विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
प्रथम खण्ड: कन्या-वर लक्षण एवं विवाह योग्य काल विचार
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J. N. Yadava Proprietor,
Master Khelari Lal & Sons.,
Sanskrit Book Depot, Kachauri Gali Benares City.
Printer:—
N. P. Bharati,
Mahashakti Press, Bulanala, Benares City.
मास्टरमणिमालायाश्चत्वारिंशत्तमो मणिः ( ज्योतिषविभागे १३ )
दैवज्ञप्रवरश्रीकेशवार्कप्रणीतं
विवाहवृन्दावनम् ।
श्री ५ मन्मिथिलेश-धौतवस्त्रप्रतिष्ठित-लब्धस्वर्णपदक-
चौगमानिवासि-काशीस्थसंन्यासिसंस्कृतपाठशालाध्यापक-
ज्यौ० आ० पं०श्रीसीतारामझाकृत-
‘वसन्तलक्ष्मीसमाख्यया’
सरलसंस्कृतभाषाटीकया सहितम् ।
तच्च
काशीस्थ ‘संस्कृत बुक्डिपो’ इत्यस्याध्यक्षैः
‘मास्टर खेलाड़ीलाल ऐण्ड सन्स’ महोदयैः
‘महाशक्ति’ मुद्रणालये
प्रकाशितम् ।
प्रथमावृत्तिः ] संवत् १९९२ [ मूल्यं सपादरूप्यकम्
सर्वाधिकारः सुरक्षितः
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यह बात स्पष्ट है कि शुभ शीलवती स्त्री से ही गृहस्थों को अर्थ, धर्म
और काम की प्राप्ति होती है अर्थात् मर्त्यलोक में रहने पर भी स्वर्ग सदृश
सुख का अनुभव होता है। यदि स्त्री दुःशीला हुई तो नरक से भी अधिक दुःख
भोगना पड़ता है। वह सुशीलता और दुःशीलता (सुभगता और दुर्भगता)
स्त्रियों को विवाह लग्न के अनुसार ही प्राप्त होती है। जो दिव्यदृष्टि पूज्य
महर्षियों ने हमलोगों के उपकारार्थ अपने अपने अनुभवानुसार निश्चित कर
रखा है। इसलिये विवाह लग्न का सम्यक् विचार करना परमावश्यक है।
यद्यपि नारदादि महर्षियों की संहितानुसार वराहमिहिर, राम आदि
आचार्यों ने अपने अपने ग्रन्थों में विवाहसमय का निर्णय किया है,
परञ्च उन ग्रन्थों में किसी किसी स्थलों में मतभेद देखकर दैवज्ञ केशवार्क
ने—इस विवाहवृन्दावन नामक अपने ग्रन्थ में—वैवाहिक तिथि, नक्षत्र,
योग, लग्न और षड्वर्ग आदि समस्त विषयों के सयुक्तिक शुभाशुभत्व
प्रतिपादन करके इस प्रकार सिद्धान्त कर दिया है कि लोगों को वैवाहिक
लग्न स्थिर करने में कोई भी सन्देह नहीं रह सकता है।
वस्तुतः — विवाह वृन्दों (दशविध विवाहों) का अवन (रक्षण)
इसीसे होता है इसलिये इसका अन्वर्थ नाम ‘विवाहवृन्दावन’ रखा गया।
इस ग्रन्थ में पद लालित्य होने पर भी अर्थ काठिन्य है। अतः गणेश
दैवज्ञ ने ‘विवाहदीपिका’ नामक विस्तृत संस्कृत टीका से उक्त काठिन्य को
भी दूर कर दिया है। तथापि अल्प संस्कृतज्ञ लोगों को उससे सन्तोष नहीं
हुआ। अतः काशी के विद्वद्वृन्द प्रेमी सुप्रसिद्ध संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष
“मास्टर खेलाड़ीलाल एण्ड सन्स” महोदय के अनुरोध से मैंने “वसन्त-
लक्ष्मी” नामक संक्षिप्त सरल संस्कृत और सविशेष भाषा टीका बनाई है।
आशा है इसे सहृदयगण अपना कर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे। और
इसमें प्रमादवश दृष्टि दोष या यन्त्रालय के दोष से कहीं कुछ त्रुटि रह
गई हो तो उसे सुधार कर मुझे सूचित करने की अनुकम्पा करेंगे।
स्खलनं गच्छतः क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥ इति ॥
विनीत—
श्रीसीताराम झा चौगमा (सम्प्रति काशी ।)
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भूमिका ।
यह बात स्पष्ट है कि शुभ शीलवती स्त्री से ही गृहस्थों को अर्थ, धर्म
और काम की प्राप्ति होती है अर्थात् मर्त्यलोक में रहने पर भी स्वर्ग सदृश
सुख का अनुभव होता है। यदि स्त्री दुःशीला हुई तो नरक से भी अधिक दुःख
भोगना पड़ता है। वह सुशीलता और दुःशीलता (सुभगता और दुर्भगता)
स्त्रियों को विवाह लग्न के अनुसार ही प्राप्त होती है। जो दिव्यदृष्टि पूज्य
महर्षियों ने हमलोगों के उपकारार्थ अपने अपने अनुभवानुसार निश्चित कर
रखा है। इसलिये विवाह लग्न का सम्यक् विचार करना परमावश्यक है।
यद्यपि नारदादि महर्षियों की संहितानुसार वराहमिहिर, राम आदि
आचार्यों ने अपने अपने ग्रन्थों में विवाहसमय का निर्णय किया है,
परञ्च उन ग्रन्थों में किसी किसी स्थलों में मतभेद देखकर दैवज्ञ केशवार्क
ने—इस विवाहवृन्दावन नामक अपने ग्रन्थ में—वैवाहिक तिथि, नक्षत्र,
योग, लग्न और षड्वर्ग आदि समस्त विषयों के सयुक्तिक शुभाशुभत्व
प्रतिपादन करके इस प्रकार सिद्धान्त कर दिया है कि लोगों को वैवाहिक
लग्न स्थिर करने में कोई भी सन्देह नहीं रह सकता है।
वस्तुतः — विवाह वृन्दों ( दशविध विवाहों ) का अवन ( रक्षण )
इसीसे होता है इसलिये इसका अन्वर्थ नाम 'विवाहवृन्दावन' रखा गया।
इस ग्रन्थ में पद लालित्य होने पर भी अर्थ काठिन्य है। अतः गणेश
दैवज्ञ ने 'विवाहदीपिका' नामक विस्तृत संस्कृत टीका से उक्त काठिन्य को
भी दूर कर दिया है। तथापि अल्प संस्कृतज्ञ लोगों को उससे सन्तोष नहीं
हुआ। अतः काशी के विद्वद्वृन्द प्रेमी सुप्रसिद्ध संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष
“मास्टर खेलाड़ीलाल एण्ड सन्स” महोदय के अनुरोध से मैंने “वसन्त-
लक्ष्मी” नामक संक्षिप्त सरल संस्कृत और सविशेष भाषा टीका बनाई है।
आशा है इसे सहृदयगण अपना कर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे। और
इसमें प्रमादवश दृष्टि दोष या यन्त्रालय के दोष से कहीं कुछ-त्रुटि रह
गई हो तो उसे सुधार कर मुझे सूचित करने की अनुकम्पा करेंगे।
स्खलनं गच्छतः क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥ इति ॥
विनीत—
श्रीसीताराम झा चौगमा ( सम्प्रति काशी । )
॥ श्रीः ॥
समर्पण-
आसील्लोके येन तुल्यो न चान्यः
काश्यां योऽभूत् सर्वमान्यो वदान्यः ।
विद्वद्वर्यो मण्डलीशो यतात्मा
श्रीगोविन्दानन्द-संज्ञो महात्मा ॥ १ ॥
यस्माद् भीता नास्तिका यान्ति दूरं
दृष्ट्वा यद्वन्नागवर्गा मयूरम् ।
साक्षाद् ब्रह्मैवास्तिका यं वन्दन्ति
सर्वे विद्वांसः सदैवानमन्ति ॥ २ ॥
वाराणस्यां येन चैका विशाला
वेदाङ्गानां स्थापिता पाठशाला ।
अन्यत्रान्याश्चापि शाखास्तदीया
जागर्त्यद्याप्यत्र कीर्तिर्यदीया ॥ ३ ॥
कुर्वन् कल्याणानि नित्यं जनानां
संसारेऽस्मिन् यः शतं हायनानाम् ।
जीवन् मुक्तो मोहमात्सर्यहीनः
काश्यामन्ते योऽभवद् ब्रह्मलीनः ॥ ४ ॥
तल्लब्धबोधस्तच्छिष्य-स्तच्छीलगुणसंयुतः ।
जितेन्द्रियः प्रशान्तात्मा ब्रह्मविज्जनैर्नुतः ॥ १ ॥
श्री 'जयेन्द्रपुरी'नाम सतां संन्यासकर्मणाम् ।
मण्डलेशत्वमासाद्य काश्यां विजयते तराम् ॥ २ ॥
यस्योक्तपाठशालायां नित्यं पाठयता मया ।
केशवार्ककृतौ व्याख्या कृता भाषार्थसंयुता ॥ ३ ॥
नाम्ना 'वसन्तलक्ष्मीः' सा भक्त्या तस्मै समर्प्यते ।
नतेन मिथिलावासि-श्रीसीतारामशर्मणा ॥ ४ ॥
विवाहवृन्दावनम्
श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य-महामना-
आशीर्वचन श्लोकः-
श्री १०८ जयेन्द्रपुरीजी महाराज, काशी !
विलसति सुविदेक-पूर्णपात्रा यदमलकीर्तिलता तता जगत्याम् ।
स दद्यात् यतिमण्डलीश्वरोऽयं सुजय-जयेन्द्रपुरी पुरोह काश्याम् ॥
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❊ अथ विवाहवृन्दावनस्थविषयाऽनुक्रमणिका ❊
विषय पृष्ठाङ्क
नक्षत्रशुद्धिप्रकरण ॥१॥
मङ्गलाचरण १
ग्रन्थवैशिष्ट्य २
विवाहविहित नक्षत्र ,,
पूर्वाफाल्गुनी पुष्य की त्याज्यता ३
निज मत से विवाह समय ,,
विवाह में पञ्चशलाका वेध ४
सप्तशलाका वेध ५
चरण वेध ,,
उत्पातादि दोष ६
लत्तादोष ,,
लत्ता दोष का फल ७
एकार्गल दोष ८
अर्गला में अन्य मत ९
पाप से षड्भान्तरित नक्षत्र १०
पादवेध में विशेष ,,
चण्डायुध दोष ११
दुष्ट योगों की वर्ज्य घटी ,,
नक्षत्र दोष १२
पाप मुक्त नक्षत्र शुद्धि ,,
पात दोष ,,
क्रान्तिसाम्य १३
नक्षत्रशुद्धि प्रशंसा ,,
कालमीमांसाप्रकरण ॥२॥
[L2
२ विवाहवृन्दावनस्य-
विषय पृष्ठाङ्क | विषय पृष्ठाङ्क
चतुर्थ द्वादश भाव दोष ३७ | राहु की गति का प्रमाण ५४
जन्मकालिक पापगत नवांश- | केतु की गति "
दोष और परिहार " | भोजराज का मत ५५
दोषान्तर ३८ | शयन से ही देवों का अहोरात्र ,,
| राहुसत्ता में प्रमाणान्तर ५७
लग्नबलप्रकरण ॥५॥ | षड्वर्गप्रकरण ॥८॥
ग्रहों के शुभाशुभ स्थान ३८ |
कर्तरी और जामित्र दोष ४१ | द्वादशभावसाधन ५८
गुरु शुक्र के बाल्यादि दोष " | ग्रहों की भावसन्धिका फल ५६
ग्रहबलोंमें विशेषता ४२ | राशि भाव के भेदमें निर्णय "
इन्द्रमत से कृपणता योग " | स्पष्ट सूर्य साधन प्रकार ६०
| लग्न और सूर्य से इष्टकाल "
चन्द्रबलप्रकरण ॥६॥ | लग्न से कालहोरा ज्ञान ६१
कोई वर का चन्द्रबल नहीं | पापहोराको निष्फलता "
देखता उसमें दोष ४३ | वारप्रवृत्ति ६२
ताराबल ४६ | इष्टकालसे होरेशज्ञान ६३
इसका सिद्धान्त " | अन्यदोष "
| षड्वर्ग कथन ६४
राहुसत्ताप्रकरण ॥७॥ | राशियों के स्वामी ,;
वराहमिहिर का मत ४७ | होरा-द्रेक्काण-द्वादशांश ६५
ग्रहण में राहु की छादकता ४८ | तिथ्यादि सन्धि "
राहु का स्वरूप " | मंगलादि ग्रहों का संक्रान्ति-
प्रतिमास में ग्रहण क्यों नहीं | काल ६६
होता है ४६ | वसन्तादि ऋतुज्ञान "
जातकसंहिता से राहुसत्ता " | ऋतुसन्धि ६७
भौमादिपात में ग्रहत्वाभाव ५० | सन्धि में विवाहफल "
प्रथम सम्पात राहु द्वितीय केतु ,, | दुष्टयोगों की सन्धि में विशेषता ६८
चन्द्रपात और उच्च में | नक्षत्रादि सन्धिघटीमान "
विशेषता ५१ | चान्द्रमाससन्धि ६६
पात ही राहु है ५२ | जन्ममासादि में विवाह निषेध "
उच्च कल्पनामात्र है ५३ | गुणदोषविवेचक की प्रशंसा ७०
राहु की दिनाधिपता क्यों नहीं ,, |
विषयानुक्रमणिका । ३
विषय पृष्ठाङ्क विषय पृष्ठाङ्क
गोधूलिप्रकरण ॥९॥ जामित्र दोष में विशेषता ,,
गोधूलिकाल ७० योगोंका सफलत्व और
गोधूलि के अधिकारी ७१ अफलत्व ९४
गोधूलि में षष्ठ अष्टम ' मिश्रप्रकरण ॥१४॥
चन्द्रजन्य दोषाभाव ,, किस प्रकार की कन्या और
शनि बृहस्पति में गोधूलि किस प्रकार के वर का वरण
में विशेष ७२ करना ९५
मासगोचरप्रकरण ॥१०॥ उद्योग से ही फल की प्राप्ति ९६
सौरचान्द्रमास विचार ७३ खस्थ लोगों का अरिष्ट लक्षण ९७
सौरचान्द्र विरोध में निर्णय ७४ छाया से अरिष्ट लक्षण ९८
गोचर अष्टवर्ग का वलावल ७५ सत्पुरुषलक्षण ,,
गोचर की मुख्यता का दृष्टान्त ७६ कन्यालक्षण १००
[L1
४ विवाहवृन्दावन विषयानुक्रमणिका
━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━
विषय पृष्ठाङ्क | विषय पृष्ठाङ्क
| संक्रान्ति से स्पष्ट सूर्य ११८
· लग्नशुद्धि प्रकरण ॥१७॥ | लग्न साधन ,,
विवाहविहित नक्षत्र ११३ | होरानवांशज्ञान ११९
नक्षत्रशुद्धि ११४ | देशान्तर चरान्तर ,,
लग्न शुद्धि ११५ | कालहोराज्ञान १२०
पलभा और चरखण्ड ११७ | षड्वर्ग ,,
लङ्कोदय और स्वोदय ,, | स्थूल दिनमान साधन ,,
इति विषयानुक्रमणिका ।
॥ श्रीः ॥
विवाहवृन्दावनम् ।
वसन्तलक्ष्मीसहितम् ।
टीकाकारकृतमङ्गलाचरणम् —
श्रीनन्दनन्दनपदे हृदये निधाय रम्ये विहर्तुमनिशं शिशुकौकिलानाम् ।
श्रीकेशवार्करचिते विमले विवाह-वृन्दावने विरचयामि वसन्तलक्ष्मीम् ॥
ग्रन्थकारकृतमङ्गलाचरणम्—
श्रीशार्ङ्गिणोः सृजतु वो नवसन्निवेशः
क्लेशव्ययं चलवलन्नयनाञ्चलश्रीः ।
यत्राञ्चल - ग्रथन - मङ्गल - माचचार
शृङ्गारहारमणिकौस्तुभरश्मिगुम्फः ॥ १ ॥
सं०—श्रीशार्ङ्गिणोः (श्रीश्च शार्ङ्गी चेति श्रीशार्ङ्गिणौ तयोः श्रीशार्ङ्गिणोः
लक्ष्मीनारायणयोः ) स नवसंनिवेशः ( नूतनसङ्गमः ) वः ( युष्माकं )
क्लेशव्ययं ( सुखं ) सृजतु ( करोतु ) । कथंभूतः स नवसंनिवेशः—
चलवलन्नयनाञ्चलश्रीः ( चलाश्च वलन्तश्च नयनाञ्चलाः नेत्रप्रान्तास्तेषां
श्रीःशोभा यस्मिन् स तथोक्तः ) पुनः किंभूतः—यत्र ( यस्मिन् नव-
संनिवेशे ) शृङ्गारहारमणि-कौस्तुभरश्मिगुम्फः ( शृङ्गारहारमणिश्च कौस्तु-
भश्चेति शृङ्गारहारमणि-कौस्तुभौ तयोः रश्मीनां गुम्फः = गुम्फनं-ग्रथनं )
अञ्चलग्रथनमङ्गलं ( अञ्चलयोः ‘प्रावृतवस्त्रप्रान्तयोः’ ग्रथनमेव मङ्गलं
तत् ) आचचार ( आचीर्णवान् = कृतवानित्यर्थः ) ॥ १ ॥
भा०—चलते और लौटते हुए नेत्र प्रान्तों की शोभा है जिसमें ऐसा श्री
( लक्ष्मी ) और नारायण का प्रथम समागम आप लोगों के क्लेश को दूर करै ।
जिस नव समागम में लक्ष्मीजी के शृङ्गार हारस्थित मणि के रश्मि ( किरण ),
और भगवान् नारायण के कौस्तुभमणि के किरण, इन दोनों का गुम्फ ( परस्पर
मिलन ) ही ने अञ्चलग्रथन ( गाँठ बन्धन ) रूप मङ्गलाचरण किया ॥ १ ॥
२ विवाहवृन्दावनम्— [ नक्षत्रशुद्धि-
अथ ग्रन्थस्य वैशिष्ट्यं कथयति—
संवर्ग्य गर्गभृगुभागुरिरैभ्यगीर्भ्यः
सारं वराहमिहिरादिमतानुसारम् ।
स्फारत्स्फुरत्परिमलाढ्यफलं विवाह-
वृन्दावनं विरचयामि विचाररम्यम् ॥ २ ॥
सं० गर्ग-भृगु-भागुरि-रैभ्य-गीर्भ्यः सारं (तत्त्वं) संवर्ग्य (संकलय्य)
वराहमिहिरादिमतानुसारं ( वराहमिहिरादीनां, आदिशब्दात्—श्रीपति-
लल्लाचार्याणां—मतं अनुसरतीति तथोक्तं ) स्फारत्स्फुरत्परिमलाढ्यफलं
( स्फारन्ति-विस्तृतानि, स्फुरन्ति विकसितानि, परिमलाढ्यानि फलानि
‘सदसद्रूपाणि’ यस्मिन् तत्तथोक्तं ) विचाररम्यं ( विचारेण सदसद्विवेकेन
रम्यं मनोहरं, वनपक्षे तु विचारेण—स्त्रीणां पक्षिणां चारेण-संचारेण रम्य-
मिति’ एवं भूतं ) विवाहवृन्दावनं ( विवाहानां वृन्दं अवतीति तथोक्तं )
विरचयामि ॥ २ ॥
भा० — गर्ग, भृगु, भागुरि, रैभ्य इन सब मुनियों के वचनों के तत्त्व संकलन
करके वराहमिहिर, श्रीपति लल्ल आदि आचार्यों के मतानुसार विस्तृत रूप से
विकसित परिमल से युक्त फल है जिसमें इस प्रकार सद्विचारों से रमणीय विवाह-
वृन्दावन नामक ग्रन्थ को मैं बनाता हूँ ॥ २ ॥
अथादौ विवाहविहितनक्षत्राणि कथयति—
ध्रुवानुराधामृगमूलरेवती-करं मघास्वातिरदूषणो गणः ।
रवेरमीना मकरादिषड्गृही करग्रहे मङ्गलकृन्मृगीदृशाम् ॥ ३ ॥
सं०—ध्रुवानुराधामृगमूलरेवतीकरं ( ध्रुवाणि-अनुराधा-मृगशिरा-
मूलं रेवती करो हस्तः एषां समाहारद्वन्द्वे नपुंसकत्वं ) मघा, स्वातिः ‘अयं’
गणः ( एकादशनक्षत्रसमूहः ) ‘यदि’ अदूषणः ( दोषरहितः ) स्यात्
तदा मृगीदृशां ( स्त्रीणां ) करगृहे ( विवाहे ) मङ्गलकृत् स्यात् । तथा च
रवेः ( सूर्यस्य ) अमीना ( मीनरहिता ) मकरादिषड्गृही ( मकरादीनां
षड्गृहाणां समाहारो मकरादिषड्गृही चैत्ररहितमुत्तरायणमित्यर्थः )
मृगीदृशां ( स्त्रीणां ) करग्रहे ( विवाहे ) मङ्गलकृत् भवति ॥ ३ ॥
भा०—ध्रुवसंज्ञक ( तीनों उत्तरा रोहिणी ), अनुराधा, मृगशिरा, मूल,
प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मौसहितम् । ३
रेवती, हस्त, मघा, और स्वाती ये ११ नक्षत्र यदि वेधादि दोषों से रहित हों तो
स्त्रियोंके पाणिग्रहणमें मङ्गलकारक होते हैं । तथा मीनको छोड़कर मकरादि ६
राशियों में ( अर्थात् मकर, कुम्भ, मेष, वृष, मिथुन में ) सूर्य हों तो विवाहमें
मङ्गलकारक होते हैं ॥ ३ ॥
विवाहे पूर्वफाल्गुनीपुष्यौ कैश्चिदुक्तौ तद्दोषं कथयति-
प्राचेतसः प्राह शुभं भगर्क्षं सीता तदूढा न सुखं सिषेवे ।
पुष्यस्तु पुष्यत्यतिकाममेव प्रजापतेराप स शापमस्मात् ॥ ४ ॥
सं०-प्रचेतसोऽपत्यं ( प्राचेतसो मुनिः ) भगर्क्षं ( पूर्वाफाल्गुनी-
नक्षत्रं ) शुभं प्राह, परन्तु तदूढा ( तस्मिन् भगर्क्षे विवाहिता ) सीता
सुखं न सिषेवे, अर्थात् वनवासादि दुःखमेव प्राप्तवती, तस्मात् तत् त्याज्य-
मेव । पुष्यस्तु अतिकामेव पुष्यति (वर्द्धयति ) अस्मात् स ( पुष्यः ) प्रजा-
पतेः ( ब्रह्मणः ) शापं आप प्राप्तवान्, अतः पुष्योऽपि त्याज्य एवेत्यर्थः ॥
भा०-प्राचेतस मुनि ने पूर्वफाल्गुनी को विवाह में शुभ कहा है, परञ्च उसमें
विवाहिता सीता ने सुख का सेवन नहीं किया । तथा पुष्य नक्षत्र तो अत्यन्त
काम को ही बढ़ाता है इसलिये ब्रह्मा ने उसे शाप दिया है । सिद्ध हुआ कि ये
दोनों नक्षत्र विवाह में त्याज्य हैं । इसलिये नारदादि मुनियों ने इन दोनों को
विवाह में विहित नहीं कहा ॥ ४ ॥
विशेष - ब्रह्मपुराणादि में प्रसिद्ध है कि-पार्वतीजी के सौन्दर्य देखकर ब्रह्माजी
मोहित हो गये पश्चात् ज्ञान होने पर उन्होंने विचार किया कि मेरा विवाह पुष्य
नक्षत्र में हुआ था इसी से काम की अधिकता हुई है इसलिये ब्रह्माजी ने पुष्य-
नक्षत्र को शाप देकर विवाह में निषेध कर दिया ॥ ४ ॥
अथ विवाहेऽन्यमतं निरस्य स्वमतमाह—
प्रावृड्वसन्तोर्जसहःकरग्रहः परैरुदाहारि न हारि तन्मतम् ।
रवेरवौसारिणमुत्तरायणं पुरन्ध्रिपाणिग्रहणे परायणम् ॥ ५ ॥
सं०—परैः ( अन्याचार्यैः ) प्रावृड्वसन्तोर्जसहःकरग्रहः ( प्रावृड्-
वर्षा, वसन्तःप्रसिद्धः, ऊर्जः कार्तिकः, सहा मार्गशीर्षः एषु करग्रहः विवाहः)
उदाहारि ( उक्तः ) 'परञ्च' तन्मतं न हारि ( न मनोहरम् ) । यतो रवेः
( सूर्यस्य ) अवैसारिणं ( मीनरहितं ) उत्तरायणं ( मकरादिराशिषट्कमेव )
पुरन्ध्रिपाणिग्रहणे (स्त्रीणां विवाहे) परायणं (श्रेष्ठं, बहुसम्मतत्वात्) ॥५॥
५ विवाहवृन्दावनम् । [ नक्षत्रशुद्धि-
भा०—वात्स्य आदि अन्य आचार्यों ने वर्षा और वसन्त ऋतु, कार्तिक तथा
मार्गशीर्ष विवाह में विहित कहा है । परन्तु उनका यह मत ठीक नहीं है । क्यों
कि मीन को छोड़कर सूर्य का उत्तरायण काल ही स्त्रियों के विवाह में अत्यन्त
श्रेष्ठ है । ऐसा बहुत मुनियों का सम्मत है । अर्थात् अल्पसम्मति होने के कारण
वर्षाऋतु विवाह में त्याज्य है ॥ ५ ॥
अथ विवाहे पञ्चशलाकावेधमाह—
याम्योत्तराः प्रागपराश्च पञ्च द्वे द्वे च रेखे रचयेद्विदिक्षु ।
विदिग्द्वितीयार्गलिताग्नितारः सहाभिजित् तत्र भवेद्भवर्गः ॥ ६ ॥
सं०—पञ्च याम्योत्तराः, पञ्च प्रागपराश्च रेखाः, द्वे द्वे रेखे च
विदिक्षु ( कोणेषु ) रचयेत् । तत्र ( तस्मिन् चक्रे ) विदिग्द्वितीयार्गलिता-
ग्नितारः ( विदिशि द्वितीया 'रेखया'ऽर्गलिता बद्धाऽग्नितारा कृत्तिका
यस्य स तथोक्त
प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ५
सं०—तस्मिन् ( चक्रे ) ग्रहः अभिन्नाग्रगतं ( एकरेखाग्रगतं )
विवाहार्क्षं अशेषमेव ( समस्तमेव ) भिनत्ति ( वेधयति ), 'तत्रापि'
असौम्यवेधः ( पापग्रहवेधः ) स्त्रीपुंसयोः ( कन्यावरयोः ) आयुः हन्ति,
सौम्यव्यधः (शुभग्रहवेधः) शश्वत् (सर्वदा) सुखानि हन्ति ( नाशयति ) ।
भा०—उक्तपञ्चशलाकाचक्र में— जिस रेखा में ग्रह हो उस रेखा के अग्रगत
विवाहविहित सम्पूर्णनक्षत्र को वेधित करता है । उसमें भी पापग्रह कृतवेध
वर कन्या की आयु और शुभग्रहकृत वेध वरकन्या के सुख का नाश करता है ।
अभिजन्मानं, सप्तशलाकावेधं चाह—
वैश्वदैवततुर्लवः श्रवःपञ्चभूलव इहाभिजिन्मितिः ।
अन्यतः परिणयादयं व्यधः सप्तरेखवलये विलोक्यते ॥ ८ ॥
सं०—वैश्वदैवततुर्लवः ( उत्तराषाढ़चतुर्थांशः ) श्रवःपञ्चभूलवः
( श्रवणस्य पञ्चदशांशः ) इह अभिजिन्मितिः स्यात् । अयं व्यधः ( वेध-
विचारः ) परिणयादन्यतः ( विवाहादन्यत्र ) सप्तरेखवेलये ( सप्तशलाके
चक्रे ) विलोक्यते ॥ ८ ॥
भा०—उत्तराषाढ़ के चतुर्थ चरण और श्रवण के आदि में पञ्चदशांश अभिजित्
नक्षत्र का मान है । विवाह से भिन्न शुभकार्यों में यह वेध सप्तशलाका चक्र में
देखा जाता है ॥ ८ ॥ सप्तशलाका चक्र यथा—
कृ रो मृ आ पु पु श्ले
भ —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— म
अ —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— पू
रे —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— उ
उ —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— ह
पू —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— चि
श —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— स्वा
ध —┼──┼──┼──┼──┼──┼──┼— वि
श्र अ उ पू मू ज्ये अ
अथावश्यके चरणवेधं कथयति—
स किल वेधविधिर्द्वितीययोश्चरणयोर्मिथ आदिचतुर्थयोः ।
अशुभविद्धमशेषमुङ् त्यजेत् चरणगं शुभवेधमसंपदि ॥ ६ ॥
६ विवाहवृन्दावनम् । [ नक्षत्रशुद्धि-
सं०-स वेधविधिः द्वितीययोश्चरणयोः तथा आदिचतुर्थयोश्चर-
णयोर्मिथः परस्परं ज्ञेयः । अशुभविद्धं ( पापग्रहविद्धं ) उडु ( नक्षत्रं )
अशेषं ( समस्तं ) त्यजेत् । तथा असम्पदि ( अन्यनक्षत्रालाभे = आव-
श्यके ) शुभवेधं ( शुभग्रहवेधं ) चरणगं ( यस्मिन् चरणे वेधस्तं चरणमेव )
त्यजेत् ॥ ९ ॥
भा०-उपरोक्त वेधविधि द्वितीय और तृतीय चरण में तथा प्रथम और
चतुर्थ चरण में परस्पर समझना । पापग्रहसे वेधित समस्त नक्षत्रको त्याग देना
चाहिये तथा परमावश्यकमें शुभग्रह से विद्ध नक्षत्रके चरणमात्र त्याग करें ॥९॥
अथ दोषान्तराणि कथयति-
यदशुभैर्गतगम्यमधिष्ठितं यदपि च त्रिविधाद्भुतदूषितम् ।
तरणितारकतोऽपि चतुर्दशं तदखिलेपि खलं शुभकर्मणि ॥१०॥
सं०-यत् 'नक्षत्रं' अशुभैः ( पापग्रहैः ) गतं ( मुक्तं ), गम्यं
( भोग्यं ), अधिष्ठितं ( युतं ) यदपि च त्रिविधाद्भुतदूषितं ( त्रिविधैः
दिव्यभौमाऽन्तरिक्षैः अद्भुतैरुत्पातैः दुष्टं ) तरणितारकतः ( सूर्यनक्षत्रतः )
चतुर्दशं तत् अखिलेपि ( समस्तेऽपि ) शुभकर्मणि खलं ( दुष्टं ) स्यात् ।
भा०-पापग्रह जिस नक्षत्र को छोड़ दिया हो, जिसमें जाने वाला हो तथा
जिसमें वर्तमान हो ये तीनों नक्षत्र तथा त्रिविध ( दिव्य भौम, आन्तरिक्ष )
उत्पातों से दूषित नक्षत्र, तथा सूर्य नक्षत्र से १४ वाँ नक्षत्र जो हो ये नक्षत्र सब
शुभकार्यों में अशुभ हैं ॥ १० ॥
अथ लत्तादोषं कथयति-
रविनखैर्मितमर्कविधुन्तुदौ मुनिभिरिन्दुरखण्डलमण्डलः ।
हुतवहाकृतिषड्जिनदन्तिभिः क्षितिसुतादभिलत्तयति ग्रहः ॥११॥
सं०-अर्कविधुन्तुदौ ( सूर्य-राहू ) 'क्रमेण' रविनखैर्मितं ( द्वादशं,
विंशतितमं नक्षत्रं अभि ( सम्मुखं ) लत्तयतः, रविः स्वाक्रान्तात् द्वादशं,
राहुश्च विंशतितमं नक्षत्रं लत्तयतीत्यर्थः । अखण्डलमण्डलः (पूर्णमण्डलः)
इन्दुश्चन्द्रः मुनिभिर्मितं ( सप्तमं ) नक्षत्रं अभि लत्तयति । तथा क्षिति-
सुतात् ( मङ्गलमारभ्य ) ग्रहः 'क्रमेण' हुतवहा-ऽऽकृति-षड्-जिन-दन्तिभि-
र्भितं 'नक्षत्रं' अभि लत्तयति ॥११॥
प्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ७
भा०-सूर्य अपने नक्षत्र से १२ वाँ, और राहु २० वाँ, पूर्ण चन्द्रमा ७ वाँ,
मङ्गल ३ रा, बुध २२ वाँ, बृहस्पति ६ ठा, शुक्र २४ वाँ और शनि ८ वाँ नक्षत्र
को सामने से लत्तित करता है ।।११।।
पूर्वाचार्यैः पृष्ठलत्तनं यदुक्तं तत्कारणं कथयति—
इति सति द्युसदामभिलत्तने यदनुलत्तनमुक्तमृषिव्रजैः ।
तदुडुपश्चिमपूर्वविभागयोरनधिकाधिकदोषविवक्षया ॥१२॥
सं०—इति ( एवं ) द्युसदां (ग्रहाणां ) अभिलत्तने ( सम्मुखलत्तने )
सति ऋषिव्रजैः ( मुनिगणैः ) अनुलत्तनं ( पृष्ठलत्तनं ) यदुक्तं, तत् उडु-
पश्चिमपूर्वविभागयोः (नक्षत्रस्योत्तरार्धपूर्वार्धयोः) अनधिकाधिकदोषविवक्षया
उक्तम् । अर्थात् सम्मुखलत्तने नक्षत्रोत्तरार्धेऽल्पदोषः पूर्वार्धेऽधिकदोषः,
पृष्ठलत्तने नक्षत्रस्योत्तरार्धेऽधिकदोषः, पूर्वार्धेऽल्पदोष इत्यर्थः ॥१२॥
भा०—इस प्रकार ग्रहों के सम्मुखलत्ता होने पर भी मुनिगणों ने जो
पृष्ठलत्ता दोष कहा वह नक्षत्र के उत्तरार्ध और पूर्वार्ध में अल्पाधिक दोष
विवक्षा से ।
अर्थात् लत्तादोष से दूषित सम्पूर्ण नक्षत्र त्याज्य है उसमें भी पृष्ठलत्ता वाले
नक्षत्रों के पूर्वार्ध में अल्प और उत्तरार्ध में अधिक दोष, तथा सम्मुखलत्ता वाले
नक्षत्रों के उत्तरार्ध में अल्प और पूर्वार्ध में अधिक दोष है। इसलिये पूर्वाचार्यों ने
पृष्ठलत्ता भी कहा है। यहाँ ग्रन्थकार ने समस्त नक्षत्र को दूषित समझकर केवल
सम्मुखलत्ता ही कहा ।।१२।।
अथ लत्तादोषस्य फलमाह—
उडुनि निर्दलिते शुभलत्तया न फलमस्ति बलस्य गलत्तया ।
अशुभलत्तितमत्ति तदूढयोर्धनसुतानसुतापकरं परम् ॥१३॥
सं०—उडुनि ( नक्षत्रे ) शुभलत्तया निर्दलिते सति बलस्य गलत्तया
फलं ( नक्षत्रोक्तं शुभं फलं ) नास्ति । अशुभलत्तितं 'नक्षत्रं' तु तदूढयोः
( तत्र विवाहितयोः कन्यावरयोः ) परं असुतापकरं ( प्राणसन्तापद्ं )
भवति, धनसुतान् अत्ति ( खादयति नाशयतीत्यर्थः ) ॥१३॥
भा०—शुभग्रह से लत्तित नक्षत्रों में बल के ह्रास होने के कारण उन
नक्षत्र का शुभ फल नहीं होता है। तथा पापग्रह से लत्तित नक्षत्र में विवाहित
वर कन्या के प्राण का सन्ताप और धन पुत्र का. नाश होता है ॥१३॥