तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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१६ निग्रहस्थानानि
पराजयहेतुः निग्रहस्थानम् । तच्च न्यून-अधिक-अपसिद्धान्त-अर्थान्तर-
अप्रतिभा मतानुज्ञा-विरोधआदिभेदाद् बहुविधमपि विस्तरभयान्नेह
कृत्स्नमुच्यते । यद् विवक्षितार्थे किञ्चिन्न्यूनं तन्न्यूनम् । विवक्षितात्
किञ्चिदधिकम् अधिकम् । सिद्धान्तादपध्वंसः-अपसिद्धान्तः । प्रकृतेनानभि-
जाता है । बल्कि न्याय से अधिक संख्या में जाति के भेद गिनाए गए हैं ।
न्याय में कुल २२ प्रकार के जाति भेद माने गए हैं । बौद्धों के 'प्रमाण-समुच्चय'
'वाद-विधि' आदि ग्रन्थों में उनके अतिरिक्त 'कार्यभेद', 'अनुक्ति' और 'स्वार्थ-
विरुद्ध' यह तीन भेद और करके जाति के २५ भेद कर दिए हैं । 'उपायहृदय'
ग्रन्थ में न्याय के २२ प्रकार के जाति-भेदों के अतिरिक्त १ भेदाभेद, २ प्रश्न-
बाहुल्योत्तराल्पता, ३ प्रश्नाल्पतोत्तरबाहुल्य, ४ हेतुसम, ५ व्याप्तिसम, अभ्यासि-
सम, ६ विरुद्ध, ७ अविरुद्ध, ८ असंशय, ९ श्रुतिसम और १० श्रुतिभिन्न इस
प्रकार जाति के दस भेद और बढ़ा दिए हैं । इस लिए यह कहना चाहिए कि
सिद्धान्ततः छल आदि के प्रयोग को अभीष्ट न मानते हुए भी बौद्ध तथा जैन
विद्वान् उनकी सर्वथा उपेक्षा नहीं कर सके हैं । उनका वर्णन उन्होंने भी किया
ही है । बौद्ध तथा जैन तार्किकों के समान अन्य सभी नैयायिक भी छल
तथा जाति के प्रयोग को सिद्धान्ततः अच्छा नहीं समझते हैं । फिर भी उन्होंने
अपने ग्रन्थ में छल और जाति का प्रतिपादन इसी लिए किया है कि यदि
प्रतिवादी इनका आश्रय ले तो वादी उनके इस 'छल' या असदुत्तररूप 'जाति'
को समझ सके और उसका उचित उत्तर दे सके ।
१६ निग्रहस्थान
पराजय का हेतु निग्रहस्थान [ कहलाता ] है । वह न्यून, अधिक, अपसि-
द्धान्त, अर्थान्तर, अप्रतिभा, मतानुज्ञा, विरोध आदिभेद से बहुत [ २२ ] प्रकार
का होने पर भी [ ग्रन्थ के ] 'विस्तार के भय से यहाँ पूर्णरूप से नहीं कहा जा
रहा है । [ फिर भी कुल ७ उदाहरण देते हैं ] ।
१—जो विवक्षित अर्थ से कुछ कम रह जाय [ पूरी बात न कही जा सके ]
वह 'न्यून' [ निग्रहस्थान कहलाता है ] ।
२—विवक्षित से कुछ अधिक [ कहना ] 'अधिक' [ निग्रहस्थान ] है ।
३—सिद्धान्त से च्युत होना 'अपसिद्धान्त' [ नामक निग्रहस्थान ] है ।