विवाह वृन्दावनम् (पं. सीताराम झा ज्योतिष टीका - विवाह संस्कार, अष्टकूट गुण-मिलान एवं मुहूर्त विज्ञान सटीक)
Vivaha Vrindavanam: Vivaha Sanskara, Ashtakuta Guna Milana evam Muhurta Vigyan
केशवार्कमहोदय (टीकाकार: पं. सीताराम झा) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणम् १ ] वसन्तलक्ष्मीसहितम् । ७
भा०-सूर्य अपने नक्षत्र से १२ वाँ, और राहु २० वाँ, पूर्ण चन्द्रमा ७ वाँ,
मङ्गल ३ रा, बुध २२ वाँ, बृहस्पति ६ ठा, शुक्र २४ वाँ और शनि ८ वाँ नक्षत्र
को सामने से लत्तित करता है ।।११।।
पूर्वाचार्यैः पृष्ठलत्तनं यदुक्तं तत्कारणं कथयति—
इति सति द्युसदामभिलत्तने यदनुलत्तनमुक्तमृषिव्रजैः ।
तदुडुपश्चिमपूर्वविभागयोरनधिकाधिकदोषविवक्षया ॥१२॥
सं०—इति ( एवं ) द्युसदां (ग्रहाणां ) अभिलत्तने ( सम्मुखलत्तने )
सति ऋषिव्रजैः ( मुनिगणैः ) अनुलत्तनं ( पृष्ठलत्तनं ) यदुक्तं, तत् उडु-
पश्चिमपूर्वविभागयोः (नक्षत्रस्योत्तरार्धपूर्वार्धयोः) अनधिकाधिकदोषविवक्षया
उक्तम् । अर्थात् सम्मुखलत्तने नक्षत्रोत्तरार्धेऽल्पदोषः पूर्वार्धेऽधिकदोषः,
पृष्ठलत्तने नक्षत्रस्योत्तरार्धेऽधिकदोषः, पूर्वार्धेऽल्पदोष इत्यर्थः ॥१२॥
भा०—इस प्रकार ग्रहों के सम्मुखलत्ता होने पर भी मुनिगणों ने जो
पृष्ठलत्ता दोष कहा वह नक्षत्र के उत्तरार्ध और पूर्वार्ध में अल्पाधिक दोष
विवक्षा से ।
अर्थात् लत्तादोष से दूषित सम्पूर्ण नक्षत्र त्याज्य है उसमें भी पृष्ठलत्ता वाले
नक्षत्रों के पूर्वार्ध में अल्प और उत्तरार्ध में अधिक दोष, तथा सम्मुखलत्ता वाले
नक्षत्रों के उत्तरार्ध में अल्प और पूर्वार्ध में अधिक दोष है। इसलिये पूर्वाचार्यों ने
पृष्ठलत्ता भी कहा है। यहाँ ग्रन्थकार ने समस्त नक्षत्र को दूषित समझकर केवल
सम्मुखलत्ता ही कहा ।।१२।।
अथ लत्तादोषस्य फलमाह—
उडुनि निर्दलिते शुभलत्तया न फलमस्ति बलस्य गलत्तया ।
अशुभलत्तितमत्ति तदूढयोर्धनसुतानसुतापकरं परम् ॥१३॥
सं०—उडुनि ( नक्षत्रे ) शुभलत्तया निर्दलिते सति बलस्य गलत्तया
फलं ( नक्षत्रोक्तं शुभं फलं ) नास्ति । अशुभलत्तितं 'नक्षत्रं' तु तदूढयोः
( तत्र विवाहितयोः कन्यावरयोः ) परं असुतापकरं ( प्राणसन्तापद्ं )
भवति, धनसुतान् अत्ति ( खादयति नाशयतीत्यर्थः ) ॥१३॥
भा०—शुभग्रह से लत्तित नक्षत्रों में बल के ह्रास होने के कारण उन
नक्षत्र का शुभ फल नहीं होता है। तथा पापग्रह से लत्तित नक्षत्र में विवाहित
वर कन्या के प्राण का सन्ताप और धन पुत्र का. नाश होता है ॥१३॥