तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनिग्रहस्थानानि ] निग्रहस्थाननिरूपणम् २६३
सम्बद्धार्थवचनम् अर्थान्तरम्। उत्तरापरिस्फूर्तिः अप्रतिभा। पराभिमत-
स्वार्थस्य स्वप्रतिकूलस्य स्वयमेवाभ्यनुज्ञानं स्वीकारो मतानुज्ञा।
इष्टार्थभङ्गो विरोधः।
४—प्रकृत [विषय] से असम्बद्ध अर्थ को कहना 'अर्थान्तर' [निग्रहस्थान] है।
५—उत्तर न सूझना 'अप्रतिभा' [ निग्रहस्थान ] है।
६—दूसरे के अभीष्ट और अपने प्रतिकूल अर्थ को स्वयं स्वीकार कर 'लेना
'मतानुज्ञा' है।
७—[ अपने ] इष्ट अर्थ का [ स्वयं ] खण्डन कर देना 'विरोध' [ नामक
निग्रहस्थान ] है।
यहां तर्कभाषाकार ने केवल सात निग्रहस्थानों का उल्लेख किया परन्तु
न्यायसूत्र में २२ निग्रहस्थान इस प्रकार गिनाए गए हैं—
प्रतिज्ञाहानिः-प्रतिज्ञान्तरं-प्रतिज्ञाविरोधः-प्रतिज्ञासंन्यासो-हेत्वन्तरम्-अर्था-
न्तरम्-निरर्थकम्-अविज्ञातार्थम्-अपार्थकम्-अप्राप्तकालम्-न्यूनम्-अधिकम्-
पुनरुक्तम्-अननुभाषणम्-अज्ञानम्-अप्रतिभा-विक्षेपो-मतानुज्ञा-पर्यनुयोज्योपेक्षणं-
निरनुयोज्यानुयोगः-अपसिद्धान्तो हेत्वाभासाश्च निग्रहस्थानि। ५, १, १।
निग्रह-स्थानों की त्रिविध परम्परा—
जिन स्थितियों में आ जाने पर मध्यस्थ वादी अथवा प्रतिवादी को पराजित
घोषित कर सकता है उनका नाम 'निग्रहस्थान' है। इन नियमों का निर्धारण
भी सबसे पहिले न्यायसूत्रों में किया गया था। उसके आधार पर आयुर्वेद के
प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी उनका प्रतिपादन लगभग उसी रूप में पाया जाता
है। उसी से प्रारम्भ में बौद्ध आचार्यों ने भी उन निग्रहस्थानों को पूर्ण रूप से
ज्यों का त्यों ग्रहण कर लिया था। इस लिए उनके 'तर्कशास्त्र' तथा 'उपाय-
हृदय' आदि ग्रन्थों में निग्रहस्थानों का वर्णन न्याय तथा चरक के वर्णन से
मिलता हुआ पाया जाता है। परन्तु पीछे बौद्ध आचार्य 'धर्मकीर्ति' ने अपने
'वादन्याय' नामक ग्रन्थ में न्याय के निग्रहस्थानों का खण्डन करके स्वतन्त्र रूप
से अपने नए निग्रहस्थानों का निरूपण किया। इसी प्रवाह में जैन आचार्य
'अकलङ्कदेव' ने भी 'निग्रहस्थानों' के विषय में स्वतन्त्र रीति से विचार किया।
इस प्रकार निग्रहस्थानों के विषय में भी बौद्ध तथा जैन परम्परा को मिला कर
तीन प्रकार की विचारधारा पाई जाती है।