तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५८ तर्कभाषा [ हेत्वाभासानां तुलना
भाष्यकार ने 'द्रव्यं छाया गतिमत्त्वात्' यह दिया है। यह भी तर्कभाषा के 'असिद्ध'
हेत्वाभास के उदाहरणों से बिल्कुल भिन्न प्रकार का उदाहरण है। इसमें
'गतिमत्त्वात्' हेतु है, 'छाया' पक्ष है और उसमें 'द्रव्यत्व' साध्य है। न्याय के
भाष्यकार का अभिप्राय यह है कि यहाँ गतिमत्त्व होने से छाया को द्रव्य सिद्ध
करने का प्रयत्न किया जा रहा है। परन्तु छाया में गतिमत्त्व रहता है यह ही
निश्चित नहीं है, क्योंकि न्याय-सिद्धान्त में वस्तुतः छाया में गति नहीं रहती
है। बीच में किसी आवरक द्रव्य के आजाने से प्रकाश का जहाँ अभाव हो
जाता है उसको 'छाया' कहते हैं। जहाँ छाया चलती हुई प्रतीत होती है, वहाँ
गति या तो प्रकाश में होती है या आवरक द्रव्य में। उनकी ही गति से
छाया चलती हुई प्रतीत होती है। इसलिए छाया में गतिरूप हेतु का अस्तित्व
न होने से 'साध्यसम' है। इसलिए यह 'साध्यसम' हेत्वाभास कहलाता है।
यह उदाहरण भी तर्कभाषा के उदाहरणों से भिन्न प्रकार का है।
२ सव्यभिचार का लक्षण सूत्रकार ने भी 'अनैकान्तिकः सव्यभिचारः'
किया है इसलिए इसे और तर्कभाषा के सव्यभिचार को एक सा कहा जा
सकता है। परन्तु तर्कभाषाकार ने जो इसके 'साधारणानैकान्तिक' और
'असाधारणानैकान्तिक' यह दो भेद किए हैं वह न्यायसूत्र अथवा उसके भाष्य
में नहीं पाए जाते हैं।
'विरुद्ध' और 'प्रकरणसम' हेत्वाभास दोनों जगह समान हैं यद्यपि उनके
उदाहरणों में दोनों जगह कुछ भेद पाया जाता है। और 'प्रकरणसम' का
दूसरा नाम 'सत्प्रतिपक्ष' भी सूत्र या भाष्य में नहीं मिलता है।
न्यायसूत्र का 'कालात्ययापदिष्ट' अथवा 'कालातीत' हेत्वाभास तर्कभाषा
में भी उसी नाम से मिलता है परन्तु उन दोनों के स्वरूप में बहुत भेद हैं।
वात्स्यायन भाष्य से प्रतीत होता है कि स्वयं भाष्यकार के समय इस हेत्वाभास
की कई तरह की व्याख्या पाई जाती थी। उन व्याख्याओं में से एक व्याख्या
यह भी थी कि 'प्रतिज्ञा आदि अवयवों को यथाक्रम न बोल कर व्युत्क्रम से
बोलना' भी 'कालातीत' या 'कालात्ययापदिष्ट' कहा जाता था। परन्तु भाष्यकार
ने उसका खण्डन किया है। और अपना दूसरा अर्थ किया है। उनका वह
लक्षण और उदाहरण और भी कठिन हो गया है। उसकी अपेक्षा तर्कभाषा
का लक्षण और उदाहरण अधिक सरल और सुबोध है।
न्याय के समानतन्त्र वैशेषिक में जैसा कि पहिले कहा जा चुका है हेतु के
पक्षसत्त्व आदि पाँच रूपों के स्थान पर तीन ही रूप स्वीकार किए गए हैं इस