तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
मंगलाचरण, षोडश पदार्थोद्देश एवं प्रत्यक्ष प्रमाण मीमांसा
हिन्दी
तर्कभाषा
तर्क भाषा की हिन्दी व्याख्या
व्याख्याकार
आचार्य्य विश्वेश्वर
सिद्धान्त शिरोमणि
चौखम्भा संस्कृत संस्थान
पोस्ट बॉक्स नं. 1139, वाराणसी
॥ श्रीः ॥
काशी संस्कृत ग्रन्थमाला
१५५
केशवमिश्रप्रणीता
तर्कभाषा
'तर्करहस्यदीपिका' हिन्दीव्याख्याविभूषिता
व्याख्याकार
आचार्य विश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणि
अध्यक्ष, 'श्रीरामदास दर्शनपीठ
गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन
चौखम्बा संस्कृत संस्थान
भारतीय सांस्कृतिक साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक
पोस्ट बाक्स नं० ११३६
के ३७/११६, गोपाल मन्दिर लेन ( गोलघर समीप मैदागिन )
वाराणसी-२२१००१ ( भारत )
प्रकाशक : चौखम्भा संस्कृत संस्थान, वाराणसी
मुद्रक : चारू प्रिन्टर्स, वाराणसी
संस्करण : दशम्, वि० सं० २०५७
मूल्य : रु. ७५.०० 75-
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इस ग्रन्थ का परिष्कृत तथा परिवर्धित मूल-पाठ
एवं टीका, परिशिष्ट आदि के सर्वाधिकार
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THE
KASHI SANSKRIT SERIES
155
TARKABHĀṢĀ
OF
ŚRĪ KEŚAVA MIŚRA
With
Tarkarahasyadīpikā Hindi Commentary
By
ĀCHĀRYA VIŚWEŚHWAR SIDDHĀNTASIROMAṆI
( Adhyaksha, Śrī Rāmadāsa Darśana Pīṭha'
Gurukul University, Vrindawan. )
CHAUKHAMBHA SANSKRIT SANSTHAN
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Post Box. No. 1139
K. 37|116, Gopal Mandir Lane ( Golghar Near Maidagin )
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Tenth Edition : 2000
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समर्पणम्
गौतम और कणाद के आदर्शों से अनुप्राणित एक आदर्श आर्य
पिता के अनुरूप स्वर्णिम महत्वाकांक्षाओं के साथ जिन्होंने
अपने प्रिय पुत्र को 'गुरुकुल' में प्रविष्ट किया
केवल
पञ्चम कक्षा में पढ़ते समय ही 'न्यायदर्शन' का भाषानुवाद
उपहार स्वरूप उनके हाथों में देकर जिन्होंने उसके कोमल
हृदय में दार्शनिक प्रवृत्ति का बीजारोपण किया
और
फिर उस बीज को 'सुधा-सञ्चित' करने के लिए उसकी
स्नेहमयी माता को भी साथ लेकर जो तुरन्त
ही स्वर्ग सिधार गए
उन्हीं
प्रातःस्मरणीय पितृदेव श्री शिवलाल बख्शी महोदय
और
अखण्ड-सौभाग्य-शालिनी माता प्रेमवती देवी
की पुण्य-स्मृति में
उनकी अव्यक्त 'स्नेह-सुधा' से सिञ्चित उस
सङ्कल्प-तरु का यह मधुर फल
सादर समर्पित है।
[ पितृ-अमावास्या सं० २०१० ]
ग्रन्थकार का परिचय
इस ग्रन्थ के लेखक श्री आचार्य्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि, एम० ए०, गुरुकुल
विश्वविद्यालय, वृन्दावनके प्रतिष्ठित स्नातक हैं और सम्प्रति वहाँ के 'श्रीरामदास-दर्शन-पीठ'
के अध्यक्ष तथा गुरुकुल के आचार्य्य पद पर कार्य कर रहे हैं। आप मूलतः उत्तर प्रदेश के
पीलीभीत जिले के मकतुल ग्राम के रहने वाले हैं। गुरुकुल की शिक्षा समाप्त करनेके बाद
उच्चतर अध्ययन के लिए आप काशी गये और वहाँ रहकर आपने काशी के सुप्रसिद्ध
विद्वानों से भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र का विधिवत् विशेष अध्ययन किया ।
लेखन की प्रवृत्ति आप में प्रारम्भ से ही रही है। भारतीय दर्शन-शास्त्र को हिन्दी
भाषा में प्रस्तुत करने की आपने विशाल आयोजना बनाई हुई है। 'तर्क-भाषा' की
शैली पर ही आपने श्री उदयनाचार्य के ईश्वर-सिद्धि-विषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'न्यायकुसुमाञ्जलि'
की हरिदासीय विवृति पर विस्तृत हिन्दी व्याख्या लिखी हैं। इस 'न्यायकुसुमाञ्जलि' की
व्याख्या पर 'श्री हरजीमल डालमिया पुरस्कार समिति' दिल्ली की ओर से आपको एक
सहस्र रुपये का 'दर्शन-पुरस्कार' प्राप्त हुआ है।
दर्शन के अतिरिक्त साहित्य शास्त्र के चुने हुए प्रमुख ग्रन्थों की हिन्दी व्याख्याएँ
प्रस्तुत करने की योजना भी आपने बनाई हुई है। इस योजना के अनुसार 'आनन्दवर्धना-
चार्य' के ध्वन्यालोक', 'वामन' की 'काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति' तथा 'कुन्तक' के 'वक्रोक्ति-
जीवित' की हिन्दी व्याख्याएँ आप तैयार कर चुके हैं। 'हिन्दी ध्वन्यालोक' पर उत्तर-
प्रदेशके राजकीय शिक्षाविभाग ने ८००) का पुरस्कार देकर आपको सम्मानित किया है।
लेखक की अन्य कृतियाँ
'महात्मा ईसा' और 'प्रपञ्च-परिचय' लेखक की विद्यार्थी जीवन की प्रारम्भिक कृतियाँ
हैं। 'महात्मा ईसा' में माहात्मा ईसा की जीवन झाँकी के साथ उनकी धार्मिक भावनाओं
का तुलनात्मक विवेचन हैं। 'प्रपञ्च-परिचय' ईश्वर, जीव और प्रकृति विषयक दार्शनिक
मन्तव्यों से सम्बन्ध रखने वाला उच्च कोटि का दार्शनिक ग्रन्थ है।
पिछले दिनों आपने बौद्ध दर्शन के विषय में 'बौद्धदर्शन का उदय और अस्त' नामक
एक विशाल ग्रन्थ लिखा है।
संस्कृत-रचनाएँ
हिन्दी के साथ आप संस्कृत भाषा में भी ग्रन्थप्रणयन में लीन है। इधर आपने संस्कृत
में भी कई प्रौढ़ ग्रन्थों की रचना की हैं। आप की 'दर्शन-मीमांसा' दर्शन-शास्त्र के विषय
में नवीन दृष्टिकोण से लिखी गई एक महत्वपूर्ण कृति है। संस्कृत की कारिका प्रणाली में
इसकी रचना की गई हैं। इसके अतिरिक्त आपने फिलसफी के एथिक्स तथा साइकालोजी
विषयों पर क्रमशः 'नीति-शास्त्रम्' तथा 'मनोविज्ञान-शास्त्रम्' नामक दो पुस्तकें गद्यात्मक
संस्कृत में लिखी हैं। अधिकांशों विद्वानों ने इनकी अत्यधिक प्रशंसा की है।
संस्कृत में कारिकात्मक शैली से ही 'साहित्य मीमांसा' 'वैदिक साहित्य कौमुदी' तथा
'पाश्चात्यं तर्कशास्त्रम्' नामक तीन प्रौढ़ ग्रन्थ आपने और लिखे हैं। 'साहित्य मीमांसा' में
प्राचीन तथा आधुनिक आलोचना तथा साहित्य के रस, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि समस्त
सम्प्रदायों का परिचय दिया गया है और 'वैदिक साहित्य कौमुदी' में वेद, ब्राह्मण,
आरण्यकार, उपनिषद्, कल्पसूत्र, आदि के साहित्य का परिचय दिया है।
भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र पर मौलिक ग्रन्थ लेखन तथा संस्कृत वाङ्मयके चुने
हुए कुछ अन्य ग्रन्थों की विशद हिन्दी-व्याख्याएँ प्रस्तुत करने की योजना आपके हाथ में है।
आभार प्रदर्शन
श्रीमान सेठ रामदास जी आये
ने
अपनी धर्मशील धर्मपत्नी
श्रीमती राजकुंवर देवी
के
सत्परामर्श
से
दर्शनग्रन्थों की रचना एवं अध्यापन
के लिए
तीस सहस्र रुपये की राशि
से
गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन।
में
'श्री रामदास दर्शन पीठ'
की
स्थापना की है
इस 'श्री रामदास दर्शन पीठ' के तत्वावधान में
तर्कभाषा की हिन्दी व्याख्या
प्रस्तुत की गई है
अत एव इन दम्पति के प्रति
हम
आभार प्रदर्शित करते हैं ।
'तर्करहस्यदीपिका' हिन्दीव्याख्या में उद्धृत ग्रन्थों की सूची
पृष्ठ | पृष्ठ
१ अथर्ववेद १ | २० न्यायसिद्धान्त मुक्तावली २१, ५३,
२ अभिधर्म कोश ११८ | ५९, १७१
३ आवश्यक निर्युक्ति ११८ | २१ न्यायबिन्दु टीका ४३, १००
४ इन्डियन साइकोलाजी ५१ | २२ न्याय प्रवेश १००
५ ऋग्वेद १५४ | २३ परीक्षा मुख सूत्र १३०
६ एन आइडियलिस्ट व्यू आफ लाइफ ६७ | २४ पाराशर उपपुराण ३
७ कठोपनिषद् १५२ | २५ पूर्वी और पश्चिमी दर्शन ६६
८ चरक ८८ | २६ प्रशस्तपादभाष्य ९८, १००, १०४,
९ तर्कभाषा १७-१८ | ११२, १२६, १७५,
१० तत्व संग्रहकारिका १००-१३० | २०१, २०२
११ दर्शन मीमांसा ६, ७, ४४, ६१, ६२, | २७ प्रमाणनयप्रवेश १०३
६५, ७०, ९७, १०१, | २८ प्रमाण मीमांसा १३०
१०२, १०७, ११४, | २९ प्रकरण पञ्चिका ४२
११६, १२८, १३०, | ३० प्रमाण समुच्चय ४३, ५०
१३१, १४३, १४४, | ३१ बृहती ४२
१५३-१६३ | ३२ माठर वृत्ति [ सांख्यकारिका ] ९८
१२ निरुक्त १ | ३३ मीमांसा शाबरभाष्य ९८, ११८
१३ नैषध १८, २६, २११, | ३४ मीमांसा श्लोकवार्तिकम् २, ५१.
१४ न्याय सूत्र ३, ८, १६, ४५, ९८, | ८, १२९
१०२, ११८. १२६, १४५, | ३५ मुण्डकोपनिषद् १५२, १५५
१६४, १६९, २२७, २६७, | ३६ योग दर्शन १५, २५, ६५
१५ न्यायसूत्र वात्सायन भाष्य ८, ११, | ३७ वैशेषिक दर्शन १११, ११२, १७२, २०८
१३, १६, २३, ६४, ७१, | ३८ शास्त्रदीपिका ४२
७८, १०४, १६९, १७२ | ३९ सर्वदर्शन संग्रह १२९, १३०, १७३,
१६ न्याय वार्तिक तात्पर्य टीका ४१ | १९४, २०२
१७ न्यायमञ्जरी ११, ४१, १२९ | ४० सांख्यकारिका ९८, २३४
१८ न्याय कन्दली ९, ४१, ११८, १२९ | ४१ सांख्यतत्त्वकौमुदी ६६, ९९, १२६
१९ न्याय कुसुमाञ्जली २५, ४१, ११३ | ४२ सांख्यप्रवचन भाष्य ६६, ११८
दो शब्द
हिन्दी आज हमारी 'राष्ट्रभाषा' है। उसको विश्व की अन्य समृद्ध भाषाओं
के समान विश्वजनीन एवं वैभवशालिनी बनाने के लिए उसके साहित्यिक भण्डार
को सर्वाङ्गपूर्ण बनाना प्रत्येक भारतीय विद्वान् का कर्तव्य है। इस उद्देश्य की
पूर्ति के लिए जहाँ उपार्जित वैभव के रूप में आज के आधुनिक कला एवं विज्ञान
आदि विषयों पर साहित्यनिर्माण की आवश्यकता है वहां इस राष्ट्रभाषा की
जननी देवभाषा संस्कृत के परम्परागत साहित्यिक वैभव को हिन्दी के माध्यम
के द्वारा आज के समाज के सामने सुन्दर और भव्य रूप में प्रस्तुत करना भी
आवश्यक ही है। इसी दृष्टि से संस्कृत साहित्य एवं दर्शन के कुछ चुने हुए प्रथम
श्रेणी के ग्रन्थों पर विस्तृत हिन्दी व्याख्याएं प्रस्तुत करने की एक सुसम्बद्ध
योजना बनाई गई है ओर उस पर कार्य हो रहा है। इस योजना के अन्तर्गत
श्री आनन्दवर्धनाचार्य के साहित्य शास्त्र के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' की
हिन्दी व्याख्या गतवर्ष प्रकाशित हो चुकी है। उसी ग्रन्थमाला के द्वितीय पुष्प
के रूप में आज 'तर्कभाषा' की यह हिन्दी व्याख्या प्रकाशित हुई है। 'वामन'
की 'काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति' तथा कुन्तक के 'वक्रोक्तिजीवितम्' की हिन्दी व्याख्या
छप रही है और उदयनाचार्य की 'न्यायकुसुमाञ्जलि' की हरिदासी विवृति की
हिन्दी व्याख्या प्रेस में जा रही है।
'तर्कभाषा' न्यायशास्त्र का—जो भारतीय दर्शन का प्रवेश द्वार है—
प्रारम्भिक ग्रन्थ है। इसलिए उसको वस्तुतः भारतीय दर्शन का प्रवेश द्वार भी
कहा जा सकता है। जिस प्रकार भवन निर्माण में वास्तु कलाकार उसके प्रवेश
द्वार को सुरुचिपूर्ण बनाने का विशेष प्रयत्न करता है इसी प्रकार इस दार्शनिक
प्रवेश द्वार के निर्माता श्री केशवमिश्र ने इसको अत्यन्त सुन्दर एवं उपयोगी
बनाने का प्रयत्न किया है। इस विषय पर 'तर्कसंग्रह' आदि जितने भी ग्रन्थ
लिखे गये हैं, 'तर्कभाषा' उन सब में सबसे सुन्दर ग्रन्थ है।
यों तो 'तर्कभाषा' मुख्यतः न्याय का ग्रन्थ है परन्तु उसमें अन्य शास्त्रों की
चर्चा भी अनेक स्थानों पर हुई है। वैशेषिक दर्शन तो न्यायदर्शन का 'समान
तन्त्र' ही कहा जाता है। इसलिए इसमें उसके सिद्धान्तों का पूर्णरूप से वर्णन किया
गया है। परन्तु उसके अतिरिक्त वेदान्त, मीमांसा तथा बौद्धदर्शन के सिद्धान्तों
की चर्चा भी की गई है। इस संक्षिप्त ग्रन्थ में केशवमिश्र ने जहाँ तहाँ सारांशरूप
में अन्य दर्शनों के सिद्धान्तों का अनुवाद करके 'युक्तिलेशोक्तिपूर्वक' उनका जो
खण्डन किया है वह बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है। केशवमिश्र की लेखनशैली यों
भी बड़ी मनोहर और हृदयग्राहिणी है। उस पर उनकी इस तुलनात्मक एवं
आलोचनात्मक विवेचनशैली ने उनकी इस कृति को 'चार चांद' लगा दिये हैं।
( १० )
ऐसे सुन्दर ग्रन्थ की हिन्दी व्याख्या में भी मूल ग्रन्थ की मुख्य विशेषताओं
को बनाए रखना आवश्यक था। मूल ग्रन्थ का केवल हिन्दी भाषान्तर मात्र कर
देने से ग्रन्थ का सौन्दर्य प्रस्फुटित होना सम्भव नहीं था। उसके लिए प्रायः
प्रत्येक स्थल पर विशद व्याख्या की आवश्यकता थी। फिर भारतीय न्यायशास्त्र
के निर्माण में ब्राह्मण विद्वानों के अतिरिक्त बौद्ध तथा जैन विद्वानों का भी बहुत
बड़ा हाथ रहा है। केशवमिश्र ने जिस तुलनात्मक पद्धति का अवलम्बन किया
था उसको ध्यान में रखते हुए हिन्दी व्याख्या में भी यथास्थान उनके सिद्धान्तों
की तुलनात्मक विवेचना आवश्यक थी अन्यथा यह व्याख्या मूल ग्रन्थ के वैभव के
अनुरूप नहीं हो सकती थी। अत एव इन सब ही बातों का यथेष्ट ध्यान रखते
हुए ही यह हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत की गई है।
इस हिन्दी व्याख्या की एक बड़ी विशेषता यह है कि विशेष महत्वपूर्ण
तुलनात्मक स्थलों पर व्याख्याकार ने विषय को अपनी स्वरचित संस्कृतकारि-
काओं में संगृहीत कर दिया है। इस प्रकार की कुल २३१ कारिकाएं भी इसमें
सम्मिलित हो गई हैं। यह कारिकाएं व्याख्याकार के ‘दर्शनमीमांसा’ नामक
दूसरे ग्रन्थ का अंश हैं। इन कारिकाओं से विषय को समझने में तथा स्मरण
रखने में विशेष सहायता मिलने की आशा है।
पाठकों की सुविधा के लिए ग्रन्थ के मुद्रण में मूल ग्रन्थ के अनुवाद भाग
तथा व्याख्या भाग को अलग-अलग टाइपों में छापा गया है। अनुवाद भाग
की प्रधानता को ध्यान में रख कर उसको इटैलिक टाइप में और शेष व्याख्या
भाग को पाइका टाइप में छापा गया है। इस दो प्रकार के टाइप के प्रयोग से
ग्रन्थ पढ़ते समय पाठकों को विशेष सुविधा होगी। जो पाठक मूल ग्रन्थ का
केवल अनुवाद भाग पढ़ना चाहेंगे वह केवल इटैलिक टाइप में छपे भाग को
बड़ी सुविधा से पढ़ सकेंगे और जो व्याख्या भाग से लाभ उठाना चाहेंगे वह
भी इसमें सरलता अनुभव करेंगे।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन का भार ‘चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय बनारस’ के
अध्यक्ष श्री जयकृष्णदास जी गुप्त ने स्वीकार कर इसे सुन्दर रूप में प्रकाशित
करने का प्रयत्न किया है, इसके लिए वे धन्यवाद के अधिकारी हैं। पुस्तक का
प्रूफ देखने में पर्याप्त सावधान रहने पर भी कहीं-कहीं अनर्थकर अशुद्धियाँ रह ही
गई हैं। इसका हमें बहुत खेद है। अगले संस्करण में उन सब त्रुटियों को दूर
करने का प्रयत्न किया जायगा।
गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन ।
७ अक्टूबर १९५३ } विश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणि
तर्कभाषा तथा 'तर्करहस्यदीपिका' व्याख्या की विषयसूची
═════════❖═════════
स्तम्भ १ (बायाँ स्तम्भ)
[ उपोद्धात पृ० १—१२ ] पृष्ठ
१ अनुबन्ध चतुष्टय १
२ नामकरण ३
३ पाश्चात्य तर्क ४
४ नवीन तथा प्राचीन शैली का भेद ४
५ दर्शनमीमांसा का संग्रह १-४ श्लोक ६
६ दो प्रकार के प्रकरण ग्रन्थ
दर्शनमीमांसा का संग्रह ५-१२ श्लोक ७
१ पदार्थाद्देश ८
६ शास्त्र प्रवृत्ति के भेद ९
७ विभाग १०
८ लक्षण का लक्षण ११
९ लक्षण का प्रयोजन १२
[ १ प्रमाण पदार्थ : पृ० १३—४५ ]
२ प्रमाणलक्षण १३
११ पदकृत्य १३
३ प्रमालक्षण १४
१२ अप्रमालक्षण १५
१३ संशय तथा तर्क का अप्रमात्व १६
१४ ज्ञान के भेद १७
१५ स्मृति और प्रत्यभिज्ञा १८
४ करणलक्षण १९
५ कारणलक्षण १९
१६ अन्यथासिद्ध २१
५ लक्षणान्तर खण्डन २३
६ समवायिकारणलक्षण २५
७ अयुतसिद्धलक्षण २६
१७ विशेषलक्षण २७
८ समवायलक्षण ३१
९ निर्गुणोत्पत्ति ३३
स्तम्भ २ (दायाँ स्तम्भ)
पृष्ठ
१० असमवायिकारणलक्षण ३६
११ निमित्तकारणलक्षण ३९
१२ प्रमाण के अन्य लक्षण का खण्डन ३९
१८ धारावाहिक के विषय में न्यायमत ४०
१९ ,, ,, में मीमांसकमत ४१
२० ,, ,, बौद्धमत ४३
२१ ,, ,, जैनमत ४३
२४ दर्शनमीमांसा संग्रह १२-२१ श्लोक ४४
[ प्रत्यक्षनिरूपण पृ० ४६–७० ]
१३ प्रत्यक्षलक्षण ४६
२५ सविकल्पक निर्विकल्पक भेद ४६
१४ त्रिविध करण ४८
१५ अवान्तर व्यापार ५०
२६ निर्विकल्पक ज्ञान के विषय में
वैयाकरण मत ५१
२७ विषयक द्विविध न्याय मत ५२
१६ षोढा सन्निकर्ष ५३
२८ अलौकिक त्रिविध सन्निकर्ष
२९ दर्शन मीमांसा का संग्रह २२-२८ श्लोक ६१
३० ,, ,, २९-३२ श्लोक ६२
३१ चाक्षुष प्रत्यक्ष का वैज्ञानिक प्रकार ६२
३२ न्याय में वैज्ञानिक प्रकार का मूल ६४
३३ दर्शन मीमांसा का संग्रह ३३-३५ श्लोक ६५
३४ चाक्षुष प्रत्यक्ष के विषय में सांख्य
आदि की प्रक्रिया ६५
३५ प्रत्यक्ष के विषय में पाश्चात्य मत ६६
३६ प्रत्यक्ष के विषय में बौद्धमत ६७
१७ बौद्धमत का खण्डन ६९
३७ दर्शन मीमांसा का संग्रह ३६-४१ श्लोक ७०
[ अनुमान निरूपण पृ० ७१–१०५ ]
१८ अनुमान का लक्षण ७१
[ १२ ]
पृष्ठ
१९ लिङ्ग का लक्षण ७२
२० परामर्श का लक्षण ७२
३८ उपाधि का निरूपण ७२
२१ औपाधिकसम्बन्ध ७५
२२ परामर्शरूप तृतीयज्ञान की
अपरिहार्यता ७७
२३ अनुमान के दो भेद ७९
२४ स्वार्थानुमान ७९
२५ परार्थानुमान ८०
२६ अन्वय व्यतिरेक व्याप्ति ८१
२७ अन्वयव्यतिरेकी हेतु ८२
२८ केवलव्यतिरेकी हेतु ८३
२९ केवलान्वयी हेतु ८५
३० हेतु के पञ्चरूप ८६
३९ पक्ष, सपक्ष, विपक्ष निरूपण ८६
३१ पक्ष सपक्ष विपक्ष लक्षण ९०
३२ हेत्वाभास ९२
३३ असिद्ध के तीन भेद ९३
३४ विरुद्ध, अनैकान्तिक
प्रकरण ९४
३५ बाधित विषय ९५
४० अनुमान की आवश्यकता ९६
४१ दर्शनमीमांसा संग्रह ४२-४८ श्लोक ९७
४२ अनुमान का लक्षण और भेद ९८
४३ बौद्ध परम्परा में अनुमान के भेद १००
४४ तर्कभाषा में अनुमान के भेद १००
४५ पञ्चावयवों के प्रयोग में भेद १०३
४६ हेतु के पञ्चरूप १०४
४७ दर्शनमीमांसा संग्रह ४९-५८ श्लोक १०१
४८ ” ” ५९ ६१ श्लोक १०२
४९ परार्थानुमान के पञ्चावयव १०२
[उपमाननिरूपण पृ० १०६-१०७]
३६ उपमान का लक्षण १०६
५० उपमान के विषय में सांख्य,
वैशेषिक आदि का न्याय से भेद १०१
पृष्ठ
५१ दर्शनमीमांसा संग्रह ६२-६९ श्लोक १०७
[ शब्दनिरूपण पृ० १०८-११४ ]
३७ शब्द का लक्षण १०८
३८ वाक्य का लक्षण १०८
३९ आकांक्षाद १०९
४० पदलक्षण ११०
५२ शब्द के विषय में वैशेषिक मत १११
५३ ” ” प्रभाकर मत ११२
५४ अभिहितान्वयवाद तथा
अन्विताभिधानवाद ११३
५५ दर्शनमीमांसा संग्रह ७०-७१श्लोक ११४
[ अर्थापत्ति निरूपण ११५-११६ ]
४१ अर्थापत्ति का लक्षण ११५
४२ अनुमान में अन्तर्भाव ११५
५६ दर्शनमीमांसा संग्रह ७२-७८ श्लोक ११६
[ अभाव निरूपण ११६-१२८ ]
४३ अभाव प्रमाण का उपपादन
पूर्वपक्ष ११७
४४ अभाव का प्रत्यक्ष से ग्रहण
सिद्धान्त पक्ष ११७
इन्द्रिय और अभाव का सम्बन्ध
५७ सम्बन्ध का लक्षण ११९
५६ विशेष्यविशेषण भावादि के
सम्बन्धत्व का खण्डन १२२
४७ अभावप्रमाण का खण्डन १२४
५८ उपमान के विषय में सांख्यमत १२५
५९ अभाव के विषय में सांख्यमत १२७
६० अभाव के विषय में वैशेषिक मत १२७
६१ प्रमाण संख्याविषयक मतभेद १२७
६२ दर्शनमीमांसा संग्रह ७९-८० श्लोक १२८
[प्रामाण्यवाद निरूपण १२८-१४४]
६३ प्रामाण्यवाद के विषय में विभिन्न
दर्शनों के मत १२९
[ १३ ]
पृष्ठ | पृष्ठ
६४ दर्शनमीमांसा का संग्रह | ५६ शरीरनिरूपण
८१-८५ श्लोक १३० | [ द्वितीय प्रमेय ] १६३
६५ मीमांसक मत का उपपादन १३१ | ५७ इन्द्रियनिरूपण
६६ नैयायिकमत से स्वतःप्रामाण्य | [ तृतीय प्रमेय ] १६४
का खण्डन १३३ | ५८ अर्थनिरूपण
६७ परतः प्रामाण्य का उपपादन १३४ | [ चतुर्थ प्रमेय ] १६८
४८ ज्ञाततान्यथानुपपत्तिप्रसूता | ५९ द्रव्यनिरूपण [ एक ]
अर्थापत्ति से ज्ञान और | ७८ मीमांसाभिमत तमो द्रव्य १७०
प्रामाण्य का ग्रहण १३६ | तमो द्रव्य का खण्डन १७१
४९ ज्ञातता का मण्डन १३७ | ५९ पृथिवीनिरूपण [क] १७८
५० मीमांसक द्वारा ज्ञातता का | ७९ पाकजोत्पत्ति विधान १७३
उपपादन १३८ | ८० पीलूपाक तथा पिठरपाक १७४
५१ विषय नियम का स्वाभा- | ८१ वैशेषिक का 'पी
[ १४ ]
पृष्ठ
८४ द्वित्वविनाश प्रक्रिया १९५
८५ आश्रयनाश से द्वित्वनाश १९६
८६ सहानवस्थान विरोध पक्ष १९७
८७ वध्यघातक विरोध पक्ष १९७
७९ परिमाण निरूपण [६] १९८
८० पृथक्त्व निरूपण [७] २००
८१ संयोग निरूपण [८] २०१
८२ विभाग निरूपण [९] २०२
८३ परत्व अपरत्व निरूपण
[ १०-११ ] २०३
८४ गुरुत्व निरूपण [१२] २०४
८५ द्रवत्व निरूपण [१३] २०५
८६ स्नेह निरूपण [१४] २०५
८७ शब्द निरूपण [१५] २०५
८८ वीचीतरङ्ग न्याय २०६
८९ कदम्ब मुकुल न्याय २०७
८८ अनित्यत्व लक्षण २०९
८९ योगिसद्भाव में प्रमाण २०९
९० बुद्धि निरूपण [१६] २१०
[L2
भूमिका
प्रदीपः सर्वविद्यानां उपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां शश्वदान्वीक्षिकी मता ॥
न्यायशास्त्र उच्चकोटि के संस्कृत साहित्य और विशेषतः भारत के दार्शनिक
साहित्य का प्रवेशद्वार है। उसके प्राथमिक परिज्ञान के बिना संस्कृत साहित्य के
किसी भी उँचे ग्रन्थ को फिर चाहे वह व्याकरण, काव्य, अलङ्कार, आयुर्वेद,
धर्मशास्त्र आदि दर्शन से सर्वथा असम्बद्ध विषयों का ही क्यों न हो यथार्थरूप से
समझ सकना कठिन है और दार्शनिक साहित्य में तो उसके बिना एक पग भी
चल सकना असम्भव ही है। न्याय और व्याकरण ये दोनों संस्कृत साहित्य का
प्रौढ पाण्डित्य प्राप्त करने के लिए आधारस्तम्भ का काम करते हैं। न्यायशास्त्र
पर जिसका जितना ही परिष्कृत अधिकार होगा अन्य शास्त्रों में उसका प्रवेश
उतनी ही सरलता और वैसी ही अबाध गति से हो सकता है। न्यायशास्त्र वस्तुतः
बुद्धि को सुपरिष्कृत, तीव्र और विशद बनाने वाला शास्त्र है। सान पर रखे हुए
शस्त्र द्वारा छेदनकार्य जैसे सुकर हो जाता है, न्याय संस्कारों से सुसंस्कृत मति के
लिए शास्त्राभ्यास का कार्य भी वैसे ही सुगम बन जाता है। परन्तु न्यायशास्त्र
जहाँ इतना आवश्यक और उपयोगी है वहाँ उतना ही कठिन भी है। विशेषतः
नव्य न्याय की रचना तो मानो सभी शास्त्रों की दुर्बोधता को एकत्र करके ही की
गई है। नव्य न्याय जैसा दुर्बोध विषय दूसरा नहीं है। संस्कृत के छात्र उसके
'परिष्कारों' को लोहे के चने कहते हैं, जो किसी अंश में भी अत्युक्ति नहीं है।
जिन्होंने अपने जीवन के सबसे सुन्दर, सबसे सुखद और सबसे अधिक बहुमूल्य
बारह-बारह वर्ष नव्य न्याय के उन्हीं परिष्कारों की भेंट चढ़ा दिए हैं ऐसे त्यागी और
तपस्वी विद्वानों की आज भी कमी नहीं है। पर उनकी संख्या प्रतिदिन कम होती
जा रही है। आज के भोग-प्रधान युग में 'ब्राह्मणेन निष्कारणो धर्मः षडङ्गो वेदोऽ-
ध्येयो ज्ञेयश्च' का आदर्श सामने रख कर कठोर साधना करने वाले इन तपस्वी
विद्वानों के उस तप और त्याग की कहानी बड़ी करुण जान पड़ती है। परन्तु
भारतीय दर्शनशास्त्र के इतिहास में वह सदा सुवर्णाक्षरों में अङ्कित रहेगी। उस
अपरिमित और उदात्त तप के बाद शान्ति और सन्तोष के साथ—
अधीतमध्यापितमर्जितं यशः, न शोचनीयं किमपीह विद्यते ।
अतः परं श्रीभवनाथशर्मणां, मनो मनोहारिणि जाह्नवीतटे ॥
के कृतज्ञतापूर्ण शब्दों में अपने जीवन की चरितार्थता को उद्घोषित करने
वाली वे अमर आत्माएँ धन्य हैं।
न्यायशास्त्र का आरम्भ कब, कैसे और कहाँ हुआ इसका कोई निश्चित विवरण
संस्कृत साहित्य में नहीं मिलता फिर भी उसके प्रतिपाद्य विषय का मनन करने से
[ १६ ]
उसके आविष्कार की कहानी का कुछ आभास पाया जा सकता है। किसी एक
विषय को लेकर विशुद्ध जिज्ञासा-भाव से अथवा जय-पराजय की आकांक्षा से
अनेक विद्वान् पुरुषों में परस्पर जो शास्त्रचर्चा होती है उसी का नाम क्रमशः 'वाद'
और 'जल्प' है। न्यायशास्त्र की सारी शक्ति 'वाद' और 'जल्प' अथवा शास्त्रचर्चा के
इस स्वरूप को परिमार्जित, परिष्कृत और नियमित करने में ही व्यय हुई है ऐसा
स्पष्ट प्रतीत होता है। वादी और प्रतिवादी को अपने.२ विषय का प्रतिपादन किस
शैली से करना चाहिए, कौन सी ऐसी त्रुटियाँ हैं जो उनके पक्ष को कमजोर बना
देती हैं; प्रतिपक्षी को कैसे अवसर पर निगृहीत कर लेना चाहिए, वाद-विवाद की
शैली और इन्हीं दाँव-पेंचों का विशद विवरण न्यायशास्त्र के बहुत बड़े भाग में
मिलता है। इसके अतिरिक्त न्यायशास्त्र का जो कुछ अंश बचता है वह देहादि से
व्यतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता-साधन में व्यय हुआ है। बस यह दो और
केवल यही दो न्यायशास्त्र के प्रतिपाद्य विषय हैं। इन दोनों विषयों का ध्यान कर
उस परिस्थिति का जिसमें न्यायशास्त्र का निर्माण हुआ, अनुमान सहज ही में
लगाया जा सकता है।
यह कहने की आवश्यकता नहीं कि न्यायशास्त्र के इन दोनों विषयों में से एक
साध्य है और दूसरा साधन । देहादि से अतिरिक्त नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध
करना ही न्यायशास्त्र का प्रमुख और सैद्धान्तिक भाग है। यह दूसरी बात है कि
परिस्थितियों के वशीभूत होकर अपने विषयों का प्रतिपादन करते समय उसने
साध्य को गौण और साधन-भाग को प्रधान बना दिया है। न्यायशास्त्र के प्रधान
प्रतिपाद्य-विषय आत्मवाद को देखकर यह सहज ही समझा जा सकता है कि
आत्मवाद और नैरात्म्यवाद के सङ्घर्ष में ही न्यायशास्त्र का आदि सूत्रपात हुआ है।
और उनके पारस्परिक वाद-विवादों से ही न्यायशास्त्र का विकास हुआ है।
वस्तुतः देखा जाय तो न्याय-दर्शन मनुष्य के विचारों का परिशोधक और
संरक्षक है। वात्स्यायन ने 'प्रमाणैरर्थपरीक्षणं न्यायः' के शब्दों में न्याय का जो
स्वरूप निर्दिष्ट किया है, वह भी इसी बात का पोषक है। प्रमाण और तर्क
[युक्तियों] के द्वारा किसी सिद्धान्त [अर्थ] की परीक्षा करना न्याय का कार्य
है। इस दृष्टि से मनुष्य जब किसी विषय में कोई सिद्धान्त स्थिर करता है वहीं
न्याय की सहायता अपेक्षित होती है। इसलिए न्याय-दर्शन विचारशील मानव
समाज की मौलिक आवश्यकता और प्राथमिक उद्भावना है। उसके विना मनुष्य
न अपने विचारों एवं सिद्धान्तों को परिष्कृत तथा सुस्थिर ही कर सकता है और न
प्रतिपक्षी के सैद्धान्तिक आघातों से अपने सिद्धान्त की रक्षा ही कर सकता है।
अपने सिद्धान्तों के परिष्कार, रक्षा और प्रचार कार्य में मनुष्य का सबसे बड़ा
सहायक न्याय शास्त्र ही है। इसीलिए न्याय-दर्शन के 'जल्प' और 'वितण्डा' का
प्रयोजन बतलाते हुए भाष्यकार ने लिखा है—
'तत्त्वाध्यवसायसंरक्षणार्थं जल्पवितण्डे, कण्टकशाखावरणवत्'
[ १७ ]
जिस प्रकार किसी छोटे पौधे की रक्षा करने के लिए उसके चारों ओर काँटों
की बाड़ लगा दी जाती है इसी प्रकार सिद्धान्त या तत्त्व की रक्षा के लिए
जल्प-वितण्डा आदि न्यायाङ्ग, काँटेदार बाड़े के समान हैं।
इस सिद्धान्त को समझ लेने से हमें न्याय शास्त्र के विविध स्वरूपों को या उन
परिवर्तनों को जो कि समय २ पर उसमें होते रहे हैं समझने में सहायता मिलेगी।
'अर्थपरीक्षा' और 'तत्त्वाध्यवसाय-संरक्षण' यही न्याय शास्त्र के प्रधान कार्य हैं इस
लिए उसका स्वरूप बहुत कुछ मानव-विचारों के ऊपर अवलम्बित है। जिस प्रकार
पृथ्वी में सभी प्रकार के पोषक तत्त्व हैं, हम अपने चर्म-चक्षुओं से उन्हें भले ही न
देख सकें पर नीम और नीबू, अंगूर और आम, केला और कटहल सभी अपने २
पोषक तत्त्व उसी पृथ्वी में से खींच लेते हैं और अपने फलों द्वारा उन विरोधी तत्त्वों
के अस्तित्व को मूर्त्तरूप में हमारे सामने प्रस्तुत कर देते हैं, इसी प्रकार विचार क्षेत्र
और प्रमाण क्षेत्र में भी हर प्रकार के तत्त्व विद्यमान हैं। हर विचार के और हर
सिद्धान्त के पोषक तत्त्व उसमें मिल सकते हैं। विचार क्षेत्र से उन तत्त्वों को खींच
कर अपने सिद्धान्त को परिपुष्ट करना और उन तत्त्वों को मूर्त्तरूप दे देना यही
न्यायशास्त्र का कार्य है। इसलिए बहुधा दो विरोधी सिद्धान्तों के समर्थन एवं
संरक्षण का भार न्यायशास्त्र पर ही आता है, और न्यायशास्त्र उन दोनों ही
सिद्धान्तों की पुष्टि के लिए आवश्यक उपकरण उसी सामान्य क्षेत्र से निकाल कर
जुटाता है। 'आत्मा है' की पुष्टि भी न्यायशास्त्र ही करता है और 'आत्मा नहीं है'
इसकी पुष्टि का उत्तरदायित्व भी न्यायशास्त्र पर ही आता है। हम उसे 'बौद्धन्याय'
नाम से अलग करने का यत्न भले ही करें पर है तो वह न्यायशास्त्र ही। ऐसी
अवस्था में मूलतः एक ही तत्त्व होने पर भी उसके बाह्यस्वरूप में परिवर्तन हो
जाता है और एक ही न्यायशास्त्र प्राचीन न्याय, नव्यन्याय; बौद्धन्याय, जैन न्याय,
पौरस्त्यन्याय, पाश्चात्त्यन्याय आदि के विविधस्वरूपों में हमारे सामने आता है।
न्यायशास्त्र के विकास पर धार्मिक प्रभाव—
भारतीय साहित्य में न्याय शास्त्र का पथनिर्देश प्रायः धार्मिक भावना ने किया
है। समाज में जिस प्रकार की धार्मिक क्रान्तियां समय २ पर होती गईं न्यायशास्त्र
के स्वरूप पर उसका प्रभाव स्पष्ट रूप से अङ्कित होता गया। वह प्रभाव इतना
व्यापक और इतना स्थायी है कि विभिन्न काल में निर्मित न्याय साहित्य पर
उसकी छाप स्पष्ट दिखाई देती है। इस प्रभाव की परख को ध्यान में रखते हुए
यदि हम सम्पूर्ण न्याय साहित्य का विश्लेषण करें तो हमें उसके तीन भाग
बिल्कुल अलग २ दिखाई देंगे, जिन्हें हम प्राचीन न्याय, मध्य न्याय और नव्य
न्याय के नाम से निर्दिष्ट कर सकते हैं। न्याय दर्शन का प्रादुर्भाव बुद्ध भगवान् के
जन्म के पूर्व हो चुका था। न्याय शास्त्र के प्रवर्तक गौतम ऋषि के गोत्रज होने से
ही कदाचित् वह गौतम बुद्ध कहे जाते हैं। इसलिए बौद्धधर्म के प्रादुर्भाव और
प्रतिष्ठा से पूर्व का न्याय 'प्राचीन न्याय' कहलाता है; बौद्ध और जैन धर्म के
२ त० भ०
[ १८ ]
यौवनकाल का 'बौद्ध न्याय' तथा जैन-न्याय 'मध्य कालीन न्याय' है और बौद्ध-
धर्म के पतन एवं ब्राह्मण धर्म के पुनरुत्थान काल का न्याय 'नव्य न्याय' के नाम
से विख्यात है।
भारत के धार्मिक जगत् में बौद्ध धर्म एक भीषण क्रान्ति के रूप में उत्पन्न
हुआ और वि० पू० पञ्चम शताब्दी से लेकर दश शताब्दी वै० तक १५०० वर्ष
उसने देश के धार्मिक एवं राजनीतिक क्षेत्र को व्यापक रूप में प्रभावित किया।
परन्तु उसके बाद वह भारत से एकदम लुप्त हो गया। भारत के सीमावर्ती तिब्बत
चीन, ब्रह्मा, लङ्का आदि देशों में बौद्धधर्म का प्रचार हो जाने के बाद भारत में
उसका प्रभाव बहुत काल तक स्थिर नहीं रह सका। वह आँधी की तरह आया,
राज्याश्रय ने उसे उत्तेजना दी, लगभग पन्द्रह सौ वर्ष बाद फिर जैसे सब कुछ
साफ हो गया केवल साहित्य में जहाँ-तहाँ उसके कुछ चिह्न अवशिष्ट रह गए।
बौद्धधर्म के उन्हीं साहित्यिक भग्नावशेषों में मध्यकालीन 'बौद्ध-न्याय' है। 'बौद्ध
न्याय' के समकालीन तथा समान तन्त्र 'जैनन्याय' की भी लगभग वही स्थिति
है। परन्तु न विदेशों में उसका उतना प्रचार हुआ और न भारत से उसका
विलोप ही हुआ।
वह बौद्धन्याय [ तथा जैन न्याय ] एक आँधी या क्रान्ति की स्मृति या
भग्नावशेष भले ही हो परन्तु उसका अपना स्वतन्त्र व्यक्तित्व है और वह व्यक्तित्व
इतना ज़बरदस्त है कि उसने दार्शनिक साहित्य और विशेषतः ब्राह्मणों के न्याय
साहित्य को अलग दो टुकड़ों में बाँट दिया है। बौद्धधर्म से पूर्व का प्राचीन न्याय
अलग है और बौद्धधर्म के ह्रास के बाद का नव्य न्याय अलग है। उन दोनों
की रचना शैली इतनी भिन्न हो गई है कि उनको मिलाने का यत्न करने पर भी
वे मिल नहीं सकते। उन दोनों के बीच अविचल खड़ा हुआ 'मध्य न्याय' या बौद्ध
न्याय जैसे आज भी उनके सारे बल-पौरुष-प्रयत्न को विफल कर रहा है।
प्राचीन और नवीन न्याय के बीच 'बौद्ध न्याय' जो अपना एक अलग अस्तित्व
रखता है उसका कारण उसकी धार्मिक विशेषता है। बौद्धधर्म अनात्मवादी धर्म है
और उसके पूर्वोत्तरवर्ती धर्म आत्मवादी धर्म हैं। इसलिए जहाँ प्राचीन और
नवीन न्याय आत्मास्तित्व-पोषक तत्त्व जुटाने का प्रयत्न करते हैं वहाँ बौद्धन्याय
अनात्मवाद-पोषक तत्त्वों का संग्रह करने में व्यस्त है। इसलिए उसका व्यक्तित्व
उन दोनों से अलग स्पष्ट ही दीख रहा है।
न्यायशास्त्र के दो युग—
न्याय साहित्य के जो यह तीन प्रमुख विभाग हमने किए हैं, इनकी भी सूक्ष्म
विवेचना करने से उनमें से प्रत्येक में अनेक स्तर [ तह ] दिखाई देते हैं जो उसके
विभिन्न-कालिक प्रभावों को परिलक्षित करते हैं। उदाहरण के लिए प्राचीन न्याय
को लीजिए। रचना की दृष्टि से इसके दो भाग अत्यन्त स्पष्ट हैं। एक में मूल सूत्र
और दूसरे में भाष्य, वार्त्तिक, तात्पर्य टीका आदि का समावेश होता है। इनमें से न
[ १६ ]
मूल सूत्रों का निर्माण एक दिन में हुआ है और न भाष्यवार्तिक आदि का, दोनों के
निर्माण में शताब्दियाँ लगी हैं। भाष्य, वार्तिक, तात्पर्य टीका आदि अलग २ ग्रन्थ
हैं इसलिए उनके ऊपर इन शताब्दियों का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। परन्तु
मूल सूत्र अलग २ पुस्तकें नहीं हैं। वह एक पुस्तक के रूप में उपलब्ध होते हैं
इसलिए उनके भीतर शताब्दियों का प्रभाव सहज में नहीं देखा जा सकता फिर
भी जिन संघर्षों में होकर न्याय-सूत्रों को अन्तिम स्वरूप मिल सका है उनका
प्रभाव छिप नहीं सकता है।
यों तो न्याय शास्त्र का सारा जीवन ही संघर्ष का जीवन रहा है। आत्मा
और अनात्मा के इस संघर्ष से उसका जन्म हुआ, इसीसे उसका विकास हुआ,
इसीसे वह जी रहा है और जिस दिन मरेगा-उस दिन इसी संघर्ष में वीरगति लाभ
करेगा। परन्तु इस संघर्षमय जीवन में उसके शत्रुगण विविध रूपों में उसके
प्रतिपक्ष में खड़े हुये हैं। जिस आदि अनात्मवाद के संघर्ष से न्याय शास्त्र को
जन्मलाभ हुआ वह अनात्मवाद कुछ दूसरी ही चीज थी परन्तु कुछ समय बाद
न्यायशास्त्र के यौवनकाल में उसी अनात्मवाद ने बौद्ध दर्शन के नैरात्म्यवाद के
नवीन रूप में आकर उससे लोहा लिया है।
१ साध्यप्रधानयुग—
उपनिषदों में अनेक स्थलों पर अनात्मवादी अथवा देहात्मवादी मतों का उल्लेख
मिलता है। कठोपनिषत् १, ९ 'येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति
चैके' और छान्दोग्य नवमाध्याय के इन्द्र-विरोचन के उपाख्यान में जिस अनात्म-
वाद और देहात्मवाद का उल्लेख हुआ है वह विचार उस काल से भी बहुत पूर्व
की सम्पत्ति हैं। ऐसे विचारों का परिशोधन कर नित्य आत्मा के अस्तित्व को
प्रतिष्ठित करना ही उपनिषदों का ध्येय है। उसी उद्देश्य की पूर्ति के लिये लगभग
उसी समय के आस पास न्यायशास्त्र का भी सूत्रपात हुआ। यह न्यायशास्त्र का
'साध्यप्रधान' अथवा 'अध्यात्मप्रधान' युग था। उसमें विशुद्ध जिज्ञासा भाव से
शङ्का-समाधान होता था। परन्तु जय या पराजय की भावना उसमें नहीं थी।
ऐसे अनेक प्रसङ्गों की चर्चा उपनिषदों में आई है। उन प्रसङ्गोंमें दोनों पक्ष अपनी-
अपनी बात को समझाने के लिये युक्ति और प्रमाणों का आश्रय लेते थे। उनको
भी सिद्धान्तों के परिशोधन एवं संरक्षण के लिये न्यायशास्त्र की सहायता की आव-
श्यकता होती थी। परन्तु वह जो कुछ थी, जिज्ञासा-भाव से, मूलतत्त्व को समझने
के लिये। श्रद्धापूर्वक, समित्पाणि होकर, जिज्ञासाभाव से लोग उपस्थित होते थे
आत्मदर्शी ऋषियों के आश्रम में। वैसे ही प्रेम भाव से अपने सम्पूर्ण अनुभव को
जिज्ञासु के हृदय में उड़ेल देने की आकुलता के साथ ऋषियों के उत्तर होते थे।
और यदि एक बार में समझ में नहीं आते तो दूसरे दिन दूसरे प्रकार से और
तीसरे दिन तीसरे प्रकार से उसी बात को समझाया जाता था। उद्देश्य था आत्म-
तत्त्व का ज्ञान प्राप्त करना, वह जिस प्रक्रिया से भी हो सके वही ठीक है—