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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
ओषधियां रोग पर वैसे ही आक्रमण करती हैं, जैसे चोर गायों के बाड़े पर आक्रमण
करते हैं. ओषधियां शरीर के समस्त रोगों और विकारों को नष्ट करती हैं. ( ८४ )
यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त ऽ आदधे.
आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. ( ८५ )
जैसे वधगृह में ले जाया जा रहा प्राणी वहां पहुंचने से पहले ही अपने को
मरा हुआ मान लेता है, वैसे ही इन शक्तिशाली ओषधियों को लेने से पहले हम
जब हाथ में रखते हैं, तो राजयक्ष्मा जैसे भीषण रोग भी भाग जाते हैं. ( ८५ )
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः.
ततो यक्ष्मं वि बाधध्व ऽ उग्रो मध्यमशीरिव.. ( ८६ )
जब ओषधि कठोर शरीर के अंगप्रत्यंग में पसरती ( फैलती ) है तो यक्ष्मा आदि
भयंकर रोगों को भी पूरी तरह समाप्त कर देती है. ( ८६ )
साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना.
साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. ( ८७ )
ओषधि लेने के साथ ही यक्ष्मा रोग दूर हो जाता है. प्राणवायु की तरह ओषधि
के शरीर में व्याप्त होने के साथ ही शेष रोग भी नष्ट हो जाता है. ( ८७ )
अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या ऽ उपावत.
ताः सर्वाः संविदाना ऽ इदं मे प्रावता वचः.. ( ८८ )
हे ओषधियो! आप एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाने की कृपा कीजिए. सभी
ओषधियां परस्पर सहयोग और हमारे इन वचनों को सुनने की कृपा करें. ( ८८ )
याः फलिनीर्या ऽ अफला ऽ अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः.
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्व ँहसः.. ( ८९ )
फल वाली, फलहीन, पुष्पहीन, पुष्पवती, बहुत उत्पन्न होने वाली ओषधियां
हमें रोगों से मुक्त कराने की कृपा करें. ( ८९ )
मुञ्चन्तु मा शपथ्यादथो वरुण्यादुत.
अथो यमस्य पड्वीशात्सर्वस्माद्देवकिल्बिषात्.. ( ९० )
हे ओषधियो! आप हमें कुपथ्य और दूषित जल से होने वाले विकारों से मुक्त
कीजिए. आप हमें छहों अनुशासन न पालने से उत्पन्न विकारों से भी मुक्त करने
की कृपा कीजिए. ( ९० )
अवपतन्तीरवदन्दिव ऽ ओषधयस्परि.
यं जीवमश्नवामहै न स रिष्याति पूरुषः.. ( ९१ )
१५४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
स्वर्गलोक से ओषधियां पृथ्वीलोक को प्राप्त होती हैं. जो जीव इन का ठीक
से सेवन करता है, वह कभी समय से पहले मरता नहीं है. ( ९१ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्बहीः शतविचक्षणाः.
तासामसि त्वमुत्तमार्ं कामाय श १७ हृदे.. (९२)
ओषधि सोम की रानी व बहुगुणा है. वह सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है. वे
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली व हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ( ९२ )
या ऽ ओषधीः सोमराज्ञीर्विष्ठिताः पृथिवीमनु.
बृहस्पतिप्रसूता ऽ अस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९३)
जो ओषधि सोम की रानी है, वह बहुगुणा है. सैकड़ों विलक्षण गुणों वाली है.
ओषधियां अभीष्ट सुख देने वाली हैं. हृदय को शक्ति देने में समर्थ हैं. ओषधियां
पुरुष को वीर्यवान बनाने की कृपा करें. ( ९३ )
याश्चेदमुपशृण्वन्ति याश्च दूरं परागताः.
सर्वाः संगत्य वीरुधोस्यै संदत्त वीर्यम्.. (९४)
जो ओषधियां पास हैं, जो दूर हैं, जो विभिन्न रूपों में उगी हुई हैं, वे सभी
हमारी प्रार्थनाएं सुनती हैं. सभी ओषधियां साथ मिल कर हमें वीर्य ( शक्ति ) प्रदान
करने की कृपा करें. ( ९४ )
मा वो रिषत् खनिता यस्मै चाहं खनामि वः.
द्विपाच्चतुष्पादस्माक १७ सर्वमस्त्वनातुरम्.. (९५)
हे ओषधियो! जब हम रोग के उपचार के लिए आप को खोदते हैं तो आप की
कृपा से खनन दोष से मुक्त हों. दोपाए, चौपाए और हमारे सभी लोग आप की
कृपा से रोग मुक्त हो जाएं. ( ९५ )
ओषधयः समवदन्त सोमेन सह राज्ञा.
यस्मै कृणोति ब्राह्मणस्त १७ राजन् पारयामसि.. (९६)
ओषधियां अपने स्वामी सोम राजा के समान ही कहती हैं—राजन्! हम जिसे
ब्राह्मण बना देती हैं, वह पार हो जाता है. ( ९६ )
नाशयित्री बलासस्यार्शस ऽ उपचितामसि.
अथो शतस्य यक्ष्माणां पाकारोरसि नाशनी.. (९७)
ओषधियां बलनाशक व रोगों का भी नाश करने वाली हैं. ओषधियां मस्से जैसे
रोगों का भी उपचार करने वाली हैं. ओषधियां यक्ष्मा जैसे सैकड़ों रोगों व पके हुए
फोड़े का भी नाश करने वाली हैं. ( ९७ )
यजुर्वेद - १५५

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
त्वां गन्धर्वा ऽ अखनँस्त्वामिन्द्रस्त्वां बृहस्पतिः.
त्वामोषधे सोमो राजा विद्वान् यक्ष्मादमुच्यत.. (९८)
गंधर्वों, इंद्र देव व बृहस्पति देव ने ओषधियों का खनन किया. राजा सोम ने
ओषधियों का खनन किया. वे राजा और विद्वान् हैं. उन्होंने यक्ष्मा रोग से मुक्त
किया. ( ९८ )
सहस्व मे अरातीः सहस्व पृतनायतः.
सहस्व सर्वं पाप्मान १७ सहमानास्योषधे.. (९९)
हे ओषधियो! आप शरीर के सभी शत्रुओं को दूर करने में समर्थ हैं. उन्हें दूर
करने की कृपा कीजिए. हे ओषधियो! आप अपनी सामर्थ्य से हमें सभी कष्टों से
मुक्त कराने की कृपा कीजिए. ( ९९ )
दीर्घायुस्त ऽ ओषधे खनिता यस्मै च त्वा खनाम्यहम्.
अथो त्वं दीर्घायुर्भूत्वा शतवल्शा विरोहतात्.. (१००)
हे ओषधि! आप का खनन करने वाले दीर्घायु हों. मैं भी आप का खनन करता
हूं. मैं भी दीर्घायु होऊं. आप भी दीर्घायु होने की कृपा करें. सैकड़ों अंकुरों से युक्त
होने की कृपा करें. ( १०० )
त्वमुत्तमास्योषधे तव वृक्षा ऽ उपस्तयः.
उपस्तिरस्तु सोस्माकं यो अस्माँ २ अभिदासति.. (१०१)
हे ओषधि! आप उत्तम हैं. आप के समीप वाले वृक्ष आप के लिए कल्याणकारी
हों, जो हमारे प्रति दुर्भावनामय हों, वे भी आप की कृपा से हमारे अनुकूल हो
जाएं. ( १०१ )
मा मा हि १७ सीज्जनिता यः पृथिव्या यो वा दिव १७ सत्यधर्मा व्यानट्.
यश्चापश्चन्द्राः प्रथमो जजान कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०२)
जो पृथिवी के जन्मदाता हैं, जो स्वर्गलोक के रचयिता हैं, जो आदिपुरुष हैं, जो
सत्यधर्मा हैं, हम उन के प्रति कभी भी विपरीत न हों. हम कभी भी उन के प्रतिकूल
न रहें. जो प्रथम जन्मा है, उस के अलावा हम अन्य किस देव को अपनी आहुति
अर्पित करें. ( १०२ )
अभ्यावर्त्तस्व पृथिवि यज्ञेन पयसा सह. वपां ते अग्निरिषितो अरोहत्.. (१०३)
हे पृथिवी! यज्ञ से होने वाली बरसात के साथ आप हमारे अनुकूल होने की कृपा
कीजिए. आप अग्नि पर आरोहण करने की कृपा कीजिए. ( १०३ )
अग्ने यत्ते शुक्लं यच्चन्द्रं यत्पूतं यच्च यज्ञियम्. तद्देवेभ्यो भरामसि.. (१०४)
१५६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप की जो ज्वाला चमकीली और चंद्रमा जैसी है, आप की जो
ज्वाला पवित्र है और यज्ञ से संबंधित है, हम उन्हें आहुति अर्पित करते हैं. (१०४)
इषमूर्जमहमित आदमृतस्य योनिं महिषस्य धाराम्.
आ मा गोषु विशत्वा तनूषु जहामि सेदिमनिराममीवाम्.. (१०५)
अग्नि ऊर्जस्वी, अमरता के मूल व महान् इच्छाएं पूरी करने वाले हैं. हम अग्नि
को आमंत्रित करते हैं. वे गायों में और हमारे शरीर में प्रवेश करने की कृपा करें.
उन की कृपा से हम निरोगी हो जाएं. (१०५)
अग्ने तव श्रवो वयो महि भ्राजन्ते अर्चयो विभावसो.
बृहद्दानो शवसा वाजमुक्थ्यं दधासि दाशुषे कवे.. (१०६)
हे अग्नि! आप प्रसिद्ध धनवान व त्रिकालज्ञ हैं. आप का धुआं यज्ञ होने की
सूचना देता हुआ स्वर्गलोक तक जाता है. आप यमजान को अन्नधन प्रदान करते
हैं. (१०६)
पावकवर्चाः शुक्रवर्चा ऽ अनूनवर्चा ऽ उदियर्षि भानुना.
पुत्रो मातरा विचरन्नुपावसि पृणक्षि रोदसी उभे.. (१०७)
हे अग्नि! आप पवित्र और अत्यधिक वर्चस्व वाले हैं. आप सूर्य रूप में उदय
होते हैं. जैसे मातापिता बेटे का पालनपोषण करते हैं, वैसे ही आप स्वर्गलोक और
पृथ्वीलोक दोनों लोकों का पालन करते हैं. (१०७)
ऊर्जो नपाज्जातवेदः सुशस्तिभिर्मन्दस्व धीतिभिर्हितः.
त्वे इषः सन्दधुर्भूरिवर्पसश्चित्रोतयो वामजाताः.. (१०८)
हे अग्नि! आप ऊर्जस्वी, सर्वज्ञ हैं. हम अच्छी प्रशंसा से आप को आनंदित
करते हैं. आप सब का हित धारिए. यजमान रक्षा साधनों से सुरक्षित और श्रेष्ठ कुल
में जन्म लेने वाले हैं. वे आप को अन्नमयी आहुति भेंट करते हैं. (१०८)
इरज्यन्नग्ने प्रथयस्व जन्तुभिरस्मे रायो अमर्त्य.
स दर्शतस्य वपुषो वि राजसि पृणक्षि सानसिं क्रतुम्.. (१०९)
हे अग्नि! आप अविनाशी हैं. यजमान सर्वप्रथम आप को प्रज्वलित करते हैं.
आप यजमानों को धन प्रदान कीजिए. आप अपने सुंदर शरीर से शोभित होते हैं.
आप यज्ञ में सारी आकांक्षाएं पूर्ण करते हैं. (१०९)
इष्कर्त्तारमध्वरस्य प्रचेतसं क्षयन्त ँ१s राधसो महः.
रातिं वामस्य सुभगां महीमिषं दधासि सानसि ँ१s रयिम्.. (११०)
हे अग्नि! आप यज्ञ के कर्ताधर्ता, श्रेष्ठ चिंतन वाले हैं. आप यजमान को महान्
यजुर्वेद - १५७

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
धन प्रदान करते हैं. उस को सौभाग्यशाली और महान् महिमावान बनाते हैं. आप
हमारे लिए भौतिक और आध्यात्मिक वैभव धारण करते हैं. ( ११० )
ऋतावानं महिषं विश्वदर्शतर्माग्न ँ सुम्नाय दधिरे पुरो जनाः.
श्रुत्कर्ण ँ सप्रथस्तमं त्वा गिरा दैव्यं मानुषा युगा.. (१११)
हे अग्नि! आप सत्यवान, महिमाशाली व समस्त विश्व के लिए दर्शनीय
हैं. हम नगरवासी अच्छे मन के लिए आप को धारण करते हैं. आप प्रसिद्ध
और प्रथम वंदनीय हैं. मनुष्य युगयुग से दिव्य गुणों वाले आप का गुणगान करते
हैं. ( १११ )
आ प्यायस्व समेतु ते विश्वतः सोम वृष्ण्यम्. भवा वाजस्य सङ्गथे.. (११२)
हे सोम! विश्व की तेजस्विता आप को प्रसन्न करे. आप वृद्धि को प्राप्त
करने की कृपा करें. आप अन्न की संगति के लिए हमारे पास पधारने की कृपा
करें. ( ११२ )
सन्ते पया ँ सि समु यन्तु वाजाः सं वृष्ण्यान्यभिमातिषाहः.
आप्यायमानो अमृताय सोम दिवि श्रवा ँ स्युत्तमानि धिष्व.. (११३)
हे सोम! आप पोषक रस और अन्न बरसाने की कृपा करें. आप अमृत से तृप्त
कीजिए. आप स्वर्गलोक में विख्यात हैं. आप चिरकाल तक स्थिर होने की कृपा
कीजिए. ( ११३ )
आप्यायस्व मदिन्तम सोम विश्वेभिर ँ शुभिः.
भवा नः सप्रथस्तमः सखा वृधे.. (११४)
हे सोम! आप आनंददाता हैं. आप सर्वत्र प्रसन्न होने की कृपा कीजिए. आप
शुभ होइए. आप विख्यात और हमारे मित्र हैं. आप बढ़ोतरी पाइए. ( ११४ )
आ ते वत्सो मनो यमत्परमाच्चित्सधस्थात्. अग्ने त्वाङ्कामया गिरा.. (११५)
हे अग्नि! हम आप के पुत्र हैं. आप परम स्थान पर विराजते हैं. हम श्रेष्ठ स्तोत्रों
से आप की वाणीमय वंदना करते हैं. ( ११५ )
तुभ्यन्ता ऽ अङ्गिरस्तम विश्वाः सुक्षितयः पृथक्. अग्ने कामाय येमिरे.. (११६)
हे अग्नि! आप श्रेष्ठ अंगों वाले हैं. आप के प्रति पृथ्वी की श्रेष्ठ प्रार्थनाएं
अलग से समर्पित की जाती हैं. हम अपनी कामनाओं की पूर्ति के लिए आप की
उपासना करते हैं. ( ११६ )
अग्निः प्रियेषु धामसु कामो भूतस्य भव्यस्य. सम्राडेको वि राजति.. (११७)
१५८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध बारहवां अध्याय
हे अग्नि! आप अपने प्रिय धामों पर स्वेच्छा से सुशोभित हो रहे हैं. आप वर्तमान
और भविष्य की सब मनोकामनाओं के पूरक और सम्राट् हैं. आप दीप्तिमान हो
कर शोभित हो रहे हैं. ( ११७ )
यजुर्वेद - १५९

तेरहवां अध्याय

तेरहवां अध्याय
मयि गृह्णाम्यग्रे अग्नि छँ रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.
मामु देवताः सचन्ताम्.. (१)
हे अग्नि! आप धन के उत्पादक, श्रेष्ठ संतति वाले और श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं.
हम यह सब पाने के लिए आप को आहुतियों से सींचते हैं. आप हमें ग्रहण करने
की (स्वीकारने की) कृपा कीजिए. (१)
अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम्.
वर्धमानो मँहाँ २ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व.. (२)
आप जलधारी, अग्नि का मूल स्थान और समुद्र के साथ वृद्धि पाते हैं.
आप महान् हैं. आप पृथ्वी की तरह विस्तृत हों. आप स्वर्गलोक की दिव्यता प्राप्त
कीजिए. (२)
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽ आवः.
स बुध्न्या ऽ उपमा ऽ अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (३)
सर्वप्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुआ. उस के बाद शक्ति व्यापक हुई. उस शक्ति ने
व्यक्त जगत् को प्रकाशित किया. उस शक्ति ने अव्यक्त जगत् को प्रकाशित किया.
सत् इस की विष्ठा, मल और असत् इस का मूल स्थान हुआ. (३)
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ में परम तत्त्व रहा. उसी से सृष्टि उपजी. वे ही एकमात्र
पालक थे. उन्होंने पृथ्वी को धारण किया. वही स्वर्गलोक को धारण करते हैं. उन
के अलावा हम अन्य किस देव के लिए हवि का विधान करें. (४)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्चः पूर्वः.
समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (५)
प्रारंभ से ही ‘द्रप्स’ रस (एक दिव्य रस) देवता को तृप्ति प्रदान करते हैं और
पृथ्वी को बढ़ाते हैं. स्वर्गलोक की बढ़ोतरी करते हैं. मूल स्थान को सींचते हैं. द्रप्स
१६० - यजुर्वेद 632/10

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
समान मूल स्थान में संचरण करते हैं. सात होता द्रप्स को आहुति प्रदान करते हैं. ( ५ )
नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु.
ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. ( ६ )
जो सर्प पृथ्‍वी का अनुकरण करते हैं, उन्हें नमन. जो सर्प अंतरिक्ष और स्वर्ग
का अनुकरण करते हैं, उन्हें भी नमन. ( ६ )
या ऽ इषवो यातुधानानां ये वा वनस्पती ँ४१ रनु.
ये वावटेषु शेरते तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (७)
जो राक्षसों के बाण रूप सर्प हैं, जो वनस्पतियों का अनुकरण करने वाले सर्प
हैं, उन्हें नमन. जो गड्ढों और निचले भागों में रहते हैं, उन सर्पों को भी नमन. ( ७ )
ये वामी रोचने दिवो ये वा सूर्यस्य रश्मिषु.
येषामप्सु सदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः.. (८)
जो चमकते हुए स्वर्गलोक में वास करते हैं, जो सूर्य की किरणों में वास करते
हैं, जिन का जल के भीतर घर है, उन सर्पों को नमन. ( ८ )
कृणुष्व पाजः प्रसितिं न पृथ्वीं याहि राजेवामवाँ २ इभेन.
तृषीमनु प्रसितिं द्रूणानो ऽ स्तासि विध्य रक्षसस्तपिष्ठैः.. (९)
हे अग्नि! आप दुष्टों को कष्ट दीजिए. आप राजा की तरह हाथी पर सवार हो
कर शत्रुओं पर आक्रमण कीजिए. आप राक्षसों को तपाइए. विस्तृत जाल की तरह
आप अपनी सामर्थ्य का जाल और अधिक पसारिए. ( ९ )
तव भ्रमास ऽ आशुया पतन्त्यनुस्पृश धृषता शोशुचानः.
तपूं ष्यग्ने जुह्वा पतङ्गान्सन्दितो वि सृज विष्वगुल्काः.. (१०)
हे अग्नि! आप भ्रमणशील हैं. आप शीघ्र अपनी चमकती हुई लपटों से राक्षसों
को भस्म कर दीजिए. हमारी आहुति से आप की लपटें ( ऊंचीऊंची ) बढ़ गई हैं.
आप अपनी उन लपटों से राक्षसों का नाश कर दीजिए. ( १० )
प्रति स्पशो वि सृज तूर्णितमो भवा पायुर्विशो अस्या ऽ अदब्धः.
यो नो दूरे अघश ँ४ सो यो अन्त्यग्ने मा किष्टे व्यथिरादधर्षीत्.. (११)
हे अग्नि! कोई भी हमें तकलीफ न पहुंचा सके. कोई भी हमें व्यथा न पहुंचा
सके. आप हमारे दूर या पास जहां कहीं भी कोई भी दुश्मन हो, उन्हें अपने पाश में
बांधने की कृपा कीजिए. ( ११ )
उदग्ने तिष्ठ प्रत्या तनुष्व न्यमित्राँ २ ओषतात्तिग्महेते.
यो नो अराति ँ४ समिधान चक्रे नीचा तं धक्ष्यतसं न शुष्कम्.. (१२)
यजुर्वेद - १६१

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
हे अग्नि! ऊपर की ओर स्थित रहिए. आप अपने तन का विस्तार कीजिए. आप
हमारे अमित्रों को भस्मीभूत कर दीजिए. जो हमारे नीच शत्रु हैं, उन्हें आप सूखी
समिधा की भांति जला कर राख कर दीजिए. ( १२ )
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्गने.
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्.
अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि.. (१३)
हे अग्नि! आप ऊर्ध्वगामी होइए. आप पूरी तरह हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए.
आप दिव्य कार्यों को खोजिए. ( १३ )
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्.
अपा ँ७ रेता ँ७ सि जिन्वति.
इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि.. (१४)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य हैं. आप स्वर्गलोक के सब से ऊपरी भाग में प्रतिष्ठित
हैं. आप पृथ्वीपालक और जल की पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं. आप को इंद्र देव के
ओज से हम यजमान प्रतिष्ठित करते हैं. ( १४ )
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकषे हव्यवाहम्.. (१५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी और यज्ञ के राजा, नेता व लोक कल्याण को नियुक्त
करने वाले हैं. आप स्वर्गलोक में उच्च स्थान को धारते हैं. आप हव्य वाहक हैं. आप
अपनी जिह्वा से हवि को ग्रहण करते हैं. ( १५ )
ध्रुवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा.
मा त्वा समुद्र ऽ उद्वधीन्मा सुपर्णो ऽ व्यथमाना पृथिवीं दृ ँ७ ह.. (१६)
हे अग्नि! आप ध्रुव, धारक हैं. आप विश्वकर्मा से विस्तार पाते हैं. समुद्र आप
को नष्ट न करे. वायु अवरोधक ( रुकावट ) न बने. आप व्यथित मत होइए. आप
पृथ्वी को दृढ़ता प्रदान कीजिए. ( १६ )
प्रजापतिष्ट्वा सादयत्वपां पृष्ठे समुद्रस्येमन्.
व्यचस्वतीं प्रथस्वतीं प्रथस्व पृथिव्यसि.. (१७)
प्रजापति आप को समुद्र की पीठ पर स्थापित करें. आप जल में विस्तृत होने
की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी की ही तरह विस्तृत होइए. ( १७ )
भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री.
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ँ७ ह पृथिवीं मा हि ँ७ सीः.. (१८)
१६२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
आप भूमि जैसी सुखदायी और विश्व को धारण करने वाली अदिति हैं. आप
सारे विश्व की धारिका हैं. आप पृथ्वी पर अपनी कृपा कीजिए. आप उसे दृढ़
बनाइए. आप उस पर हिंसा मत होने दीजिए. ( १८ )
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय.
अग्निष्ट्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा
सीद.. (१९)
हे देवी! समस्त प्राण, अपान, व्यान व उदान शरीरस्थ ( वायु के भेद ) की
प्रतिष्ठा के लिए आप की स्थापना की जाती है. अग्नि आप की रक्षा करें. शीतल
शांतिमय साधनों से आप का कल्याण हो. दिव्यता से आप अंगिरा के समान ध्रुव
हो कर विराजने की कृपा कीजिए. ( १९ )
काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्ती परुषः परुषस्परि.
एवा नो दूर्वे प्र तनु सहस्रेण शतेन च.. (२०)
हे दूर्वा! आप सभी जगह भलीभांति उग जाती हैं. अपनी तरह हमारी भी संतान
और धनवृद्धि की कृपा कीजिए. ( २० )
या शतेन प्रतनोषि सहस्रेण विरोहसि.
तस्यास्ते देवीष्टके विधेम हविषा वयम्.. (२१)
हे दूर्वा! हम आप के लिए वैसी ही हवि का विधान करते हैं, जिस से आप
सैकड़ों हजारों की संख्या में उग कर बढ़ें. ( २१ )
यास्ते अग्ने सूर्ये रुचो दिवमातन्वन्ति रश्मिभिः.
ताभिर्नो अद्य सर्वाभी रुचे जनाय नस्कृधि.. (२२)
हे अग्नि! सूर्य देव की जो चमकीली किरणें स्वर्गलोक का विस्तार करती हैं,
आज उन किरणों से मनुष्यों का विस्तार हो. ( २२ )
या वो देवाः सूर्ये रुचो गोष्वश्वेषु या रुचः.
इन्द्राग्नी ताभिः सर्वाभी रुचं नो धत्त बृहस्पते.. (२३)
हे इंद्र! हे अग्नि! हे बृहस्पति! आप की जो कांति सूर्यरूप में शोभित है, जो गायों,
घोड़ों में स्थित है, आप वह सारी कांति हमारे लिए धारण करने की कृपा कीजिए. ( २३ )
विराड्ज्योतिर्धारयत्स्वराड्ज्योतिर्धारयत्.
प्रजापतिष्ट्वा सादयतु पृष्ठे पृथिव्या ज्योतिष्मतीम्.
विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ.
अग्निष्टेऽधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (२४)
विराट् शक्ति ने ज्योति को धारण किया. स्वयं ज्योतिर्मय ने ज्योति को धारण
यजुर्वेद - १६३

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
किया. प्रजापति ज्योतिर्मयी पृथ्‍वी के पृष्ठ भाग पर विराजने की कृपा करें. वे आप
को प्राण, अपान, व्यान, धान सारे विश्व को प्रभूत ज्योति प्रदान करने की कृपा
करें. अग्नि आप के अधिपति हैं. आप देवताओं के साथ स्थिर होने की कृपा
कीजिए. आप अंगिरा के समान ध्रुव हो कर विराजिए. ( २४ )
मधुश्च माधवश्च वासन्तिकावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी
कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ् मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः.
ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे.
वासन्तिकावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्
ध्रुवे सीदतम्.. ( २५ )
चैत और वैशाख महीने वसंत ऋतु से संबंधित हैं. दोनों ऋतुएं अग्नि को अंदर
से जोड़े रखने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्‍वीलोक आपस में सहयोग करने
की कृपा करें. ओषधियां हमारे लिए फलीभूत होने की कृपा करें. समान व्रत वाली
अग्नि बड़ेबड़े कामों में सहायता करने की कृपा करें. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
के बीच जो ये अग्नियां हैं, वे समान मन वाली हों. अग्नियां वसंत ऋतु से आवृत्त
हों. वे फलीभूत होने की कृपा करें. सभी देव इंद्र का आश्रय ग्रहण करें. अग्नि देवता
के साथ अंगिरा की तरह ध्रुव हो कर विराजिए. ( २५ )
अषाढासि सहमाना सहस्वारातीः सहस्व पृतनायतः.
सहस्रवीर्यासि सा मा जिन्व.. ( २६ )
आप अषाढ़ व सहनशील हैं. आप शत्रुओं को पराजित कीजिए. आप सहस्र
वीर्य वाले हैं. आप हमें जिताने की कृपा कीजिए. ( २६ )
मधु वाता ऽ ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः. माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः.. ( २७ )
वायु मधुरता से बहने की कृपा करे. नदियां मधुरतापूर्वक रहें. सारी ओषधियां
मधुरतामय होने की कृपा करें. ( २७ )
मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव १४ रजः. मधु द्यौरस्तु नः पिता.. ( २८ )
रात्रि मधुर हो. उषा मधुर हो. पृथ्‍वी मधुमती हो. रज मधुर हो. हमारे पिता स्वर्गलोक
मधुमय होने की कृपा करें. ( २८ )
मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ २ अस्तु सूर्यः. माध्वीर्गावो भवन्तु नः.. ( २९ )
वनस्पतियां हमारे प्रति मधुमान हों. सूर्य हमारे प्रति मधुमान ( कृपालु ) हों. गाएं
हमारे प्रति माध्वी ( मधुरतामय ) होने की कृपा करें. ( २९ )
अपां गम्भन्त्सीद मा त्वा सूर्योभिताप्सीन्माग्निर्वैश्वानरः.
अच्छिन्नपत्राः प्रजा ऽ अनुवीक्षस्वानु त्वा दिव्या वृष्टिः सचताम्.. ( ३० )
१६४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
(हे कूर्म!) आप जल के गर्भ में विराजिए. आप सूर्य के मंडल में विराजिए.
सूर्य आप को न तपाए. वैश्वानर भी आप को संतप्त न करें. आप प्रजा का निरंतर
निरीक्षण कीजिए. दिव्य दृष्टि सदैव आप को सचेत करती रहे. (३०)
त्रीन्त्समुद्रान्त्समसृपत् स्वर्गानपां पतिर्वृषभ ऽ इष्टकानाम्.
पुरीषं वसानः सुकृतस्य लोके तत्र गच्छ यत्र पूर्वे परेताः.. (३१)
आप ने तीनों लोकों के समुद्र को व्याप्त किया है. आप स्वर्ग के मालिक हैं.
आप शक्तिमान हैं. आप इष्टकों (विश्व निर्माण में प्रयुक्त इकाइयों) में शक्ति
भरने वाले हैं. आप पशुओं को बसाते हुए उसी लोक में जाइए, जहां अच्छे काम
करने वाले पहले ही पहुंच चुके हैं. (३१)
मही द्यौः पृथिवी च न ऽ इमं यज्ञं मिमिक्षताम्. पिपृतां नो भरीमभिः.. (३२)
महान् पृथ्वी और स्वर्गलोक हमारे इस यज्ञ को अपनेअपने अंशों से पूरने की
कृपा करें. भरणपोषण करने वाली सामग्रियां हमारी पिपासा शांत करें. (३२)
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (३३)
विष्णु इंद्र देव से जुड़े हुए हैं. वे इंद्र देव के सखा हैं. विष्णु सभी कर्मों को
देखते हैं और व्रतों का निर्माण करते हैं. (३३)
ध्रुवासि धरुणेतो जज्ञे प्रथममेभ्यो योनिभ्यो अधि जातवेदाः.
स गायत्र्या त्रिष्टुभानुष्टुभा च देवेभ्यो हव्यं वहतु प्रजानन्.. (३४)
हे उखा! आप ध्रुव व धारक हैं. सर्वज्ञ अग्नि यज्ञ में सर्वप्रथम आप के यहां
उत्पन्न हुए. अग्नि, गायत्री, त्रिष्टुप्, अनुष्टुप् आदि छंदों से देवताओं के लिए हवि
वहन करने की कृपा करें. (३४)
इषे राये रमस्व सहसे द्युम्न ऽ ऊर्जे अपत्याय.
सम्राडसि स्वराडसि सारस्वतौ त्वोत्सौ प्रावताम्.. (३५)
हे उखा! आप सम्राट्, स्वयं प्रकाशित, सरस्वतीमय व पालन पोषणकर्ता हैं.
आप अन्न, यश, साहस और ऊर्जा में रमण करते हैं. आप हमारे पुत्र पौत्रों को भी
उस में रमण कराइए. (३५)
अग्ने युक्ष्वा हि ये तवाश्वासो देव साधवः. अरं वहन्ति मन्यवे.. (३६)
हे अग्नि! आप दिव्य गुणों वाले हैं. आप अपने घोड़े रथ में जोतिए. वे आप के
रथ के अरों का वहन कर के शीघ्र आप को गंतव्य तक ले जाएं. (३६)
युक्ष्वा हि देवहूतमाँ २ अश्वाँ २ अग्ने रथीरिव. नि होता पूर्व्यः सदः.. (३७)
हे अग्नि! आप हमारे लिए देवताओं को आमंत्रित करने वाले हैं. आप अपने
यजुर्वेद - १६५

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
रथ में घोड़े जोतिए. आप चिरकाल से हमारे होता हैं. आप यज्ञ स्थान में
विराजिए. ( ३७ )
सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्ह्रदा मनसा पूयमाना:.
घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्ये अग्ने:... ( ३८)
सम्यक् रूप से प्रवाहित होने वाली सरिता के समान हमारे हृदय और मन से
पवित्र वाणियां प्रवाहित होती हैं. यज्ञ की अग्नि स्वर्णिम प्रकाश वाली है. घी की
धाराएं अग्नि के बीच बहा कर उसे स्वर्णिम बना देती हैं. ( ३८ )
ऋचे त्वा रुचे त्वा भासे त्वा ज्योतिषे त्वा.
अभूदिदं विश्वस्य भुवनस्य वाजिनमग्नेर्वैश्वानरस्य च.. ( ३९)
आप गाए जाते हैं, प्रकाशित हैं, भासित व ज्योतिष हैं. आप की कृपा से सारे
लोकों, वैश्वानर और बल को हम समझ सके हैं. ( ३९ )
अग्निर्ज्योतिषा ज्योतिष्मान् रुक्मो वर्चसा वर्चस्वान्.
सहस्रदा ऽ असि सहस्राय त्वा.. (४०)
हे अग्नि! आप ज्योति से ज्योतिष्मान हैं. आप वर्चस्व से वर्चस्वी हैं. आप हजारों
के लिए हजार वैभव देने वाले हैं. ( ४० )
आदित्यं गर्भं पयसा समङ्ग्धि सहस्रस्य प्रतिमां विश्वरूपम्.
परि वृङ्ग्धि हरसा माभि म १४ स्था: शतायुषं कृणुहि चीयमान:... (४१)
आप आदित्य के गर्भ को दूध से सींचिए. आप हजारों रूपों वाले हैं. आप
अपने तेज से रोगों का नाश कीजिए. आप यजमान को शतायु और उसे अहंकार से
मुक्त कीजिए. ( ४१ )
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञान १४ सरिरस्य मध्ये.
शिशुं नदीना १४ हरिमद्रिबुध्नम्ग्ने मा हि १४ सी: परमे व्योमन्.. (४२)
हे अग्नि! आप वायु के प्रिय, वरुण देव की नाभि, ज्ञान के अश्व और जल
के बीच रहते हैं. आप नदियों के शिशु, हरे, जलमय व पर्वत पर चिह्न अंकित करने
वाले हैं. आप परम व्योमवासी हैं. आप हिंसा मत कीजिए. ( ४२ )
अजस्रमिन्दुमरुषं भुरण्युमग्निमीडे पूर्वचित्तिं नमोभि:.
स पर्वभिऋतुशः कल्पमानो गां मा हि १४ सीरदितिं विराजम्.. (४३)
हे अग्नि! आप अजस्र, शांतिदायी, ऊर्जावान और ऋषियों द्वारा सेवित हैं. आप
अन्न से भरणपोषण करने वाले हैं. हम पूर्व से ही मन से आप को नमन करते हैं.
आप पर्वों और ऋतु के अनुसार फलते हैं. आप गौ के समान पोषण करते हैं. आप
हिंसा मत कीजिए. आप विराजने की कृपा कीजिए. ( ४३ )
१६६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
वरूत्रीं त्वष्टुर्वरुणस्य नाभिमविं जज्ञाना १७ रजसः परस्मात्.
मही १७ साहस्त्रीमसुरस्य मायामग्ने मा हि १७ सीः परमे व्योमन्.. (४४)
हे अग्नि! आप विभिन्न रूपों का निर्माण करने वाले हैं. आप वरुण देव की
नाभि हैं. आप उच्चलोक में उत्पन्न, महिमावान और परम व्योमवासी हैं. आप हजारों
के कल्याणकारी हैं. आप किसी भी प्रकार की हिंसा न कीजिए. (४४)
यो अग्निरग्नेरध्यजायत शोकात्पृथिव्या ऽ उत वा दिवस्परि.
येन प्रजा विश्वकर्मा जजान तमग्ने हेडः परि ते वृणक्तु.. (४५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी के शोक से उत्पन्न हुए. आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
को प्रकाशित करते हैं. स्रष्टा ने आप से ही सृष्टि की रचना की. आप कभी हम पर
क्रोध मत करिए. (४५)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १७ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (४६)
हे अग्नि! मित्र देव और वरुण देव आप के नेत्ररूप हैं. आप अद्भुत शक्तिमान
हैं. आप स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक को पूरी तरह प्रकाशित कीजिए.
सूर्य जड़ और चेतन की आत्मा हैं. वे इसी रूप में उदित हुए हैं. (४६)
इमं मा हि १७ सीर्द्विपादं पशु १७ सहस्राक्षो मेधाय चीयमानः.
मयुं पशुं मेधमग्ने जुषस्व तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
मयुं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४७)
हे अग्नि! आप दोपायों और पशुओं के प्रति हिंसा न करें. आप हजारों नेत्रों
वाले हैं. आप को यज्ञ के लिए प्रकट किया है. आप अन्न व पशुओं की बढ़ोत्तरी
कीजिए. आप हमें वैभव दीजिए. हम सुखी जीवन यापन करें. आप का क्रोध, जो
हम से द्वेष करते हैं, उन्हें पीड़ित करें. (४७)
इमं मा हि १७ सीरेकशफं पशुं कनिक्रदं वाजिनं वाजिनेषु.
गौरमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
गौरं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४८)
हे अग्नि! आप के घोड़े अत्यंत गतिशील हैं. वे हिनहिना कर अपनी स्फूर्ति दिखाते
हैं. आप इन घोड़ों के प्रति हिंसक मत होइए. आप जंगली जानवरों को परेशान कीजिए.
आप अपने ज्वालामय शरीर को बढ़ाइए. जो हम से प्रेम नहीं रखते, जो हम से द्वेष
रखते हैं, आप का क्रोध उन्हें पीड़ित करे. (४८)
इम १७ सहस्र १७ शतधारमुत्सं व्यच्यमान १७ सरिरस्य मध्ये.
घृतं दुहानामितिं जनायाग्ने मा हि १७ सीः परमे व्योमन्.
यजुर्वेद - १६७

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
गवयं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४९)
हे अग्नि! यह अदिति हजारों सैकड़ों धाराओं का मूल स्रोत है. शरीर के बीच
में घी छोड़ने वाली है. घृत का दोहन करने वाली है. परम व्योम में स्थित है. आप
अदिति के प्रति हिंसा न कीजिए. जंगली जानवरों की ओर आप को निर्देश दिया
जाता है. आप अपने तन की बढ़ोत्तरी करते हुए उन के साथ विराजिए. जिन से हम
द्वेष करते हैं, ऐसों के प्रति आप अपना क्रोध प्रकट कीजिए. ( ४९ )
इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्.
त्वष्टुः प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने मा हि १४ सीः परमे व्योमन्.
उष्ट्रमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
उष्ट्रं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (५०)
हे अग्नि! आप सर्वप्रथम उत्पन्न हैं. आप वरुण देव की नाभि, पशुओं, दोपायों
व चौपायों की त्वचा हैं. आप परम व्योम में स्थित हैं. आप हमारे प्रति हिंसक मत
होइए. हम जंगली ऊंटों की ओर आप को निर्देश करते हैं. आप उन के साथ अपने
तन की बढ़ोत्तरी कीजिए. आप उन ऊंटों के प्रति और जो हमारे प्रति द्वेष रखते हैं,
उन के प्रति क्रोध कीजिए. ( ५० )
अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्रे.
तेन देवा देवतामग्रमायँस्तेन रोहमायन्नुप मेध्यासः.
शरभमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
शरभं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (५१)
अग्नि ने अज ( बकरा ) को बनाया है. उसी से वह आगे देख सका है. उसी से
देवता देवत्व और उसी मेध से यजमान स्वर्ग को पाते हैं. आप जंगली शरभ
( जानवर ) का अनुकरण कीजिए. आप उस दिशा में बढ़िए. आप शरभ और जिन
से हम द्वेष रखते हैं, उन पर क्रोध कीजिए. ( ५१ )
त्वं यविष्ठ दाशुषो नॄः पाहि शृणुधी गिरः. रक्षा तोकमुतत्मना.. (५२)
हे अग्नि! आप युवा हैं. आप हमारी वाणीमय उपासनाओं को सुनिए. आप
हमारी, यजमानों और हमारी पीढ़ियों की रक्षा कीजिए. ( ५२ )
अपां त्वेमन्त्सादयाम्यपां त्वोद्मन्त्सादयाम्यपां त्वा भस्मन्त्सादयाम्यपां त्वा ज्योतिषि
सादयाम्यपां त्वायने सादयाम्यर्णवे त्वा सदने सादयामि समुद्रे त्वा सदने सादयामि
सरिरे त्वा सदने सादयाम्यपां त्वा क्षये सादयाम्यपां त्वा सधिषि सादयाम्यपां त्वा
सदने सादयाम्यपां त्वा सधस्थे सादयाम्यपां त्वा योनौ सादयाम्यपां त्वा पुरीषे
सादयाम्यपां त्वा पाथसि सादयामि. गायत्रेण त्वा छन्दसा सादयामि त्रैष्टुभेन त्वा
१६८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
छन्दसा सादयामि जागतेन त्वा छन्दसा सादयाम्यानुष्टुभेन त्वा छन्दसा सादयामि
पाङ्क्तेन त्वा छन्दसा सादयामि.. (५३)
हे ( अपस्या नामक ) इष्टके ! जल को हम अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं.
जल को ओषधियों में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को भस्म में प्रतिष्ठित करते हैं.
हम जल को प्रकाश में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को उस के घर समुद्र में प्रतिष्ठित
करते हैं. हम जल को शरीर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को क्षय में प्रतिष्ठित
करते हैं. हम जल को आप के घर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को आप के मूल
स्थान में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को नगर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को
पथ में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को गायत्री छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल
को त्रैष्टुभ् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को जगती छंद से प्रतिष्ठित करते हैं.
हम जल को अनुष्टुप् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को पंक्ति छंद से प्रतिष्ठित
करते हैं. (५३ )
अयं पुरो भुवस्तस्य प्राणो भौवायनो वसन्तः प्राणायनो गायत्री वासन्ती गायत्र्यै गायत्रं
गायत्रादुपा ९४ शुरुपा ९४ शोस्त्रिवृत् त्रिवृतो रथन्तरं वसिष्ठ ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया
त्वया प्राणं गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५४)
हे अग्नि! आप प्रथमोत्पन्न हैं. अतः प्राणों में स्थित हैं. प्राण भुवन अग्नि से
उत्पन्न हैं. अतः प्राणों के रूप में स्थित हैं. प्राण भुवन से उत्पन्न होने से भौवायन
कहे जाते हैं. वसंत ऋतु प्राण से उत्पन्न होती है. वसंत ऋतु से गायत्री उत्पन्न होती
है. गायत्री से गायत्र साम उत्पन्न होता है. गायत्री से उपांशु उत्पन्न होता है. उपांशु से
त्रिवृत्त, त्रिवृत्त से रथंतर. इन सब के प्रमुख वसिष्ठ ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए
सहयोग से हम प्रजाओं के लिए प्राण ग्रहण करते हैं. (५४)
अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य मनो वैश्वकर्मणं ग्रीष्मो मानसस्त्रिष्टुब्ग्रैष्मी
त्रिष्टुभः स्वर ९४ स्वरादन्तर्यामोन्तर्यामात्पञ्चदशः पञ्चदशाद् बृहद् भरद्वाज ऽ ऋषिः
प्रजापतिगृहीतया त्वया मनो गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५५)
हम विश्वकर्मा को इस दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित करते हैं. मन विश्वकर्मा
से उत्पन्न हुआ है. मन से ग्रीष्म दिशा उत्पन्न हुई. ग्रीष्म से त्रिष्टुप्, त्रिष्टुप् से
स्वार साम तथा स्वार साम से अंतर्याम ग्रह उत्पन्न हुए. अंतर्याम से पंचदश सोम
उत्पन्न हुए. पंचदश सोम से बृहत्साम उत्पन्न हुए. इन सब के प्रमुख भरद्वाज
ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए मन ग्रहण करते
हैं. (५५)
अयं पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य चक्षुर्वैश्वव्यचसं वर्षाश्चाक्षुष्यो जगती वार्षी जगत्या ऽ
ऋक्सममृक्समाच्छुक्रः शुक्रात्सप्तदशः सप्तदशाद्वैरूपं जमदग्निऋर्षिः
प्रजापतिगृहीतया त्वया चक्षुर्गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५६)
यजुर्वेद - १६९

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
हम विश्वव्यचा ( सूर्य ) को पश्चिम दिशा में प्रतिष्ठित करते हैं. उस से नेत्र
उत्पन्न हुए. विश्वव्यचा से वर्षा ऋतु उत्पन्न हुई. वर्षा ऋतु से जगती छंद उत्पन्न हुए.
उस से ऋक् व साम उत्पन्न हुए. ऋक् और साम से शुक्र ग्रह उत्पन्न हुए. शुक्र ग्रह
से सप्तदश स्तोम उत्पन्न हुए. सप्तदश स्तोम से वैरूप साम का प्रादुर्भाव हुआ. इन
सब के प्रमुख जमदग्नि ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के
लिए नेत्र ग्रहण करते हैं. ( ५६ )
इदमुत्तरात् स्वस्तस्य श्रोत्र १५ सौव १५ शरच्छ्रौत्र्यनुष्टुप् शारद्यनुष्टुभ ऽ ऐड मैडान्मन्थी
मन्थिन ऽ एकवि १५ श ऽ एकवि १५ शाद्वैराजं विश्वामित्र ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया
त्वया श्रोत्रं गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५७)
उत्तर दिशा में श्रोत्र प्रमुख साधन हैं. श्रोत्र से शरद की उत्पत्ति होती है. शरद
से अनुष्टुप् छंद उत्पन्न हुआ. अनुष्टुप् से एडसाम की उत्पत्ति हुई. एडसाम से मंधी
उत्पन्न हुआ. मंथी से एकविंश स्तोम की उत्पत्ति हुई. एकविंश से वैराज साम उत्पन्न
हुआ. इन सब के प्रमुख विश्वामित्र ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम
प्रजाओं के लिए श्रोत्र को ग्रहण करते हैं. ( ५७ )
इयमुपरि मतिस्तस्यै वाङ्मात्या हेमन्तो वाच्यः पङ्कितहैमन्ती पङ्क्त्यै
निधनवन्निधनवत ऽ आग्रयण ऽ आग्रयणात् त्रिणवत्रयस्त्रि १५ शौ त्रिणवत्रयस्त्रि १५
शाभ्या १५ शाक्वररैवते विश्वकर्म ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया त्वया वाचं गृह्णामि
प्रजाभ्यो लोकं ता ऽ इन्द्रम्.. (५८)
सब से ऊपर मति प्रतिष्ठित है. उसी का मति से मनन करते हुए इस की प्रतिष्ठा
करते हैं. वाणी से हेमंत ऋतु उत्पन्न हुई. हेमंत से पंक्ति छंद की उत्पत्ति हुई. पंक्ति
से निधनवत साम उत्पन्न हुआ. निधनवत साम से आग्रयण उत्पन्न हुआ आग्रयण से
त्रिणव की उत्पत्ति हुई. आग्रयण से त्रयस्त्रिंश की उत्पत्ति हुई. त्रिणव और त्रयस्त्रिंश
से शाक्वर और रैवत साम उत्पन्न हुए. इन सब के प्रमुख विश्वकर्मा ऋषि हैं.
प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए वाणी को ग्रहण करते हैं.
प्रजा के लिए स्तोत्र गान करते हुए हम इंद्र देव का आह्वान करते हैं. ( ५८ )
१७० - यजुर्वेद

चौदहवां अध्याय

चौदहवां अध्याय
ध्रुवक्षितिर्ध्रुवयोनिर्ध्रुवासि ध्रुवं योनिमासीद साधुया.
उख्यस्य केतुं प्रथमं जुषाणाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (१)
हे इष्टके! आप ध्रुव, स्थिर स्वभाव वाली, स्थिर मूल स्थान वाली और ध्रुव
स्वभाव वाली हैं. आप उखा की पताका का सेवन और उसे स्थिर कीजिए. आप
स्थिर श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त होइए. अश्विनी देव और देवों के अध्वर्यु आप को इस
उत्तम स्थल में प्रतिष्ठित करें. (१)
कुलायिनी घृतवती पुरन्धिः स्योने सीद सदने पृथिव्याः.
अभि त्वा रुद्रा वसवो गृणन्त्विमा ब्रह्म पीपिहि सौभागायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह
त्वा.. (२)
हे इष्टके! आप कुलवान व घी से युक्त हैं. आप निवास योग्य पृथ्वी के घर में
निवास कीजिए. रुद्रगण और वसुगण आप की उपासना करते हैं. आप गणनीय हैं.
आप अपने सौभाग्य की बढ़ोत्तरी हेतु सुरक्षित करें. दोनों अश्विनीकुमार अध्वर्यु के
रूप में आप को इस यज्ञ स्थल पर विराजमान कराएं. (२)
स्वैर्दक्षैर्दक्षपितेह सीद देवाना १७ सुम्ने बृहते रणाय.
पितेवैधि सूनव ऽ आ सुशेवा स्वावेशा तन्वा सं विशस्वाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह
त्वा.. (३)
हे इष्टके! आप शक्ति की रक्षा करती हैं. आप देवताओं के अच्छे मन के लिए
रण में प्रतिष्ठित होइए. आप जैसे पिता पुत्र के सुखी जीवन की कामना करते हैं,
प्रयास करते हैं, वैसे ही आप हमारे लिए कीजिए. दोनों अश्विनीकुमार देवों के दोनों
अध्वर्यु आप को यहां प्रतिष्ठित करते हैं. (३)
पृथिव्याः पुरीषमस्यप्सो नाम तां त्वा विश्वे अभिगृणन्तु देवाः.
स्तोमपृष्ठा घृतवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविणायजस्वाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (४)
आप पृथ्वि की नाथ और जल से उत्पन्न हुई हैं. सब देव सब ओर से आप की
स्तुति करें. घी की हवि से आनंदित हो कर यहां विराजिए. आप हमें पीढ़ियों सहित
यजुर्वेद - १७१

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय
धन दीजिए. देवताओं के दोनों अध्वर्यु दोनों अश्विनीकुमार आप को यहां प्रतिष्ठित
करते हैं. ( ४ )
आदित्यास्त्वा पृष्ठे सादयाम्यन्तरिक्षस्य धर्त्रीं विष्टम्भनीं दिशामधिपत्नीं भुवनानाम्.
ऊर्मिर्द्रप्सो अपामसि विश्वकर्मा त ऽ ऋषिरश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (५)
हम इस इष्टका को आदित्य देव की पीठ पर स्थापित करते हैं. इष्टका अंतरिक्ष
को धारण करती है. आप सभी दिशाओं को स्थिरता प्रदान करती हैं. आप भुवनों
की पत्नी और जल की तरंगों की तरह हैं. आप के द्रष्टा ऋषि विश्वकर्मा हैं.
अश्विनीकुमार देवताओं के पुरोहित ( अध्वर्यु ) हैं. दोनों अश्विनीकुमार आप को
इस स्थान पर प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. ( ५ )
शुक्रश्च शुचिश्च ग्रैष्मावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ
ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः.
ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे.
ग्रैष्मावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद् ध्रुवे
सीदतम्.. (६)
हे इष्टकाओ! आप चमकीली, पवित्र, ग्रीष्म ऋतु जैसी और अग्नि के भीतर
जुड़ी हुई हैं. आप स्वर्गलोक तक विस्तार पाएं. आप पृथ्वीलोक तक कल्पित होने
की कृपा करें. जल और ओषधियां फल वाली हों. व्रत सहित अग्नियां ज्येष्ठता
( बड़प्पन ) के लिए प्रेरित करने की कृपा करें. जो अग्नियां हम समान मन वालों
के भीतर हैं, वे स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक को शोभित करने की कृपा करें. ग्रीष्म
ऋतु को दोनों ओर से फलीभूत करती हुई इंद्र देव के समान देवताओं में शोभित
हों. अपनी दिव्यता से अंगिरा की भांति स्थिरतापूर्वक विराजने की कृपा करें. ( ६ )
सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्देवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू
सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्वसुभिः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा
वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजू रुद्रैः
सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः
सजूर्विधाभिः सजूरादित्यैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू
सादयतामिह त्वा सजूरृतुभिः सजूर्विधाभिः सजूर्विश्वेदेवैः सजूर्देवैर्वयोनाधैरग्नये त्वा
वैश्वानरायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (७)
हे इष्टकाओ! आप ऋतुओं के साथ प्रेममय हैं. आप जलों के साथ प्रेममय हैं.
आप देवों के साथ प्रेममय हैं. आयु देने वाले देवों के साथ प्रेममय हैं. आप इंद्रादि
देवों के साथ प्रेममय हैं. हम अग्नि की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं.
वैश्वानर की प्रसन्नता के लिए अध्वर्यु अश्विनीकुमार आप को यहां प्रतिष्ठित करते
हैं. ऋतुओं सहित वसुगणों के साथ आप को अग्नि की प्रसन्नता के लिए प्रतिष्ठित
१७२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय

पूर्वार्ध चौदहवां अध्याय
किया जाता है. जल सहित आप ऋतुओं के साथ प्रेममय हैं. देवताओं सहित आप
ऋतुओं के साथ प्रेममय हैं. देवताओं के अध्वर्यु आप को यहां प्रतिष्ठित करने की
कृपा करें. आप ऋतुओं के प्रिय हैं. आप जलों के प्रिय हैं. आप आदित्यों के प्रिय
हैं. आप प्राणों से प्रिय हैं. आप ऋतुओं के साथ प्रेममय हैं. आप जलों के साथ
प्रेममय हैं. आप रुद्रों के साथ प्रेममय हैं. आप देवताओं के साथ प्रेममय हैं. आप
को संसार के कल्याणकारी अग्नि के लिए ग्रहण करते हैं. अध्वर्यु अश्विनीकुमार
आप को यहां प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. (७)
प्राणं मे पाह्यपानं मे पाहि व्यानं मे पाहि चक्षुर्म ऽ उर्व्या विभाहि श्रोत्रं मे श्लोकय.
अपः पिन्वौषधीर्जिन्व द्विपादव चतुष्पात् पाहि दिवो वृष्टिमैरय.. (८)
आप हमारे प्राण की रक्षा कीजिए. आप हमारे अपान की रक्षा कीजिए. आप
हमारे व्यान की रक्षा कीजिए. आप हमारे नेत्रों की रक्षा कीजिए. आप हमें व्यापक
दृष्टि प्रदान कीजिए. आप हमारे कानों को पूर्ण रूप से सामर्थ्यशाली बनाइए. आप
उर्वी (पृथ्वी) पर कृपालु होइए. आप पृथ्वी को जल से सींचिए. आप पृथ्वी को
ओषधियों से सींचिए. आप दोपायों की रक्षा कीजिए. आप चौपायों की रक्षा
कीजिए. आप स्वर्गलोक से हम पर कृपा की बरसात कीजिए. (८)
मूर्धा वयः प्रजापतिश्छन्दः क्षत्रं वयो मयन्दं छन्दो विष्टम्भो वयोधिपतिश्छन्दो
विश्वकर्मा वयः परमेष्ठी छन्दो वस्तो वयो विवलं छन्दो वृष्णिर्वयो विशालं छन्दः
पुरुषो वयस्तन्द्रं छन्दो व्याघ्रो वयोधामृष्टं छन्दः सिँहो वयश्छदिश्छन्दः षष्ठवाड़्वयो
बृहती छन्द ऽ उक्षा वयः ककुप् छन्द ऽ ऋषभो वयः सतोबृहती छन्दः.. (९)
प्रजापति ने गायत्री छंद से मूर्धन्य ब्राह्मणों को उत्पन्न किया. प्रजापति ने वय
छंद से संरक्षणशील क्षत्रियों को उत्पन्न किया. आयु अधिपति ने विष्टंभ छंद से वैश्य
को उत्पन्न किया. विश्वकर्मा ने परमेष्ठ छंद से शूद्र को उत्पन्न किया. प्रजापति ने
एक पद छंद से भेड़ को उत्पन्न किया. उन्होंने एक पंक्ति पद छंद से मनुष्य को
उत्पन्न किया. उन्होंने विराट् छंद से व्याघ्र को उत्पन्न किया. उन्होंने अतिजगती छंद
से सिंह को उत्पन्न किया. उन्होंने बृहती छंद से भारवाही पशु को उत्पन्न किया.
उन्होंने ककुप् छंद से उक्षा जाति को उत्पन्न किया. उन्होंने सतोबृहती छंद से ऋषभ
(भालू) को उत्पन्न किया. (९)
अनड्‌वान्वयः पङ्क्तिश्छन्दो धेनुर्वयो जगती छन्दस्त्र्यविर्वयस्त्रिष्टुप् छन्दो
दित्यवाड़्वयो विराट् छन्दः पञ्चाविर्वयो गायत्री छन्दस्त्रिवत्सो वय ऽ उष्णिक्
छन्दस्तुर्यवाड़्वयोनुष्टुप् छन्दो लोकं त इन्द्रम्.. (१०)
प्रजापति ने पंक्ति छंद से सांड को उत्पन्न किया. उन्होंने जगती छंद से गाय को
उत्पन्न किया. उन्होंने त्रिष्टुप् छंद से त्र्यवि जाति को उत्पन्न किया. प्रजापति ने विराट्
से भारवाहक पशुओं को उत्पन्न किया. उन्होंने उष्णिक् से तीन वत्स वाले पशुओं
यजुर्वेद - १७३