तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकरणसमः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५५
तथाहि विपरीतसाधकानुमानं त्रिविधं भवति । उपजीव्यम्,
उपजीवकम्, अनुभयं चेति । तत्राद्यं बाधकं बलवत्त्वात् । यथा 'अनित्य-
परमाणुर्मूर्तत्वाद् घटवत्' इत्यस्य परमाणुसाधकानुमानं नित्यत्वं
साधयदपि न प्रतिपक्षः । किन्तु बाधकमेवोपजीव्यत्वात् । तच्च धर्मिग्राह-
कत्वात् । न हि प्रमाणेनागृह्यमाणे धर्मिणि परमाण्वावनित्यत्वानुमानमिदं
सम्भवति, आश्रयासिद्धेः । अतोऽनेनानुमानेन परमाणुग्राहकस्य प्रामाण्य-
मध्यनुज्ञातमन्यथाऽस्योदयासम्भवात् । तस्मादुपजीव्यं बाधकमेव ।
उपजीवकं तु दुर्बलत्वाद् बाध्यम् । यथेदमेवानित्यत्वानुमानम् । तृतीयं
तु सत्प्रतिपक्षं समबलत्वात् ।
यस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणेन पक्षे साध्याभावः परिच्छिन्नः स कालात्यया-
कहलाता है] । इसलिए यह 'सत्प्रतिपक्ष' कहलाता है] । और जो [साध्यविपरीत
साधक होने पर भी ] तुल्यबल नहीं होता वह प्रतिपक्ष नहीं होता है ।
क्योंकि साध्यविपरीतसाधक अनुमान तीन प्रकार का होता है। १ उपजीव्य
[ जिसके आश्रित दूसरा अनुमान हो ] २ उपजीवक [ जो दूसरे अनुमान के
आश्रित हो ] ३ अनुभय । उनमें से पहिला [ उपजीव्य अनुमान ] बाधक [ ही ]
होता है बलवान् होने से । जैसे 'परमाणु अनित्य है मूर्त [परिच्छिन्न-परिमाणवान्]
होने से घट के समान' । इस [ परमाणु अनित्यत्व साधक अनुमान ] का परमाणु
साधक [ दूसरा अनुमान ] नित्यत्व सिद्ध के करने वाला होने पर भी
प्रतिपक्ष नहीं है किन्तु बाधक ही है उपजीव्य होने से । और वह
[ उपजीव्यत्व ] धर्मी [ परमाणु ] का साधक होने से है । धर्मी रूप
परमाणु के [ अनुमान ] प्रमाण से गृहीत न होने पर [ परमाणु के ] अनित्यत्व
का साधक यह अनुमान [ भी ] नहीं हो सकता है। आश्रयासिद्धि होने से । इस
लिए [ आश्रयासिद्धि से बचने के लिए ] इस [ परमाणु के अनित्यत्व साधक ]
अनुमान से परमाणु ग्राहक [ अनुमान ] का प्रामाण्य भी स्वीकार कर लिया है
[यह मानना होगा] । अन्यथा [आश्रयासिद्धि के कारण] इस [परमाणु के अनित्यत्व
साधक अनुमान ] का उदय ही सम्भव न होने से । इसलिए 'उपजीव्य'
बाधक ही [ होता ] है । और 'उपजीवक' तो दुर्बल होने से बाध्य होता है ।
जैसे यही [ परमाणु का ] अनित्यत्व [ साधक ] अनुमान । [ इन दोनों से
भिन्न ] तीसरा [ अनुभय रूप अनुमान ही ] समबल होने से 'सत्प्रतिपक्ष'
होता है ।
५ जिस [ हेतु ] के साध्य का अभाव प्रत्यक्षादि प्रमाण से पक्ष में
निश्चित हो, वह 'कालात्ययापदिष्ट' है और वही 'बाधितविषय' भी कहलाता है ।