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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 43, कुल 421 में से

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पृष्ठ 43

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
है. वह परिधि आप के अनुरूप है. वह परिधि गुप्त है. अग्नि इस परिधि को भरनेपूरने
की कृपा करें. अग्नि के लिए प्रिय पाथेय समर्पित किया गया है. वे उन्हें स्वीकार
करने की कृपा करें. ( १७ )
स ᳪ स्वभागा स्थेषा बृहन्तः प्रस्तरेष्ठाः परिधयाश्च देवाः.
इमां वाचमभि विश्वे गृणन्त ऽ आसद्यास्मिन् बर्हिषि मादयध्व ᳪ स्वाहा वाट्.. ( १८ )
हे देवगण! आप अपने आश्रम व अपनी परिधि ( मर्यादा ) में रहने की कृपा
करें. हम आप सब की वाणी से वंदना करते हैं. आप कुश के आसन पर विराजिए
और आनंदित होइए. आप सभी के लिए स्वाहा. ( १८ )
घृताची स्थो धुर्यौ पात ᳪ सुम्ने स्थः सुम्ने मा धत्तम्.
यज्ञ नमश्च त ऽ उप च यज्ञस्य शिवे संतिष्ठस्व स्विष्ठे मे संतिष्ठस्व.. (१९)
हे दो देव ( जुहू और उपभृत ) ! आप दोनों घी से पूर्ण होइए. आप दोनों अच्छे
मन वाले हो कर स्थित रहिए. आप हम लोगों के लिए अच्छा मन धारण करने की
कृपा कीजिए. यज्ञ व उस के देव उपभृत को नमस्कार. आप हमारा कल्याण करने
की भी कृपा कीजिए. आप हमारे इष्ट देव हैं. आप प्रतिष्ठित होने और हमें सुख
प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( १९ )
अग्नेदब्धायोशीतं पाहि मा दिद्योः पाहि प्रसित्यै पाहि दुरिष्ट्यै पाहि दुरद्मन्या अविषं
नः पितुं कृणु. सुषदा योनौ स्वाहा वाडग्नये संवेशपतये स्वाहा सरस्वत्यै यशोभगिन्यै
स्वाहा.. ( २० )
हे अग्नि! आप हमें शत्रुओं, शस्त्रों व दूषित ( विषैले ) भोजन से बचाइए. आप
भोजन के उन विषैले तत्त्वों को दूर करने की कृपा कीजिए. आप का मूल स्थान
सुखद हो. आप के लिए स्वाहा. आप के संरक्षण में रहने वालों, देवी तथा यश की
बहन सरस्वती के लिए स्वाहा. ( २० )
वेदोसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोभवस्तेन मह्यं वेदो भूयाः.
देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित. मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ ᳪ स्वाहा वाते
धाः.. ( २१ )
हे देवगण! आप ज्ञानमय हैं. आप हमें भी ज्ञानवान बनाने की कृपा कीजिए.
आप हमारे लिए ज्ञान स्वरूप होइए. हम आप के गुण गाते हैं. आप मन के पालक
हैं. यह यज्ञ देवों को समर्पित है. आप के लिए स्वाहा. वायु इस यज्ञ को धारण कर
के इस का विस्तार करने की कृपा करें. ( २१ )
संबर्हिरङ्क्ता ᳪ हविषा घृतेन समादित्यैर्वसुभिः सम्मरुद्भिः.
समिन्द्रो विश्वदेवोभिरङ्क्तां दिव्यं नभो गच्छतु यत् स्वाहा.. ( २२)
हे इंद्र! कुश के समूह को घी युक्त करते हैं. कुश के समूह को घी युक्त कर के
यजुर्वेद - ४३