यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 171, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौदहवां अध्याय
ध्रुवक्षितिर्ध्रुवयोनिर्ध्रुवासि ध्रुवं योनिमासीद साधुया.
उख्यस्य केतुं प्रथमं जुषाणाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (१)
हे इष्टके! आप ध्रुव, स्थिर स्वभाव वाली, स्थिर मूल स्थान वाली और ध्रुव
स्वभाव वाली हैं. आप उखा की पताका का सेवन और उसे स्थिर कीजिए. आप
स्थिर श्रेष्ठ स्थान को प्राप्त होइए. अश्विनी देव और देवों के अध्वर्यु आप को इस
उत्तम स्थल में प्रतिष्ठित करें. (१)
कुलायिनी घृतवती पुरन्धिः स्योने सीद सदने पृथिव्याः.
अभि त्वा रुद्रा वसवो गृणन्त्विमा ब्रह्म पीपिहि सौभागायाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह
त्वा.. (२)
हे इष्टके! आप कुलवान व घी से युक्त हैं. आप निवास योग्य पृथ्वी के घर में
निवास कीजिए. रुद्रगण और वसुगण आप की उपासना करते हैं. आप गणनीय हैं.
आप अपने सौभाग्य की बढ़ोत्तरी हेतु सुरक्षित करें. दोनों अश्विनीकुमार अध्वर्यु के
रूप में आप को इस यज्ञ स्थल पर विराजमान कराएं. (२)
स्वैर्दक्षैर्दक्षपितेह सीद देवाना १७ सुम्ने बृहते रणाय.
पितेवैधि सूनव ऽ आ सुशेवा स्वावेशा तन्वा सं विशस्वाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह
त्वा.. (३)
हे इष्टके! आप शक्ति की रक्षा करती हैं. आप देवताओं के अच्छे मन के लिए
रण में प्रतिष्ठित होइए. आप जैसे पिता पुत्र के सुखी जीवन की कामना करते हैं,
प्रयास करते हैं, वैसे ही आप हमारे लिए कीजिए. दोनों अश्विनीकुमार देवों के दोनों
अध्वर्यु आप को यहां प्रतिष्ठित करते हैं. (३)
पृथिव्याः पुरीषमस्यप्सो नाम तां त्वा विश्वे अभिगृणन्तु देवाः.
स्तोमपृष्ठा घृतवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविणायजस्वाश्विनाध्वर्यू सादयतामिह त्वा.. (४)
आप पृथ्वि की नाथ और जल से उत्पन्न हुई हैं. सब देव सब ओर से आप की
स्तुति करें. घी की हवि से आनंदित हो कर यहां विराजिए. आप हमें पीढ़ियों सहित
यजुर्वेद - १७१