विवाह विज्ञान और कामशास्त्र (दाम्पत्य मनोविज्ञान, शारीरिक-मानसिक सामंजस्य एवं सम्पूर्ण विवाह विज्ञान)
Vivah Vigyan Aur Kam Shastra: Dampatya Manovigyan evam Vaidik Vivaha
विवाह विज्ञान शोध पीठ द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविवाह विज्ञान-कामशास्त्र १६५
पीत प्रसन्न वदनां प्रक्लिन्नात्म मुखद्विजाम् ।
नरकामः प्रियकथांस्रस्त कुच्यक्षिमूर्द्धजाम् ॥
किसी किसी स्त्री को मासिकधर्म्म तो होता है परन्तु दिख-
लाई नहीं देता उसे “अदृष्टार्तव” कहते हैं। शास्त्रकारों ने ऐसी
ऋतुमती स्त्री के लक्षण ऊपर के श्लोक में इस प्रकार बतलाए हैं:-
अर्थात्—जिस स्त्री का मुख पीला मालूम हो और वह
स्त्री प्रसन्न मुख दिखलाई दे, दांतों के मसूढ़े पसीजते हों और
उसे पुरुष सम्बन्धी तथा विषय सम्बन्धी बातें अच्छी लगें ऐसी
बातों से प्रसन्न और कुछ नेत्र तथा केश शिथिल मालूम
पड़ने लगें उसे ऋतुमती समझना ।
स्फुरद्भुजस्तन श्रोणिनाभ्यूरुज घनस्फिजम् ।
हर्षोत्सुक्यपरां चापि विद्यादृतुमतीं स्त्रियम् ॥
भुजा, स्तन, कमर, नाभि, ऊरु जंघाएं और कूले ये सब
अंग कंपित होने लगें अर्थात् फड़कने लगें और मैथुन करने की
अत्यन्त इच्छा हो, स्त्री के सब लक्षण अदृश्य जो दिखलाई
न दे ऐसे ऋतुधर्म्म होने के हैं। जो इस प्रकार से ऋतुधर्म्म मे
होती हैं उनके मासिकधर्म्म का रक्त दिखलाई नहीं देता परन्तु
वे होती हर महीने हैं।
ऐसी अनेक स्त्रियां मेरे देखने में आई जिनको प्रकट में
मासिकधर्म्म नही होता परन्तु उनमें हर महीने ऊपर लिखे लक्षण
मालूम होते हैं।