विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
२६२ आनन्द मन्दिर
जरा और एक ऊंचे दिमाग वाले महाशय का विचार
सुनिये एक पुस्तक मे लिखते हैं:—
“जव पुरुष समझे कि वीर्य का स्तम्भन नही होता निकलना
ही चाहता है तव अपने हाथ की दो अंगुलियो से अपनी इन्द्री
के नीचे और गुदा के ऊपर वीच के स्थान मे जो वीर्यपात
करने वाली नस है उसे खूव जोर से दवा रक्खे इस प्रकार वीर्य
स्खलित न होगा वाहर निकलता हुआ भी भीतर लौट जावेगा ।
और सभोग वाले की इच्छा पूरी होगी ।”
इस प्रकार जव वीर्य स्खलित होने को हो तव लौटाल देवे
इस उपाय से चाहे जितनी देरी तक वीर्य को स्तम्भन कर सकता
है । यह भी न हो सके तो संभोग करने के शुरू से ही उस नस को
पकड़े रहे इत्यादि । ये सव वाते कितनी रद्दी और अनुचित
हैं। पुस्तको के लेखक या मूढ पुरुष समझते हैं कि इस प्रकार
वीर्य स्खलन करने से तो वस वैकुण्ठ का दरवाजा ही खुल जायगा
और स्त्री स्खलित होकर पति की वीरता और मर्दानगी के वड़े
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६३
सावधान
ऐसे हानिकारक उपाय कभी नही करना चाहिये । निकलते
हुए वीर्य को भूलकर भी किसी अज्ञानी की वातो मे आकर
रोकना नही चाहिये ।
जो उपाय ऊपर वताया गया है उसी के अनुसार स्त्री को
पूरी तरह से सच्चे स्नेह, हृदय से प्यार करके, स्त्री के प्रसन्न होने
पर संभोग आरम्भ करना चाहिये और एक दूसरे मे ध्यान लगा-
कर चिन्ता रहित हो खूब प्रसन्नता से भली भांति सभोग करना
चाहिये ।
यहां एक वात और ध्यान देने योग्य है । यदि पति को किसी
प्रकार का वीर्य दोष नहीं है, गरमी सुजाक प्रमेह कुछ नहीं है
तो ऊपर के उपाय से संभोग करने से स्त्री की अवश्य तृप्ति होगी
इस वात की भूलकर भी कोशिश नही करनी चाहिये कि स्त्री
हमसे पहिले स्खलित हो परन्तु इस वात का अवश्य ध्यान रखना
चाहिये कि दोनो साथ स्खलित न होने पावे यदि स्त्री पति के
बाद् स्खलित होगी तो गर्भ रहने पर कन्या उत्पन्न होगी और पति
पहिले स्खलित होगा तो पुत्र उत्पन्न होगा ।
ध्यान रखना चाहिये, यदि पति मे
१६४ आनन्द मन्दिर
रोगी पुरुष स्त्री की तृप्ति कभी नही कर सकते और इन
मूर्खता के उपायो से भी जो आज कल की कामशास्त्र सम्बन्धी
पुस्तको मे बतलाये गये है नही कर सकते ।
रोगी पुरुषो की स्त्रियां भी प्रायः रोगी रहती है और इस
प्रकार मूर्खता से सभोग करने वाले पतियो की स्त्रियां भी रोगी रहती
हैं। रोगी स्त्रियो के साथ सभोग करना स्त्रियो के साथ बड़ा भारी
अत्याचार करना है और अपने पैरो मे आप कुल्हाडा मारना है ।
इसलिये आरोग्य पति पत्नी ही सभोग के अधिकारी हैं
और आरोग्य पति ही स्त्री की इच्छा पूरी कर सकता है ।
संभोग के समय जल्दी करने से स्त्री पुरुष दोनो को हानि
पहुचती है और यही कारण है जो पुरुषो को इस मूर्खता के
कारण अनेक प्रकार के स्तम्भन उपाय ढूढने पड़ते है । मूर्ख विषयी
पुरुष चाहते है कि हम घटो तक प्रसंग करते रहे । परन्तु प्रकृति
भी ऐसा करने से रोकती है । इसका नियम यही है कि जिस
समय ऋतुस्नान के समय स्त्री की प्रबल इच्छा हो उस समय
सभोग किया जावे तो स्त्री की इच्छा पूरी होगी । किसी उपाय
की आवश्यकता नही है । वगैर स्त्री की इच्छा हुए गर्भ रहता ही
नही, यह बात किसी पुस्तक लेखक को मालूस नही है । यदि मालूम
होती तो इतने मनगढत उपाय लिखने की आवश्यकता न पड़ती
और पाठक धोखे मे न पड़ते ।
यह बात दूसरी है कि स्त्री पुरुष दोनो रोगी हो । गर्भाशय मे
कुछ खराबी हो तो गर्भ न रहे । मासिक धर्म्म के दिनो के
दाम्पत्य प्रेम का सुखमय परिणाम । पृ० २५१ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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बाद गर्भाशय का मुख बन्द होजाने पर संभोग होने से भी गर्भ
नहीं रहता ।
वैद्यकशास्त्र बतलाता है:—
तत्र स्त्री पुंसयोः संयोगेतेजः शरीराद्वायुरुदीरयति ।
ततस्तेजोनिलसन्निपाताच्छुक्रंच्युतं योनिमभि-
प्रतिपद्यते संसृज्यतेचार्त्तवेन ॥
अर्थात्—स्त्री पुरुष के संयोग मे आपस के प्रेम सम्पादन
करने और सच्चे प्रेम मे मग्न हो आनन्दित होकर सभोग
करने से स्त्री पुरुष दोनों की इन्द्री के आपस मे संघर्षण के
द्वारा उत्पन्न हुई ऊष्मा (गर्मी) से वायु शरीर से उठता है उस
रगड़ की गरमी के तेज से पुरुष का वीर्य पतला होकर वायु की
सहायता से अपने स्थान से चलकर गर्भाशय के मुख मे गिरकर
गर्भाशय मे जाकर स्त्री के आर्त्तव मे मिल जाता है । इस प्रकार
पुरुष का वीर्य स्त्री के आर्त्तव मे मिलने से गर्भरूप धारण करता है।
सन्तान पर दाम्पत्य प्रेम का प्रभाव
सुन्दर और हृष्ट पुष्ट सन्तान उत्पन्न करने के लिये पति पत्नी
का प्रेम बड़ा भारी कारण है, जादू कैसा असर रखता है। परन्तु
यह प्रेम सच्चा होना चाहिये। सच्चा प्रेम सुन्दर रूप रंग पर
निर्भर नहीं है। सौन्दर्य कुछ और है प्रेम कुछ और। कुरूप पत्नी के
भी सुन्दर सन्तान होती देखी जाती है । सब विचारो की बात है ।
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प्रेम मे एक बड़ी भारी विचित्रता है, प्रेम का बड़ा भारी
महत्व है। यह बात नही है कि सुन्दर स्त्री हो तभी पति का उस
पर प्रेम हो तथा सुन्दर पति हो तभी पत्नी प्रेम करे। जिस प्रेम
मे रंग रूप का भेद भाव रखकर प्रेम होता है वह प्रेम नही
कहा जा सकता ।
ऐसा स्वार्थी प्रेम, प्रेम नही है। वह स्वार्थ का ही प्रेम है।
इसलिये ऐसे दम्पति जो केवल सुन्दरता का विचार करके प्रेम
करते हैं वे महा मूर्ख हैं। उनकी सन्तान सुन्दर कदापि नही हो
सकती । सच्चे प्रेम से पति पत्नी का हृदय एक हो जाता है।
विचार एक हो जाते हैं। इस प्रकार परस्पर प्रेम करने वाले
दम्पति सुन्दर सन्तान उत्पन्न करते हैं।
गर्भाधान के समय दाम्पत्य प्रेम का बड़ा ही सच्चा प्रभाव
पड़ता है इसी से रूपवान गुणवान सन्तान उत्पन्न होती है।
किसी की पत्नी यदि रूपवती न हो अथवा किसी का पति सुन्दर
न हो तो उसे रूपवान, गुणवान, सन्तान उत्पन्न करने की
निराशा नही होनी चाहिये । आपस मे सच्चा प्रेम होना चाहिये
पति को अपनी कुरूप स्त्री को सुन्दर रूपवती समझ कर प्रेम
करना चाहिये और उसी प्रकार पत्नी को भी अपने कुरूप पति
को सर्व श्रेष्ठ रूपवान समझ कर प्रेम करना चाहिये ।
प्रेम के प्रभाव से कुरूप पति पत्नियो के भी सुन्दर गुणवान
सन्तान हो सकती है और प्रेम न होने से रूपवान गुणवान
दम्पति के भी कुरूप और मूर्ख सन्तान उत्पन्न होती है। इस
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प्रकार जो पति पत्नी सुन्दर न होने पर भी सुन्दर सन्तान उत्पन्न
करने की इच्छा रखते हो उन्हे परस्पर सच्चे प्रेम से ही गर्भाधान
क्रिया करनी चाहिये ।
एकवार मेरे पास इलाज के लिये एक स्त्री आई उसके
साथ मे एक लड़की थी और एक लड़का भी चार पांच वर्ष का
था लड़की दो वर्ष की थी । वह स्त्री सुन्दर थी, पजाव की रहने
वाली थी । मैंने उसकी लड़की को देख कर हंसी मे कहा कि आप
तो वड़ी सुन्दर हैं यह लड़की कैसी कुरूप पैदा की है ? तव वह
हसकर कहने लगी । न जाने क्या वात है लड़का मेरे ही रग रूप
का है यह लड़की वदसूरत हुई है । आपही वतलावे क्या
कारण है ?
इस प्रकार वातचीत होरही थी इतने ही मे उसकी नौक-
रानी जो वाहर वैठी हुई थी उस स्त्री को वुलाने आई । उसके
पति ने कुछ पूछने को वाहर वुलाया था । जव वह नौकरानी मेरे
सामने आई तो मैने देखा उस नौकरानी और उस लड़की की
जिसके वावत मुझसे वातचीत होरही थी, सूरत विलकुल मिलती
थी मैने नौकरानी को देखकर कहा, देखिये आपकी लड़की
नौकरानी की शक्ल की है । जव आपकी यह लड़की गर्भ मे थी
तव यह नौकरानी हर समय आपके पास रहती होगी । उस स्त्री
ने हस कर कहा—हां देवी जी ! यह वात तो वहुत ठीक
आपने वतलाई । जव यह लडकी गर्म मे थी तव मै वीमार होगई
थी तभी यह नौकरानी रक्खी गई थी । कोई और स्त्री मेरे
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पास रहने के लिये घर मे नही थी । मेरे पति दफ्तर चले जाते
थे यह मेरे पास हर वक्त बैठी रहती थी ।
मैंने उस स्त्री से कहा, अब गर्भ की दशा मे कभी इसे अपने
पास मत रखना नही तो अब जो बालक होगा वह भी ऐसा ही
काला कलूटा बदशक्ल इसी लडकी की तरह होगा, वह स्त्री
हंसने लगी और बोली—देवी जी ! मुझे यह बात मालूम न थी ।
एक और दूसरी स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आईँ । उसके
लड़के का कान बहता था । लडके की अवस्था सात आठ महीने
की थी । मैने उससे पूछा, इसका कान कब से बहता है क्योकि
कान से सवाद आता है ? उस स्त्री ने कहा, जब से यह पैदा हुआ
है इसी तरह कान से मवाद आता है। मैंने उससे पूछा, जब यह
गर्भ मे था तब आपके कान मे कोई शिकायत तो नही थी ? उस
स्त्री ने कहा, जब यह पैदा नही हुआ था तब मेरे कान मे फुड़िया
निकली थी, कान बहने लगा था । यह शिकायत मुझे कई महीने
तक रही । जब यह गर्भ मे था तब भी कई महीने तक कान मे
तकलीफ रही, डाक्टरी इलाज होता रहा। गर्भावस्था मे भी पिच-
कारी से कान धोया जाता था, फिर अच्छा होगया । अब मुझे
जब से यह पैदा हुआ है कान की कोई शिकायत नही है ।
मैने उस स्त्री से कहा, बस यही बात है जब यह गर्भ मे था
तब आपका कान बहता था बल्कि गर्भ रहने के पहिले ही आपके
कान मे शिकायत थी इसीलिये वही असर लड़के मे आगया
है । इस लड़के का कान बहना बडी कठिनाई से दूर तो होजावेगा
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २६६
परन्तु उसकी जड़ नहीं जावेगी। कुछ न कुछ शिकायत कान की
इसे उम्र भर रहेगी। मैंने दवा बतला दी और कह दिया
कि अधिक दिन तक इलाज करने से फायदा होगा। वह स्त्री दवा
लेकर अपने घर चलीगई।
एक स्त्री मेरे पास इलाज के लिये आई उसकी एक लड़की
जिसकी अवस्था ६, साल की थी कुछ कुछ पागल होगई थी
उसी लड़की के इलाज के लिये वह स्त्री मेरे पास आई थी, मैंने
उस लडकी का हाल पूछा कि इसकी यह दशा कितने दिन से
है ? उस स्त्री ने कहा कि यह कुछ सनक मिजाज की कई वर्ष से
मालूम होती थी अब जिस प्रकार बडी होती जाती है वैसे ही इसका
मिजाज सनकी होता जाता है। मैने उस स्त्री से पूछा कि जब
यह लडकी गर्भ मे थी उस समय आपके यहां कोई सनकी मिजाज
का मनुष्य तो नही था ? उस स्त्री ने कहा, मेरी भौजाई पागल थी
जब मै गर्भवती हुई तब मेरे पति ने मुझे मेरे पिता के यहां भेज-
दिया। मै गर्भावस्था मे बराबर पिता के यहां रहीं और वही यह
लड़की पैदा हुई।
मेरी भौजाई पागल थी मै उसे खाना खिलाती कपडे पहिनाती।
वह कपड़े उतार कर फेंक देती थी तो मैं बार बार कपड़े पहिनाती
थी उसकी सेवा करती थी। वह दस पन्द्रह दिन को कभी कभी
अच्छी भी होजाती थी।
मैंने कहा—यही कारण इस लडकी के सनकी होने का है
इसका कोई इलाज नहीं है इसका आराम होना कठिन है। मैंने
२७० आनन्द मन्दिर
पूछा-आपकी भौजाई अभी है या नहीं ? उसने कहा भौजाई अभी
जिन्दा है और भौजाई का अब यह हाल है कि जब वह गर्भवती
होजाती है तो जब तक बालक पैदा नही होता तब तक बिलकुल
अच्छी रहती है। नाम मात्र को भी पागल पन नहीं रहता,
मेरी भौजाई बड़ी चतुर और गृहस्थी के कामकाज मे परिश्रम
करने वाली पढ़ी लिखी स्त्री है। गर्भावस्था मे सब काम ठीक करती
है। बालक होते ही कुछ दिन बाद फिर पागल होजाती है। बच्चो
की परवरिश के लिये गाय का दूध पिलाया जाता है उसके पास
तक बच्चो को नही जाने दिया जाता।
मैंने कहा इसी प्रकार यह तुम्हारी लड़की भी होगी। इसका
आराम होना तो कठिन है।
इसप्रकार के सैकड़ो उदाहरण मेरे देखने मे आये हैं क्योकि
सभी प्रकार की स्त्रियां रोगी निरोगी प्रतिदिन आया करती हैं।
इस विषय को अधिक उदाहरण देकर बढ़ाने से पुस्तक बहुत बड़ी
होजायगी। इस विषय मे कहना यही है कि माता पिता के शरीर
मे किसी प्रकार का रोग न हो और दोनो प्रसन्न चित्त हो और
संभोग के समय दोनो की प्रबल इच्छा सम्भोग करने की हो
तभी सन्तान आरोग्य होती है। रोगी माता पिता की सन्तान
भी रोगी होती है। गर्भ रह जाने पर भी गर्भावस्था मे गर्भवती
को बडी सावधानी से रहना चाहिये। गर्भावस्था मे भी जैसे आचार
व्यवहार किये जाते हैं उसका प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। सन्तान
के उत्पन्न होने तक माता के विचारो का असर सन्तान पर पड़ता है।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७१
सन्तान पर माता पिता के रोगों का प्रभाव
जिस प्रकार गर्भावस्था में गर्भवती के आचार विचार तथा
अन्य कामो का प्रभाव सन्तान पर पडता है उसी प्रकार माता
पिता के रोगो का भी प्रभाव सन्तान पर पड़ता है। यह प्रभाव
ऐसा भयंकर होता है कि माता पिता की अज्ञानता और मुर्खता
से सन्तान का जीवन नष्ट होजाता है। सन्तान जीवन पर्यन्त कष्ट
भोगती है और बहुतेरे बच्चे गर्भ मे ही तथा उत्पन्न होते ही
काल का कलेवा बनजाते हैं।
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम सन्तान
शुद्ध रज वीर्य से उत्तम और आरोग्य तथा दीर्घजीवी
सन्तान उत्पन्न होती है और दूषित तथा रोगी रज वीर्य से अनेक
दोषो वाली तथा रोगी सन्तान उत्पन्न होती है। इस कारण
यहां मै शुद्ध रज वीर्य और रज क्या है, वीर्य क्या है, स्त्री
और पुरुष के रजवीर्य तथा जननेन्द्रियो मे किस प्रकार रोग
उत्पन्न होते है और उनका प्रभाव सन्तान पर कैसा पडता है
इस विषय को प्रसगानुसार लिखूगी।
सन्तान होने में बालक रोग
वीर्य को अधिक व्यय करने से प्रमेह रोग उत्पन्न होता है।
जो अज्ञानी पुरुष वाल्यावस्था मे कुसंगति मे पड़कर अपने वीर्य
को अपने हाथ से नष्ट करते हैं उसे हस्तमैथुन कहते हैं। आगे
चलकर जवानी मे उन्हें २० बीस प्रकार के प्रमेहों में कोई सा प्रमेह
उत्पन्न होता है। प्रमेह वीर्य सम्बन्धी बडे भारी रोगो मे एक रोग
है। वैद्यक शास्त्र बतलाता है कि प्रमेह रोग स्वभाव से ही महादुष्ट
रोगी है। इस कारण इसका इलाज बडी सावधानी से करना
चाहिये। प्रमेह रोग मे पुरुष की जान मे प्रकट रूप मे कोई विशेष
कष्ट तो शुरू मे होता नही क्योंकि स्वप्न मे वीर्य निकल जाने से
कोई तकलीफ मालूम नही होती, पाखाना फिरते समय जोर
करने मे धातु निकलना कुछ भी दुखदाई नही प्रतीत होता,
पेशाब के साथ धातु जाने मे भी कुछ दिक्कत नहीं होती। संभोग
के समय शीघ्रपात होना इत्यादि किसी प्रकार के धातु विकार
मे कुछ तकलीफ मालूम न होने से रोगी पुरुष कुछ भी परवाह
नही करते और कुछ चिन्ता भी नही रहती। दुनियां के सभी काम
रोते भीकते गिरते पडते चले ही जाते हैं।
रोग बढ़ते बढ़ते जब अधिक बढ़ जाता है और शरीर आल सी
और असमर्थ होता मालूम होने लगता है तब कुछ २ चिन्ता होती
है सो भी ऐसी नही कि लगाकर औषधि हो जिससे रोग दूर होजावे।
प्रमेह मौजूद है और सहवास मे कमी न होने पावे यह विचार
सदैव बना रहता है। औषधि मगाया करते हैं सो भी प्रमेह की
नहीं, शीघ्रपात की। जिससे स्त्री प्रसन्न रहे। वे लोग महामूर्ख हैं
जो प्रमेह रोगो को सरल समझ कर परवाह नही करते वे अपने
पैरो मे आप कुल्हाड़ी मारते हैं। सन्तान भी वैसी ही होती है।
॥ ३
त्र
मू
ग
रो
य
न
क
व
क
ब
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आनन्द
मन्दिर
दसवां अध्याय
-:०:-
१८
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विवाह विज्ञान-काम
नपुंसकों की संभोग ~~~~~~~~~
आसेक्यश्च सुगंधीच कुम्भीकरश्चैष्य- कृत्य
सरेतसस्त्वमीज्ञेया अशुक्रःषंडसंज्ञितः ॥
अर्थात्—आसेक्य, सुगन्धि, कुम्भिक, और ईर्ष्यक, इन चारों
नपुंसकों में तो उत्तेजनात्मक वीर्य होता है परन्तु स्त्री की सी चेष्टा
वाले नपुंसक में नहीं होता । इसका कारण यह है कि:—
अनयाविप्रकृत्यातु तेषांशुवहा शिराः ।
हर्षात्स्फुटत्वमायान्ति ध्वजोच्छ्रायस्ततो भवेत् ॥
अर्थात्—पहिले कहे हुए चार नपुंसकों में वास्तव में तो वीर्य नहीं
है परन्तु उनकी विरुद्ध चेष्टा (वीर्य भक्षण योनि और पुरुष इन्द्री
का सूंघना, गुदा मैथुन और दूसरे को मैथुन करते देखना )
इन कारणों से वीर्य न रहते हुए भी वीर्य वाली नाड़ियां हर्षयुक्त
होकर फूल जाती हैं उसी से उन नपुंसकों की इन्द्री में चैतन्यता
उत्पन्न होजाती है ।
इसप्रकार की स्त्रियां नपुंसक भी देखी जाती हैं । मेरे पास
इलाज के लिये सभी प्रकार की रोगी स्त्रियां आया करती हैं और
२५ पचीस वर्षों में मैं लाखों स्त्रियो का इलाज कर चुकी हूं इनमे
सभी प्रकार के रोगों वाली स्त्रिया देखी गई । जो स्त्रिया मेरे पास
इलाज के लिये आती हैं वे अपना सभी प्रकार का हाल खुलासा कह
नन्द मन्दिर
नासा हाल के उनकी चिकित्सा ठीक नहीं
चिट्टियां भी प्रतिदिन पचासो आया करती हैं ।
उने चिट्ठियों मे भी अपने रोग का खुलासा हाल रोगी स्त्रिया लिख
दिया करती है जो हाल रह जाता है मैं पत्र द्वारा पूछलेती हू ।
स्त्री पुरुषो की सब रोग सम्बन्धी चिट्ठियां गुप्त रक्खी जाती हे
मेरे सिवाय दूसरा कोई नहीं देख सकता इसलिये कोई रोगी स्त्री
पुरुष मुझे अपने रोग का खुलासा हाल लिखने में संकोच नहीं
करता ।
रागी स्त्रियो की जबानी हाल (सुनने, उनके पत्रों से जानने
तथा स्त्रियो की परीक्षा करने से आयुर्वेद में लिखे उपर्युक्त लक्षणो
को मैने बिलकुल सच पाया है इसीलिये अनुभव में आये हुये
लक्षणों को सबको मालूम करने के लिये लिख रही हू ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २७५
पुरुषार्थ हीनता या नपुंसकत्व
अब मैं यहां पर सब प्रकार के नपुंसकों का वर्णन विस्तार
करती हूं क्योकि जितने नपुंसक हैं सब माता पिता की
मूर्खता से ही विपरीत रति करने से उत्पन्न होते हैं। इन्हीं सब
नपुंसको से पाठक आसनों का फल समझ ले।
नपुंसक पुरुष के लक्षण
वैद्यक शास्त्र बतलता है कि:—
संकल्प प्रवणो नित्यं प्रियां वश्यामथापि वा ।
न याति लिंग शैथिल्यात्कदाचिद्याति वा यदि ॥
अर्थ यह है कि पुरुष स्त्री प्रसग करने की इच्छा तो मन
में सदैव करे परन्तु अपनी स्त्री से भी प्रसग न कर सके इन्द्री
की कमजोरी के कारण स्त्री के पास जाते भी डरे। यदि किसी
प्रकार प्रसग करे भी तो शीघ्रही उस पुरुष का श्वास फूलने लगे
और शरीर मे पसीना आने लगे। इन्द्री मे ठीक ठीक उत्तेजना न
हो। इसप्रकार वह पुरुष लज्जित होकर बड़ा दुःखी हो और उस
बिचारे के विचार मन के मन मे ही रह जावे। यह साधारण
नपुंसको के लक्षण हैं।
जिन पुरुषो मे ये लक्षण पाये जावे उन्हे नपुंसक समझ
लेना चाहिये चाहे वे जन्म से हों अथवा किन्ही कारणो से पैदा
होगये हो।