तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय - ७
मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि पञ्च ॥८॥
[ मनोज्ञामनोज्ञेन्द्रियविषयरागद्वेषवर्जनानि ] स्पर्शन आदि
पाँचों इन्द्रियों के इष्ट-अनिष्ट विषयों के प्रति राग-द्वेष का
त्याग करना [ पञ्च ] सो पाँच परिग्रहत्यागव्रत की भावनायें हैं।
Giving up attachment and aversion for agreeable
and disagreeable objects of the five senses
constitutes five.
हिंसादिष्विहामुत्रापायावद्यदर्शनम् ॥९॥
[ हिंसादिषु ] हिंसा आदि पाँच पापों से [ इह अमुत्र ] इस
लोक में तथा परलोक में [ अपायावद्यदर्शनम् ] नाश की
(दुःख, आपत्ति, भय तथा निंद्यगति की) प्राप्ति होती है -
ऐसा बारम्बार चिन्तवन करना चाहिये।
The consequences of violence etc. are calamity and
reproach in this world and in the next.
दुःखमेव वा ॥१०॥
[ वा ] अथवा ये हिंसादिक पाँच पाप [ दुःखमेव ] दुःखरूप
ही हैं - ऐसा विचारना।
Or sufferings only (result from injury etc.).
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