तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजातिः ] जातिनिरूपणम् २६१
पादनम् । यथा पूर्वस्मिन् प्रयोगे कश्चिदेवमाह 'यदि कृतकेन हेतुना
घटवच्छब्दोऽनित्यः स्यात् तेनैव हेतुना घटवदेव हि शब्दः श्रावणोऽपि
न स्यात् । न हि घटः श्रावण' इति ।
आपादान अपकर्षसमा जाति है । जैसे पहिले प्रयोग [ अनुमान ] में कोई
यह कहे कि 'यदि कृतकत्व हेतु से घट के समान शब्द अनित्य है तो उसी
[ कृतकत्व ] हेतु से घट के समान ही शब्द श्रोत्रग्राह्य भी न होता' । [ क्योंकि ]
घट श्रोत्रग्राह्य नहीं है ।
यहाँ ग्रन्थकार ने 'छल' 'जाति' और 'निग्रहस्थान' आदि को अनावश्यक
मानकर उनका विस्तारपूर्वक वर्णन नहीं किया है । यद्यपि प्राचीन न्याय के ग्रन्थों
में इन विषयों का बहुत विस्तार है। स्वयं न्याय-सूत्रकार ने पाँच अध्यायों में से
एक अध्याय इस 'जाति' और 'निग्रहस्थानों' के वर्णन में लगा दिया है । और
अपने सिद्धान्त की रक्षा के लिए आवश्यकता पड़ने पर 'छल' तथा असदुत्तर
रूप 'जाति' के प्रयोग की भी अनुमति ने भी स्पष्ट रूप से दी है । परन्तु बाद में
इन 'छल' और 'जाति' आदि के प्रयोग के प्रति आस्था कम हो गई है । विशेषतः
बौद्ध और जैन आचार्यों ने इन छल आदि के प्रयोग की बहुत निन्दा की है ।
न्याय-परम्परा में छल आदि के प्रयोग के समर्थन में कहा गया है कि—
'दुःशिक्षितकुतर्कांशलेशवाचालिताननाः ।
शक्याः किमन्यथा जेतुं वितण्डाटोपपण्डिताः ॥
गतानुगतिको लोकः कुमार्गं तत्प्रतारितः ।
मा गादिति च्छलादीनि प्राह कारुणिको मुनिः ॥'
इसके विपरीत बौद्ध आचार्य धर्मकीर्ति ने अपने 'वादन्याय' में लिखा है :—
तत्त्वरक्षणार्थं सद्भिरुपहर्तव्यमेव छलादि विजिगीषुभिरिति चेत्, नख-चपेट-
शस्त्रप्रहार-दीपनादिभिरपीति वक्तव्यम् । तस्मान्न न्यायादयं तत्त्वरक्षणोपायः ।
जैन आचार्य हेमचन्द्र ने इसी बात को इस प्रकार लिखा है:—
नैवम् । असदुत्तरैः परप्रतिषेधस्य कर्तुमयुक्तत्वात् । नहि अन्यायेन जयं
यशो वा महात्मानः समीहन्ते¹।
यद्यपि जैन और बौद्ध आचार्यों ने पीछे से 'जाति' और 'छल' के प्रयोग का
खण्डन किया है परन्तु उनके ग्रन्थों में भी 'जाति' आदि का वर्णन पाया
१. प्रमाणमीमांसा पृ० ६४ ।