विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मौसहितम् । ३
रेवती, हस्त, मघा, और स्वाती ये ११ नक्षत्र यदि वेधादि दोषों से रहित हों तो
स्त्रियोंके पाणिग्रहणमें मङ्गलकारक होते हैं । तथा मीनको छोड़कर मकरादि ६
राशियों में ( अर्थात् मकर, कुम्भ, मेष, वृष, मिथुन में ) सूर्य हों तो विवाहमें
मङ्गलकारक होते हैं ॥ ३ ॥
विवाहे पूर्वफाल्गुनीपुष्यौ कैश्चिदुक्तौ तद्दोषं कथयति-
प्राचेतसः प्राह शुभं भगर्क्षं सीता तदूढा न सुखं सिषेवे ।
पुष्यस्तु पुष्यत्यतिकाममेव प्रजापतेराप स शापमस्मात् ॥ ४ ॥
सं०-प्रचेतसोऽपत्यं ( प्राचेतसो मुनिः ) भगर्क्षं ( पूर्वाफाल्गुनी-
नक्षत्रं ) शुभं प्राह, परन्तु तदूढा ( तस्मिन् भगर्क्षे विवाहिता ) सीता
सुखं न सिषेवे, अर्थात् वनवासादि दुःखमेव प्राप्तवती, तस्मात् तत् त्याज्य-
मेव । पुष्यस्तु अतिकामेव पुष्यति (वर्द्धयति ) अस्मात् स ( पुष्यः ) प्रजा-
पतेः ( ब्रह्मणः ) शापं आप प्राप्तवान्, अतः पुष्योऽपि त्याज्य एवेत्यर्थः ॥
भा०-प्राचेतस मुनि ने पूर्वफाल्गुनी को विवाह में शुभ कहा है, परञ्च उसमें
विवाहिता सीता ने सुख का सेवन नहीं किया । तथा पुष्य नक्षत्र तो अत्यन्त
काम को ही बढ़ाता है इसलिये ब्रह्मा ने उसे शाप दिया है । सिद्ध हुआ कि ये
दोनों नक्षत्र विवाह में त्याज्य हैं । इसलिये नारदादि मुनियों ने इन दोनों को
विवाह में विहित नहीं कहा ॥ ४ ॥
विशेष - ब्रह्मपुराणादि में प्रसिद्ध है कि-पार्वतीजी के सौन्दर्य देखकर ब्रह्माजी
मोहित हो गये पश्चात् ज्ञान होने पर उन्होंने विचार किया कि मेरा विवाह पुष्य
नक्षत्र में हुआ था इसी से काम की अधिकता हुई है इसलिये ब्रह्माजी ने पुष्य-
नक्षत्र को शाप देकर विवाह में निषेध कर दिया ॥ ४ ॥
अथ विवाहेऽन्यमतं निरस्य स्वमतमाह—
प्रावृड्वसन्तोर्जसहःकरग्रहः परैरुदाहारि न हारि तन्मतम् ।
रवेरवौसारिणमुत्तरायणं पुरन्ध्रिपाणिग्रहणे परायणम् ॥ ५ ॥
सं०—परैः ( अन्याचार्यैः ) प्रावृड्वसन्तोर्जसहःकरग्रहः ( प्रावृड्-
वर्षा, वसन्तःप्रसिद्धः, ऊर्जः कार्तिकः, सहा मार्गशीर्षः एषु करग्रहः विवाहः)
उदाहारि ( उक्तः ) 'परञ्च' तन्मतं न हारि ( न मनोहरम् ) । यतो रवेः
( सूर्यस्य ) अवैसारिणं ( मीनरहितं ) उत्तरायणं ( मकरादिराशिषट्कमेव )
पुरन्ध्रिपाणिग्रहणे (स्त्रीणां विवाहे) परायणं (श्रेष्ठं, बहुसम्मतत्वात्) ॥५॥