सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 322

अव्याप्त्यादयो दोषाः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५७
कत्वाच्च । यथा गौलक्षणस्य पशुत्वस्य । गोत्वे हि सास्नादिमत्त्वं प्रयोजकं,
न तु पशुत्वम् । तथा अव्याप्तिर्भागासिद्धत्वम् । यथा गौलक्षणस्य
शाबलेयत्वस्य । एवम् असम्भवोऽपि स्वरूपासिद्धिः । यथा गौलक्षणस्यैक-
शफत्वस्येति ।
होने और सोपाधिक होने के कारण । जैसे गौ के लक्षण 'पशुत्व' [ के करने पर ]
की [ अतिव्याप्ति व्याप्यत्वासिद्धि ही है ] । गोत्व में 'सास्नादिमत्त्व' ही प्रयोजक
है पशुत्व नहीं । [ प्रयोजक को ही 'उपाधि' कहते हैं । इसलिए यह सोपाधिक होने
से व्याप्यत्वासिद्ध है और विपक्ष महिषादि में विद्यमान होने से भी व्याप्यत्वासिद्ध
है ] । इसी प्रकार अव्याप्ति [ दोष ] भागासिद्ध [ के अन्तर्गत ] है । जैसे गो
लक्षण 'शाबलेयत्व' की [ अव्याप्ति भाग में असिद्ध होने से भागासिद्ध है और
भागासिद्ध स्वरूपासिद्ध का भेद है इसलिए अव्याप्ति स्वरूपासिद्ध के अन्तर्गत हो
जाती है । ] इसी प्रकार असम्भव [ दोष ] भी 'स्वरूपासिद्ध' है । जैसे गौलक्षण
'एकशफत्व' का [ असम्भवत्व दोष आश्रयरूप गो में न पाया जाने में स्वरूपा-
सिद्ध ही होता है ] ।
नवीन और प्राचीन हेत्वाभासों की तुलना—
इस प्रकार तर्कभाषाकार ने पाँच हेत्वाभासों का पूर्वापेक्षया कुछ अधिक
विस्तार से यहाँ दुबारा निरूपण किया है । यद्यपि यह सब न्याय-सम्मत
हेत्वाभास कहे गए हैं फिर भी प्राचीन न्याय-सूत्रोक्त और इन हेत्वाभासों
में कुछ अन्तर पाया जाता है । उनके नामों में भी कुछ अन्तर है और स्वरूप
में भी । न्याय-सूत्र में हेत्वाभासों के नाम इस प्रकार गिनाए गए हैं—
सव्यभिचार-विरुद्ध-प्रकरणसम-साध्यसम-अतीतकाला हेत्वाभासाः ।
तर्कभाषा के हेत्वाभासों में सबसे प्रथम 'असिद्ध' हेत्वाभास गिनाया गया है
परन्तु न्यायसूत्र में 'असिद्ध' का कहीं उल्लेख नहीं है । असिद्ध के स्थान पर वहाँ
'साध्यसम' नाम मिलता है जिसे 'असिद्ध' का स्थानापन्न मान सकते हैं । परन्तु
न्यायसूत्रों के 'साध्यसम' हेत्वाभास को यदि नवीन 'असिद्ध' हेत्वाभास के स्थान
पर माना भी जाय तो वह पूर्णतया सुसङ्गत नहीं होता है । क्योंकि तर्कभाषा में
'असिद्ध' के जो आश्रयासिद्ध, स्वरूपासिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध वह तीन भेद
किए हैं उस प्रकार के भेदों का न न्याय-सूत्रों में ही कोई उल्लेख मिलता है और
न उसके 'वात्स्यायन भाष्य' में ही । इसके अतिरिक्त 'साध्यसम' का जो उदाहरण
१. न्या० सू० १, १, ४५
१७ त० भा०