तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
प्रकरणसमः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५५
तथाहि विपरीतसाधकानुमानं त्रिविधं भवति । उपजीव्यम्,
उपजीवकम्, अनुभयं चेति । तत्राद्यं बाधकं बलवत्त्वात् । यथा 'अनित्य-
परमाणुर्मूर्तत्वाद् घटवत्' इत्यस्य परमाणुसाधकानुमानं नित्यत्वं
साधयदपि न प्रतिपक्षः । किन्तु बाधकमेवोपजीव्यत्वात् । तच्च धर्मिग्राह-
कत्वात् । न हि प्रमाणेनागृह्यमाणे धर्मिणि परमाण्वावनित्यत्वानुमानमिदं
सम्भवति, आश्रयासिद्धेः । अतोऽनेनानुमानेन परमाणुग्राहकस्य प्रामाण्य-
मध्यनुज्ञातमन्यथाऽस्योदयासम्भवात् । तस्मादुपजीव्यं बाधकमेव ।
उपजीवकं तु दुर्बलत्वाद् बाध्यम् । यथेदमेवानित्यत्वानुमानम् । तृतीयं
तु सत्प्रतिपक्षं समबलत्वात् ।
यस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणेन पक्षे साध्याभावः परिच्छिन्नः स कालात्यया-
कहलाता है] । इसलिए यह 'सत्प्रतिपक्ष' कहलाता है] । और जो [साध्यविपरीत
साधक होने पर भी ] तुल्यबल नहीं होता वह प्रतिपक्ष नहीं होता है ।
क्योंकि साध्यविपरीतसाधक अनुमान तीन प्रकार का होता है। १ उपजीव्य
[ जिसके आश्रित दूसरा अनुमान हो ] २ उपजीवक [ जो दूसरे अनुमान के
आश्रित हो ] ३ अनुभय । उनमें से पहिला [ उपजीव्य अनुमान ] बाधक [ ही ]
होता है बलवान् होने से । जैसे 'परमाणु अनित्य है मूर्त [परिच्छिन्न-परिमाणवान्]
होने से घट के समान' । इस [ परमाणु अनित्यत्व साधक अनुमान ] का परमाणु
साधक [ दूसरा अनुमान ] नित्यत्व सिद्ध के करने वाला होने पर भी
प्रतिपक्ष नहीं है किन्तु बाधक ही है उपजीव्य होने से । और वह
[ उपजीव्यत्व ] धर्मी [ परमाणु ] का साधक होने से है । धर्मी रूप
परमाणु के [ अनुमान ] प्रमाण से गृहीत न होने पर [ परमाणु के ] अनित्यत्व
का साधक यह अनुमान [ भी ] नहीं हो सकता है। आश्रयासिद्धि होने से । इस
लिए [ आश्रयासिद्धि से बचने के लिए ] इस [ परमाणु के अनित्यत्व साधक ]
अनुमान से परमाणु ग्राहक [ अनुमान ] का प्रामाण्य भी स्वीकार कर लिया है
[यह मानना होगा] । अन्यथा [आश्रयासिद्धि के कारण] इस [परमाणु के अनित्यत्व
साधक अनुमान ] का उदय ही सम्भव न होने से । इसलिए 'उपजीव्य'
बाधक ही [ होता ] है । और 'उपजीवक' तो दुर्बल होने से बाध्य होता है ।
जैसे यही [ परमाणु का ] अनित्यत्व [ साधक ] अनुमान । [ इन दोनों से
भिन्न ] तीसरा [ अनुभय रूप अनुमान ही ] समबल होने से 'सत्प्रतिपक्ष'
होता है ।
५ जिस [ हेतु ] के साध्य का अभाव प्रत्यक्षादि प्रमाण से पक्ष में
निश्चित हो, वह 'कालात्ययापदिष्ट' है और वही 'बाधितविषय' भी कहलाता है ।
२५६ तर्कभाषा [ कालात्ययापदिष्टः
पदिष्टः। स एव बाधितविषय इत्युच्यते। यथा 'अग्निरनुष्णः कृतकत्वा-
ज्जलवत्'। अत्र कृतकत्वं हेतुः। तस्य च यत् साध्यमनुष्णत्वं तस्याभावः
प्रत्यक्षेणैव परिच्छिन्नः। त्वगिन्द्रियेणाग्नेरुष्णत्वपरिच्छेदात्।
तथा परोऽपि कालात्ययापदिष्टो, यथा, 'घटस्य क्षणिकत्वे साध्ये
प्रागुक्तं सत्त्वं हेतुः'। तस्यापि च यत् साध्यं क्षणिकत्वं तस्याऽभावोऽ-
क्षणिकत्वं प्रत्यभिज्ञातर्कादिलक्षणेन प्रत्यक्षेण परिच्छिन्नम्। स एवायं
घटो यो मया पूर्वमुपलब्धः' इति प्रत्यभिज्ञया पूर्वानुभवजनितसंस्कार-
सहकृतेन्द्रियप्रभवया पूर्वापरकालनया घटस्य स्थायित्वपरिच्छेदादिति।
एते चासिद्धादयः पञ्च हेत्वाभासा यथा कथञ्चित् पक्षधर्मत्वायन्यत
मरूपहीनत्वादहेतवः स्वसाध्यं न साधयन्तीति।
येऽपि लक्षणस्य केवलव्यतिरेकिहेतोस्त्रयो दोषा अव्याप्ति-अतिव्याप्ति-
असम्भवास्तेऽप्यत्रैवान्तर्भवन्ति, न तु पञ्चभ्योऽधिकाः। तथाहि,
अतिव्याप्तिर्व्याप्यत्वासिद्धिः। विपक्षमात्राद्व्यावृत्तत्वात् सोपाधि-
जैसे 'अग्नि अनुष्ण है कृतक होने से घट के समान'। यहां कृतकत्व हेतु है। और
उसका जो साध्य अनुष्णत्व उसका अभाव [ उष्णत्व अग्नि में ] प्रत्यक्ष से ही
निश्चित है। त्वगिन्द्रिय से अग्नि में उष्णत्व का निश्चय होने से।
दूसरा भी कालात्ययापदिष्ट [ का उदाहरण ] है। जैसे घट के 'क्षणिकत्व'
की सिद्धि में पहिले कहा हुआ 'सत्त्व' हेतु। उस [ सत्त्व हेतु ] का भी जो साध्य
क्षणिकत्व उसका अभाव अक्षणिकत्व [ स्थिरत्व ] प्रत्यभिज्ञा तर्कादि रूप
[ सहकृत ] प्रत्यक्ष [ प्रमाण ] से ही निश्चित है। 'यह वही घट है जो मैंने
पहिले देखा था' इस पूर्वानुभव जनित संस्कार सहकृत इन्द्रिय से उद्भूत,
'प्रत्यभिज्ञा' [ पहिचान ] से पूर्वापर काल के परिज्ञान से, घट के स्थायित्व का
निश्चय होनेसे। [यह हेतु भी 'बाधितविषय' या कालात्ययापदिष्ट' हेत्वाभास है]।
यह असिद्ध आदि पांचों हेत्वाभास किसी न किसी प्रकार 'पक्षधर्मत्व' आदि
[ पञ्च रूपों ] में से किसी रूप से हीन होने से अहेतु [ हेत्वाभास ] हैं और
अपने साध्य को सिद्ध नहीं करते हैं।
और जो 'केवल व्यतिरेकी' हेतु रूप लक्षण के अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और
असम्भव रूप तीन दोष [ माने जाते ] हैं वह भी इन्हीं [ हेत्वाभासों ] में अन्तर्गत
हो जाते हैं। वह इन पांच [ हेत्वाभासों ] से अलग नहीं हैं। जैसे कि अतिव्याप्ति
[ दोष ] ब्याप्यत्वासिद्ध [ हेत्वाभास के अन्तर्गत ] है। विपक्षमात्र से व्यावृत्त न
अव्याप्त्यादयो दोषाः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५७
कत्वाच्च । यथा गौलक्षणस्य पशुत्वस्य । गोत्वे हि सास्नादिमत्त्वं प्रयोजकं,
न तु पशुत्वम् । तथा अव्याप्तिर्भागासिद्धत्वम् । यथा गौलक्षणस्य
शाबलेयत्वस्य । एवम् असम्भवोऽपि स्वरूपासिद्धिः । यथा गौलक्षणस्यैक-
शफत्वस्येति ।
होने और सोपाधिक होने के कारण । जैसे गौ के लक्षण 'पशुत्व' [ के करने पर ]
की [ अतिव्याप्ति व्याप्यत्वासिद्धि ही है ] । गोत्व में 'सास्नादिमत्त्व' ही प्रयोजक
है पशुत्व नहीं । [ प्रयोजक को ही 'उपाधि' कहते हैं । इसलिए यह सोपाधिक होने
से व्याप्यत्वासिद्ध है और विपक्ष महिषादि में विद्यमान होने से भी व्याप्यत्वासिद्ध
है ] । इसी प्रकार अव्याप्ति [ दोष ] भागासिद्ध [ के अन्तर्गत ] है । जैसे गो
लक्षण 'शाबलेयत्व' की [ अव्याप्ति भाग में असिद्ध होने से भागासिद्ध है और
भागासिद्ध स्वरूपासिद्ध का भेद है इसलिए अव्याप्ति स्वरूपासिद्ध के अन्तर्गत हो
जाती है । ] इसी प्रकार असम्भव [ दोष ] भी 'स्वरूपासिद्ध' है । जैसे गौलक्षण
'एकशफत्व' का [ असम्भवत्व दोष आश्रयरूप गो में न पाया जाने में स्वरूपा-
सिद्ध ही होता है ] ।
नवीन और प्राचीन हेत्वाभासों की तुलना—
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने पाँच हेत्वाभासों का पूर्वापेक्षया कुछ अधिक
विस्तार से यहाँ दुबारा निरूपण किया है । यद्यपि यह सब न्याय-सम्मत
हेत्वाभास कहे गए हैं फिर भी प्राचीन न्याय-सूत्रोक्त और इन हेत्वाभासों
में कुछ अन्तर पाया जाता है । उनके नामों में भी कुछ अन्तर है और स्वरूप
में भी । न्याय-सूत्र में हेत्वाभासों के नाम इस प्रकार गिनाए गए हैं—
सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यसम-अतीतकाला हेत्वाभासाः ।
तर्कभाषा के हेत्वाभासों में सबसे प्रथम 'असिद्ध' हेत्वाभास गिनाया गया है
परन्तु न्यायसूत्र में 'असिद्ध' का कहीं उल्लेख नहीं है । असिद्ध के स्थान पर वहाँ
'साध्यसम' नाम मिलता है जिसे 'असिद्ध' का स्थानापन्न मान सकते हैं । परन्तु
न्यायसूत्रों के 'साध्यसम' हेत्वाभास को यदि नवीन 'असिद्ध' हेत्वाभास के स्थान
पर माना भी जाय तो वह पूर्णतया सुसङ्गत नहीं होता है । क्योंकि तर्कभाषा में
'असिद्ध' के जो आश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध वह तीन भेद
किए हैं उस प्रकार के भेदों का न न्याय-सूत्रों में ही कोई उल्लेख मिलता है और
न उसके 'वात्स्यायन भाष्य' में ही । इसके अतिरिक्त 'साध्यसम' का जो उदाहरण
१. न्या० सू० १, १, ४५
१७ त० भा०
२५८ तर्कभाषा [ हेत्वाभासानां तुलना
भाष्यकार ने 'द्रव्यं छाया गतिमत्त्वात्' यह दिया है। यह भी तर्कभाषा के 'असिद्ध'
हेत्वाभास के उदाहरणों से बिल्कुल भिन्न प्रकार का उदाहरण है। इसमें
'गतिमत्त्वात्' हेतु है, 'छाया' पक्ष है और उसमें 'द्रव्यत्व' साध्य है। न्याय के
भाष्यकार का अभिप्राय यह है कि यहाँ गतिमत्त्व होने से छाया को द्रव्य सिद्ध
करने का प्रयत्न किया जा रहा है। परन्तु छाया में गतिमत्त्व रहता है यह ही
निश्चित नहीं है, क्योंकि न्याय-सिद्धान्त में वस्तुतः छाया में गति नहीं रहती
है। बीच में किसी आवरक द्रव्य के आजाने से प्रकाश का जहाँ अभाव हो
जाता है उसको 'छाया' कहते हैं। जहाँ छाया चलती हुई प्रतीत होती है, वहाँ
गति या तो प्रकाश में होती है या आवरक द्रव्य में। उनकी ही गति से
छाया चलती हुई प्रतीत होती है। इसलिए छाया में गतिरूप हेतु का अस्तित्व
न होने से 'साध्यसम' है। इसलिए यह 'साध्यसम' हेत्वाभास कहलाता है।
यह उदाहरण भी तर्कभाषा के उदाहरणों से भिन्न प्रकार का है।
२ सव्यभिचार का लक्षण सूत्रकार ने भी 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः'
किया है इसलिए इसे और तर्कभाषा के सव्यभिचार को एक सा कहा जा
सकता है। परन्तु तर्कभाषाकार ने जो इसके 'साधारणानैकान्तिक' और
'असाधारणानैकान्तिक' यह दो भेद किए हैं वह न्यायसूत्र अथवा उसके भाष्य
में नहीं पाए जाते हैं।
'विरुद्ध' और 'प्रकरणसम' हेत्वाभास दोनों जगह समान हैं यद्यपि उनके
उदाहरणों में दोनों जगह कुछ भेद पाया जाता है। और 'प्रकरणसम' का
दूसरा नाम 'सत्प्रतिपक्ष' भी सूत्र या भाष्य में नहीं मिलता है।
न्यायसूत्र का 'कालात्ययापदिष्ट' अथवा 'कालातीत' हेत्वाभास तर्कभाषा
में भी उसी नाम से मिलता है परन्तु उन दोनों के स्वरूप में बहुत भेद हैं।
वात्स्यायन भाष्य से प्रतीत होता है कि स्वयं भाष्यकार के समय इस हेत्वाभास
की कई तरह की व्याख्या पाई जाती थी। उन व्याख्याओं में से एक व्याख्या
यह भी थी कि 'प्रतिज्ञा आदि अवयवों को यथाक्रम न बोल कर व्युत्क्रम से
बोलना' भी 'कालातीत' या 'कालात्ययापदिष्ट' कहा जाता था। परन्तु भाष्यकार
ने उसका खण्डन किया है। और अपना दूसरा अर्थ किया है। उनका वह
लक्षण और उदाहरण और भी कठिन हो गया है। उसकी अपेक्षा तर्कभाषा
का लक्षण और उदाहरण अधिक सरल और सुबोध है।
न्याय के समानतन्त्र वैशेषिक में जैसा कि पहिले कहा जा चुका है हेतु के
पक्षसत्त्व आदि पाँच रूपों के स्थान पर तीन ही रूप स्वीकार किए गए हैं इस
छलम् ] छलनिरूपणम् २५६
१४ छलम्
अभिप्रायन्तरेण प्रयुक्तस्य शब्दस्यार्थान्तरं परिकल्प्य दूषणाभिधानं
लिए उस में 'विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत्' । १ विरुद्ध, २ असिद्ध
और सन्दिग्ध [अनैकान्तिक] यह तीन हेत्वाभास कहे हैं और उन के अतिरिक्त
एक 'अनध्यवसित' हेत्वाभास भी माना है। अक्षपाद और कणाद दोनों के
'अनुगामी' सर्वज्ञ ने भी अपने 'न्यायसार' में 'असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-अन-
ध्यवसित-कालात्ययापदिष्ट-प्रकरणसमाः कह कर छः हेत्वाभासों का वर्णन किया
है। इन में न्याय के पाँच और वैशेषिक में कहे हुए 'अनध्यवसित' का संग्रह
कर के छः हेत्वाभास माने हैं। बौद्धों में दिङ्नाग के 'न्यायप्रवेश' में असिद्ध,
विरुद्ध, अनैकान्तिक तीन ही हेत्वाभास माने हैं और सांख्य की माठरवृत्ति में
भी इन्हीं तीन का उल्लेख हुआ है। जैनों में भी सिद्धसेन तथा वादिदेव
आदि आचार्यों ने¹ तीन ही हेत्वाभासों का वर्णन किया है।
पाश्चात्य हेत्वाभास—
पाश्चात्य तर्कशास्त्र में हेत्वाभास के लिए 'फैलेसी' शब्द का प्रयोग हुआ
है। उन के यहाँ विचार के किसी नियम के भङ्ग के कारण उत्पन्न अशुद्धि को
'फैलेसी' या हेत्वाभास कहते हैं। अरस्तू के अनुसार हेत्वाभास दो प्रकार के
होते हैं। एक वह जो भाषा के कारण [ फैलेसीज़ ड्यू टु लैंग्वेज ] होते हैं
और दूसरे वह जो विचार के कारण [ फैलेसीज़ ड्यू टु थाट ] होते हैं। उनमें
से भाषाश्रित हेत्वाभास ६ प्रकार के और विचाराश्रित हेत्वाभास चार
प्रकार के प्रतिपादन किए गए हैं।
तर्कभाषा में असिद्ध के तीन भेद किए गए हैं। परन्तु वैशेषिक दर्शन के
प्रशस्तपाद भाष्य में असिद्ध के चार भेद किए गए हैं—
तत्रासिद्धश्चतुर्विधः । उभयासिद्धोऽन्यतरासिद्धो तद्भावासिद्धोऽनुमेयासिद्धश्च ।
दिङ्नाग के न्याय-प्रवेश में भी उसी प्रकार असिद्ध के चार भेदों का निरूपण
है और माठरवृत्ति में भी असिद्ध के चार भेद किए गए हैं।
उभयासिद्धोऽन्यतरासिद्धः सन्दिग्धासिद्ध आश्रयासिद्धश्चेति² ।
१४ छल
अन्य अभिप्राय से प्रयुक्त शब्द का अन्य अर्थ कल्पना करके दोष देना 'छल'
१. प्रमाणवार्तिक ६, ४७ ।
२. माठरवृत्ति
२६० तर्कभाषा [ जातिः
छलम् । यथा 'नवकम्बलोऽयं देवदत्तः' इति वाक्ये नूतनाभिप्रायेण
प्रयुक्तस्य नवशब्दस्यार्थान्तरमाशंक्य कश्चित् दूषयति । 'नास्य नव
कम्बलाः सन्ति दरिद्रत्वात् । न ह्यस्य द्वयमपि सम्भाव्यते कुतो नव'
इति । स च वादी छलवादितया ज्ञायते ।
१५ जातिः
असदुत्तरं जातिः । सा च उत्कर्षसम-अपकर्षसम-आदिभेदेन
बहुविधा । विस्तरभिया नेह कृत्स्नोच्यते । तत्राव्याप्तेन दृष्टान्त-
गतधर्मेण साध्ये पक्षे अव्यापकधर्मस्यापादनम् उत्कर्षसमा जातिः ।
यथा शब्दोऽनित्यः कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते कश्चिदेवमाह 'यदि कृत-
कत्वेन हेतुना घटवच्छब्दोऽनित्यः स्यात् तर्हि तेनैव हेतुना तद्वदेव
शब्दः सावयवोऽपि स्यात् ।'
अपकर्षसमा तु दृष्टान्तगतेन धर्मेणाव्याप्तेनाव्यापकस्य धर्माभावस्या-
[ कहलाता ] है । जैसे 'यह देवदत्त नव कम्बल युक्त है' इस वाक्य में नूतन के
अभिप्राय से प्रयुक्त नव शब्द का [ ९ संख्या रूप ] दूसरा अर्थ कल्पना करके कोई
दोष दे कि इसके पास नौ कम्बल नहीं हैं दरिद्र होने से । इसके पास तो दो
[ कम्बल ] भी नहीं सम्भव हैं नौ कहाँ से आए ? [ इस प्रकार अभिप्रेत अर्थ से
भिन्न अर्थ कल्पना करके खण्डन करनेवाला ] वह वादी छलवादी समझा
जाता है ।
१५ जाति
असत् उत्तर [का नाम] 'जाति' है । और वह 'उत्कर्षसमा' अपकर्षसमा' आदि
भेद से बहुत [ २४ ] प्रकार की होती है । [ ग्रन्थ के ] विस्तार के भय से सबका
वर्णन यहाँ नहीं करते हैं। [उदाहरणार्थ केवल दो के उदाहरण देते हैं] उनमें से
दृष्टान्तगत अव्याप्त धर्म से साध्य अर्थात् पक्ष में अव्यापक धर्मान्तर का आपादान
'उत्कर्षसमा' जाति है। जैसे 'शब्द अनित्य है कृतक होने से घट के समान' ऐसा
कहने पर कोई यह कहे कि 'यदि कृतकत्व हेतु से घट के समान शब्द अनित्य है
तो उसी [ कृतकत्व ] हेतु से उसी [ घट ] के समान शब्द सावयव भी होना
चाहिए' । [ इस उदाहरण में शब्द में अविद्यमान सावयवत्व रूप एक नया धर्म
बढ़ाया जा रहा है इसलिए उसको 'उत्कर्षसमा' जाति कहते हैं ] ।
[ इसके विपरीत ] दृष्टान्तगत अव्याप्त धर्म से अव्यापक धर्म के अभाव का
जातिः ] जातिनिरूपणम् २६१
पादनम् । यथा पूर्वस्मिन् प्रयोगे कश्चिदेवमाह 'यदि कृतकेन हेतुना
घटवच्छब्दोऽनित्यः स्यात् तेनैव हेतुना घटवदेव हि शब्दः श्रावणोऽपि
न स्यात् । न हि घटः श्रावण' इति ।
आपादान अपकर्षसमा जाति है । जैसे पहिले प्रयोग [ अनुमान ] में कोई
यह कहे कि 'यदि कृतकत्व हेतु से घट के समान शब्द अनित्य है तो उसी
[ कृतकत्व ] हेतु से घट के समान ही शब्द श्रोत्रग्राह्य भी न होता' । [ क्योंकि ]
घट श्रोत्रग्राह्य नहीं है ।
यहाँ ग्रन्थकार ने 'छल' 'जाति' और 'निग्रहस्थान' आदि को अनावश्यक
मानकर उनका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया है । यद्यपि प्राचीन न्याय के ग्रन्थों
में इन विषयों का बहुत विस्तार है। स्वयं न्याय-सूत्रकार ने पाँच अध्यायों में से
एक अध्याय इस 'जाति' और 'निग्रहस्थानों' के वर्णन में लगा दिया है । और
अपने सिद्धान्त की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर 'छल' तथा असदुत्तर
रूप 'जाति' के प्रयोग की भी अनुमति ने भी स्पष्ट रूप से दी है । परन्तु बाद में
इन 'छल' और 'जाति' आदि के प्रयोग के प्रति आस्था कम हो गई है । विशेषतः
बौद्ध और जैन आचार्यों ने इन छल आदि के प्रयोग की बहुत निन्दा की है ।
न्याय-परम्परा में छल आदि के प्रयोग के समर्थन में कहा गया है कि—
'दुःशिक्षितकुतर्कांशलेशवाचालिताननाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपपण्डिताः ॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्प्रतारितः ।
मा गादिति च्छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः ॥'
इसके विपरीत बौद्ध आचार्य धर्मकीर्ति ने अपने 'वादन्याय' में लिखा है :—
तत्त्वरक्षणार्थं सद्भिरुपहर्तव्यमेव छलादि विजिगीषुभिरिति चेत्, नख-चपेट-
शस्त्रप्रहार-दीपनादिभिरपीति वक्तव्यम् । तस्मान्न न्यायादयं तत्त्वरक्षणोपायः ।
जैन आचार्य हेमचन्द्र ने इसी बात को इस प्रकार लिखा है:—
नैवम् । असदुत्तरैः परप्रतिषेधस्य कर्तुमयुक्तत्वात् । नहि अन्यायेन जयं
यशो वा महात्मानः समीहन्ते¹।
यद्यपि जैन और बौद्ध आचार्यों ने पीछे से 'जाति' और 'छल' के प्रयोग का
खण्डन किया है परन्तु उनके ग्रन्थों में भी 'जाति' आदि का वर्णन पाया
१. प्रमाणमीमांसा पृ० ६४ ।
२६२ | तर्कभाषा | [ निग्रहस्थानानि
१६ निग्रहस्थानानि
पराजयहेतुः निग्रहस्थानम् । तच्च न्यून-अधिक-अपसिद्धान्त-अर्थान्तर-
अप्रतिभा मतानुज्ञा-विरोधआदिभेदाद् बहुविधमपि विस्तरभयान्नेह
कृत्स्नमुच्यते । यद् विवक्षितार्थे किञ्चिन्न्यूनं तन्न्यूनम् । विवक्षितात्
किञ्चिदधिकम् अधिकम् । सिद्धान्तादपध्वंसः-अपसिद्धान्तः । प्रकृतेनानभि-
जाता है । बल्कि न्याय से अधिक संख्या में जाति के भेद गिनाए गए हैं ।
न्याय में कुल २२ प्रकार के जाति भेद माने गए हैं । बौद्धों के 'प्रमाण-समुच्चय'
'वाद-विधि' आदि ग्रन्थों में उनके अतिरिक्त 'कार्यभेद', 'अनुक्ति' और 'स्वार्थ-
विरुद्ध' यह तीन भेद और करके जाति के २५ भेद कर दिए हैं । 'उपायहृदय'
ग्रन्थ में न्याय के २२ प्रकार के जाति-भेदों के अतिरिक्त १ भेदाभेद, २ प्रश्न-
बाहुल्योत्तराल्पता, ३ प्रश्नाल्पतोत्तरबाहुल्य, ४ हेतुसम, ५ व्याप्तिसम, अभ्यासि-
सम, ६ विरुद्ध, ७ अविरुद्ध, ८ असंशय, ९ श्रुतिसम और १० श्रुतिभिन्न इस
प्रकार जाति के दस भेद और बढ़ा दिए हैं । इस लिए यह कहना चाहिए कि
सिद्धान्ततः छल आदि के प्रयोग को अभीष्ट न मानते हुए भी बौद्ध तथा जैन
विद्वान् उनकी सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सके हैं । उनका वर्णन उन्होंने भी किया
ही है । बौद्ध तथा जैन तार्किकों के समान अन्य सभी नैयायिक भी छल
तथा जाति के प्रयोग को सिद्धान्ततः अच्छा नहीं समझते हैं । फिर भी उन्होंने
अपने ग्रन्थ में छल और जाति का प्रतिपादन इसी लिए किया है कि यदि
प्रतिवादी इनका आश्रय ले तो वादी उनके इस 'छल' या असदुत्तररूप 'जाति'
को समझ सके और उसका उचित उत्तर दे सके ।
१६ निग्रहस्थान
पराजय का हेतु निग्रहस्थान [ कहलाता ] है । वह न्यून, अधिक, अपसि-
द्धान्त, अर्थान्तर, अप्रतिभा, मतानुज्ञा, विरोध आदिभेद से बहुत [ २२ ] प्रकार
का होने पर भी [ ग्रन्थ के ] 'विस्तार के भय से यहाँ पूर्णरूप से नहीं कहा जा
रहा है । [ फिर भी कुल ७ उदाहरण देते हैं ] ।
१—जो विवक्षित अर्थ से कुछ कम रह जाय [ पूरी बात न कही जा सके ]
वह 'न्यून' [ निग्रहस्थान कहलाता है ] ।
२—विवक्षित से कुछ अधिक [ कहना ] 'अधिक' [ निग्रहस्थान ] है ।
३—सिद्धान्त से च्युत होना 'अपसिद्धान्त' [ नामक निग्रहस्थान ] है ।
निग्रहस्थानानि ] निग्रहस्थाननिरूपणम् २६३
सम्बद्धार्थवचनम् अर्थान्तरम्। उत्तरापरिस्फूर्तिः अप्रतिभा। पराभिमत-
स्वार्थस्य स्वप्रतिकूलस्य स्वयमेवाभ्यनुज्ञानं स्वीकारो मतानुज्ञा।
इष्टार्थभङ्गो विरोधः।
४—प्रकृत [विषय] से असम्बद्ध अर्थ को कहना 'अर्थान्तर' [निग्रहस्थान] है।
५—उत्तर न सूझना 'अप्रतिभा' [ निग्रहस्थान ] है।
६—दूसरे के अभीष्ट और अपने प्रतिकूल अर्थ को स्वयं स्वीकार कर 'लेना
'मतानुज्ञा' है।
७—[ अपने ] इष्ट अर्थ का [ स्वयं ] खण्डन कर देना 'विरोध' [ नामक
निग्रहस्थान ] है।
यहां तर्कभाषाकार ने केवल सात निग्रहस्थानों का उल्लेख किया परन्तु
न्यायसूत्र में २२ निग्रहस्थान इस प्रकार गिनाए गए हैं—
प्रतिज्ञाहानिः-प्रतिज्ञान्तरं-प्रतिज्ञाविरोधः-प्रतिज्ञासंन्यासो-हेत्वन्तरम्-अर्था-
न्तरम्-निरर्थकम्-अविज्ञातार्थम्-अपार्थकम्-अप्राप्तकालम्-न्यूनम्-अधिकम्-
पुनरुक्तम्-अननुभाषणम्-अज्ञानम्-अप्रतिभा-विक्षेपो-मतानुज्ञा-पर्यनुयोज्योपेक्षणं-
निरनुयोज्यानुयोगः-अपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानि। ५, १, १।
निग्रह-स्थानों की त्रिविध परम्परा—
जिन स्थितियों में आ जाने पर मध्यस्थ वादी अथवा प्रतिवादी को पराजित
घोषित कर सकता है उनका नाम 'निग्रहस्थान' है। इन नियमों का निर्धारण
भी सबसे पहिले न्यायसूत्रों में किया गया था। उसके आधार पर आयुर्वेद के
प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी उनका प्रतिपादन लगभग उसी रूप में पाया जाता
है। उसी से प्रारम्भ में बौद्ध आचार्यों ने भी उन निग्रहस्थानों को पूर्ण रूप से
ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया था। इस लिए उनके 'तर्कशास्त्र' तथा 'उपाय-
हृदय' आदि ग्रन्थों में निग्रहस्थानों का वर्णन न्याय तथा चरक के वर्णन से
मिलता हुआ पाया जाता है। परन्तु पीछे बौद्ध आचार्य 'धर्मकीर्ति' ने अपने
'वादन्याय' नामक ग्रन्थ में न्याय के निग्रहस्थानों का खण्डन करके स्वतन्त्र रूप
से अपने नए निग्रहस्थानों का निरूपण किया। इसी प्रवाह में जैन आचार्य
'अकलङ्कदेव' ने भी 'निग्रहस्थानों' के विषय में स्वतन्त्र रीति से विचार किया।
इस प्रकार निग्रहस्थानों के विषय में भी बौद्ध तथा जैन परम्परा को मिला कर
तीन प्रकार की विचारधारा पाई जाती है।
२६४ तर्कभाषा [ उपसंहारः
उपसंहारः
इहात्यन्तमुपयुक्तानां स्वरूपभेदेन भूयो भूयः प्रतिपादनम् । यदनति-
प्रयोजनं तल्लक्षणमदोषाय । एतावतैव बालव्युत्पत्तिसिद्धेः ।
इति श्रीकेशवमिश्रविरचिता तर्कभाषा समाप्ता ।
उपसंहार
यहां [ तर्कभाषा ग्रन्थ ] में अत्यन्त उपयोगी [ हेत्वाभास आदि पदार्थों ]
का स्वरूपभेद से बार बार प्रतिपादन किया गया है। और जो अधिक उपयोगी
नहीं है उसका लक्षण न करना दोषजनक नहीं है। क्योंकि हमने जो कुछ कहा
है ] इतने से ही बालव्युत्पत्ति सिद्ध हो सकती है। [ बालव्युत्पत्ति के लिए ही
ग्रन्थ लिखा था। इसमें जितना विषय वर्णन किया है, बालव्युत्पत्ति के लिए वही
पर्याप्त है। इसलिए जाति, निग्रहस्थान आदि जो अधिक उपयोगी पदार्थ नहीं हैं,
उनका विस्तारपूर्वक वर्णन न करना दोषाधायक नहीं है ] ।
श्रीकेशवमिश्र-विरचित तर्कभाषा समाप्त हुई ।
मासाभ्यां पौषमाघाभ्यां, द्विसहस्रेऽष्टकोत्तरे ।
वैक्रमे, तर्कभाषायाः व्याख्येयं पूर्तिमागता ॥
उत्तरप्रदेशस्थ-'पीलीभीत' मण्डलान्तर्गत-मकतुलग्रामनिवासिनां
श्री शिवलाल-बख्शी-महोदयानां तनुजनुषा
वृन्दावनस्थगुरुकुलविश्वविद्यालयाधीतविद्येन तत्रत्याचार्यपदमधितिष्ठता
एम्० ए० इत्युपपदधारिणा श्रीमदाचार्यविश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणिना
विरचिता 'तर्करहस्यदीपिका' हिन्दीव्याख्या समाप्ता
समाप्ताश्चायं ग्रन्थः
चौखम्भा संस्कृत संस्थान
पोस्ट बाक्स नं० १३६
जड़ाव भवन, के. ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन
वाराणसी-२२१००१ ( भारत ) फोन : ६४८८६
• कारिकावली-मुक्तावली। विश्वनाथ पंचानन भट्टचार्य कृत। महादेव भट्ट कृत
'दिनकरी' (प्रकाश) तथा रामरुद्र भट्टाचार्य एवं राजेश्वर शास्त्री द्रविण कृत
'रामरुद्री' (तरंगिणी) (का. ६)
• गा० अवयवप्रकरणम्। गदाधर भट्टाचार्य कृत ज्वाला प्रसाद गौड़ कृत
'विलासिनी' टीका (का. २०२)
• जा० सिद्धान्तलक्षणम्। जगदीश तर्कालंकारकृत। शिवदत्तमिश्र कृत 'गंगा'
टीका तथा 'क्रोडपत्र संग्रह' द्वितीय संस्करण (का. १०१)
• तर्कसंग्रहः। अन्नम्भट्ट कृत। प्राचीन नौ टीका। सम्पादक-सत्करि शर्मा वङ्गीय।
(का. १८४)
• न्यायकुसुमांजलिः। उदयनाचार्य कृत। वरदराज, वर्धमानोपाध्याय मेधठक्कुर
तथा रुचिदत्त कृत 'बोधिनी' 'प्रकाश', 'प्रकाशिका' तथा 'मकरन्द'
टीका एवं बच्चा झा कृत नोट्स। सं० पद्मप्रसाद भट्टराई तृतीय स्तबक से अंत
तक एवम् संपूर्ण (का. ३०)
• न्यायदर्शन। गौतम कृत। वात्स्यायन भाष्य। पद्म प्रसाद शास्त्री और हरिराम
शुक्ल द्वारा संपादित। ढुण्डिराज शास्त्री कृत 'प्रकाशिका' हिन्दी टीका। सं०
श्रीनारायण मिश्र (का ४३)
• न्यायमंजरी। जयन्त भट्टकृत। सूर्यनारायण शुक्ल कृत नोट्स आदि।
(का. १०६)
• न्यायसिद्धान्तमुक्तावली। विश्वनाथ न्यायपंचानन कृत। कृष्ण वल्लभाचार्य
कृत 'किरणावली' टीका। सम्पादक नारायण चरण शास्त्री तथा श्वेतवैकुण्ठ शास्त्री
(का. १०६)
• शब्दशक्ति प्रकाशिका। जगदीश तकर्लंकार कृत। 'कृष्ण कान्ती' टीका
तथा रामभद्र सिद्धान्त वागीश कृत 'प्रबोधिनी' टीकाद्वय ढुणिढराज शास्त्री कृत
टिप्पणी। (का. १०९)
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