तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
DevanagariHindipublished330 पृष्ठ
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१४ छलम्
अभिप्रायन्तरेण प्रयुक्तस्य शब्दस्यार्थान्तरं परिकल्प्य दूषणाभिधानं
लिए उस में 'विरुद्धासिद्धसन्दिग्धमलिङ्गं काश्यपोऽब्रवीत्' । १ विरुद्ध, २ असिद्ध
और सन्दिग्ध [अनैकान्तिक] यह तीन हेत्वाभास कहे हैं और उन के अतिरिक्त
एक 'अनध्यवसित' हेत्वाभास भी माना है। अक्षपाद और कणाद दोनों के
'अनुगामी' सर्वज्ञ ने भी अपने 'न्यायसार' में 'असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-अन-
ध्यवसित-कालात्ययापदिष्ट-प्रकरणसमाः कह कर छः हेत्वाभासों का वर्णन किया
है। इन में न्याय के पाँच और वैशेषिक में कहे हुए 'अनध्यवसित' का संग्रह
कर के छः हेत्वाभास माने हैं। बौद्धों में दिङ्नाग के 'न्यायप्रवेश' में असिद्ध,
विरुद्ध, अनैकान्तिक तीन ही हेत्वाभास माने हैं और सांख्य की माठरवृत्ति में
भी इन्हीं तीन का उल्लेख हुआ है। जैनों में भी सिद्धसेन तथा वादिदेव
आदि आचार्यों ने¹ तीन ही हेत्वाभासों का वर्णन किया है।
पाश्चात्य हेत्वाभास—
पाश्चात्य तर्कशास्त्र में हेत्वाभास के लिए 'फैलेसी' शब्द का प्रयोग हुआ
है। उन के यहाँ विचार के किसी नियम के भङ्ग के कारण उत्पन्न अशुद्धि को
'फैलेसी' या हेत्वाभास कहते हैं। अरस्तू के अनुसार हेत्वाभास दो प्रकार के
होते हैं। एक वह जो भाषा के कारण [ फैलेसीज़ ड्यू टु लैंग्वेज ] होते हैं
और दूसरे वह जो विचार के कारण [ फैलेसीज़ ड्यू टु थाट ] होते हैं। उनमें
से भाषाश्रित हेत्वाभास ६ प्रकार के और विचाराश्रित हेत्वाभास चार
प्रकार के प्रतिपादन किए गए हैं।
तर्कभाषा में असिद्ध के तीन भेद किए गए हैं। परन्तु वैशेषिक दर्शन के
प्रशस्तपाद भाष्य में असिद्ध के चार भेद किए गए हैं—
तत्रासिद्धश्चतुर्विधः । उभयासिद्धोऽन्यतरासिद्धो तद्भावासिद्धोऽनुमेयासिद्धश्च ।
दिङ्नाग के न्याय-प्रवेश में भी उसी प्रकार असिद्ध के चार भेदों का निरूपण
है और माठरवृत्ति में भी असिद्ध के चार भेद किए गए हैं।
उभयासिद्धोऽन्यतरासिद्धः सन्दिग्धासिद्ध आश्रयासिद्धश्चेति² ।
१४ छल
अन्य अभिप्राय से प्रयुक्त शब्द का अन्य अर्थ कल्पना करके दोष देना 'छल'
१. प्रमाणवार्तिक ६, ४७ ।
२. माठरवृत्ति