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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 325, कुल 330 में से

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पृष्ठ 325

२६० तर्कभाषा [ जातिः
छलम् । यथा 'नवकम्बलोऽयं देवदत्तः' इति वाक्ये नूतनाभिप्रायेण
प्रयुक्तस्य नवशब्दस्यार्थान्तरमाशंक्य कश्चित् दूषयति । 'नास्य नव
कम्बलाः सन्ति दरिद्रत्वात् । न ह्यस्य द्वयमपि सम्भाव्यते कुतो नव'
इति । स च वादी छलवादितया ज्ञायते ।
१५ जातिः
असदुत्तरं जातिः । सा च उत्कर्षसम-अपकर्षसम-आदिभेदेन
बहुविधा । विस्तरभिया नेह कृत्स्नोच्यते । तत्राव्याप्तेन दृष्टान्त-
गतधर्मेण साध्ये पक्षे अव्यापकधर्मस्यापादनम् उत्कर्षसमा जातिः ।
यथा शब्दोऽनित्यः कृतकत्वाद् घटवदित्युक्ते कश्चिदेवमाह 'यदि कृत-
कत्वेन हेतुना घटवच्छब्दोऽनित्यः स्यात् तर्हि तेनैव हेतुना तद्वदेव
शब्दः सावयवोऽपि स्यात् ।'
अपकर्षसमा तु दृष्टान्तगतेन धर्मेणाव्याप्तेनाव्यापकस्य धर्माभावस्या-
[ कहलाता ] है । जैसे 'यह देवदत्त नव कम्बल युक्त है' इस वाक्य में नूतन के
अभिप्राय से प्रयुक्त नव शब्द का [ ९ संख्या रूप ] दूसरा अर्थ कल्पना करके कोई
दोष दे कि इसके पास नौ कम्बल नहीं हैं दरिद्र होने से । इसके पास तो दो
[ कम्बल ] भी नहीं सम्भव हैं नौ कहाँ से आए ? [ इस प्रकार अभिप्रेत अर्थ से
भिन्न अर्थ कल्पना करके खण्डन करनेवाला ] वह वादी छलवादी समझा
जाता है ।
१५ जाति
असत् उत्तर [का नाम] 'जाति' है । और वह 'उत्कर्षसमा' अपकर्षसमा' आदि
भेद से बहुत [ २४ ] प्रकार की होती है । [ ग्रन्थ के ] विस्तार के भय से सबका
वर्णन यहाँ नहीं करते हैं। [उदाहरणार्थ केवल दो के उदाहरण देते हैं] उनमें से
दृष्टान्तगत अव्याप्त धर्म से साध्य अर्थात् पक्ष में अव्यापक धर्मान्तर का आपादान
'उत्कर्षसमा' जाति है। जैसे 'शब्द अनित्य है कृतक होने से घट के समान' ऐसा
कहने पर कोई यह कहे कि 'यदि कृतकत्व हेतु से घट के समान शब्द अनित्य है
तो उसी [ कृतकत्व ] हेतु से उसी [ घट ] के समान शब्द सावयव भी होना
चाहिए' । [ इस उदाहरण में शब्द में अविद्यमान सावयवत्व रूप एक नया धर्म
बढ़ाया जा रहा है इसलिए उसको 'उत्कर्षसमा' जाति कहते हैं ] ।
[ इसके विपरीत ] दृष्टान्तगत अव्याप्त धर्म से अव्यापक धर्म के अभाव का