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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

१८ विषय सूची
३०७ दुष्ट पुरुषो से ठगीगई परपुरुषरता स्त्री को
यमराज का दण्ड ५०९
३०८ अपने सुख और आराम के लिये सौतेली सन्तान
को कष्ट देने का फल ५०९
३०९ पति का निरादर ५०९
भूल सुधार
पाठक इस तरह सुधार कर पढ़ें
अशुद्ध शुद्ध
पृष्ठ ९१ मे—
एकादशी को कपोल मे एकादशी को गले मे
द्वादशी को गले मे द्वादशी को गालो मे
तेरस को गाल मे तेरस को होठ मे
पृष्ठ २६३ पंक्ति १६ मे
बाद स्खलित होगी पहले स्खलित होगी
चित्र पृष्ठ १९६ मे
वर्षा वहार पृ० १९१ वर्षा वहार पृ० १२२
कहीं कहीं कुछ प्रूफ की और भी भूले रह गई है पाठक
क्षमा करे । अगले संस्करण मे ठीक कर दी जायगी ।

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भूमिका
शम्भु स्वयम्भु हरयो हरिणेक्षणानाम् ।
येनाक्रियन्तसततं गृहकर्मदासाः ॥
वाचामगोचर चरित्र विचित्रताय ।
तस्मै नमो भगवते कुसुमायुधाय ॥ (भर्तृहरि)
जिसने अपने कर्त्तव्य से शिव ब्रह्मा और विष्णु को भी स्त्रियो
के प्रेम के कारण गृहकार्य करने के लिये दास बना रक्खा है
और जो विचित्र चरित्र मे परम चतुर और विलक्षण है। जिसकी
चतुरता का वर्णन नही हो सकता ऐसे भगवान कामदेव को

  • वारम्बार नमस्कार है ।
    कुसुमायुधधारी कामदेव की महिमा अपार है जिस
    समय वह अपना प्रचण्ड वेग धारण करता है उस समय देव-
    ताओं तक की बुद्धि ठिकाने नही रहती वे भी विषयान्ध हो
    जाते हैं ।

३ भूमिका

जब जब कामदेव ने अपना उग्ररूप धारण किया तो
बड़े बड़े योगी और तपस्वी भी उसके वश मे हो गये साधारण
पुरुषो की क्या गिनती है। जो महात्मा विश्व को ब्रह्ममय देखते थे
वे उसे स्त्रीमय देखने लगे। कभी कभी कामदेव ने देवताओ तक
को वह कौतुक दिखलाया कि तमाम ससार काममय हो गया ।
इसमे जाना जासकता है कि—
जब ऐसे ऐसे बलवान् और ज्ञानवान् देवताओ तपस्वियों
महर्षियो और योगिराजो तथा विद्वानो तक को कामदेव ने नाच
नचा दिया और उन्हे स्त्रियो का दास बना दिया तो साधारण
मनुष्यो की क्या गिनती है।
स्त्रिया प्रत्यक्ष रति का स्वरूप और सृष्टि की उन्नति का
मूल कारण है, उन्ही के द्वारा मनुष्य मात्र की उत्पत्ति होती है
इसीलिये विधि ने उनमे सौन्दर्य की विशेषता रक्खी है। उनके
अंग अंग से लावण्यता और मोहकता टपकती है। उनमें वह
आकर्षण होता है जिसकी शक्ति चुम्बक से भी अधिक होती है।
स्त्रीमुद्रां झषकेतनस्य जननीं सर्वार्थसम्पत्करीं ।
येमूढाः प्रविहाययांति कुधियोमिथ्याफलान्वेषिणः ।
अर्थात् स्त्रियां कामदेव की मुद्रा है, वे सब अर्थ और सम्पत्ति
की करने वाली हैं जो मूढ़ कुबुद्धि उन्हे छोड़कर स्वर्गादि की इच्छा
से निकल भागते हैं वे मिथ्याफल के खोजने वाले हैं।
जिस नारी जाति को आज पुरुष उपेक्षा की दृष्टि से देखते
हैं उसकी महिमा शास्त्रकारों ने मुक्त कंठ से गाई है।

नारी महिमा ३
नारी महिमा
द्रष्टव्येषु किमुत्तमं मृगदृशां प्रेमप्रसन्नं मुखं।
घ्रातव्येष्वपि किं तदास्य पवनःश्राव्येषु किं तद्वचः॥
किं स्वाद्येषु तदोष्ठपल्लवरसः स्पृश्येषु किं तत्तनु-
र्ध्येयं किं नवयौवनं सुहृदयैः सर्वत्र तद्विभ्रमः ॥
मनुष्यो के देखने योग्य वस्तुओ मे उत्तम वस्तु क्या है ? मृग-
नयनी स्त्रियों का प्रेम से प्रसन्न वदन (मुख), सूंघने की वस्तु में
उनके मुख की भाफ, सुनने में मधुरवाणी, स्वादिष्ट वस्तु में उनके
अधर पल्लव (ओठो) का रस, स्पर्श की वस्तु मे उनका कोमल
शरीर और ध्यान करने के योग्य उनका यौवन और विलास है ।
स्वपर प्रतार कोऽसौ निन्दति,
योलीक पण्डितो युवतीः ।
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्ग-
स्तस्यापि फलं तथाप्सरसः ॥
जो स्त्रियों की बुराई करता है वह झूठा पण्डित है, आप तो
ठगा ही गया, औरो को भी ठगाता है क्योकि तपस्या का फल
स्वर्ग है और स्वर्ग का फल स्त्री भोग है। अर्थात् स्वर्ग भोग से
भी बढ़कर आनन्द दायक पत्नी का प्रेम है ।

४ भूमिका
सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम
यदि स्त्री के प्रेम मे इतना प्रभाव न होता तो शिव और
श्रीकृष्ण आदि तक इसप्रकार स्त्री के प्रेम मे मग्न न होते। देवता
और बड़े वडे महर्षि तक स्त्रियों का आदर करते थे उनके प्रेम
वन्धन मे बंधे हुए थे। पढ़िये शिव जी के पत्नी मोह की कथा।
सती राजा दक्ष प्रजापतिकी कन्या थीं इनकी सुन्दरता
संसार मे विख्यात थी। सती का विवाह शिव जी के साथ हुआ
था, विवाह के पश्चात् सती कैलाशपति शिव जी के यहां आकर
बड़े आनन्द से रहने लगी।
यद्यपि शिवजी के यहां किसी बात की कमी न थी परन्तु
सती के शरीर पर गेरुए कपड़े और आभूषणों की जगह गले
में रुद्राक्ष की माला, हाथों में भी रुद्राक्ष के आभूषण
सौन्दर्य की शोभा बढा रहे थे। शिवजी और सती मे इतना अधिक
प्रेम था कि एक दूसरे से क्षण भर को भी अलग न होते थे।
एक बार सती के पिता ने बड़ा भारी यज्ञ किया जिसमे
भारत वर्ष भर के धनी निर्धन मूर्ख विद्वान सभी को निमंत्रण दिया
परन्तु अपनी प्यारी पुत्री सती और उनके पति शिवजी को
नहीं बुलाया। जब सती को यह बात नारद जी से मालूम हुई और
यज्ञ का दिन निकट आगया तब एक दिन सती ने अपने पति
शिवजी से पिता के यहाँ जाने की आज्ञा मांगी। शिवजी ने कहा
बिना बुलाए पिता के यहाँ किसी ऐसे उत्सव मे जाना उचित
नहीं है क्योकि उन्होंने समस्त देश के मनुष्यो को निमंत्रण भेजा

श्रीकृष्ण जी का दाम्पत्य-प्रेम ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ५
है, परन्तु हमारा तुम्हारा नाम भी नहीं लिया। यो साधारण समय
में तुम जाना चाहती तो मुझे कोई इनकार न था परन्तु ऐसे समय
में न बुलाना हमलोगों का अपमान करना है, इस समय यदि तुम
बिना बुलाये जाओगी तो तुम्हारा बड़ा अपमान होगा।
तुम्हारे पिता ने हम लोगों का अपमान करने के लिये ही यह यज्ञ
किया है ऐसा मेरा ख्याल है। इस कारण बिना बुलाये तुम जाओगी
तो तुम्हारा अपमान होगा, तुम्हे पछताना पड़ेगा, तुम्हारा अपमान
होने से मेरा अपमान होगा।
सती ने प्रार्थना की कि हे स्वामिन ! पुत्री यदि पिता के यहां
बिना बुलाये भी चली जांय तो अपमान नहीं होता क्योंकि पिता
का घर भी तो अपना ही घर है। पुत्री के लिये पिता निमन्त्रण भेजे
या न भेजे पुत्री को जाने में मेरे विचार से तो कुछ अपमान की
बात नहीं होनी चाहिये ।
इस पर शिवजी ने कहा—इस विषय में अधिक कहने सुनने
की कोई बात नहीं है यदि तुम्हारी इच्छा जाने की ही है तो मैं
मना भी नहीं कर सकता चली जाओ। शिवजी की आज्ञा पाकर
सती ने पिता के घर जाने की तैयारी की। जब चलने लगी तब
शिवजी ने फिर समझाया कि देखो वहां जाकर जो कुछ भी कार्य
करना वह बड़े विचार से करना और समय का हर समय ध्यान
रखना सब कार्य समय का विचार करके करना ।
शिवजी ने सती को समझाया तो खूब परन्तु सती को माता
का स्नेह खींच ले गया क्योकि नारद जी सती से कहगये थे कि

६ भूमिका
"तुम्हें यज्ञ में तुम्हारे पिता ने नही बुलाया इस लिये तुम्हारी
माता ने अन्न जल त्याग दिया है और वे बडी दुःखी हैं" ।
नारद जी के कहने के अनुसार सती ने माता का दुःख
सुनकर जाना ही उचित समझा, इस लिये शिवजी की बात पर
कुछ विशेष ध्यान नही दिया ।
सती अपने पिता के यहा पहुंच गईं। घर में सती की माता
अन्न जल त्याग कर सती के लिये दुःखित पडी रो रही थी ।
माता की यह दशा देखकर सती को भी बडा दुःख हुआ । माता
के निकट जाकर सती ने कहा "माता मैं आगई" ।
सती की आवाज माता के कानो मे पहुची और वह सुनते
ही उठी, सती को हृदय से लगा लिया, माता पुत्री के स्नेह का
प्रेम सागर उमड पडा । दोनों परस्पर हृदय से लगकर रोने
लगीं । माता से मिलकर सती ने पिता से मिलने की इच्छा
प्रकट की । माता ने कहा—नही ! बेटी पिता से इस समय
मिलना उचित नही है क्योकि वे इस समय यज्ञशाला मे हैं। ऐसे
समय वहा तुम्हारा जाना मै भला नही समझती ।
सती को इस बात का बड़ा दुःख था कि पिता ने मुझे
निमंत्रण क्यो नही दिया इसलिये वह पिता से इस बात का
उलाहना देने की धुन मे थी इस कारण उसने एक न सुनी । वह
यज्ञशाला मे पिता के पास पहुच गई ।
सती को देखकर यज्ञशाला मे बैठे हुए सभी ऋषि मुनि
आदिको ने सती को पिता के पास जाने के लिये रास्ता दे दिया

सती ने पिता से जाकर नमस्कार किया फिर चारों ओर देखा तो
यज्ञ में सब देवताओं के भाग थे पर शिव जी का भाग न था ।
सती को देखते ही राजा दक्ष की आंखे सती के ऊपर क्रोध से
लाल होगईं और वे कर्कश स्वर से बोले—सती ! तुझे किसने
बुलाया, तू यहां किस के बुलाने से आई है ?
सती पिता की ऐसी क्रोध युक्त वाणी सुनकर चकित रहगईं
उनको ऐसी आशा स्वप्न में भी न थी उनके हृदय मे पिता के
कठोर वचन वाण की समान लगे और वे दुःखित हो बोलीं
"पिता जी मुझे बुलाया तो किसी ने नहीं परन्तु मैं माता पिता के
स्नेह के कारण स्वयं चली आई क्योंकि मैंने बहुत दिनो से अपनी
प्यारी माता और आपको देखा नहीं था। पिताजी ! आपने मिलने
की बहुत दिनों से मेरी उत्कण्ठा थी, मैंने क्या अपराध किया है
जो आपने अपनी इस प्यारी पुत्री को भुला दिया" ?
"पिताजी ! आप चाहे मुझे भुलादे परन्तु मैं आपकी पुत्री हूं
आपका जो वात्सल्य प्रेम मुझपर रहा है उसे मै कभी स्वप्न मे भी
नही भूल सकती ।"
सती का इस प्रकार पिता से वार्तालाप सुनकर यज्ञशाला
में बैठे हुए सभी ऋषि मुनि बड़े ध्यान और आश्चर्य मे सती की
ओर देखने लगे जिसका हाथ आहुति देने को उठा था वह वैसा,
ही रह गया। सभी अपने अपने कार्य को भुलाकर सती की नम्रता
भरी मधुर वाणी सुनने लगे ।
सती की इस प्रकार की नम्रता युक्त विनय से भी राजा दक्ष
पर कुछ प्रभाव नहीं पड़ा। वे सती से कहने लगे—तेरा यह वहाना

८
भूमिका


मेरे सामने न चलेगा। ऐसा बहाना मैं नही सुन सकता यह उसी
निर्लज्ज को सुनाना जिसके साथ तेरा सम्बन्ध हुआ है।
सती ने कहा—पिताजी ! आप मुझे जो इच्छा हो कहिये
परन्तु आप उन्हे कुछ न कहिये आपके मुह से यह बात शोभा
नहीं देती आप मेरे स्वामी को निर्लज्ज बना रहे हैं ऐसे कटु-
वाक्य मै सुन नहीं सकती ।
राजा दक्ष ने कहा—मै इसमे असत्य क्या कहता हू, तेरा
पति निर्लज्ज तो है ही क्योकि पागल की समान वाघम्बर धारी
अमृत और विष को एक समान समझने वाले को मैंने निर्लज्ज
कहा तो इसमे बुराई क्या है।
सती बोली—पिताजी ! आप उन्हे चाहे जो समझे मेरे तो वे
जीवन सर्वस्व और पूज्य देव है। आप उन्हे ऐसे कटु वाक्य न कहे ।
राजा दक्ष को सती की बात सुनकर बड़ा क्रोध आगया और
वे अपने क्रोध को न संभाल सके। फिर विशेष क्रोध में आकर
वे सती के पति शिवजी को अनेक कटुवाक्य कहने लगे ।
सती ने कहा—पिताजी ! आप को इतना क्रोध मेरे ऊपर क्यों
आरहा है यदि मुझसे जाने अथवा बिना जाने कोई अपराध हो
गया हो तो उसके लिये मैं क्षमा चाहती हू, यदि आप मुझे मेरा
वह अपराध जिसपर आप इतने अप्रसन्न है बतला कर उसका
प्रायश्चित भी बतलादे तो मै उसे करने को अभी तैयार हूं।
राजा दक्ष के होठ क्रोध से कांपने लगे और नेत्र लाल होगये
वे बोले—तेरे अपराध का प्रायश्चित तेरी मृत्यु के सिवाय और

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र
आनन्द मन्दिर
केवल विवाहित स्त्री पुरुषों के लिये
दाम्पत्य प्रेम
और
रतिक्रिया का गुप्तरहस्य
लेखिका
आयुर्वेदिक स्त्री चिकित्सा में भारत विख्यात
श्रीमती यशोदादेवी
प्रथमवार ] [आ) साढ़ेसात रु०

मुद्रक व प्रकाशक
पं० श्रीराम शर्मा
स्त्री शिक्षा पुस्तकालय
कर्नलगंज, प्रयाग

बनिता हितैषी प्रेस
कर्नलगंज, इलाहाबाद

सा नारी धर्मभागिनी । पृ० १५ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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सती और शिव का दाम्पत्य प्रेम ६
कुछ नहीं होसकता, तेरी मृत्यु से ही उस अधम निर्लज्ज शिवका
मेरा सम्बन्ध नष्ट होगा तभी तेरा अपराध क्षमा होगा।
सती को पति के लिये "अधम" शब्द पिता के मुख से
सुनकर इतना अधिक दुःख और हृदय को कष्ट हुआ कि वे मरने
मे तय्यार होकर पितासे कहने लगी—पिता जी! यदि आपको मेरे
प्राणान्त से ही संतोष हो तो मैं तय्यार हूं, मेरे मरने से ही आप
मेरा अपराध क्षमा करने के अभिलाषी है तो मै आपकी आज्ञा
पालन करने को तय्यार हूं।
राजा दक्ष के मुह से एक शब्द भी नहीं निकला। सती
यज्ञशाला मे पद्मासन लगाकर बैठ गई। अपने गेरुवे कपडो
से, जो पहिने थी अपने मुख आदि समस्त शरीर को ढक लिया।
बात की बात मे सती के शरीर से एक प्रचण्ड अग्नि की लपट
निकलकर आकाश मे विलीन होगई। इस भयानक दृश्य को देखकर
यज्ञशाला के सभी ऋषि मुनि आदि अवाक् रहगये। सबके हृदय
दुःख से भर गये। सती के शरीर का अंत होते ही शिवजी के गणो
को यह समाचार मालूम हुआ। उन्होने आकर राजा दक्ष के शरीर
को, यज्ञशाला और राजमहल आदि को नष्ट कर दिया।
सती की मृत्यु का दुःखदाई समाचार पाकर शिवजी को
अपनी प्रिय पत्नी के विछोह का जो दुःख हुआ वह लिखकर सम-
झाना कठिन है। सती का अपने पति शिव जी पर जैसा प्रेम
था उसकी प्रशसा करना व्यर्थ है। पाठक पाठिकाये इसी घटना से
स्वयं समझले कि पिता के मुह मे पति की निन्दा सुनकर सती ने
अपने प्राण त्याग दिये, इससे अधिक प्रेम और क्या होसकता है।

१० भूमिका

जिस प्रकार सती अपने प्रिय पति से प्रेम करती थीं उससे
कहीं अधिक शिव जी का प्रेम सती पर था। शिवजी ने ससुर
के यहाँ पहुँच कर राजा दक्ष की यज्ञशाला में जाकर देखा, हवन
कुण्ड से हवन की सुगन्धि की जगह रक्त और मांस जलने की
दुर्गन्ध आरही थी। राजा दक्ष का शरीर अनेक टुकडों मे इधर उधर
पड़ा हुआ था। राज महलो से हाहाकार की आवाज आरही थी।
शिवजी को अपनी पत्नी सती के मृत शरीर को देखकर बड़ा
दुख हुआ। शिवजी ने अपनी प्यारी पत्नी का मृत शरीर उठाकर
अपने कंधे पर रखलिया और सती के शोक में पागल के समान
पहाड़ो की कंदराओ में फिरने लगे। शिवजी को अपनी प्यारी
पत्नी सती से इतना स्नेह था कि वे उसके मृत शरीर को छोड़ना
ही नही चाहते थे। मृत शरीर को ही देख देखकर उन्हें कुछ
सन्तोष सा होता था।
शिवजी रातदिन सती के मृत शरीर को लिये फिरते थे।
ससार के सभी कार्य भूल कर केवल सती के शरीर को खिलाते
रहते थे और सती के मुख का दर्शन कर संतोप करते थे। शिवजी
के इस प्रकार से रहने से देवताओं को बड़ी चिंता हुई परंतु किसी
का साहस नही था कि शिवजी के पास आकर सती के मृत शरीर को
शिवजी से अलग कराता। इसलिये सब देवताओं ने सभा करके
यह निश्चय किया कि जब तक शिवजी से सती का मृत शरीर
अलग न किया जावेगा तब तक शिव जी का चित्त शांत न
होगा। इस प्रकार सती के शरीर को देवो ने शस्त्रो से टुकड़े टुकड़े
कर डाला। सैकड़ो टुकड़े करके अनेक स्थानों मे भेज दिया जहां

जहा सती के शरीर के टुकड़े गये वहां वहा तीर्थ होगये जो देवी
मठ कहे जाते हैं जैसे ज्वालामुखी, देवीहिंगलाज, विन्ध्यवासिनी
देवी आदि। भारतवर्ष भरमें १०८ देवी के प्रसिद्ध मंदिर हैं।
शिव और सती का दाम्पत्य प्रेम भारत के धर्मग्रंथों अर्थात
भारत के प्राचीन इतिहास में प्रसिद्ध है। उसी दिन से सती धर्म
अर्थात पातिव्रत धर्म की प्रतिष्ठा नी नींव पडी। जो स्त्री पति के
प्रेम के कारण शरीर त्याग करती है वह सती कही जाती है।
और उसकी देश पूजा करता है। भारत की स्त्रियों की पतिभक्ति
जगद्विख्यात है। भारत की स्त्रियां अपने पति की निन्दा सुनकर
अब भी प्राण त्यागने को तैयार होजाती हैं।
पति और पत्नी मे कैसा प्रेम होना चाहिये यह भारत के
प्राचीन ऋषि मुनियों ने और देवताओं ने प्रत्यक्ष दिखला दिया है।
शिवजी का दाम्पत्य प्रेम आदर्श प्रेम है। जबसे पति पत्नी में प्रेम
का अभाव हुआ। पुरुष स्त्रियों का अनादर करने लगे और स्त्रियां
रोगी ही रोगी सन्तान उत्पन्न करने लगीं। पुरुष स्त्री को केवल
विषय वासना की तृप्ति करने तथा विषयाग्नि की शांति का यंत्र
समझ कर अनियम रति क्रिया करने लगे तब से दाम्पत्य प्रेम
और सुख का नाश होगया।
जब से मनगढंत कामशास्त्र कोकशास्त्र आदि की अनेक
गन्दी पुस्तकों का प्रचार हुआ है तब से देखा जाता है स्त्रियो
और पुरुषों की रोगी संख्या दिन प्रति दिन बढती जाती है
और इसी कारण हमारे देश के बालको की रोगी तथा मृत्यु संख्या
अन्य देशों के बालकों की रोगी तथा मृत्यु संख्या से अधिक है।