विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१७० आनन्द मन्दिर
को शुद्ध शुक्र कहते हैं और शुक्र का स्थान सम्पूर्ण शरीर कहा
गया है। चरक सहिता मे लिखा है।
“रस इक्षौ यथा दध्नि सर्पिस्तैलं तिले यथा”
अर्थात् जैसे ईख मे रस, तिल मे तैल, दही मे घी, सर्वत्र
विद्यमान् रहता है इसी प्रकार इस समस्त शरीर मे वीर्य रहा
करता है—इसलिये इस विषय मे अधिक लिखकर व्यर्थ पुस्तक
वढाना नही चाहती। अव इस वात को यही छोड़ कर अत्यन्त
उपयोगी वातो को जो आप लोगो के लिये लाभकारी है उनका
वर्णन करती हूं। इसे ध्यान से पढ़िये और समझकर फायदा
उठाइये।
स्त्री पुरुषों के रोगों की अधिकता का कारण
वहुधा वर्तमान काल मे वालक से लेकर वृद्ध तक किसी न
किसी रोग मे ग्रस्त पाये जाते है, कोई उसको प्रमेह, कोई
जिरियान के नाम से उच्चारण करते है, और सर्वसाधारण जन
इसी को धातु का पतलापन कहते है। वैद्यक मतानुसार यद्यपि
इसका निदान कारण अधिक प्रसंग, दही, गुण, मांस रस
नवीन अन्न जल आदि का खाना लिखा है परन्तु इसका मूल
कारण स्वभाव विरुद्ध दुष्ट कर्मों से वीर्य का नाश करना
है, वहुतेरे व्यभिचारी अनेक प्रकार के अनैसर्गिक कर्म्म किया
करते है और रात दिन उसी के ध्यान मे मग्न रहते हैं
एव चिन्ता सागर मे ऐसे डूवे रहते है कि उनसे दूसरा कोई