यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंतेरहवां अध्याय
मयि गृह्णाम्यग्रे अग्नि छँ रायस्पोषाय सुप्रजास्त्वाय सुवीर्याय.
मामु देवताः सचन्ताम्.. (१)
हे अग्नि! आप धन के उत्पादक, श्रेष्ठ संतति वाले और श्रेष्ठ वीर्य वाले हैं.
हम यह सब पाने के लिए आप को आहुतियों से सींचते हैं. आप हमें ग्रहण करने
की (स्वीकारने की) कृपा कीजिए. (१)
अपां पृष्ठमसि योनिरग्नेः समुद्रमभितः पिन्वमानम्.
वर्धमानो मँहाँ २ आ च पुष्करे दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथस्व.. (२)
आप जलधारी, अग्नि का मूल स्थान और समुद्र के साथ वृद्धि पाते हैं.
आप महान् हैं. आप पृथ्वी की तरह विस्तृत हों. आप स्वर्गलोक की दिव्यता प्राप्त
कीजिए. (२)
ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं पुरस्ताद्वि सीमतः सुरुचो वेन ऽ आवः.
स बुध्न्या ऽ उपमा ऽ अस्य विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च वि वः.. (३)
सर्वप्रथम ब्रह्मा उत्पन्न हुआ. उस के बाद शक्ति व्यापक हुई. उस शक्ति ने
व्यक्त जगत् को प्रकाशित किया. उस शक्ति ने अव्यक्त जगत् को प्रकाशित किया.
सत् इस की विष्ठा, मल और असत् इस का मूल स्थान हुआ. (३)
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्.
स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४)
सर्वप्रथम हिरण्यगर्भ में परम तत्त्व रहा. उसी से सृष्टि उपजी. वे ही एकमात्र
पालक थे. उन्होंने पृथ्वी को धारण किया. वही स्वर्गलोक को धारण करते हैं. उन
के अलावा हम अन्य किस देव के लिए हवि का विधान करें. (४)
द्रप्सश्चस्कन्द पृथिवीमनु द्यामिमं च योनिमनु यश्चः पूर्वः.
समानं योनिमनु सञ्चरन्तं द्रप्सं जुहोम्यनु सप्त होत्राः.. (५)
प्रारंभ से ही ‘द्रप्स’ रस (एक दिव्य रस) देवता को तृप्ति प्रदान करते हैं और
पृथ्वी को बढ़ाते हैं. स्वर्गलोक की बढ़ोतरी करते हैं. मूल स्थान को सींचते हैं. द्रप्स
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