यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
हे अग्नि! ऊपर की ओर स्थित रहिए. आप अपने तन का विस्तार कीजिए. आप
हमारे अमित्रों को भस्मीभूत कर दीजिए. जो हमारे नीच शत्रु हैं, उन्हें आप सूखी
समिधा की भांति जला कर राख कर दीजिए. ( १२ )
ऊर्ध्वो भव प्रति विध्याध्यस्मदाविष्कृणुष्व दैव्यान्गने.
अव स्थिरा तनुहि यातुजूनां जामिमजामिं प्र मृणीहि शत्रून्.
अग्नेष्ट्वा तेजसा सादयामि.. (१३)
हे अग्नि! आप ऊर्ध्वगामी होइए. आप पूरी तरह हमारे शत्रुओं का नाश कीजिए.
आप दिव्य कार्यों को खोजिए. ( १३ )
अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्.
अपा ँ७ रेता ँ७ सि जिन्वति.
इन्द्रस्य त्वौजसा सादयामि.. (१४)
हे अग्नि! आप मूर्धन्य हैं. आप स्वर्गलोक के सब से ऊपरी भाग में प्रतिष्ठित
हैं. आप पृथ्वीपालक और जल की पौष्टिकता बढ़ाने वाले हैं. आप को इंद्र देव के
ओज से हम यजमान प्रतिष्ठित करते हैं. ( १४ )
भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः.
दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चकषे हव्यवाहम्.. (१५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी और यज्ञ के राजा, नेता व लोक कल्याण को नियुक्त
करने वाले हैं. आप स्वर्गलोक में उच्च स्थान को धारते हैं. आप हव्य वाहक हैं. आप
अपनी जिह्वा से हवि को ग्रहण करते हैं. ( १५ )
ध्रुवासि धरुणास्तृता विश्वकर्मणा.
मा त्वा समुद्र ऽ उद्वधीन्मा सुपर्णो ऽ व्यथमाना पृथिवीं दृ ँ७ ह.. (१६)
हे अग्नि! आप ध्रुव, धारक हैं. आप विश्वकर्मा से विस्तार पाते हैं. समुद्र आप
को नष्ट न करे. वायु अवरोधक ( रुकावट ) न बने. आप व्यथित मत होइए. आप
पृथ्वी को दृढ़ता प्रदान कीजिए. ( १६ )
प्रजापतिष्ट्वा सादयत्वपां पृष्ठे समुद्रस्येमन्.
व्यचस्वतीं प्रथस्वतीं प्रथस्व पृथिव्यसि.. (१७)
प्रजापति आप को समुद्र की पीठ पर स्थापित करें. आप जल में विस्तृत होने
की कृपा कीजिए. आप पृथ्वी की ही तरह विस्तृत होइए. ( १७ )
भूरसि भूमिरस्यदितिरसि विश्वधाया विश्वस्य भुवनस्य धर्त्री.
पृथिवीं यच्छ पृथिवीं दृ ँ७ ह पृथिवीं मा हि ँ७ सीः.. (१८)
१६२ - यजुर्वेद