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सर्वकोश
विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)

Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan

केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा

DevanagariHindipublished138 पृष्ठ

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पृष्ठ 6

भूमिका ।
यह बात स्पष्ट है कि शुभ शीलवती स्त्री से ही गृहस्थों को अर्थ, धर्म
और काम की प्राप्ति होती है अर्थात् मर्त्यलोक में रहने पर भी स्वर्ग सदृश
सुख का अनुभव होता है। यदि स्त्री दुःशीला हुई तो नरक से भी अधिक दुःख
भोगना पड़ता है। वह सुशीलता और दुःशीलता (सुभगता और दुर्भगता)
स्त्रियों को विवाह लग्न के अनुसार ही प्राप्त होती है। जो दिव्यदृष्टि पूज्य
महर्षियों ने हमलोगों के उपकारार्थ अपने अपने अनुभवानुसार निश्चित कर
रखा है। इसलिये विवाह लग्न का सम्यक् विचार करना परमावश्यक है।
यद्यपि नारदादि महर्षियों की संहितानुसार वराहमिहिर, राम आदि
आचार्यों ने अपने अपने ग्रन्थों में विवाहसमय का निर्णय किया है,
परञ्च उन ग्रन्थों में किसी किसी स्थलों में मतभेद देखकर दैवज्ञ केशवार्क
ने—इस विवाहवृन्दावन नामक अपने ग्रन्थ में—वैवाहिक तिथि, नक्षत्र,
योग, लग्न और षड्वर्ग आदि समस्त विषयों के सयुक्तिक शुभाशुभत्व
प्रतिपादन करके इस प्रकार सिद्धान्त कर दिया है कि लोगों को वैवाहिक
लग्न स्थिर करने में कोई भी सन्देह नहीं रह सकता है।
वस्तुतः — विवाह वृन्दों ( दशविध विवाहों ) का अवन ( रक्षण )
इसीसे होता है इसलिये इसका अन्वर्थ नाम 'विवाहवृन्दावन' रखा गया।
इस ग्रन्थ में पद लालित्य होने पर भी अर्थ काठिन्य है। अतः गणेश
दैवज्ञ ने 'विवाहदीपिका' नामक विस्तृत संस्कृत टीका से उक्त काठिन्य को
भी दूर कर दिया है। तथापि अल्प संस्कृतज्ञ लोगों को उससे सन्तोष नहीं
हुआ। अतः काशी के विद्वद्वृन्द प्रेमी सुप्रसिद्ध संस्कृत पुस्तकालयाध्यक्ष
“मास्टर खेलाड़ीलाल एण्ड सन्स” महोदय के अनुरोध से मैंने “वसन्त-
लक्ष्मी” नामक संक्षिप्त सरल संस्कृत और सविशेष भाषा टीका बनाई है।
आशा है इसे सहृदयगण अपना कर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे। और
इसमें प्रमादवश दृष्टि दोष या यन्त्रालय के दोष से कहीं कुछ-त्रुटि रह
गई हो तो उसे सुधार कर मुझे सूचित करने की अनुकम्पा करेंगे।
स्खलनं गच्छतः क्वापि भवत्येव प्रमादतः ।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥ इति ॥
विनीत—
श्रीसीताराम झा चौगमा ( सम्प्रति काशी । )