हमें भी
बलवान बनाइए. आप की कृपा से हम पुष्ट हों. (२०)
रेवती रमध्वमस्मिन्योनावस्मिन् गोष्ठेऽस्मिँल्लोकेऽस्मिन् क्षये. इहैव स्त मापगात.. (२१)
हे रेवती ( धन वाली गौओ )! आप यज्ञ के समय यज्ञस्थल पर प्रसन्नता के साथ
रहें. आप दुही जाने से पहले बाड़े में विचरें. आप सदैव यजमान की आंखों में रहें.
आप यहीं निवास कीजिए. आप कहीं मत जाइए. (२१)
स १७ हितासि विश्वरूप्यूर्जामाविश गौपत्येन.
उप त्वाग्ने दिवेदिवे दोषावस्तर्द्धिया वयम्.
नमो भरन्त ऽ एमसि.. (२२)
हे गौओ! आप बहुत रूपों वाली और ऊर्जस्वी ( तेजस्‍वी ) हैं. आप यजमान
को गोपति बनाती हैं. हे अग्नि! आप दिनरात यजमान के पास निवास करते हैं. हम
श्रद्धा से भर कर आप को नमन करते हैं. हम आप के पास आते हैं. (२२)
राजन्तमध्वराणां गोपामृतस्य दीदिविम्. वर्धमान १७ स्वे दमे.. (२३)
यजुर्वेद - ४९

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे अग्नि! आप प्रकाशमान हैं. आप यज्ञों में शोभित होते हैं. आप स्वर्गलोक
को भी प्रकाशित करते हैं. आप गोपति व अमर हैं. आप स्वयं यज्ञ में बढ़ोत्तरी पाते
हैं. हम उपासना से आप के पास आते हैं. ( २३ )
स नः पितेव सूनवेग्ने सूपायनो भव. सचस्वा नः स्वस्तये.. (२४)
हे अग्नि! आप यजमानों के पास उसी तरह बने रहें जैसे पिता पुत्र के पास बना
रहता है. आप हम यजमानों के कल्याण के लिए सदैव यजमानों के पास रहने की
कृपा कीजिए. ( २४ )
अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः.
वसूरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दाः.. ( २५)
हे अग्नि! आप हमारे पास हैं. आप पालक, रक्षक, कल्याणकारी व भावी
पीढ़ियों के दाता हैं. आप घर दाता, विश्वविख्यात, धन और कीर्तिदाता हैं. हमारी
आंख के तारे व धनदाता हैं. ( २५ )
तन्त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.
स नो बोधि श्रुधी हवमुरुष्याणो अघायतः समस्मात्.. (२६)
हे अग्नि! आप पवित्रतम हैं. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करने वाले हैं.
आप से हम अपने अच्छे मन के लिए कामना करते हैं. आप से हम अच्छे मित्रों के
लिए इच्छा करते हैं. आप पापियों से हमें बचाइए. आप हमें जागृत कीजिए. आप
हमारा निवेदन सुनिए. ( २६ )
इड ऽ एह्यदित ऽ एहि काम्या ऽ एत. मयि वः कामधरणं भूयात्.. (२७)
हे इड़ा देवी! व हे अदिति देवी! आप यहां पधारिए. आप यहां पधारने की
इच्छा कीजिए. हे इच्छित गौ! आप हमारी इच्छाओं को पूरा करने के लिए यहां
पधारिए. ( २७ )
सोमान १७ स्वरणं कृणुहि ब्रह्मणस्पते. कक्षीवन्तं य ऽ औशिजः.. (२८)
हे ब्रह्मणस्पति! आप सोम का सेवन करने वालों को प्रकाशमान कीजिए. जैसे
उशीज के पुत्र कक्षीवान को आप ने महिमावान बनाया, वैसे ही आप हमें भी
महिमावान बनाने की कृपा कीजिए. ( २८ )
यो रेवान्यो अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः. स नः सिषक्तु यस्तुरः.. ( २९)
हे ब्रह्मणस्पति! आप रोगहारी, धनवान, ऐश्वर्यदाता, पुष्टिवर्धक व जल्दी काम
समाप्त करने वाले हैं. आप हमारे पास पधारने की कृपा कीजिए. ( २९)
मा नः श १७ सो अरुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य. रक्षा णो ब्रह्मणस्पते.. (३०)
५० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे ब्रह्मणस्पति! आप हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. हम पर धूर्त, अयज्ञी
( यज्ञ न करने वालों ) लोगों का बुरा असर न हो. ( ३० )
महि त्रीणामवोस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः. दुराधर्षं वरुणस्य.. (३१)
मित्र देवता, अर्यमन देवता और दुर्धर्ष ( प्रबल प्रतापी ) वरुण तीनों देव हमारी
रक्षा करने की कृपा करें. ( ३१ )
नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु. ईशे रिपुरघश ᳪ सः.. (३२)
राह, कठिन स्थान और घर आदि स्थानों में भी तीनों देवों की कृपा से पापी
शत्रु असर नहीं डाल सकता. ( ३२ )
ते हि पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय. ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्.. (३३)
वे तीनों देव अदिति देव के पुत्र हैं. वे मनुष्यों को दीर्घ जीवन और कभी क्षीण
न होने वाली ज्योति प्रदान करते हैं. ( ३३ )
कदा चन स्तरीरसि नेन्द्र सश्चसि दाशुषे.
उपोपेन्नु मघवन् भूय ऽ इन्नु ते दानं देवस्य पृच्यते.. (३४)
हे इंद्र! आप अहिंसक हैं. यजमान हविदाता हैं. यजमान की धनदान से सेवा करते
हैं. आप ऐश्वर्य से युक्त हैं. आप यजमान को अधिक धन दान करने वाले हैं. ( ३४ )
तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि. धियो यो नः प्रचोदयात्.. (३५)
सविता वरण करने योग्य व सौभाग्यवान हैं. हम उन की बुद्धिपूर्वक उपासना
करते हैं. वे हमारी बुद्धि को प्रेरित करने की कृपा करें. ( ३५ )
परि ते दूडभो रथोस्माँ २ अश्नोतु विश्वतः. येन रक्षसि दाशुषः.. (३६)
हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा करने की कृपा करें. हे देवगण! आप
का रथ हमारी रक्षा करने की कृपा करे. हे देवगण! आप चारों ओर से हमारी रक्षा
करने की कृपा करें, ताकि हमारे धन की रक्षा हो सके. ( ३६ )
भूर्भुवः स्वः सुप्राजाः प्रजाभिः स्या ᳪ सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.
नर्य प्रजां मे पाहि श ᳪ स्य पशून्मे पाह्यर्थर्य पितुं मे पाहि.. (३७)
हे अग्नि! हम अच्छी संतान और अच्छे वीरों वाले हो जाएं. हम सुवीरों का अच्छे
अन्न से पोषण करें. आप हमारी संतान, हमारे पशुओं व पालक की रक्षा करने की
कृपा करें. ( ३७ )
आ गन्म विश्ववेदसमस्मभ्यं वसुवित्तमम्.
अग्ने सम्राडभि द्युम्नमभि सह ऽ आ यच्छस्व.. ( ३८)
यजुर्वेद - ५१

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
हे अग्नि! आप बुलाने योग्य व सर्वविद् हैं. आप हमारे लिए श्रेष्ठ धन धारण
करने व हमारे पास आने की कृपा कीजिए. आप सम्राट् हैं. आप शोभा सहित
पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ३८ )
अयमग्निर्गृहपतिर्गाहर्पत्यः प्रजाया वसुवित्तमः.
अग्ने गृहपतेभि द्युम्नमभि सह आ यच्छस्व.. (३९)
ये अग्नि गृहपति हैं. हमारी संतान के लिए धन देने वाले हैं. हे अग्नि! आप
गृहपति हैं. आप शोभा सहित पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा
कीजिए. ( ३९ )
अयमग्निः पुरीष्यो रयिमान् पुष्टिवर्धनः.
अग्ने पुरीष्याभि द्युम्नमभि सह ऽ आ यच्छस्व... (४०)
यह अग्नि दक्षिण, धनवान व पुष्टिवर्धक है. हे अग्नि! आप वैभववर्धक हैं. आप
शोभा सहित पधारिए और हमें भी शोभा प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ४० )
गृहा मा बिभीत मा वेपध्वमूर्जं बिभ्रत ऽ एमसि.
ऊर्जं बिभ्रद्वः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः.. (४१)
हे घर! भयभीत और कांपिए मत. हम ऊर्जस्वी ( तेजवान ) होने के लिए आप
के पास आते हैं. हम ओज संपन्न हो कर आप में प्रविष्ट होते हैं. हम श्रेष्ठ बुद्धिमान
दुःखहीन हो कर आप में प्रविष्ट होते हैं. ( ४१ )
येषामध्येति प्रवसन्येषु सौमनसो बहुः. गृहानुपह्वयामहे ते नो जानन्तु जानतः.. (४२)
प्रवास के समय जिस के बारे में सोचते हैं, अच्छे मन से उस घर में प्रसन्नता
से रह रहे हैं. घर के पास रहने वाले देवता ज्ञानी हैं. वे देवता हमारे इस भाव को
जानने की कृपा करें. ( ४२ )
उपहूता ऽ इह गाव ऽ उपहूता ऽ अजावयः.
अथो अन्नस्य कीलाल ऽ उपहूतो गृहेषु नः.
क्षेमाय वः शान्त्यै प्रपद्ये शिव ँ शग्म ँ शंयोः शंयोः.. (४३)
हमारे घर में सुख से रहने के लिए गायों, भेड़ों व बकरियों को सम्मान से
बुलाया गया है. अन्न की समृद्धि हेतु हम इन का आह्वान करते हैं. हम कल्याण व
अनिष्ट निवारण हेतु आप का आह्वान करते हैं. हम लौकिक और पारलौकिक सुख
पाना चाहते हैं. ( ४३ )
प्रघासिनो हवामहे मरुतश्च रिशादसः. करम्भेण सजोषसः.. (४४)
हे मरुद्गणो! आप शत्रुओं की हिंसा करने वाले व हवि का भक्षण करने वाले
हैं. हे मरुद्गणो! आप दही मिश्रित सत्तू का भक्षण करने वाले हैं. ( ४४ )
५२ – यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
यद्ग्रामे यदर॑ण्ये॒ यत्स॒भायां॒ यदि॑न्द्रि॒ये.
यदेन॑श्चकृ॒मा व॒यमि॒दं तदव॑यजामहे॒ स्वाहा॑.. (४५)
जो पाप हम ने गांव, जंगल और सभा में किए हैं हम उन से मुक्त होने के लिए
यज्ञ करते हैं, उन के लिए स्वाहा. जो पाप हम ने इंद्रियों से किए हैं हम उन से मुक्त
होने के लिए यज्ञ करते हैं, उन के लिए स्वाहा. ( ४५ )
मो षू ण ऽ इन्द्रात्र॒ पृत्सु॑ दे॒वैरस्ति॒ हि ष्मा॑ ते शुष्मि॒न्नव॑याः.
म॒हश्चि॒द्यस्य॑ मीढुषो यव्या॑ ह॒विष्म॑तो म॒रुतो॒ वन्द॑ते॒ गीः.. (४६)
हे इंद्र! आप शक्तिमान और देवों का पक्ष लेने वाले हैं. आप हमारा नाश मत
कीजिए. आप महान और हवि को ग्रहण करने वाले हैं. आप यज्ञ वाली हवि ग्रहण
करते हैं. हम मरुद्गण की भी वाणी से वंदना करते हैं. ( ४६ )
अक्र॒न् कर्म॑ कर्म॒कृतः॒ सह॑ वा॒चा म॑यो॒भुवा.
दे॒वेभ्यः॒ कर्म॑ कृ॒त्वास्तं॒ प्रेत॑ सचाभुवः.. (४७)
कर्मकर्ता वाणी के साथ मंत्रपाठ का कर्म करने की कृपा करें. परस्पर प्रीतिपूर्वक
रहने वाले यजमानगण देवताओं के अनुष्ठान कर के प्रस्थान करने की कृपा
करें. ( ४७ )
अव॑भृथ निचुम्पु॒ण नि॒चेरु॑रसि निचुम्पु॒णः.
अव॑ दे॒वैर्दे॒वकृ॑त॒मेनो॑यासिष॒मव॒ मर्त्यैर्मर्त्य॑कृ॒तं पु॒रुरा॒व्णो दे॑व रि॒षस्पाहि॑.. (४८)
हे जलप्रवाह! आप नीचे की ओर बहने वाले और बहुत तीव्र वेग वाले हैं.
फिर भी धीमी गति से बहने की कृपा कीजिए. आप देवताओं के प्रति किए गए
पाप धोने के लिए पधारे हैं. आप दुःखदायी शत्रुओं से हमारी रक्षा करने की कृपा
कीजिए. ( ४८ )
पूर्णा दर्वि॒ परा॑पत सु॒पूर्णा पुन॒राप॑त. व॒स्नेव॒ विक्री॑णावहा॒ इष॒मूर्ज॑ १७॒ शत॑क्रतो.. (४९)
हे दर्वि देवी! आप पास स्थित अन्न से परिपूर्ण होने की कृपा कीजिए. आप
इंद्र की ओर जाने की कृपा कीजिए. वे सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. हम हवि रूप
अन्न रस को आपस में बेचें ( आदानप्रदान करें ). ( ४९ )
देहि॑ मे ददामि ते॒ नि मे॑ धेहि॒ नि ते॑ दधे.
नि॒हारं॑ च॒ हरा॑सि मे नि॒हारं॒ निह॑राणि ते॒ स्वाहा॑.. (५०)
( इंद्र कहते हैं ) हे यजमान! आप हमें हवि प्रदान कीजिए. हम आप को
( सुफल ) प्रदान करेंगे. आप निश्चित ( रूप से ) हवि धारण कीजिए. हम आप को
अभीष्ट फल देंगे. ( यजमान कहते हैं ) हे इंद्र! हम निश्चय ही आप को हवि प्रदान
करते हैं. आप भी हमारे लिए अन्न प्रदान कीजिए. आप के लिए स्वाहा. ( ५० )
यजुर्वेद - ५३

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अक्षन्नमीमदन्त ह्यव प्रिया ऽ अधूषत.
अस्तोषत स्वभानवो विप्रा नविष्ठया मती योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५१)
हम ने यज्ञ में जो हवि पितरों के लिए प्रदान की है, उसे पितरों ने स्वीकार कर
लिया है. स्वीकार कर के उस हवि का सेवन भी कर लिया है. स्वयं प्रकाशित
ब्राह्मणों ने नई ऋचाओं से स्तुति शुरू कर दी. हे इंद्र! अब इस यज्ञ में पधारने के
लिए 'हरी' नामक घोड़ों को रथ में जोतने की कृपा कीजिए. (५१)
सुसन्दृशं त्वा वयं मघवन्वन्दिषीमहि.
प्र नूनं पूर्णबन्धुर स्तुतो यासि वशाँ २ अनु योजा न्विन्द्र ते हरी.. (५२)
हे इंद्र! आप धनवान हैं. आप सभी को अच्छी और समान दृष्टि से देखते हैं.
हम सब आप की उपासना करते हैं. आप निश्चय ही हम सभी के पूर्ण बंधु हैं. आप
स्तुति करने वालों के वश में रहते हैं.आप उन की स्तुतियों का अनुकरण करते हैं.
आप उन की इच्छा पूरी करने के लिए रथ में 'हरी' नामक घोड़ों को जोतने की
कृपा कीजिए. (५२)
मनो न्वाह्वामहे नाराश १७१ सेन स्तोमेन. पितॄणां च मन्मभिः.. (५३)
हम वीर पुरुषों की गाथाओं को गाने वाले मंत्रों से पितरों को आमंत्रित करते
हैं. हम पितरों को मन से बार-बार आमंत्रित करते हैं. (५३)
आ न ऽ एतु मनः पुनः क्रत्वे दक्षाय जीवसे. ज्योक् च सूर्यं दृशे.. (५४)
हमारा यह मन (पितृलोक से) पुनः आए. यज्ञ कार्य के लिए जीवलोक में
पधारने की कृपा करे. हम बारबार सूर्य का प्रकाश देख सकें. (५४)
पुनर्नः पितरो मनो ददातु दैव्यो जनः. जीवं व्रात १७१ सचेमहि.. (५५)
पितृगण! पुनः हमारे मन को श्रेष्ठ कार्यों के लिए प्रेरित करने की कृपा करें.
ताकि हम जीवों और घर वालों की सेवा कर सकें. (५५)
वय १७१ सोम व्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः. प्रजावन्तः सचेमहि.. (५६)
हे पितरो! आप सोम व्रत वाले हैं. हम आप के प्रति पितृकार्यों में मन और
तन लगाए हुए हैं. उसे धारण किए हुए हैं. हम संतानवान सचित्त आप की सेवा
में लगे रहें. (५६)
एष ते रुद्र भागः सह स्वस्राम्बिकया तं जुषस्व स्वाहैष ते रुद्र भाग ऽ आखुस्ते पशुः.. (५७)
हे रुद्र! यह आप का भाग है. आप अपनी पत्नी अंबिका के साथ इसे ग्रहण
करने की कृपा कीजिए. आप के लिए स्वाहा. हे रुद्र! यह भाग आप के पशु चूहे
के लिए अर्पित है. (५७)
५४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अव रुद्रमदीमह्मव देवं त्र्यम्बकम्.
यथा नो वस्यसस्करद्यथा नः श्रेयसस्करद्यथा नो व्यवसाययात्.. (५८)
रुद्र देव व त्र्यंबक को हम लोगों की रक्षा करनी चाहिए. वे हमारे लिए आयुकारी
( बढ़ोतरी करने वाले ), श्रेयकारी व व्यवसायों की बढ़ोतरी करने वाले हों. ( ५८ )
भेषजमसि भेषजं गवेश्वाय पुरुषाय भेषजम्. सुखं मेषाय मेष्यै.. (५९)
हे रुद्र! आप रोग निवारक ओषधि की भांति कष्ट निवारक हैं. आप हमारे
घोड़ों के लिए ओषधि प्रदान कीजिए. आप हमारे व्यक्तियों के लिए ओषधि
प्रदान कीजिए. हम अपने भेड़ और अन्य पशुओं की आप से कुशलता चाहते
हैं. ( ५९ )
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पतिवेदनम्.
उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुक्षीय मामुतः.. (६०)
हे रुद्र! आप तीन दृष्टियों वाले हैं. हम आप की उपासना करते हैं. आप जीवन
में सुगंध फैलाने व पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं. हमें संरक्षण प्रदान करते हैं. हम
सांसारिक बंधनों से, वृक्ष से अलग हुए फल की भांति अलग हो जाएं; पर अमरता
से नहीं. ( ६० )
एतत्ते रुद्रावसं तेन परो मूजवतोतीहि.
अवततधन्वा पिनाकावसः कृत्तिवासा ऽ अहि ँषन् सन्तः शिवोतीहि.. (६१)
हे रुद्र! आप अपने बचे हुए हवि-भाग को साथ ले कर मूंजवत पर्वत पार कर
जाइए. आप अपना धनुष कपड़ों से ढक दीजिए. आप कल्याण करने वाले हैं. आप
पर्वत को पार कर के पधार जाइए. ( ६१ )
त्र्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य त्र्यायुषम्. यद्देवेषु त्र्यायुषं तन्नो अस्तु त्र्यायुषम्.. (६२)
जमदग्नि की तीन अवस्थाएं हैं. कश्यप की तीन अवस्थाएं हैं. देवताओं की
तीन अवस्थाएं हैं. हमारी भी ( वैसी ही ) तीन अवस्थाएं हों. ( ६२ )
शिवो नामासि स्वधितिस्ते पिता नमस्ते अस्तु मा मा हि ँसीः.
नि वर्त्तयाम्यायुषेन्नाद्याय प्रजननाय रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.. (६३)
आप का नाम ही शिव ( कल्याणकारी ) है. धारदार शस्त्र आप के पिता हैं.
आप को हमारा नमन. आप हमें कभी कष्ट न दें. हम आयु, अन्न, प्रजनन, धन व
पोषण के लिए आप से निवेदन करते हैं. हम अच्छी संतान एवं अच्छे वीर्य के लिए
आप से निवेदन करते हैं. ( ६३ )
यजुर्वेद - ५५

चौथा अध्याय

चौथा अध्याय
एदमगन्म देवयजनं पृथिव्या यत्र देवासो अजुषन्तविश्वे.
ऋक्सामभ्या ᳪ सन्तरन्तो यजुर्भी रायस्पोषेण समिषा मदेम.
इमा ऽ आपः शमु मे सन्तु देवीरोषधे त्रायस्व स्वधिते मैनं ᳪ हि ᳪ सी:.. (१)
जिस यज्ञ स्थान पर सारे देवता प्रसन्न होते हैं, हम सभी यजमान उसी स्थल पर
इकट्ठे हुए हैं. ऋग्वेद और सामवेद के मंत्रों से हम यज्ञ के पार जाते हैं. यजुर्वेद के
मंत्रों से यज्ञ करते हुए हम धन और पोषण प्राप्त करते हैं. ये जल हमारे लिए
शांतिदायी हों. दिव्य गुणों वाली ओषधियां हमें रोगों से बचाएं. ये अस्त्रशस्त्र
(अनावश्यक) हिंसाकारी न हों. (१)
आपो अस्मान्मातरः शुन्धयन्तु घृतेन नो घृतप्वः पुनन्तु.
विश्वं ᳪ हि रिप्रं प्रवहन्ति देवीरुदिदाभ्यः शुचिरा पूत एमि.
दीक्षातपसोस्तनूरसि तां त्वा शिवा ᳪ शग्मां परि दधे भद्रं वर्णं पुष्यन्.. (२)
जल हमारी मां है. जल हमें शोधित (शुद्ध) करने की कृपा करे. घी से
जो जल झरता है, वह हमें पवित्र करने की कृपा करे. प्रवाहित होता हुआ
जल सभी पापों को धो दे. जल से हम शुद्ध और पवित्र होते हैं. हे रेशमी वस्त्र! आप
दीक्षातपस देव का शरीर हो. आप कोमल, सुखद, कल्याणकारी व श्रेष्ठ (सुंदर)
रंग वाले हैं. हम आप को (यज्ञ में) धारण करते हैं. (२)
महीनां पयोसि वर्चोदा ऽ असि वर्चो मे देहि.
वृत्रस्यासि कनीनकश्चक्षुर्दा ऽ असि चक्षुर्मे देहि.. (३)
आप गायों का दूध हैं. आप वर्चस्व (चमक) देने वाले हैं. आप हमें वर्चस्व
प्रदान कीजिए. आप वृत्र की आंख की पुतली हैं. आप आंख देने वाले हैं. आप हमें
आंख प्रदान कीजिए. (३)
चित्पतिर्मा पुनातु वाक्पतिर्मा पुनातु देवो मा सविता पुनात्वच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य
रश्मिभिः.
तस्य ते पवित्रपते पवित्रपूतस्य यत्कामः पुने तच्छकेयम्.. (४)
५६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौथा अध्याय

पूर्वार्ध चौथा अध्याय
आप चित्त ( मन ) के पति ( स्वामी ) हैं. आप हमें पवित्र कीजिए. आप वाणी
के स्वामी हैं. आप हमें पवित्र बनाइए. दोष ( छिद्रों ) से रहित सविता देव हमें पवित्र
करने की कृपा करें. सूर्य अपनी किरणों से हमें पवित्र बनाएं. हे पवित्रपति ! हम आप
के पुत्र हैं. हम पवित्र हो कर अपनी मनोकामना पूर्ण करें, ताकि हम और अधिक
यज्ञ करने योग्य हो सकें. ( ४ )
आ वो देवास ऽ ईमहे वामं प्रत्यध्वरे. आ वो देवास ऽ आशिषो यज्ञियासो हवामहे.. (५)
हे देवताओ! हम इस यज्ञ के आरंभ में अपनी इच्छापूर्ति के लिए आप को
आमंत्रित करते हैं. हे देवताओ! हम याज्ञिक ( यज्ञ करने वाले ) आशीर्वाद और यज्ञ
फल की प्राप्ति के लिए आप का आह्वान करते हैं. ( ५ )
स्वाहा यज्ञं मनसः स्वाहोरोरन्तरिक्षात्स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ᳪ स्वाहा वातादारभे
स्वाहा.. (६)
हे यज्ञ देव! हम मन से यज्ञ करते हैं. उन के लिए स्वाहा. अंतरिक्षलोक, स्वर्गलोक
व पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. हम वायु को यज्ञ के आरंभ में ही आहुति अर्पित करते
हैं. ( ६ )
आकूत्यै प्रयुजेग्नये स्वाहा मेधायै मनसेग्नये स्वाहा दीक्षायै तपसेग्नये स्वाहा सरस्वत्यै
पूष्णेग्नये स्वाहा.
आपो देवीर्बृहतीर्विश्वशम्भुवो द्यावापृथिवी उरो अन्तरिक्ष.
बृहस्पतये हविषा विधेम स्वाहा.. (७)
अग्नि यज्ञ के संकल्प की प्रेरणा देने वाले हैं. उन के लिए स्वाहा. अग्नि यज्ञ
की बुद्धि देते हैं. यज्ञ करने में मन को प्रेरित करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. दीक्षा
और तप की सिद्धि हेतु अग्नि को यह आहुति दी जाती है. सरस्वती देवी के लिए
स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. हे जल देव! आप के लिए
स्वाहा. संसार के पालक शंभु देव के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा.
पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. विशाल अंतरिक्षलोक के लिए स्वाहा. हम बृहस्पति के
लिए हवि समर्पित करते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ७ )
विश्वो देवस्य नेतुर्मर्तो वुरी॑त सख्यम्.
विश्वो राय ऽ इषुध्यति द्युम्नं वृणीत पुष्यसे स्वाहा.. (८)
सविता देव सभी देवों का नेतृत्व करने वाले हैं. वे वरेण्य ( श्रेष्ठ ) गुणों वाले
हैं. हम उन की मित्रता पाना चाहते हैं. हम उन से सभी प्रकार के वैभव चाहते हैं.
हम सब के लिए उन से धन प्राप्ति की चाह रखते हैं. हम स्वर्गदायी वैभव ( यशस्वी )
चाहते हैं. हम प्रजा का पोषण करने के लिए धन चाहते हैं. सविता देव के लिए
स्वाहा. ( ८ )
यजुर्वेद - ५७