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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 47, कुल 421 में से

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पृष्ठ 47

पूर्वार्ध तीसरा अध्याय
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन् महिषो दिवम्.. (७)
अग्नि का तेज प्राणवायु और अपानवायु के रूप में सभी प्राणियों के भीतर
संचरण करता है. वे अपने उस तेज को और फैलाते हुए स्वर्गलोक को प्रकाशित
करते हैं. (७)
त्रि ँशद्धाम विराजति वाक् पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभिः.. (८)
वाणी रूप में अग्नि का तेज दस के तिगुने (यानी तीस) स्थानों पर शोभा पाता
है अर्थात् वाणी दिनरात के तीस मुहूर्त और महीने के तीस दिन के रूप में शोभित
होती है. सूर्य के लिए भी स्तुति के रूप में वाणी का तेज धारण किया जाता है. दिन
में प्रकाश रूप में अग्नि के लिए वाणी के रूप में स्तोत्र उचारे जाते हैं. (८)
अग्निर्ज्योतिर्ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिर्ज्योतिः सूर्यः स्वाहा.
अग्निवर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्यो वर्चो ज्योतिर्वर्चः स्वाहा.
ज्योतिः सूर्यः सूर्यो ज्योतिः स्वाहा.. (९)
अग्नि प्रकाश है. प्रकाश अग्नि है. प्रकाश स्वरूप अग्नि के लिए हम आहुति
प्रदान करते हैं. सूर्य प्रकाश है. प्रकाश सूर्य है. हम प्रकाश स्वरूप सूर्य के लिए
आहुति प्रदान करते हैं. वाणी अग्नि है. अग्नि वाणी है. वाणी स्वरूप अग्नि के लिए
आहुति प्रदान करते हैं. वाणी सूर्य रूप है. सूर्य वाणी रूप है. हम सूर्य को आहुति
प्रदान करते हैं. प्रकाश सूर्य रूप है. सूर्य प्रकाश रूप है. हम सूर्य को आहुति प्रदान
करते हैं. (९)
सजूर्देवेन सवित्रा सजू रात्र्येन्द्रवत्या.
जुषाणो अग्निर्वेतु स्वाहा.
सजूर्देवेन सवित्रा सजूरुषसेन्द्रवत्या.
जुषाणः सूर्यो वेतु स्वाहा.. (१०)
सविता देव सहित और इंद्रयुक्त रात्रि सहित अग्नि को आहुति प्रदान करते हैं.
इन देवताओं से युक्त (जुड़े हुए) अग्नि इस आहुति को ग्रहण करने की कृपा करें.
सविता देव सहित इंद्रयुक्त उषा देवी के साथ सूर्य के लिए यह आहुति प्रदान करते
हैं. सूर्य इस आहुति को स्वीकार करने की कृपा करें. (१०)
उपप्रयन्तो अध्वरं मन्त्रं वोचे माग्नये. आरे अस्मे च शृण्वते.. (११)
हम यज्ञ के समीप प्रयास कर रहे हैं (जा रहे हैं). हम अग्नि के लिए मंत्र उच्चार
रहे हैं. वे हमारे समीप आने की कृपा करें और मंत्रों को सुनने की कृपा करें. (११)
अग्निमूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्. अपा ँश रेता ँश सि जिन्वति.. (१२)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य (सर्वोच्च), स्वर्गलोक में स्थित, इस पृथ्वी के स्वामी
यजुर्वेद - ४७