तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
अध्याय - ६
[ आत्मपरोभयस्थानानि ] अपने में, पर में और दोनों के
विषय में स्थित [ दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनानि ]
दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये
[ असद्वेद्यस्य ] असातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं।
Suffering, sorrow, agony, moaning, injury, and
lamentation, in oneself, in others, or in both, lead
to the influx of karmas which cause unpleasant
feeling.
भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः
शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥
[ भूतव्रत्यनुकम्पा ] प्राणियों के प्रति और व्रतधारियों के प्रति
अनुकम्पा-दया, [ दानसरागसंयमादियोगः ] दान, सराग
संयमादि के योग, [ क्षान्तिः शौचमिति ] क्षमा और शौच,
अर्हन्त भक्ति इत्यादि [ सद्वेद्यस्य ] सातावेदनीय कर्म के
आस्रव के कारण हैं।
Compassion towards living beings in general and
the devout in particular, charity, asceticism with
attachment etc. (i.e. restraint-cum-non-restraint,
involuntary dissociation of karmas without effort,
austerities not based on right knowledge),
contemplation, equanimity, freedom from greed –
these lead to the influx of karmas that cause
pleasant feeling.
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अध्याय - ६
केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥१३॥
[ केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादः ] केवली, श्रुत, संघ, धर्म
और देव का अवर्णवाद करना सो [ दर्शनमोहस्य ]
दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव का कारण है।
Attributing faults to the omniscient, the scriptures,
the congregation of ascetics, the true religion, and
the celestial beings, leads to the influx of faith-
deluding karmas.
कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥१४॥
[ कषायोदयात् ] कषाय के उदय से [ तीव्रपरिणामः ] तीव्र
परिणाम होना सो [ चारित्रमोहस्य ] चारित्र मोहनीय के
आस्रव का कारण है।
Intense feelings induced by the rise of the passions
cause the influx of the conduct-deluding karmas.
बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥१५॥
[ बह्वारम्भपरिग्रहत्वं ] बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह होना
सो [ नारकस्यायुषः ] नरकायु के आस्रव का कारण है।
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अध्याय - ६
Excessive infliction of pain, and attachment cause
the influx of karma which leads to life in the
infernal regions.
माया तैर्यग्योनस्य ॥१६॥
[ माया ] माया-छलकपट [ तैर्यग्योनस्य ] तिर्यंचायु के आस्रव
का कारण है।
Deceitfulness causes the influx of life-karma
leading to the animal and vegetable world.
अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥१७॥
[ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं ] थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रहपन
[ मानुषस्य ] मनुष्य-आयु के आस्रव का कारण हैं।
Slight injury and slight attachment cause the
influx of life-karma that leads to human life.
स्वभावमार्दवं च ॥१८॥
[ स्वभावमार्दवं ] स्वभाव से ही सरल परिणाम होना [ च ]
भी मनुष्यायु के आस्रव का कारण है।
Natural mildness also (leads to the same influx).
87
अध्याय - ६
निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥१९॥
[ निःशीलव्रतत्वं च ] शील और व्रत का जो अभाव है वह
भी [ सर्वेषाम् ] सभी प्रकार की आयु के आस्रव का कारण
है।
Non-observance of the supplementary vows, vows,
etc. causes the influx of life-karmas leading to birth
among all the four kinds of beings (conditions of
existence).
सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि
दैवस्य ॥२०॥
[ सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि ] सरागसंयम,
संयमासंयम, अकामनिर्जरा और बालतप [ दैवस्य ] ये देवायु
के आस्रव के कारण हैं।
Restraint with attachment, restraint-cum-non-
restraint, involuntary dissociation of karmas, and
austerities accompanied by perverted faith, cause
the influx of life-karma leading to celestial birth.
सम्यक्त्वं च ॥२१॥
88
अध्याय - ६
[ सम्यक्त्वं च ] सम्यग्दर्शन भी देवायु के आस्रव का कारण
है अर्थात् सम्यग्दर्शन के साथ रहा हुआ जो राग है वह भी
देवायु के आस्रव का कारण है।
Right belief also (is the cause of influx of life-karma
leading to celestial birth).
योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥२२॥
[ योगवक्रता ] योग में कुटिलता [ विसंवादनं च ] और
विसंवादन अर्थात् अन्यथा प्रवर्तन [ अशुभस्य नाम्नः ] अशुभ
नामकर्म के आस्रव का कारण हैं।
Crooked activities and deception cause the influx of
inauspicious physique-making karmas.
तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥
[ तद्विपरीतं ] उससे अर्थात् अशुभ नामकर्म के आस्रव के जो
कारण कहे उनसे विपरीत भाव [ शुभस्य ] शुभ नामकर्म के
आस्रव का कारण हैं।
The opposites of these (namely straightforward
activity, and honesty or candour) cause the influx of
auspicious physique-making karmas.
89
अध्याय - ६
दर्शनविशुद्धिर्विनयसम्पन्नता शीलव्रतेष्वनतीचारो-
ऽभीक्ष्णज्ञानोपयोगसंवेगौ शक्तितस्त्यागतपसी
साधुसमाधिर्वैयावृत्त्यकरणमर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचन-
भक्तिरावश्यकापरिहाणिर्मार्गप्रभावना
प्रवचनवत्सलत्वमिति तीर्थकरत्वस्य ॥२४॥
[ दर्शनविशुद्धिः ] 1- दर्शनविशुद्धि, [ विनयसम्पन्नता ]
2- विनयसम्पन्नता, [ शीलव्रतेष्वनतीचारः ] 3- शील और
व्रतों में अनतिचार अर्थात् अतिचार का न होना,
[ अभीक्ष्णज्ञानोपयोगः ] 4- निरन्तर ज्ञानोपयोग, [ संवेगः ]
5- संवेग अर्थात् संसार से भयभीत होना,
[ शक्तितस्त्यागतपसी ] 6-7- शक्ति के अनुसार त्याग तथा
तप करना, [ साधुसमाधिः ] 8- साधुसमाधि,
[ वैयावृत्त्यकरणम् ] 9- वैयावृत्त्य करना,
[ अर्हदाचार्यबहुश्रुतप्रवचनभक्तिः ] 10-13- अर्हत्-
आचार्य-बहुश्रुत (उपाध्याय) और प्रवचन (शास्त्र) के प्रति
भक्ति करना, [ आवश्यकापरिहाणिः ] 14- आवश्यक में
हानि न करना, [ मार्गप्रभावना ] 15- मार्ग प्रभावना और
[ प्रवचनवत्सलत्वम् ] 16- प्रवचन-वात्सल्य [ इति
तीर्थकरत्वस्य ] ये सोलह भावना तीर्थंकर-नामकर्म के आस्रव
का कारण हैं।
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अध्याय - ६
The influx of Tīrthaṁkara name-karma is caused
by these sixteen observances, namely, purity of
right faith, reverence, observance of vows and
supplementary vows without transgressions,
ceaseless pursuit of knowledge, perpetual fear of
the cycle of existence, giving gifts (charity),
practising austerities according to one’s capacity,
removal of obstacles that threaten the equanimity
of ascetics, serving the meritorious by warding off
evil or suffering, devotion to omniscient lords, chief
preceptors, preceptors, and the scriptures, practice
of the six essential daily duties, propagation of the
teachings of the omniscient, and fervent affection
for one’s brethren following the same path.
परात्मनिन्दाप्रशंसे सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च
नीचैर्गोत्रस्य ॥२५॥
[ परात्मनिंदाप्रशंसे ] दूसरे की निंदा और अपनी प्रशंसा करना
[ सदसद्गुणोच्छादनोद्भावने च ] तथा प्रगट गुणों को छिपाना
और अप्रगट गुणों को प्रसिद्ध करना सो [ नीचैर्गोत्रस्य ] नीच
गोत्रकर्म के आस्रव का कारण हैं।
Censuring others and praising oneself, concealing
good qualities present in others and proclaiming
noble qualities absent in oneself, cause the influx of
karmas which lead to low status.
91
अध्याय - ६
तद्विपर्ययौ नीचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ चोत्तरस्य ॥२६॥
[ तद्विपर्ययः ] उस नीच गोत्रकर्म के आस्रव के कारणों से
विपरीत अर्थात् परप्रशंसा, आत्मनिंदा इत्यादि [ च ] तथा
[ नोचैर्वृत्त्यनुत्सेकौ ] नम्र वृत्ति होना तथा मद का अभाव -
सो [ उत्तरस्य ] दूसरे गोत्रकर्म अर्थात् उच्च गोत्रकर्म के
आस्रव का कारण हैं।
The opposites of those mentioned in the previous
sutra, and humility and modesty, cause the influx
of karmas which determine high status.
विघ्नकरणमन्तरायस्य ॥२७॥
[ विघ्नकरणम् ] दान, लाभ, भोग, उपभोग तथा वीर्य में
विघ्न करना सो [ अन्तरायस्य ] अन्तराय कर्म के आस्रव का
कारण हैं।
Laying an obstacle is the cause of the influx of
obstructive karmas.
॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे षष्ठोऽध्यायः ॥
92
अध्याय - ७
अथ सप्तमोऽध्यायः
The Five Vows
हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिर्व्रतम् ॥१॥
[ हिंसाऽनृतस्तेयाब्रह्मपरिग्रहेभ्यो विरतिः ] हिंसा, झूठ, चोरी,
मैथुन और परिग्रह अर्थात् पदार्थों के प्रति ममत्वरूप परिणमन
- इन पाँच पापों से (बुद्धिपूर्वक) निवृत्त होना सो [ व्रतम् ]
व्रत है।
Desisting from injury, falsehood, stealing,
unchastity, and attachment, is the (fivefold) vow.
देशसर्वतोऽणुमहती ॥२॥
व्रत के दो भेद हैं - [ देशतः अणुः ] उपरोक्त हिंसादि पापों
का एकदेश त्याग करना सो अणुव्रत और [ सर्वतः महती ]
सर्वदेश त्याग करना सो महाव्रत है।
(The vow is of two kinds), small and great, from its
being partial and complete.
तत्स्थैर्यार्थं भावनाः पञ्च पञ्च ॥३॥
[ तत्स्थैर्यार्थं ] उन व्रतों की स्थिरता के लिये [ भावनाः पञ्च
पञ्च ] प्रत्येक व्रत की पाँच-पाँच भावनायें हैं।
किसी वस्तु का बार बार विचार करना सो भावना है।
93
अध्याय - ७
For the sake of strengthening the vows, there are
five observances¹ for each of these.
वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपान-
भोजनानि पञ्च ॥४॥
[ वाङ्मनोगुप्तीर्यादाननिक्षेपणसमित्यालोकितपानभोजनानि ]
वचनगुप्ति- वचन को रोकना, मनगुप्ति- मन की प्रवृत्ति को
रोकना, ईर्या समिति- चार हाथ जमीन देखकर चलना,
आदाननिक्षेपण समिति- जीवरहित भूमि देखकर सावधानी से
किसी वस्तु को उठाना धरना और आलोकितपानभोजन-
देखकर-शोधकर, भोजन-पानी ग्रहण करना [ पञ्च ] ये पाँच
अहिंसा व्रत की भावनायें हैं।
Control of speech, control of thought, regulation of
movement, care in taking and placing things or
objects, and examining food or drink, are five.
क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानान्यनुवीचिभाषणं
च पञ्च ॥५॥
¹ Bhāvanā is generally rendered as contemplation or meditation.
But from what follows ‘observance’ may be taken as a better
rendering.
94
अध्याय - ७
[ क्रोधलोभभीरुत्वहास्यप्रत्याख्यानानि ] क्रोधप्रत्याख्यान,
लोभप्रत्याख्यान, भीरुत्वप्रत्याख्यान, हास्यप्रत्याख्यान अर्थात्
क्रोध का त्याग करना, लोभ का त्याग करना, भय का त्याग
करना, हास्य का त्याग करना [ अनुवीचिभाषणं च ] और
शास्त्र की आज्ञानुसार निर्दोष वचन बोलना [ पञ्च ] ये पाँच
सत्यव्रत की भावनायें हैं।
Giving up anger, greed, cowardice or fearfulness,
and jest, and speaking harmless words are five.
शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः पञ्च ॥६॥
[ शून्यागारविमोचितावासपरोपरोधाकरणभैक्ष्यशुद्धि-
सधर्माविसंवादाः ] शून्यागारवास- पर्वतों की गुफा, वृक्ष की
पोल इत्यादि निर्जन स्थानों में रहना, विमोचितावास- दूसरों के
द्वारा छोड़े गये स्थान में निवास करना, किसी स्थान पर रहते
हुये दूसरों को न हटाना तथा यदि कोई अपने स्थान में आवे
तो उसे न रोकना, शास्त्रानुसार भिक्षा की शुद्धि रखना और
साधर्मियों के साथ यह मेरा है-यह तेरा है ऐसा क्लेश न
करना [ पञ्च ] ये पाँच अचौर्यव्रत की भावनायें हैं।
95
अध्याय ६: आस्रव तत्व व कर्म बन्ध के कारण
अध्याय - ७
Residence in a solitary place, residence in a
deserted habitation, causing no hindrance to
others, acceptance of clean food, and not
quarrelling with brother monks, are five.
—————
स्त्रीरागकथाश्रवणतन्मनोहरांगनिरीक्षणपूर्वरतानुस्मरण-
वृष्येष्टरसस्वशरीरसंस्कारत्यागाः पञ्च ॥७॥
[ स्त्रीरागकथाश्रवणत्यागः ] स्त्रियों में राग बढ़ाने वाली कथा
सुनने का त्याग, [ तन्मनोहरांगनिरीक्षणत्यागः ] उनके मनोहर
अंगों को निरखकर देखने का त्याग, [ पूर्वरतानुस्मरणत्यागः ]
अव्रत अवस्था में भोगे हुए विषयों के स्मरण का त्याग,
[ वृष्येष्टरसत्यागः ] कामवर्धक गरिष्ठ रसों का त्याग और
[ स्वशरीरसंस्कारत्यागः ] अपने शरीर के संस्कारों का त्याग
[ पञ्च ] ये पाँच बह्मचर्य व्रत की भावनायें हैं।
Giving up listening to stories that excite
attachment for women, looking at the beautiful
bodies of women, recalling former sexual pleasure,
delicacies stimulating amorous desire, and
adornment of the body, constitutes five.
—————
96
अध्याय - ७
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥८॥
[ मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि ] स्पर्शन आदि
पाँचों इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषयों के प्रति राग-द्वेष का
त्याग करना [ पञ्च ] सो पाँच परिग्रहत्यागव्रत की भावनायें हैं।
Giving up attachment and aversion for agreeable
and disagreeable objects of the five senses
constitutes five.
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥९॥
[ हिंसादिषु ] हिंसा आदि पाँच पापों से [ इह अमुत्र ] इस
लोक में तथा परलोक में [ अपायावद्यदर्शनम् ] नाश की
(दुःख, आपत्ति, भय तथा निंद्यगति की) प्राप्ति होती है -
ऐसा बारम्बार चिन्तवन करना चाहिये।
The consequences of violence etc. are calamity and
reproach in this world and in the next.
दुःखमेव वा ॥१०॥
[ वा ] अथवा ये हिंसादिक पाँच पाप [ दुःखमेव ] दुःखरूप
ही हैं - ऐसा विचारना।
Or sufferings only (result from injury etc.).
97
अध्याय - ७
मैत्रीप्रमोदकारुण्यमाध्यस्थानि च सत्त्वगुणाधिक-
क्लिश्यमानाविनेयेषु ॥११॥
[ सत्त्वेषु मैत्री ] प्राणीमात्र के प्रति निर्वैर बुद्धि [ गुणाधिकेषु
प्रमोदं ] अधिक गुणवानों के प्रति प्रमोद (हर्ष)
[ क्लिश्यमानेषु कारुण्यं ] दुःखी-रोगी जीवों के प्रति करुणा
और [ अविनेयेषु माध्यस्थ्यं ] हठाग्रही मिथ्यादृष्टि जीवों के
प्रति माध्यस्थ भावना - ये चार भावना अहिंसादि पाँच व्रतों
की स्थिरता के लिये बारम्बार चिन्तवन करने योग्य हैं।
Benevolence towards all living beings, joy at the
sight of the virtuous, compassion and sympathy for
the afflicted, and tolerance towards the insolent
and ill-behaved.
जगत्कायस्वभावौ वा संवेगवैराग्यार्थम् ॥१२॥
[ संवेगवैराग्यार्थम् ] संवेग अर्थात् संसार का भय और वैराग्य
अर्थात् राग-द्वेष का अभाव करने के लिये
[ जगत्कायस्वभावौ वा ] क्रम से संसार और शरीर के
स्वभाव का चिन्तवन करना चाहिये।
Or the nature of mundane existence (the universe)
and the body (may also be contemplated) in order
to cultivate awe at the misery of worldly existence
and detachment to worldly things.
98
अध्याय - ७
प्रमत्तयोगात्प्राणव्यपरोपणं हिंसा ॥१३॥
[ प्रमत्तयोगात् ] कषाय-राग-द्वेष अर्थात् अयत्नाचार
(असावधानी-प्रमाद) के सम्बन्ध से अथवा प्रमादी जीव के
मन-वचन-काय योग से [ प्राणव्यपरोपणं ] जीव के
भाव-प्राण का, द्रव्य-प्राण का अथवा इन दोनों का वियोग
करना सो [ हिंसा ] हिंसा है।
The severance of vitalities out of passion is injury.
असदभिधानमनृतम् ॥१४॥
प्रमाद के योग से [ असदभिधानं ] जीवों को दुःखदायक
अथवा मिथ्यारूप वचन बोलना सो [ अनृतम् ] असत्य है।
Speaking what is not commendable is falsehood.
अदत्तादानं स्तेयम् ॥१५॥
प्रमाद के योग से [ अदत्तादानं ] बिना दी हुई किसी भी
वस्तु को ग्रहण करना सो [ स्तेयम् ] चोरी है।
Taking anything that is not given is stealing.
99
अध्याय - ७
मैथुनमब्रह्म ॥१६॥
[ मैथुनमब्रह्म ] जो मैथुन है सो अब्रह्म अर्थात् कुशील है।
मूर्च्छा परिग्रहः ॥१७॥
[ मूर्च्छा परिग्रहः ] जो मूर्च्छा है सो परिग्रह है।
निश्शल्यो व्रती ॥१८॥
[ व्रती ] व्रती जीव [ निःशल्यः ] शल्य रहित ही होता है।
अगार्यनगारश्च ॥१९॥
[ अगारी ] अगारी अर्थात् सागार (गृहस्थ) [ अनगारः च ]
और अनगार (गृहत्यागी भावमुनि) इस प्रकार व्रती के दो भेद
हैं।
नोट- निश्चय सम्यग्दर्शन-ज्ञानपूर्वक महाव्रतों को पालने वाले
मुनि अनगारी कहलाते हैं और देशव्रत को पालने वाले श्रावक
सागारी कहलाते हैं।
100
अध्याय - ७
The householder and the homeless ascetic are the
two kinds of votaries.
अणुव्रतोऽगारी ॥२०॥
[ अणुव्रतः ] अणुव्रत अर्थात् एकदेश व्रत पालनेवाले
सम्यग्दृष्टि जीव [ अगारी ] सागार कहे जाते हैं।
One who observes the small vows is a householder.
दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिकप्रोषधोपवासोपभोग-
परिभोगपरिमाणातिथिसंविभागव्रतसंपन्नश्च ॥२१॥
[ च ] और फिर वे व्रत [ दिग्देशानर्थदण्डविरतिसामायिक-
प्रोषधोपवासोपभोगपरिभोगपरिमाणातिथिसंविभाग-
व्रतसंपन्नः ] दिग्व्रत, देशव्रत तथा अनर्थदण्डव्रत ये तीन
गुणव्रत और सामायिक, प्रोषधोपवास, उपभोग-परिभोग
परिमाण (मर्यादा) तथा अतिथिसंविभागव्रत ये चार शिक्षाव्रत
सहित होते हैं अर्थात् व्रतधारी श्रावक पाँच अणुव्रत, तीन
गुणव्रत और चार शिक्षाव्रत, इन बारह व्रतों सहित होता है।
101
अध्याय - ७
Abstaining from activity with regard to directions,
country, and purposeless sin, periodical
concentration, fasting at regular intervals, limiting
consumable and non-consumable things, and
partaking of one’s food after feeding an ascetic, are
the minor or supplementary vows.
मारणान्तिकीं सल्लेखनां जोषिता ॥२२॥
व्रतधारी श्रावक [ मारणान्तिकीं ] मरण के समय होने वाली
[ सल्लेखनां ] सल्लेखना को [ जोषिता ] प्रीतिपूर्वक सेवन
करें।
The householder courts voluntary death at the end
of his life.
शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः
सम्यग्दृष्टेरतीचाराः ॥२३॥
[ शंकाकांक्षाविचिकित्साऽन्यदृष्टिप्रशंसासंस्तवाः ] शंका,
कांक्षा, विचिकित्सा, अन्यदृष्टि की प्रशंसा और अन्यदृष्टि का
संस्तव - ये पाँच [ सम्यग्दृष्टेः अतिचाराः ] सम्यग्दर्शन के
अतिचार हैं।
102
अध्याय - ७
Doubt in the teachings of the Jina, desire for
worldly enjoyment, repugnance or disgust at the
afflicted, admiration for the knowledge and conduct
of the wrong believer, and praise of wrong
believers, are the five transgressions of the right
believer.
व्रतशीलेषु पञ्च पञ्च यथाक्रमम् ॥२४॥
[ व्रतशीलेषु ] व्रत और शीलों में भी [ यथाक्रमं ] अनुक्रम
से प्रत्येक में [ पञ्च पञ्च ] पाँच-पाँच अतिचार हैं।
There are five, five transgressions respectively for
the vows and the supplementary vows.
बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ॥२५॥
[ बन्धवधच्छेदातिभारारोपणान्नपाननिरोधाः ] बन्ध, वध,
छेद, अधिक भार लादना और अन्न-पान का निरोध करना -
ये पाँच अहिंसाणुव्रत के अतिचार हैं।
Binding, beating, mutilating limbs, overloading,
and withholding food and drink.
103
अध्याय - ७
मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार-
साकारमन्त्रभेदाः ॥२६॥
[ मिथ्योपदेशरहोभ्याख्यानकूटलेखक्रियान्यासापहार-
साकारमन्त्रभेदाः ] मिथ्या उपदेश, रहोभ्याख्यान,
कूटलेखाक्रिया, न्यासापहार और साकारमन्त्रभेद - ये पाँच
सत्याणुव्रत के अतिचार हैं।
Perverted teaching, divulging what is done in
secret, forgery, misappropriation, and proclaiming
others’ thoughts.
स्तेनप्रयोगतदाहृतादानविरुद्धराज्यातिक्रमहीनाधिक-
मानोन्मानप्रतिरूपकव्यवहाराः ॥२७॥
चोरी के लिये चोर को प्रेरणा करना या उसका उपाय बताना,
चोर से चुराई हुई वस्तु खरीदना, राज्य की आज्ञा के विरुद्ध
चलना, देने-लेने के बाँट तराजू आदि कम-ज्यादा रखना और
कीमती वस्तु में कम कीमत की वस्तु मिलाकर असली भाव
से बेचना - ये अचौर्याणुव्रत के अतिचार हैं।
Prompting others to steal, receiving stolen goods,
under-buying in a disordered state, using false
weights and measures, and deceiving others with
artificial or imitation goods.
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