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सर्वकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 421 में से

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पृष्ठ 42

पूर्वार्ध दूसरा अध्याय
मनो जूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमं तनोत्वरिष्टं यज्ञꣳ समिमं दधातु.
विश्वे देवास ऽ इह मादयन्तामो ३ म्प्रतिष्ठ.. (१३)
हे सविता! आप अपने वेगवान मन से घी का सेवन कीजिए. बृहस्पति देव इस
यज्ञ का विस्तार करने व इस को धारण करने की कृपा करें. यह यज्ञ सभी देवताओं
को आनंदित करने की कृपा करे. दोनों देव हमें प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (१३)
एषा ते अग्ने समित्तया वर्धस्व चा च प्यायस्व.
वर्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि.
अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा ससृवाꣳ सं वाजजितꣳ सम्मार्ज्मि.. (१४)
हे अग्नि! यह आप की बढ़ोतरी के लिए समिधा है. आप अपनी बढ़ोतरी के
साथ हमारी भी बढ़ोतरी करने की कृपा कीजिए. हम आप की बढ़ोतरी करते हैं.
हम अपनी बढ़ोतरी पाते हैं. अग्नि अन्न उपजाते हैं. हम आप का सम्मार्जन करते हैं
अर्थात् आप को जल से सींचते हैं. (१४)
अग्नीषोमयोर्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि.
अग्नीषोमौ तमपनुदतां योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि.
इन्द्राग्न्योर्जितिमनूज्जेषं वाजस्य मा प्रसवेन प्रोहामि.
इन्द्राग्नी तमपनुदतां योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मो वाजस्यैनं प्रसवेनापोहामि.. (१५)
हे अग्नि! हम वैसी ही विजयश्री पाना चाहते हैं, जैसी विजय सोम और अग्नि
ने प्राप्त की है. अग्नि और सोम उन को दूर हटा दें जो हम से द्वेष करते हैं. वे उन
को दूर हटा दें जिन से हम द्वेष करते हैं. हम अन्न से उस विजय के लिए प्रेरणा
पाते हैं. (१५)
वसुभ्यस्त्वा रुद्रेभ्यस्त्वादित्येभ्यस्त्वा संजानाथां द्यावापृथिवी मित्रावरुणौ त्वा वृष्ट्यावताम्.
व्यन्तु वयोक्तꣳ रिहाणा मरुतां पृषतीर्गच्छ वशा पृश्निर्र्भूत्वा दिवं गच्छ ततो नो वृष्टिमावह.
चक्षुष्पा ऽ अग्नेसि चक्षुर्मे पाहि.. (१६)
वसुगणों, रुद्रगणों और आदित्यगणों को ये तीन परिधियां अर्पित की जाती हैं.
मित्रगण और वरुण स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक की वर्षा से उन की रक्षा करने की
कृपा करें. पक्षी घी वाली हवि को खा कर मरुद्गणों का अनुकरण करने की कृपा
करें. किरणों की तरह स्वर्गलोक में पहुंचने का अनुकरण करने की कृपा करें. अग्नि
हमारे यज्ञ व हमारे नेत्रों के रक्षक हैं. वे हमारे यज्ञ व हमारे नेत्रों की रक्षा करें. (१६)
यं परिधिं पर्यधत्था ऽ अग्ने देव पणिभिर्गुह्यमानः.
तं त ऽ एतमनु जोषं भराम्येष नेत्त्वदपचेतयाता ऽ अग्नेः प्रियं पाथोपीतम्.. (१७)
(*मेत्त्वदपचेतयाता वै. य. अ.)
हे अग्नि! प्राणियों से बचाव के लिए आप के चारों ओर परिधि बनाई जाती
४२ - यजुर्वेद