यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 169, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
छन्दसा सादयामि जागतेन त्वा छन्दसा सादयाम्यानुष्टुभेन त्वा छन्दसा सादयामि
पाङ्क्तेन त्वा छन्दसा सादयामि.. (५३)
हे ( अपस्या नामक ) इष्टके ! जल को हम अलग स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं.
जल को ओषधियों में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को भस्म में प्रतिष्ठित करते हैं.
हम जल को प्रकाश में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को उस के घर समुद्र में प्रतिष्ठित
करते हैं. हम जल को शरीर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को क्षय में प्रतिष्ठित
करते हैं. हम जल को आप के घर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को आप के मूल
स्थान में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को नगर में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को
पथ में प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को गायत्री छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल
को त्रैष्टुभ् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को जगती छंद से प्रतिष्ठित करते हैं.
हम जल को अनुष्टुप् छंद से प्रतिष्ठित करते हैं. हम जल को पंक्ति छंद से प्रतिष्ठित
करते हैं. (५३ )
अयं पुरो भुवस्तस्य प्राणो भौवायनो वसन्तः प्राणायनो गायत्री वासन्ती गायत्र्यै गायत्रं
गायत्रादुपा ९४ शुरुपा ९४ शोस्त्रिवृत् त्रिवृतो रथन्तरं वसिष्ठ ऽ ऋषिः प्रजापतिगृहीतया
त्वया प्राणं गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५४)
हे अग्नि! आप प्रथमोत्पन्न हैं. अतः प्राणों में स्थित हैं. प्राण भुवन अग्नि से
उत्पन्न हैं. अतः प्राणों के रूप में स्थित हैं. प्राण भुवन से उत्पन्न होने से भौवायन
कहे जाते हैं. वसंत ऋतु प्राण से उत्पन्न होती है. वसंत ऋतु से गायत्री उत्पन्न होती
है. गायत्री से गायत्र साम उत्पन्न होता है. गायत्री से उपांशु उत्पन्न होता है. उपांशु से
त्रिवृत्त, त्रिवृत्त से रथंतर. इन सब के प्रमुख वसिष्ठ ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए
सहयोग से हम प्रजाओं के लिए प्राण ग्रहण करते हैं. (५४)
अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य मनो वैश्वकर्मणं ग्रीष्मो मानसस्त्रिष्टुब्ग्रैष्मी
त्रिष्टुभः स्वर ९४ स्वरादन्तर्यामोन्तर्यामात्पञ्चदशः पञ्चदशाद् बृहद् भरद्वाज ऽ ऋषिः
प्रजापतिगृहीतया त्वया मनो गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५५)
हम विश्वकर्मा को इस दक्षिण दिशा में प्रतिष्ठित करते हैं. मन विश्वकर्मा
से उत्पन्न हुआ है. मन से ग्रीष्म दिशा उत्पन्न हुई. ग्रीष्म से त्रिष्टुप्, त्रिष्टुप् से
स्वार साम तथा स्वार साम से अंतर्याम ग्रह उत्पन्न हुए. अंतर्याम से पंचदश सोम
उत्पन्न हुए. पंचदश सोम से बृहत्साम उत्पन्न हुए. इन सब के प्रमुख भरद्वाज
ऋषि हैं. प्रजापति से लिए गए सहयोग से हम प्रजाओं के लिए मन ग्रहण करते
हैं. (५५)
अयं पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य चक्षुर्वैश्वव्यचसं वर्षाश्चाक्षुष्यो जगती वार्षी जगत्या ऽ
ऋक्सममृक्समाच्छुक्रः शुक्रात्सप्तदशः सप्तदशाद्वैरूपं जमदग्निऋर्षिः
प्रजापतिगृहीतया त्वया चक्षुर्गृह्णामि प्रजाभ्यः.. (५६)
यजुर्वेद - १६९