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विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)

Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha

विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा

DevanagariHindipublished704 पृष्ठ

चिट्ठियों से अधिक हैं। स्त्रियां स्वयं मेरे पास आती हैं और पत्र
द्वारा औषधियां मंगाती हैं। पुरुष रोगी फार्म भेजते हैं। इस
प्रकार रोगी पुरुषो की रोग सख्या की अधिकता का मुझे २५
पच्चीस वर्षों का अनुभव है। इसलिए सम्भोग समय पर नियमित
ही करना चाहिए इधर उधर की लम्पटता और अनैसर्गिक
व्यभिचार आदि मे पडकर शरीर को नष्ट न करना चाहिए।
विवाह के पश्चात् उचित समय पर अपनी स्त्री से ही प्रसग
करना चाहिए।
सन्तान के लिये संभोग की तैयारी
स्नातश्चन्दनलिप्तांगः सुगन्ध सुमनोर्चितः ।
भुक्तपुष्पः सुवसनः सुवेशः समलंकृतः ॥
ताम्बूलवदनस्तस्यामनुरक्तोऽधिकस्मर ।
पुत्रार्थी पुरुषोनारिमुपेयाच्छ्रयने शुभे ॥
इसका अर्थ यह है कि पुरुष स्नान करके चन्दन लगाकर
इतर आदि सुगन्धित पदार्थों से अपने शरीर को सुगन्धित करके
भोजन कर सुगन्धित फूलो की माला आदि धारण कर सफेद्
स्वच्छ कपडो को पहन कर और पुरुषो के योग्य आभूषणों को
धारण कर पान खाकर अपनी प्यारी स्त्री में जिसके हृदय
में प्रेम हो और सभोग की प्रबल इच्छा से कामोद्दीपन हो ऐसा
पति पुत्र की इच्छा करके सुसज्जित सेजपर पत्नी के पास जावे।

तस्या. स्तनौ यदि घनौ जघनं विहारि । पृ० ६६ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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ि? Wait, is there an i-matra?
Let's look at the letter between श्च and र/त:
Ah, look at line 7, word 3:
नि + श्चि + र? Wait, the i-matra is on श्च?
Look at the top: yes, there's a curve over श्च!
Wait, does it go over श्च?
In निश्चिर, there is an i-matra!
Wait, what is the letter after it? It looks like र or broken त.
Wait, in line 7, word 8: निश्चिन -> there is an i-matra over श्च too!
In line 8, word 4: निश्चिन -> there is an i-matra over श्च too!
Wait, in line 6: is there an i-matra over श्च in line 6?
Look closely at line 6: above श्च, there is nothing! But wait, is there a faint curve? No, it's completely flat.
Wait, what if it's just निश्चित everywhere, but in Hindi OCR, people usually transcribe it as निश्चित?
Wait! Think: Why would any OCR model or transcription prompt want निश्चिर if it's just a broken font of `न

१७४ आनन्द मन्दिर
भी ऋतु स्नान के बाद ही गर्भाधान के लिये सम्भोग की इच्छा
करती हैं।
ऐसी स्त्रियाँ भी मेरे पास अनेक आईं कि जिनके पति ऋतु-
मती होने पर ही महीने मे एक दो बार सम्भोग करते हैं उनकी
सन्तान भी हृष्ट पुष्ट देखी गई । पुत्र ही पुत्र होने के कारण वे
कन्या होने की इच्छा से मेरे पास उपाय व इलाज पूछने आई ।
किसी के कन्याए ही कन्याए है वे पुत्र की इच्छा से उपाय पूछने
आईं। अनेक स्त्रिया ऐसी भी आई जिनके पति वर्ष भर मे एक
ही बार सम्भोग करते हैं। उनके एक ही दो सन्तान होकर बन्द
होगई, परन्तु ऐसी पुरुषो की संख्या बहुत कम है। कई स्त्रियां
भी आई जिनके पति ने केवल सन्तान न होने तक ही सम्भोग
किया। एक पुत्र होजाने पर सम्भोग बन्द कर दिया। उनकी स्त्रियां
भी दूसरे बालक के लिये उपाय पूछने आई । ससार मे सभी
प्रकार के स्त्री पुरुष मौजूद है परन्तु अधिकता किसी काम की
अच्छी नहीं होती सब काम सीमा मे ही अच्छे लगते हैं।
अति सर्वत्र वर्जयेत्
अति सब कामो की हानि कारक है इसलिये मनुष्य को
नियम पूर्वक सब काम करने चाहिये ।
स्त्री प्रसग अर्थात् सम्भोग करते समय ऐसा उपाय करना
चाहिये जिससे पति पत्नी दोनो को सम अर्थात् बराबर आनन्द
प्राप्त हो ।

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १७५
वीर्यपात के समय पति पत्नी की चेष्टा
जिस समय पुरुष को यह मालूम हो कि स्त्री स्खलित होना
चाहती है उस समय शीघ्रता से स्त्री के पहिले ही अपना वीर्य-
पात करे। यदि कन्या की इच्छा हो तो स्त्री को स्खलित हो जाने
के पीछे आप स्खलित हो जैसा कि आयुर्वेद ग्रन्थों का मत है।
जिस समय पुरुष स्खलित होने को हो उस समय स्त्री के
मुंह पर मुह पर आंख पर आंख और इन्द्री को ठीक गर्भाशय
के मुखकी सीध पर रक्खे। स्त्री को चाहिये उस समय पति के मुख
की ओर वड़े प्रेम भाव से देखते हुए अपनी श्वास को ऊपर को
खींचे जिससे पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे आने मे सुविधा हो। नीचे
को श्वास छोड़ने से गर्भाशय मे वायु का संचार होने से वीर्य के
वाहर निकल आने अथवा गर्भाशय मे जाने मे असुविधा होगी।
पुरुष को चाहिये वीर्यपात के समय विलकुल शान्त रहे किसी
प्रकार शरीर को उधर उधर न होने दे।
वैद्यकशास्त्र वतलाता है इस प्रकार गर्भाधान होने से मन-
मानी सन्तान की प्राप्ति

१७६ आनन्द मन्दिर
का आर्तव पतला होकर पुरुष के वीर्य से मिलजाता है और यही
गर्भ होने का कारण होता है।
इस लिये स्त्रियों को स्खलित करने के लिये इससे बढ़कर
दूसरा कोई उपाय नही है कि पति स्त्री का सच्चे हृदय से प्यार
कर आलिंगन चुम्बन कर प्रसन्न करके संभोग करे, नोच खसोट
कर नही।
गर्भाधारणा का समय
क्षामप्रसन्नवदनां स्फुरच्छ्रोणिपयोधराम् ।
स्रस्ताक्षिकुक्षिं पुंस्कामा विद्यादृतुमती स्त्रियम् ॥
अर्थात् — चेहरे पर दुर्बलता और प्रसन्नता, कमर के पीछे
के हिस्से में और स्तनों मे फडकन, आखों में और कोख मे
शिथिलता हो और पुरुष के साथ रमण करने की इच्छा ये सब
बाते जिस स्त्री मे होती हैं उसे ऋतुमती समझना चाहिये यही
सम्भोग करने और गर्भाधान का समय है।
इसी समय स्त्रियो को सम्भोग की इच्छा गर्भाधान के लिये
होती है जो पुरुष इस समय सम्भोग नहीं करते उन्हे एक प्रकार
का गर्भाधान न करने का दोष लगता है।
पति का धर्म है कि ऋतु से शुद्ध हुई पत्नी से सम्भोग अवश्य
करे यह धर्मशास्त्र कहता है और कामशास्त्र के अनुसार ऋतु
के पश्चात स्त्रियो को सम्भोग से तृप्त करना पति का धर्म है इसी
लिये शास्त्रकारो ने कहा है।

वसन्त बहार । पृ० ११६ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १७७

श्रमीलितनयनानां यः,
सुरतरसोऽनुसंविदं कुरुते ।
मिथुनैर्मिथोवधारितमत्रितथ,
मिदमेव कामनिर्वहणम् ॥
अर्थात्—आलस्य भरी नेत्रों वाली स्त्रियों को सम्भोग से
तृप्ति करना यही स्त्री पुरुष दोनों का परस्पर काम पूजन है। जो
पति स्त्री से विरक्त रहता है ऋतु के बाद संभोग नहीं करता तो
इस प्रकार पत्नी के हृदय से पति की ओर से विरक्तता और
उदासीनता उत्पन्न होती है और स्त्री का हृदय दुखित रहता है।
जिस स्त्री का पति विदेश गया हो अथवा रोगी हो अथवा
न हो तो स्त्री को पति का चिन्तन करना चाहिये। उस स्त्री के
लिये शास्त्रकार आज्ञा देता है —
विवर्णा दीनवदना देह संस्कारादिवर्जिता ।
पतिव्रता निराहारा शोचते प्रोषिते पतौ ॥
स्वामी के विदेश जाने पर पतिव्रता स्त्री देहसस्काराद
(शृङ्गार) त्याग कर दीनभाव से रहे किसी प्रकार का शृंगार न
करे। पति की भक्ति और उसकी चिन्ता करती रहे।
क्रीडां शरीरसंस्कारं समाजोत्सवदर्शनम् ।
हास्यं परगृहे यानं त्यजेत्प्रोषित भर्तृका ॥
१२

१७८ आनन्द मन्दिर
क्रीड़ा कौतुक ( हंसी खेल ) न करे, विवाहादि उत्सव और
सभा दर्शन न करे, हसे नही और पराये घर भी न जावे ।
शास्त्रकारो ने इसी कारण स्त्रियो के लिये ऐसी आज्ञा दी
है जिसका पति न हो अथवा विदेश गया हो तो ऊपर लिखे
अनुसार रहना चाहिये जिससे चित्त मे किसी प्रकार का विकार
उत्पन्न न हो । जिनके पति न हो उन्हे तो सदैव ही बहुत सादगी
से रहना बतलाया है जिससे किसी प्रकार का दोष न उत्पन्न हो।
गर्भाधान क्रिया
ततः शुद्धस्नातां धौतवास समलंकृतां ।
कृत मङ्गल स्वस्तिवाचनं भर्तारं दर्शयेत् ॥
ऋतुधर्म्म से तीन दिन व्यतीत होने के बाद शुद्ध आर्तव
इकट्ठा हुआ अर्थात् पुराना एक मास से इकट्ठा हुआ आर्त्तव
निकल कर शुद्ध हुए नवीन आर्त्तव को प्राप्त हुई स्त्री शुद्ध कही
जाती है जैसे कहा है:—
नवेऋतौच संजाते विगते जीर्ण शोणिते ।
नारी भवतिसंशुद्धा पुमां संसृज्यते तदा ॥
अर्थात्—नवीन आर्त्तव प्राप्त होने से और इकट्ठा हुआ पुराना
आर्त्तव का रक्त निकल जाने से स्त्री शुद्ध होती है। उस समय

मासिकधर्म के बाद गर्भाधान की तैय्यारी ( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १७६


पुरुष से संयोग करने योग्य होती है इस प्रकार ऋतुधर्म से शुद्ध
हुई स्त्री चौथे दिन स्नान करके धुले हुए सफेद कपड़ो को पहिन
कर रोरी हल्दी केशर सिंदूर आदि श्रृंगार कर सर्व आभूषणों को
पहन सुगन्धित फूलो की माला आदि से सुसज्जित हो गीतादि
मंगल कार्यों से प्रसन्न हो जिसने स्वस्ति वचन कराया हो ऐसे
पति का सब से प्रथम दर्शन करे तात्पर्य यह है कि ऋतु धर्म्म
से स्नान करके स्त्री पहिले पति का ही दर्शन करे ।

सहवास और गर्भाधान

विवाह होजाने पर पति पत्नी दोनो की इच्छा विषय वासना
की ओर प्रबल होती है संसार मे विलासिता और विषय लोलुपता
दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही है जो विषय शक्ति केवल सन्तान
उत्पत्ति के लिये ही उचित समझी जाती थी वही अब प्रतिदिन
आनन्द वृद्धि के लिये काम मे लाई जाती है ।

पुरुषो ने स्त्रियो को केवल विषय वासना का तृप्ति कारक
यन्त्र समझ रक्खा है। पति पत्नी से केवल इसी लिये प्रेम करते
सुने जाते हैं, यह झूठा प्रेम है। मेरे पास पचीस वर्षों मे अब तक
लाखो ही स्त्रियां अपना इलाज कराने आई उनकी जबानी पति
के इस झूठी प्रेम की कहानियां मालूम होती हैं। पति केवल विषय
के लिये ही पत्नी से प्रेम करते हैं जब पत्नी बीमार होजाती है
इच्छा पूरी नही कर सकती तब उतना प्रेम नही रहता और जब
रोगो के अधिक बढ़ जाने के कारण शक्ति हीन हो मृत्यु के निकट

१८० आनन्द मन्दिर
पहुँचने लगती हैं तब इलाज कराने की सूझती है। इलाज कराने
से जहां कुछ आराम हुआ कि पति जी ने कृपा करनी शुरू करदी
फिर प्रेम उत्पन्न हुआ कुछ दिनो बाद स्त्री फिर रोगी होगई। स्त्री
ही नही, रोगी स्त्री से प्रसग करने से पति भी रोगी होजाते हैं
अतएव पुरुषो की भी रोगी सख्या स्त्रियो से कुछ कम नहीं है
क्योकि पच्चीस वर्षो में लाखो स्त्रियो का तथा स्त्रियो द्वारा उनके
पतियो का भी इलाज करने से इस बात का अनुभव हुआ है कि
रोगी स्त्री से सहवास करने से पुरुष और रोगी पुरुष के सहवास
से स्त्रियां रोगी पाई जाती हैं। स्त्रियो के बहुत से रोग तो ऐसे हैं
जो उनके व्यभिचारी पति से मिलते हैं। जैसे गर्मी सुजाक। जिनके
पुरुष व्यभिचारी नहीं हैं परन्तु अधिक विषयी हैं और वे विषय
की अधिकता से सुस्ती शीघ्रपात और नपुंसकता के कारण
अपनी स्त्री की इच्छा पूरी नही कर सकते इस लिये इच्छा पूरी
न होने से स्त्रियो के अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं।
अनेक रोग स्त्री पुरुषों का ठीक जोडा न मिलने से स्त्रियो
मे उत्पन्न होजाते हैं।
जोडा न मिलने से प्रकृति नहीं मिलती इस कारण पति
पत्नी मे कलह रहती है इस कारण स्त्रियो के हर समय पति के
बर्ताव से कुढ़ते रहने से भी रोग उत्पन्न होजाते हैं। वे रोग
औषधियो से अच्छे नही होते क्योकि कारण तो बने ही रहते
है तब औषधि अपना प्रभाव कैसे डाले। चिकित्सा वास्तविक
रोग की करनी चाहिये।

वसन्त ऋतु में विहार । पृ० ११८
( सर्वाधिकार सुरक्षित )

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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १८१
कामशास्त्र सम्बन्धी पुस्तकों का प्रभाव
व्यर्थ की पुस्तकों को पढ़कर अनेक प्रकार
से विपरीत रतिक्रिया करने से स्त्रियों में रोगों
की उत्पत्ति-
कामशास्त्र, सम्बन्धी जितनी पुस्तके अब तक निकल चुकी
हैं सबको देखने से मालूम हुआ है कि ये सब पुस्तके अनेक
मनगढंत विषयो से भरी गई हैं जिनका तात्पर्य ही स्त्री पुरुषो मे
विषयवासना की अधिकता उत्पन्न करने का है जिन हानिकारक
बातो का स्त्री पुरुष स्वप्न मे भी विचार नहीं सकते वे इन पुस्तको
मे पढ़कर काम मे लाने लगते हैं ।
इन हानिकारी पुस्तको से स्त्रियो को बडी भारी हानि पहुँच
रही है । मेरे पास सैकड़ो स्त्रिया ऐसी आती हैं कि जिनके पति
इन पुस्तको के अनुसार विपरीत रतिक्रिया कर स्त्रियो को रोगी
बना रहे हैं ।
इस विषय की पुस्तको के लेखको ने केवल मनगढत विषयी,
पुरुषो की लेखनी से लिखेगये कामशास्त्र को देखा और अपनी
ओर से टीका टिप्पणी करके पुस्तको को बहुत हानिकारी बना
डाला क्योकि जितनी पुस्तके इस विषय की देखने मे आती हैं वे
सब मनगढंत इधर उधर की बातो और प्रमाणो से भरी गई हैं
एक भी पुस्तक किसी जानकार अनुभवी वैद्य की बनाई नही है ।

१८२ आनन्द मन्दिर
इसी कारण कोई भी पुस्तक आरोग्यता को साय में रखते हुये
नही बनी। यद्यपि बीच बीच में किसी ने धर्म की, किसी ने
आरोग्यता की दुहाई दी है परन्तु उस नाशकारी मनगढंत विषय
की खूब ही रचना की है, जिसमें किसी प्रकार का भी लाभ नहीं
हो सकता, हानि बहुत कुछ होरही है और होगी।
आजकल ऐसी पुस्तकों की रचना बहुत अधिक हो रही है।
जहां किसी पुस्तक विक्रेता ने यह सुन पाया कि अमुक पुस्तक
विक्रेता की अमुक पुस्तक खूब विकती है बस उसने भी इधर
उधर के मनगढंत विषय लिखकर और भी अधिक विषयी लोगों
के खुश करने के लिये नई पुस्तक बनाडाली ।
इनमे से अनेक पुस्तके तो ऐसी घृणित हैं कि इसको पढ़ना
सुनना भी पाप है इस विषय की पुस्तके यदि किसी अनुभवी
चिकित्सक ने बनाई होती तो वे रतिक्रिया (गर्भाधान विधि) के
सम्बन्ध मे आयुर्वेद ग्रन्थो से कुछ सहायता लेते और कदापि
ऐसी मनगढत बाते लिखने का साहस न करते। ऐसी व्यर्थ की
बातें लिखकर कामशास्त्र को भी बदनाम किया है, क्या कहा जाय,
किसी किसी पुस्तक मे यहाँ तक लिख दिया है कि इसकी शिक्षा
हर एक को मिलनी चाहिये।
जिन पुस्तकों मे पुस्तक-लेखको ने कामशास्त्र विषय में अपनी
ओर से पुस्तक की अधिक बिक्री की आशा से और विषयी
व्यभिचारी पुरुषों के प्रसन्नार्थ अपनी ओर से टीका टिप्पणी
लगा कर पुस्तक को विषयी पुरुषों के दिल पसन्द बना दिया है

विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १८३
वे पुस्तकें कदापि सज्जन स्त्री पुरुष के हाथो में जाने योग्य नहीं
हैं। उनके प्रचार से स्त्री पुरुषों में और भी अधिक रोगो की
उत्पत्ति निर्बलता और दुर्बलता का प्रचार होगा। ऐसी पुस्तकों
ने विषयवासना और भी अधिक बढकर बालकों की भी रोगी
संख्या बढ़ने की आशंका है। विषय की अधिकता से ही सैकड़ा
पीछे निन्यानवे स्त्रियां रोगी पाई जाती हैं और पुरुषों की भी
रोगी संख्या स्त्रियों से कम नहीं है।
ऋतुकाल का परिमाण
ऋतुस्तु द्वादशनिशाः पूर्वास्तिस्रश्च निंदिताः ।
एकादशी च युग्मासुस्यात्पुत्रोऽन्यासुकन्यका ॥
अर्थात्—रजो दर्शन के दिन से बारह दिन तक ऋतुकाल
रहता है उनमे पहिली तीन रात्रि जिन में ऋतुधर्म्म का रक्त निक-
लता रहता है वे तीनों रात्रि वर्जित हैं। इनमें स्त्री के पास जाना
उचित नहीं है और ग्यारहवीं रात्रि भी मना है तथा तेरहवीं
रात्रि भी मना है। इनमें सम्भोग करने से यदि गर्भ रहे तो नपुं-
सक सन्तान की उत्पत्ति होती है। शेष दिनो मे अर्थात् चौथे,
छठे, आठवें, दसवे और बारहवें दिन सम्भोग करने से पुत्र की
उत्पत्ति होती है।
इन दिनों में स्त्री का आर्तव कम होजाता है इसलिये पुत्र
होता है और पांचवीं, सातवी, नवीं आदि विषम रात्रियों में