विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
आनन्द
मन्दिर
सातवां अध्याय
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०१
सृष्टि और मनुष्य जाति
संसार की स्थिति सृष्टि पर ही निर्भर है और सृष्टि स्त्री
पुरुष ( नर मादा ) पर निर्भर है इसके अतिरिक्त दूसरा कोई
उपाय परमात्मा ने सृष्टि उत्पत्ति का नही रक्खा । वहुत मे जीव
ऐसे भी हैं कि जो विना नर मादा के ही उत्पन्न हो जाते है
परन्तु मनुष्य विना स्त्री पुरुष के उत्पन्न नही हो सकता। सृष्टि की
उन्नति के मुख्य प्राणी मनुष्य ही है। मनुष्यो से ही सृष्टि की
उन्नति और अवनति होती है इसी लिये मनुष्यो मे स्त्री पुरुष
का जोड़ा बनाया है । उत्तम सन्तान व जाति उत्पन्न होने के
लिये ऋषियो ने विवाह की प्रथा चलाई और चार आश्रमो का
नियम रक्खा । ब्रह्मचर्य आश्रम विद्या प्राप्त करने के लिये है ।
मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह विद्या प्राप्त करने के वाद विवाह
करके गृहस्थाश्रम मे प्रवेश कर दाम्पत्य जीवन का सच्चा आनन्द
और सुख भोगते हुए उत्तम सन्तान उत्पन्न कर परमात्मा की
सृष्टि मे सहायता दे ।
यह अत्यन्त खेद् की वात है कि ब्रह्मचर्य अवस्था (वाल्यावस्था)
से ही कुसंगति मे पड़कर अनेक होनहार वच्चे अनियमता से
वीर्य का सत्यानाश मार लेते है जिसके कारण आगे चलकर अनेक
अनर्थ होते हैं, अधर्म की वृद्धि होती है, शक्ति क्षीण हो जाती है
दीर्घजीवन की जगह् अल्पायु होती है और समाज मे अनेक
प्रकार के रोग दोष फैल जाते हैं ।
२०२ आनन्द मन्दिर
मनुष्य की नित्य प्रति की इच्छाएं
शरीरे जायते नित्यं वाञ्छा नृणां चतुर्विधा ।
बुभुक्षा च पिपासा च सुपुप्सा च रतिस्पृहा ॥
आयुर्वेद बतलाता है और प्रकृति का नियम है कि मनुष्यों
के शरीर मे भोजन करने की, पानी पीने की, सोने की और स्त्री
संभोग करने की इच्छा नित्य प्रति बनी रहती है । इन इच्छाओं
को रोकने से और नियम विरुद्ध अधिक उपभोग करने से शरीर
मे अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होजाते हैं जिससे मनुष्य की
आयु क्षीण होती जाती है और ऐसे मनुष्य अकाल मे ही काल के
कलेवा हो जाते हैं।
भोजन की इच्छा रोकने से अर्थात् समय पर भोजन न
करने से शरीर टूटने लगता है, निर्बलता और दुर्बलता आघेरती
है, अरुचि उत्पन्न होती है थकान सी मालूम होती है सुस्ती आ
आजाती है, आंखे कमजोर होजाती है और बलका क्षय होता
है । इसी प्रकार से शरीर कमजोर होजाता है।
प्यास लगने पर पानी न पीने से कठ और मुख सूख जाता
है, खुश्की होती है, कानों को हानि पहुँचती है, रक्त सूखने लगता
है और हृदय मे पीडा होती है। आती हुई निद्रा को रोकने से
जम्भाई आने लगती है । शिर तथा नेत्र भारी हो जाते है शरीर
टूटने लगता है आलस्य उत्पन्न होता है और खाया हुआ अन्न
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०३
पचता नहीं है। जो मनुष्य भूख लगने पर नहीं खाते उनकी
जठराग्नि मन्द होजाती है शरीर की अग्नि खाये हुए आहार को
पचाती है, आहार नहीं रहने मे वात पित्त तथा कफ को पचाती
है, उनके क्षय होने पर धातुयो को पचाती है और धातुओ के
क्षय होने पर शरीर को पचाती है और फिर प्राणो को पचाती है
अर्थात् प्राणों का नाश करती है।
रति ( संभोग ) के सम्बन्ध मे भी ऐसा ही समझना चाहिये।
बहुतेरे मनुष्यों को अनेक प्रकार के शारीरिक और मानसिक
रोग उनकी संभोग इच्छा पूर्ण न होने मे हो जाते हैं परन्तु
इसके यह अर्थ नहीं कि मनुष्य दिन रात संभोग मे जुटा रहे।
पुरुष रोगों का कारण
अब तक मेरे पास लाखो स्त्रियां अपने तथा अपने पति के लिये
औषधियां लेने आईं उनके पतियों की दशा सुनकर मुझे इस बात
का अनुभव हुआ कि पुरुषो की अज्ञानता ( वीर्यनाश ) से ही
अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। श्रवण शक्ति का नाश होता है, नेत्रों की
ज्योति कम हो जाती है, शुक्र ऐसा पतला होजाता है कि वस्त्र
में लगने से जलवत किसी प्रकार का चिन्ह तक नहीं रहता ।
साधारण शक्ति ऐसी नष्ट हो जाती है कि स्त्री के दर्श स्पर्श से ही
धातु बहने लगती है। एव सन्तानोत्पादक शक्ति नाश हो जाती
है। मूत्र तो सदा जलन के साथ एव थोड़ा थोडा कई बार होता
है और शुक्र मेह का प्रादुर्भाव भी हो जाता है। जिसमे शौच
३०४ आनन्द मन्दिर
(दिशा, पेशाब) करने के पहिले अथवा पीछे वीर्य स्खलित
(पतन) होता है और अकारण ही सर्वदा चिन्ता लगी रहती
है। जिसके कारण पुरुष स्वप्र मे भी उसी खोटे कर्म को करते हुए
देखता है और उसका वीर्य अनायास ही स्खलित हो जाता है
और जब तक स्वप्रदोष से यह स्खलित वीर्य किसी उपाय से
अधोपतित नही होता है, तब तक मूत्र नाली मे जलन और पेशाब
मे कड़क होती ही रहती है।
ऐसे हजारो पुरुषो की स्त्रियां मेरे पास आई और प्रतिदिन
पचासो आती है कि उनके पति किसी काम के अर्थात् गर्भाधान
करने लायक नही है, सन्तान कैसे हो ।
बहुतेरे नवयुवक स्वप्नावस्था मे किसी नवीन वयस्का बालिका
से सम्भाषण करते हुए क्षण मात्र मे ही स्खलित हो जाते
है इसी को "स्वप्रदोष" कहते है। अनैसर्गिक उपाय से स्त्री ससर्ग
की अपेक्षा स्वप्र मे अधिक वीर्य निकलता है, तथा शरीर अधिक
तर दुर्बल और बलहीन हो जाता है। इसी से मेरुदण्ड (रीढ़) मे
प्रायः दर्द हुआ करता है, अण्डकोषो का बढ़ जाना भी उन्ही कुचे-
ष्टाओ का फल है, और थोडी अवस्था मे अस्वाभाविक कर्म हस्त-
क्रिया आदि के करने से पुरुष इन्द्री छोटी और नसे खराब हो जाती
हैं; इन्द्री का अग्रभाग कुछ -टेढ़ा भी हो जाता है। स्वप्रदोष दिन
हो या रात सोते हुए होता है और मानसिक चंचलता से जागृत
अवस्था मे भी मूत्रेन्द्री मे सुरसुरी होकर धातु निकलता है।
इस प्रकार धातु निकलने से इन्द्री का अग्रभाग सदा भीगा
वर्षा ऋतु में विहार । पृ० १७३
( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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और चिपचिपा रहता है, इसमे जठराग्नि मन्द होकर पाचन शक्ति
घटने से भूख कम हो जाती है, थोडा भी अधिक भोजन करने
से अजीर्ण हो जाता है ( ऐसी बीसों चिट्ठियां प्रतिदिन
मेरे पास आया करती हैं) इसी कारण से कोष्ठ भी परिष्कृत
नही होता और प्रदर मे शूल होने लगती है। इसके निवारण
के लिये किसी तीक्ष्ण पाचक अथवा विरेचन (दस्तावर) औषधि
के सेवन मे यद्यपि एक दो दिन के लिये कष्ट दूर हो जाता है
परन्तु इससे कोष्ठ परिष्कृत होने के बदले और भी कोष्ठबद्ध होने
लगता है और थोड़ी ही अवस्था मे बूढो की भाति मुंह पर झांई,
खाल का लटक जाना तथा झुर्रियां पडने लगती हैं, स्वर
भी बिगड़ जाता है। अर्थात सब तरह से जवानी मे ही बुढ़ापा
आघेरता है।
बहुतेरे पुरुष उपरोक्त शारीरिक अवनति को अनान्य कारणों
से होना समझ कर चिकित्सा करवाते हैं और जब किसी प्रकार
की चिकित्सा से लाभ नही होता तो निराश होकर मृत्यु के दिन
गिनने लगते हैं।
उन्हें यह ससार दु खमय विदित
२०६ आनन्द मन्दिर
जिसके कारण उनकी औषधि कुछ भी फायदा नही करती इसी
कारण से रोग के मूल कारण को न जानकर उपस्थित उपद्रव
के प्रतिकार करने की चेष्टा करते हैं; परन्तु उससे क्या हो
सकता है, जब तक कारण का नाश न हो, कार्य का नाश होना
असम्भव है। रोगी और भी हताश हो जाता है। इसी कारण मैं
सबके समझने के लिये और सावधान करने के लिये इस विषय
को यहां विस्तार से लिखती हूँ।
यदि वैद्य रोगी से इस अवस्था का कारण पूछता है तो रोगी
लज्जित हो अपनी मूर्खता से लम्पटता की कथा न कहकर अत्यन्त
दुःख और दीनता प्रकट करते है तथा प्रत्यक्ष भी कहते हैं कि इस
“जिन्दगी से मर जाना ही अच्छा है”।
बुरे कर्मों से पुरुषेन्द्री की खराबियां
अण्डकोष लटक जाते हैं, कभी कभी उनमे पीड़ा होती है,
इन्द्री मे सुरसुराहट प्रतीत होती है, उत्तेजना कम, वीर्यपात
जल्दी, बिना आनन्द स्वप्नदोष, २१ प्रकार के प्रमेह, नामर्दी होती
है, रुचि बिलकुल नही होती, यदि कुछ होती भी है
' or 'खु'?
Wait, look at "सूखा": 'सू' 'खा' ','
Next word:
First letter: 'कु' or 'खु' or 'सु'?
It has a loop at bottom left: 'कु' or 'कृ'? "कृशता"? No.
Wait, look at: 'सु' 'क' 'ड़' 'ना'?
Wait, look at line 16:
"झड़ते हैं। सूखा, सुकड़ना, आंखों का धंसना, उन्माद और"
Wait, look at the letter after "सूखा,":
It has: 'कु' or 'सु' or 'धु'?
Wait, could it be "खुजली"?
Wait, let's look at:
"सूखा" (emaciation / rickets)
Then: "____, आंखों का धंसना, उन्माद और"
Wait, could it be "कमजोरी"?
Let's look at the letters:
1: looks like 'कु' or 'सु'
2: looks like 'क' or 'प' or 'च'
3: 'ना'
Wait, could it be "सुपना"? (सपना / स्वप्नदोष)?
Wait, could it be "कांपना"?
LOOK AT IT:
'कां' 'प' 'ना' (KAMPANA - trembling)!
Look at the first letter: 'कां' (ka with dot and aa matra)!
Wait, does it have an 'aa'
।
"त्याग न सका निदान": 'त्या', 'ग', space, 'न', space, 'स', 'का', space, 'नि', 'दा', 'न'.
Let's check line 5:
पागलखाने भेजा गया और वही मरगया ।
Wait, "वही" or "वहीं"?
No dot above 'ही'. It's "वही".
"मरगया": 'म', 'र', 'ग', 'या' (one word, or "मर गया"?).
It is printed together: "मरगया" !
Then a space and a danda: "।"
Now Heading:
सस्तिष्क की खराबियां
Wait, let's re-verify every letter of the heading:
- First word:
"सस्तिष्क"
Let's check letter 3: 'ष्क'.
Is it 'ष्क' or 'स्फ' or 'स्क'?
It is 'ष्' with 'क' below: 'ष्क'.
Letter 2: 'स्' + 'ति' = 'स्ति'.
Letter 1: 'स'.
So: "सस्तिष्क". - Second word: "की".
- Third word:
Look at the characters:
- 'ख'
- 'रा'
- 'वि' or 'बि'?
Wait, let's look at the belly of this letter:
It is a circle. Does it have a slash?
Wait, in this font, does 'ब
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २०६
जाय तो एक भारी ग्रंथ बनेगा और हर एक पढ़ने वाला एक
एक पत्र को पढ़ कर हैरान हो जायगा। एक नवयुवक की स्त्री मेरे
पास आई और उसने अपने पति का हाल मुझ से कहा । उसके
पति का रोगी फार्म देखकर मुझे मालूम हुआ कि वह २०
कदम भी न चल सकता था, चलने में श्वांस चढ़ने लगती थी
उसकी दुर्बलता इतनी बढ़ी हुई थी कि उसका जीना आश्चर्य
मालूम होता था। उसने बताया कि आठ वर्ष की आयु में विवाह
हुआ। १९ वर्ष की आयु में पक्षाघात हुआ। २२ साल की आयु में
‘फिर अधरंग ( पक्षाघात ) का आक्रमण हुआ। २६ साल में फिर
दौरा हुआ, पश्चात पेचिस आरम्भ हुई। २९ साल की आयु में
दिलकी धड़कन प्रारम्भ हुई और इस वक्त उसको श्वासरोग,
कलेजे की वृद्धि, मन्दाग्नि, पेट में भारीपन और दर्द जिगर, दर्द
कमर, गुर्दों की पिछली तरफ दर्द, पिंडलियों में दर्द, पेट में दर्द,
याद्दाश्त कमजोर, दुर्बलता इत्यादि रोग हैं।
आज कल ऐसा समय आगया है कि सैकड़ा पीछे ९० इसी
बुरी आदत के शिकार हैं, फिर क्यों न प्रत्येक व्यक्ति धातु पुष्टि
की औषधियां ढूंढ़ता फिरे। पुरुषों की इस प्रकार दुर्दशा के ही
कारण विज्ञापन बाजों की बन आई है। आजकल जिसे देखिए
वही नया औषधालय खोल कर धातु पुष्टि की दवाओं के नोटिस
देने लगते हैं और भोली भाली जनता को लूटते हैं। ऐसे नोटिस-
बाजों से जिन्हें वैद्यक का कुछ भी ज्ञान नहीं है, कभी कभी
बड़ा नुक्सान होता है।
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३१० आनन्द मन्दिर
बहु मैथुन
हमारे शास्त्रो मे लिखा है कि तरुण पुरुष और स्त्री का जब
विवाह हो और स्त्री रजोधर्म से शुद्ध हो तो पुरुष केवल एक
वार गर्भाधान करे और गर्भस्थित होने के पश्चात जब तक बालक
उत्पन्न होकर माता का दूध पीना न छोडे तब तक दोनो प्रसग
करने से बचे रहे। इस विधि से मानो ढाई वर्ष मे एक वार नौवत
पहुँचती है। खैर यह तो हुई धर्म्मशास्त्र की आज्ञा। मुझे अपने
पाठको को यह कर्णगोचर कराना है कि कितने दिनो के पीछे
गर्भाधान किया जाय जिसमे स्वास्थ्य मे कोई फर्क न पड़े। उपरोक्त
नियम बहुत उत्तम है परन्तु मनुष्यो की दशा आज कल बहुत
गिरी हुई है।
बहु मैथुन का परिणाम
बहु मैथुन इस प्रकार बढ़ा हुआ है कि जिसका वर्णन करना
असम्भव है। एक समय मैने एक पुरुष रोगी के पत्र को पढ़ कर
आश्चर्य किया उस पत्र मे लिखा था कि विवाह होते ही सात आठ
साल तक मैं लगातार २ से ६ बार तक प्रति दिन प्रसंग करता रहा।
इस दुष्कर्म ने भारतवासियों का सत्यानाश कर दिया है।
स्त्री के मासिक रजोधर्म के दिनो मे या बीमारी, प्रसूत के दिनो मे
भी अज्ञानी मूर्ख लोग स्त्री को चैन नही लेने देते, मुह काला
करते हैं और प्राय. रजस्वला की भी परवाह नही करते।
इसका भी सोच नही करते हैं कि इतने अधिक प्रसंग से महा
[विवाह विज्ञान-कामशास्त्र २११]
व्याधी खड़ी होगी। वे स्त्रियो को रोगी बना देते हैं। धिक्कार है ऐसे
मनुष्यत्व को, पशु पक्षी भी उचित समय पर रति सुख लेते हैं।
शोक है कितनेही विवाहित जोडे है जिनका, स्वास्थ्य भोग के
नियमो की अज्ञानता से वरवाद हो चुका है विना कुछ भी सोचे
विचारे वे अपनी मूर्खता और अज्ञानता से अपनी रुचियों की
बागडोर ढीली छोड़ देते हैं और पागलपन से दुख तथा शोक
की ओर दौड़े जाते हैं।
कोई कोई घमंडी लोग इस मूर्खता के कारण बहुमैथुन
करते हैं कि कही स्त्री यह न खयाल करे कि इसमें वल नहीं है।
वे मूर्ख यह नहीं जानते कि जब बहुमैथुन के कारण हम वेकाम
हो जावेंगे तो उस समय बिलकुल ही इच्छा पूरी न कर सकेंगे !
फिर क्या होगा !! यह लिखना जरूरी है कि स्त्री बहुमैथुन से
कभी प्रसन्न नहीं होती है, किन्तु बहुमैथुन से वह घृणा करती
है। नियम पूर्वक गर्भाधान होना ही स्त्री के लिये प्रसन्नता और
आनन्द की बात है और इसी मे अत्यन्त खुशी है। रोजाना
कोई स्त्री स्खलित होती ही नहीं, अगर हो तो थोडे काल मे
ही मुरदा होजाती है। इस विषय को विस्तार पूर्वक यहां लिखने
की आवश्यकता नहीं है। दोनो ही स्त्री पुरुष क्षय व राजदमा के
रोगी होजाते हैं। शरीर का सार वीर्य है। रुधिर की सौ बूदों के
समान वीर्य की एक बूद होती है यह बूद एक अनमोल मोती है
इससे शरीर उत्पन्न होता है इसको वरवाद करना अत्यन्त
मूर्खता का काम है।
२१२ आनन्द मन्दिर
इससे रोगी की कमजोरी बराबर होते रहने से स्वास्थ्य को
हानि पहुचने वाले फल पैदा होते है । मैथुन का प्रभाव अवश्य
पट्ठो द्वारा दिमाग तक पहुँचता है और दुर्बल व्यक्ति प्राय
इस आघात से मर भी जाते है । खरगोश स्खलित होने के
पश्चात एक तरफ को गिर पडता है । मैथुन से बल नष्ट होता
है और पट्ठो को आघात पहुचता है। बहु मैथुन से शारीरिक और
आत्मिक बल ओज निकल जाते है इससे आप समझ सकते हैं
कि बहु मैथुन से कैसी हानि होती है, जीवन दायक रत्न का अधि-
कता से निकलते रहना ओर प्रसंग से पैदा हुये पट्ठो की कमजोरी
शरीर का नाश करने वाली है । प्राय सयम से रहने वाले स्त्री
पुरुष भी विवाह होते ही दैनिक मैथुन आरम्भ कर देते हैं और
उस समय तक करते हैं जब तक बीमारी उन्हे विवश नही
कर देती है । वे इलाज करवाते है । वैद्य उनके साधारण रोग का
इलाज करता है बहुमैथुन के विषय मे एक प्रश्न भी नहीं
पूछता और न रोकने के लिये सूचना देता है, रोग प्रतिदिन
बढ़ता ही जाता है । मन्दाग्नि पट्ठो की दुर्बलता, इत्यादि रोग
आराम नही होते है । यदि रोगी किसी ऐसे डाक्टर के पास
जावे जो उसको बता दे कि यह समस्त रोग बहुमैथुन के द्वारा
होगये है तो वह विस्मित होता है । मजबूत आदमी को पहले
पहल बडी भारी खराबी नही होती इस लिये वे समझते हैं कि
इसमे कोई हानि न होगी परन्तु शीघ्र नही तो कुछ दिनो मे
उसको इसका फल जरूर भुगतना पडता है ।
B. K. Mitra
दुग्ध पान आदि । पृ० १२७ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र ३१३
संभोग के लिये अयोग्य पुरुष
अत्याशितोऽधृतिः क्षुद्वान्सव्यथाङ्गः पिपासितः ।
बालो वृद्धोन्यरोगार्त्तस्त्यजेद्रोगी च मैथुनम् ॥
जिसने अत्यन्त भोजन किया हो, धैर्य रहित, भूखा, जिसके
शरीर मे किसी प्रकार का रोग हो प्यासा हो, बालक, बुड्ढा
या रोगी हो ऐसे पुरुष को मैथुन कदापि नही करना चाहिये ।
इसी सम्बन्ध मे दूसरे ऋषि की राय है —
क्षुधितः क्षुब्धचित्तश्च मध्यान्हे तृषितोऽबलः ।
स्थितश्च हानिं शुक्रस्य वायोः कोपं च विन्दति ॥
व्याधितस्यरुजा प्लीहा मूर्छा मृत्युश्च जायते ॥
अर्थात्—जो पुरुष भूखा, क्षोभित चित्त वाला, प्यासा,
बलहीन अर्थात् निर्बल दुर्बल हो उसे तथा मध्यान्ह के समय,
संभोग नही करना चाहिये । यदि करे तो शुक्र की हानि अर्थात्
वीर्य नाश हो, वायु का कोप हो और रोग बढ़े तथा रोग में
कष्ट बढ़े, पीडा अधिक हो । तापतिल्ली तथा मूर्छा रोग हो और
( मृत्युश्च जायते ) मृत्यु भी हो ।
इससे पाठक समझ सकते हैं कि नियम विरुद्ध रतिक्रिया
करने से स्त्री पुरुष दोनो को कितनी हानि पहुँचती है और
सन्तान रोगी निर्बल होती है। महर्षियो के बताए हुए इन नियमों
११४ आनन्द मन्दिर
पर न चलने से ही सैकडा पीछे निन्नानवे पुरुषो मे एक न एक
थोड़ा या बहुत रोग अवश्य होता है ।
आवश्यक सूचना
शास्त्रकारो ने वतलाया है कि विवाह के समय स्त्री की
अवस्था से पुरुष की अवस्था ड्योढी होनी चाहिये इसका उद्देश्य
यह है कि पुरुष की अवस्था अधिक और स्त्री की कम होने से
संभोग मे पुरुष की शक्ति क्षीण नही होती । पुरुष की शक्ति को
पुरुष से कम अवस्था वाली स्त्री खींच नही सकती । यदि स्त्री की
अवस्था पुरुष से अधिक हो तो अधिक अवस्था वाली स्त्री रति-
क्रिया के समय पुरुष की शक्ति को खीच लेती है इसका परिणाम
यह होता है कि पुरुष थोडे ही दिनो मे शक्तिहीन हो जाता है
और स्त्री वलवान है इस कारण उसके कन्याए ही अधिक
उत्पन्न होती हैं क्योकि पुरुष वलवान होने से पुत्र, और स्त्री
वलवान होने से कन्याएं उत्पन्न होती हैं ।
यदि कोई शका करें कि पुरुष की अवस्था अधिक और
स्त्री की कम होते हुए भी कन्याए अधिक होती हैं ? उसका कारण
यह है कि मासिकधर्म होने के वाद सम बिसम दिनों मे
गर्भाधान का विचार न रखने का यह कारण है । स्त्री पुरुषो
के वलावल के साथ समविसम रात्रियो का भी प्रभाव पडता है ।
इसीलिये आयुर्वेद और वेदो तथा धर्मशास्त्रों मे सव मे ही
स्त्री की अवस्था से पुरुष की ड्योढ़ी अवस्था विवाह के समय होनी