तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५६ तर्कभाषा [ कालात्ययापदिष्टः
पदिष्टः। स एव बाधितविषय इत्युच्यते। यथा 'अग्निरनुष्णः कृतकत्वा-
ज्जलवत्'। अत्र कृतकत्वं हेतुः। तस्य च यत् साध्यमनुष्णत्वं तस्याभावः
प्रत्यक्षेणैव परिच्छिन्नः। त्वगिन्द्रियेणाग्नेरुष्णत्वपरिच्छेदात्।
तथा परोऽपि कालात्ययापदिष्टो, यथा, 'घटस्य क्षणिकत्वे साध्ये
प्रागुक्तं सत्त्वं हेतुः'। तस्यापि च यत् साध्यं क्षणिकत्वं तस्याऽभावोऽ-
क्षणिकत्वं प्रत्यभिज्ञातर्कादिलक्षणेन प्रत्यक्षेण परिच्छिन्नम्। स एवायं
घटो यो मया पूर्वमुपलब्धः' इति प्रत्यभिज्ञया पूर्वानुभवजनितसंस्कार-
सहकृतेन्द्रियप्रभवया पूर्वापरकालनया घटस्य स्थायित्वपरिच्छेदादिति।
एते चासिद्धादयः पञ्च हेत्वाभासा यथा कथञ्चित् पक्षधर्मत्वायन्यत
मरूपहीनत्वादहेतवः स्वसाध्यं न साधयन्तीति।
येऽपि लक्षणस्य केवलव्यतिरेकिहेतोस्त्रयो दोषा अव्याप्ति-अतिव्याप्ति-
असम्भवास्तेऽप्यत्रैवान्तर्भवन्ति, न तु पञ्चभ्योऽधिकाः। तथाहि,
अतिव्याप्तिर्व्याप्यत्वासिद्धिः। विपक्षमात्राद्व्यावृत्तत्वात् सोपाधि-
जैसे 'अग्नि अनुष्ण है कृतक होने से घट के समान'। यहां कृतकत्व हेतु है। और
उसका जो साध्य अनुष्णत्व उसका अभाव [ उष्णत्व अग्नि में ] प्रत्यक्ष से ही
निश्चित है। त्वगिन्द्रिय से अग्नि में उष्णत्व का निश्चय होने से।
दूसरा भी कालात्ययापदिष्ट [ का उदाहरण ] है। जैसे घट के 'क्षणिकत्व'
की सिद्धि में पहिले कहा हुआ 'सत्त्व' हेतु। उस [ सत्त्व हेतु ] का भी जो साध्य
क्षणिकत्व उसका अभाव अक्षणिकत्व [ स्थिरत्व ] प्रत्यभिज्ञा तर्कादि रूप
[ सहकृत ] प्रत्यक्ष [ प्रमाण ] से ही निश्चित है। 'यह वही घट है जो मैंने
पहिले देखा था' इस पूर्वानुभव जनित संस्कार सहकृत इन्द्रिय से उद्भूत,
'प्रत्यभिज्ञा' [ पहिचान ] से पूर्वापर काल के परिज्ञान से, घट के स्थायित्व का
निश्चय होनेसे। [यह हेतु भी 'बाधितविषय' या कालात्ययापदिष्ट' हेत्वाभास है]।
यह असिद्ध आदि पांचों हेत्वाभास किसी न किसी प्रकार 'पक्षधर्मत्व' आदि
[ पञ्च रूपों ] में से किसी रूप से हीन होने से अहेतु [ हेत्वाभास ] हैं और
अपने साध्य को सिद्ध नहीं करते हैं।
और जो 'केवल व्यतिरेकी' हेतु रूप लक्षण के अव्याप्ति, अतिव्याप्ति और
असम्भव रूप तीन दोष [ माने जाते ] हैं वह भी इन्हीं [ हेत्वाभासों ] में अन्तर्गत
हो जाते हैं। वह इन पांच [ हेत्वाभासों ] से अलग नहीं हैं। जैसे कि अतिव्याप्ति
[ दोष ] ब्याप्यत्वासिद्ध [ हेत्वाभास के अन्तर्गत ] है। विपक्षमात्र से व्यावृत्त न