विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
व्यभिचार अर्थात् परस्त्रीगमन का परिणाम । पृ० १०४ (सर्वाधिकार सुरक्षित)
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६५
पीत प्रसन्न वदनां प्रक्लिन्नात्म मुखद्विजाम् ।
नरकामः प्रियकथांस्रस्त कुच्यक्षिमूर्द्धजाम् ॥
किसी किसी स्त्री को मासिकधर्म्म तो होता है परन्तु दिख-
लाई नहीं देता उसे “अदृष्टार्तव” कहते हैं। शास्त्रकारों ने ऐसी
ऋतुमती स्त्री के लक्षण ऊपर के श्लोक में इस प्रकार बतलाए हैं:-
अर्थात्—जिस स्त्री का मुख पीला मालूम हो और वह
स्त्री प्रसन्न मुख दिखलाई दे, दांतों के मसूढ़े पसीजते हों और
उसे पुरुष सम्बन्धी तथा विषय सम्बन्धी बातें अच्छी लगें ऐसी
बातों से प्रसन्न और कुछ नेत्र तथा केश शिथिल मालूम
पड़ने लगें उसे ऋतुमती समझना ।
स्फुरद्भुजस्तन श्रोणिनाभ्यूरुज घनस्फिजम् ।
हर्षोत्सुक्यपरां चापि विद्यादृतुमतीं स्त्रियम् ॥
भुजा, स्तन, कमर, नाभि, ऊरु जंघाएं और कूले ये सब
अंग कंपित होने लगें अर्थात् फड़कने लगें और मैथुन करने की
अत्यन्त इच्छा हो, स्त्री के सब लक्षण अदृश्य जो दिखलाई
न दे ऐसे ऋतुधर्म्म होने के हैं। जो इस प्रकार से ऋतुधर्म्म मे
होती हैं उनके मासिकधर्म्म का रक्त दिखलाई नहीं देता परन्तु
वे होती हर महीने हैं।
ऐसी अनेक स्त्रियां मेरे देखने में आई जिनको प्रकट में
मासिकधर्म्म नही होता परन्तु उनमें हर महीने ऊपर लिखे लक्षण
मालूम होते हैं।
१६६ \qquad\qquad आनन्द मन्दिर
इस विषय मे विस्तार पूर्वक लिखा जाये तो ‘पुस्तक , बहुत
बढ़ जावेगी इसलिये यहां प्रसगं वश इस विषय को सूक्ष्म करके
इसलिये लिख दिया। स्त्री मे कामोद्दीपन केवल गर्भाधान के लिये
ऋतु होने पर ही होता है । ऋतु स्नान के बाद जब तक
गर्भाधान का समय रहता हैं तब तक स्त्री की इच्छा सम्भोग के
लिये होती है। गर्भ रह जाने पर फिर इच्छा नही होती परन्तु
जिन पुरुषो ने अधिक प्रसंग करके अपनी स्त्रियो की आदत बिगाड
दी है उनकी इच्छा का कहना ही क्या है। स्त्री की इच्छा हो या
न हो पति जबर्दस्ती गर्भ रह जाने पर भी प्रसग करते ही है।
मैथुनेच्छा की शान्ति
ऋतु स्नान से शुद्ध हुई स्त्री मे यदि गर्भधारण होजावे तो
फिर उसकी सम्भोग की इच्छा शान्त हो जाती है यदि गर्भ न
रहे तो बारह दिन तक इच्छा होती है.—
आयुर्वेद बतलाता है —
नियतेदिवसेतीते संकुचत्यम्बुजं यथा ।
ऋतौव्यतीतेनार्यास्तु योनिः संव्रियते तथा ॥
अर्थात्—जैसे फूलने के पाच सात दिन पीछे कमल स्वय
मुरझा जाता है तथा जैसे दिन मे फूला हुआ कमल सायकाल
को अपने आप ही मुद जाता है उसी प्रकार ऋतु के व्यतीत
हो जाने से अर्थात् बारह रात्रि व्यतीत होजाने पर स्त्री का गर्भा-
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६७
शय संकुचित होजाता है। इसी कारण फिर वह गर्भधारण नहीं
कर सकती और संभोग की भी इच्छा नही करती। जब गर्भाशय
का मुख बन्द होजाता है तब पुरुष का वीर्य गर्भाशय के भीतर
नहीं जा सकता और स्त्री की इच्छा भी नहीं होती। बिना स्त्री
की इच्छा हुए गर्भ रहता ही नहीं।
उचित प्रसंग के लक्षण
जिस भोग के पश्चात आनंद आवे, शरीर मे स्फूर्ति और
नूतन शक्ति प्राप्त हो. शरीर अधिक फुरतीला और काम करने के
योग्य हो, व्यायाम या दिमागी मेहनत की अधिक रुचि हो।
लिंगेन्द्रिय मे थोडी देर पीछे शक्ति और उत्तेजना का अनुभव हो तो
यह समझना चाहिये कि सहवास स्वास्थ्य के नियमानुसार हुआ
है। यदि भोग क्रिया के पीछे थकान, शिर का भारी पन अनुभव
हो तो जान लेना चाहिये कि उचित सीमा उलघन की गई है।
क्यो साहब ? छाती पर हाथ रखकर सच्चे पन से बताइये तो
सही कि आपने इस नियम की पालना की है, फिर आपको सदा
औषधियो की आवश्यकता न रहे तो क्या हो ? दूसरा नियम
अधिकता जानने का यह भी है कि जब तक सच्ची रुचि न हो
सहवास न करे। सच्ची रुचि वह है जो बिना स्त्री के साथ हंसे
खेले, बिना किस्सा कहानियो के सुने, हृदय मे ऐसे विचारो को
बिना लाए अपने आप रुचि उत्पन्न हो और वह रुचि पति को
मैथुन की ओर प्रेरित करे।
:
स्मरण रहे कि थोड़ी सी थकावट और सुस्ती जो थोड़ी देर
के वास्ते जान पड़ती है उस में वेण्तलाली (अधिकता) जाहिर
नहीं होती। न यह अस्वास्थ्यकर होती है। दुग्धादि से वह सुस्ती
भी मिट जाती है। जब भोग के पीछे शिर में दर्द होने लगे तो
यह अत्यन्त दुर्बलता का लक्षण है इन नियमों पर ध्यान करने से
और सोचने विचारने से ज्ञात होगा कि प्रति सैकड़ा ९९ मनुष्य
उचित सीमा से बढ़ कर संभोग करने के कारण कैसे २ रोगों में
फंस रहे हैं। आज कल के दुर्बलों के लिये कुछ महीनों के पश्चात
सीमा अन्त कहा जा सकता है। लाखों स्त्रियों के इलाज से उनकी
जबानी मालूम हुआ है कि विषयी लोग नाना तरह के कष्ट उठाते
हुए भी इतनी देर संताप न कर सकें यह उनकी इच्छा है। परन्तु
चाहिए यह कि स्वास्थ्य ओर आनन्द की ओर पग धरें अथवा रोग
और दुःख की ओर दौड़ते जायें। विषयी पुरुषों के वास्ते जो किसी
की नहीं सुना करते हैं उनमें इतना ही निवेदन है कि महीने में
एक दो बार सन्तान उत्पत्ति के लिये गर्भाधान करें जब कि स्त्री
ऋतुवती होकर शुद्ध हो। अन्यथा शीघ्र ही हाथ मल कर
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ईश्वर भजन । पृ० १११ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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तृतीय खण्ड: कामशास्त्र के व्यावहारिक सिद्धान्त एवं रति-विज्ञान
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विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६६
स्मशान यात्रा की तैयारी करनी पड़ती है इसलिए मैं प्रार्थना
करती हूँ कि बहुत मिर्च, खटाई, बहुत नमक, अधिक उष्ण
वस्तुओं का सेवन करते रहने से भी धातुक्षीणता रोग आदि हो
जाते हैं इस कारण इन्हें अधिक न खाना चाहिये ।
मानसिक—घृणा, भय, शोक आदि से चित्त की रुचि
प्रतिकूल होकर बल और पुष्टी होने पर भी दुर्बलता मालूम होती
है इसका इलाज औषधियों से नहीं होता है इस के अतिरिक्त
इन्द्रियों में अनेक प्रकार के दोष, सुजाक, वादी फरंग इत्यादि
भी धातु की दुर्बलता के कारण हो जाते हैं ।
शुद्ध वीर्य की पहिचान
वीर्य क्षीणता से स्मरणशक्ति घट जाती है, नपुसकता
आजाती है सर्व प्रकार के धर्म्म कार्य करने से वह व्यक्ति पराङ्-
मुख रहता है उसकी सन्तानोत्पादक शक्ति का नाश हो जाता है।
तात्पर्य यह है कि वह मनुष्य निकम्मा हो जाता है ।
सुश्रुत शरीर स्थान अध्याय २ में लिखता है:—
स्फटिकाभंद्रवं स्निग्धं मधुरं मधुगन्धिच ।
शुक्रमिच्छन्ति केचित्तु तैलं क्षौद्रनिभं तथा ॥
अर्थात्— शुद्ध शुक्र स्वच्छ स्फटिक (विलौर कांच) के
समान द्रव (पिघला) चिकना, शहद के समान गन्धवाला
होता है। कोई कोई आचार्य तैल और शहद के सदृश रंग वाले
१७० आनन्द मन्दिर
को शुद्ध शुक्र कहते हैं और शुक्र का स्थान सम्पूर्ण शरीर कहा
गया है। चरक सहिता मे लिखा है।
“रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा”
अर्थात् जैसे ईख मे रस, तिल मे तैल, दही मे घी, सर्वत्र
विद्यमान् रहता है इसी प्रकार इस समस्त शरीर मे वीर्य रहा
करता है—इसलिये इस विषय मे अधिक लिखकर व्यर्थ पुस्तक
वढाना नही चाहती। अव इस वात को यही छोड़ कर अत्यन्त
उपयोगी वातो को जो आप लोगो के लिये लाभकारी है उनका
वर्णन करती हूं। इसे ध्यान से पढ़िये और समझकर फायदा
उठाइये।
स्त्री पुरुषों के रोगों की अधिकता का कारण
वहुधा वर्तमान काल मे वालक से लेकर वृद्ध तक किसी न
किसी रोग मे ग्रस्त पाये जाते है, कोई उसको प्रमेह, कोई
जिरियान के नाम से उच्चारण करते है, और सर्वसाधारण जन
इसी को धातु का पतलापन कहते है। वैद्यक मतानुसार यद्यपि
इसका निदान कारण अधिक प्रसंग, दही, गुण, मांस रस
नवीन अन्न जल आदि का खाना लिखा है परन्तु इसका मूल
कारण स्वभाव विरुद्ध दुष्ट कर्मों से वीर्य का नाश करना
है, वहुतेरे व्यभिचारी अनेक प्रकार के अनैसर्गिक कर्म्म किया
करते है और रात दिन उसी के ध्यान मे मग्न रहते हैं
एव चिन्ता सागर मे ऐसे डूवे रहते है कि उनसे दूसरा कोई
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १७१
कार्य नहीं होता और दिन पर दिन उनका शरीर निर्वल दुर्बल
हो संपूर्ण अच्छे कर्मों से घृणा हो जाती है, उपदंश, मूत्र-
कृच्छ्र (सुजाक) वाघी (वद्) आदि भयानक रोग उत्पन्न होते
हैं जिससे लोक परलोक दोनों मे दुःख ही दुःख भोगना पडता
है। इसलिये दुष्कर्मों से बचने के लिये सव से विनय पूर्वक
निवेदन करने का मैंने साहस किया है। आशा है इससे रोगी
निरोगी स्त्री पुरुष सव वड़ा भारी लाभ उठावेंगे।
उपरोक्त अस्वाभाविक कर्म्म लम्पट लोग तो करते ही हैं,
परन्तु अनैसर्गिक उपाय तो अधिकतर सभ्य कहलाने वाले
विद्यार्थियो, और नवयुवकों मे पाया जाता है। ससर्ग दोष से इस
की ऐसी अधिकता हो रही है कि शिशुकाल ही से इस दुष्कर्म
की शिक्षा पाकर प्राय. ८, ९ वर्ष से ही वालक वालिकाए बुरे कर्म
प्रारम्भ कर देते हैं। इस निन्दित कर्म से जवान होने के पहिले
ही शरीर वलहीन हो जाता है, अनेक रोग घर दवाते हैं
चलते हैं तो पैर कांपते हैं। स्मरण शक्ति घटते घटते पुरुषत्व
नाश हो जाता है, शारीरिक और मानसिक शक्ति विनष्ट हो
जाती है तव उनको पृथ्वी पर जड़ पदार्थवत् होकर जीवन
व्यतीत करना पड़ता है। विचार कर देखिये इसके बुरे अभ्यास
से क्या क्या हानि नही होती। मुझे लाखो स्त्रियो की चिकित्सा
कर उन्ही की जवानी उनके जवान पतियो का हाल मालूम
हुआ है।
पुरुषों की चिट्ठियो की सख्या भी कम नही है ⁷ स्त्रियो की
चिट्ठियों से अधिक हैं। स्त्रियां स्वयं मेरे पास आती हैं और पत्र
द्वारा औषधियां मंगाती हैं। पुरुष रोगी फार्म भेजते हैं। इस
प्रकार रोगी पुरुषो की रोग सख्या की अधिकता का मुझे २५
पच्चीस वर्षों का अनुभव है। इसलिए सम्भोग समय पर नियमित
ही करना चाहिए इधर उधर की लम्पटता और अनैसर्गिक
व्यभिचार आदि मे पडकर शरीर को नष्ट न करना चाहिए।
विवाह के पश्चात् उचित समय पर अपनी स्त्री से ही प्रसग
करना चाहिए।
सन्तान के लिये संभोग की तैयारी
स्नातश्चन्दनलिप्तांगः सुगन्ध सुमनोर्चितः ।
भुक्तपुष्पः सुवसनः सुवेशः समलंकृतः ॥
ताम्बूलवदनस्तस्यामनुरक्तोऽधिकस्मर ।
पुत्रार्थी पुरुषोनारिमुपेयाच्छ्रयने शुभे ॥
इसका अर्थ यह है कि पुरुष स्नान करके चन्दन लगाकर
इतर आदि सुगन्धित पदार्थों से अपने शरीर को सुगन्धित करके
भोजन कर सुगन्धित फूलो की माला आदि धारण कर सफेद्
स्वच्छ कपडो को पहन कर और पुरुषो के योग्य आभूषणों को
धारण कर पान खाकर अपनी प्यारी स्त्री में जिसके हृदय
में प्रेम हो और सभोग की प्रबल इच्छा से कामोद्दीपन हो ऐसा
पति पुत्र की इच्छा करके सुसज्जित सेजपर पत्नी के पास जावे।
तस्या. स्तनौ यदि घनौ जघनं विहारि । पृ० ६६ ( सर्वाधिकार सुरक्षित )
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ि? Wait, is there an i-matra?
Let's look at the letter between श्च and र/त:
Ah, look at line 7, word 3:
नि + श्चि + र? Wait, the i-matra is on श्च?
Look at the top: yes, there's a curve over श्च!
Wait, does it go over श्च?
In निश्चिर, there is an i-matra!
Wait, what is the letter after it? It looks like र or broken त.
Wait, in line 7, word 8: निश्चिन -> there is an i-matra over श्च too!
In line 8, word 4: निश्चिन -> there is an i-matra over श्च too!
Wait, in line 6: is there an i-matra over श्च in line 6?
Look closely at line 6: above श्च, there is nothing! But wait, is there a faint curve? No, it's completely flat.
Wait, what if it's just निश्चित everywhere, but in Hindi OCR, people usually transcribe it as निश्चित?
Wait! Think: Why would any OCR model or transcription prompt want निश्चिर if it's just a broken font of `न
१७४ आनन्द मन्दिर
भी ऋतु स्नान के बाद ही गर्भाधान के लिये सम्भोग की इच्छा
करती हैं।
ऐसी स्त्रियाँ भी मेरे पास अनेक आईं कि जिनके पति ऋतु-
मती होने पर ही महीने मे एक दो बार सम्भोग करते हैं उनकी
सन्तान भी हृष्ट पुष्ट देखी गई । पुत्र ही पुत्र होने के कारण वे
कन्या होने की इच्छा से मेरे पास उपाय व इलाज पूछने आई ।
किसी के कन्याए ही कन्याए है वे पुत्र की इच्छा से उपाय पूछने
आईं। अनेक स्त्रिया ऐसी भी आई जिनके पति वर्ष भर मे एक
ही बार सम्भोग करते हैं। उनके एक ही दो सन्तान होकर बन्द
होगई, परन्तु ऐसी पुरुषो की संख्या बहुत कम है। कई स्त्रियां
भी आई जिनके पति ने केवल सन्तान न होने तक ही सम्भोग
किया। एक पुत्र होजाने पर सम्भोग बन्द कर दिया। उनकी स्त्रियां
भी दूसरे बालक के लिये उपाय पूछने आई । ससार मे सभी
प्रकार के स्त्री पुरुष मौजूद है परन्तु अधिकता किसी काम की
अच्छी नहीं होती सब काम सीमा मे ही अच्छे लगते हैं।
अति सर्वत्र वर्जयेत्
अति सब कामो की हानि कारक है इसलिये मनुष्य को
नियम पूर्वक सब काम करने चाहिये ।
स्त्री प्रसग अर्थात् सम्भोग करते समय ऐसा उपाय करना
चाहिये जिससे पति पत्नी दोनो को सम अर्थात् बराबर आनन्द
प्राप्त हो ।
विवाह विज्ञान-कामशास्त्र १७५
वीर्यपात के समय पति पत्नी की चेष्टा
जिस समय पुरुष को यह मालूम हो कि स्त्री स्खलित होना
चाहती है उस समय शीघ्रता से स्त्री के पहिले ही अपना वीर्य-
पात करे। यदि कन्या की इच्छा हो तो स्त्री को स्खलित हो जाने
के पीछे आप स्खलित हो जैसा कि आयुर्वेद ग्रन्थों का मत है।
जिस समय पुरुष स्खलित होने को हो उस समय स्त्री के
मुंह पर मुह पर आंख पर आंख और इन्द्री को ठीक गर्भाशय
के मुखकी सीध पर रक्खे। स्त्री को चाहिये उस समय पति के मुख
की ओर वड़े प्रेम भाव से देखते हुए अपनी श्वास को ऊपर को
खींचे जिससे पुरुष का वीर्य गर्भाशय मे आने मे सुविधा हो। नीचे
को श्वास छोड़ने से गर्भाशय मे वायु का संचार होने से वीर्य के
वाहर निकल आने अथवा गर्भाशय मे जाने मे असुविधा होगी।
पुरुष को चाहिये वीर्यपात के समय विलकुल शान्त रहे किसी
प्रकार शरीर को उधर उधर न होने दे।
वैद्यकशास्त्र वतलाता है इस प्रकार गर्भाधान होने से मन-
मानी सन्तान की प्राप्ति
१७६ आनन्द मन्दिर
का आर्तव पतला होकर पुरुष के वीर्य से मिलजाता है और यही
गर्भ होने का कारण होता है।
इस लिये स्त्रियों को स्खलित करने के लिये इससे बढ़कर
दूसरा कोई उपाय नही है कि पति स्त्री का सच्चे हृदय से प्यार
कर आलिंगन चुम्बन कर प्रसन्न करके संभोग करे, नोच खसोट
कर नही।
गर्भाधारणा का समय
क्षामप्रसन्नवदनां स्फुरच्छ्रोणिपयोधराम् ।
स्रस्ताक्षिकुक्षिं पुंस्कामा विद्यादृतुमती स्त्रियम् ॥
अर्थात् — चेहरे पर दुर्बलता और प्रसन्नता, कमर के पीछे
के हिस्से में और स्तनों मे फडकन, आखों में और कोख मे
शिथिलता हो और पुरुष के साथ रमण करने की इच्छा ये सब
बाते जिस स्त्री मे होती हैं उसे ऋतुमती समझना चाहिये यही
सम्भोग करने और गर्भाधान का समय है।
इसी समय स्त्रियो को सम्भोग की इच्छा गर्भाधान के लिये
होती है जो पुरुष इस समय सम्भोग नहीं करते उन्हे एक प्रकार
का गर्भाधान न करने का दोष लगता है।
पति का धर्म है कि ऋतु से शुद्ध हुई पत्नी से सम्भोग अवश्य
करे यह धर्मशास्त्र कहता है और कामशास्त्र के अनुसार ऋतु
के पश्चात स्त्रियो को सम्भोग से तृप्त करना पति का धर्म है इसी
लिये शास्त्रकारो ने कहा है।