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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 11, कुल 330 में से

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ऐसे सुन्दर ग्रन्थ की हिन्दी व्याख्या में भी मूल ग्रन्थ की मुख्य विशेषताओं
को बनाए रखना आवश्यक था। मूल ग्रन्थ का केवल हिन्दी भाषान्तर मात्र कर
देने से ग्रन्थ का सौन्दर्य प्रस्फुटित होना सम्भव नहीं था। उसके लिए प्रायः
प्रत्येक स्थल पर विशद व्याख्या की आवश्यकता थी। फिर भारतीय न्यायशास्त्र
के निर्माण में ब्राह्मण विद्वानों के अतिरिक्त बौद्ध तथा जैन विद्वानों का भी बहुत
बड़ा हाथ रहा है। केशवमिश्र ने जिस तुलनात्मक पद्धति का अवलम्बन किया
था उसको ध्यान में रखते हुए हिन्दी व्याख्या में भी यथास्थान उनके सिद्धान्तों
की तुलनात्मक विवेचना आवश्यक थी अन्यथा यह व्याख्या मूल ग्रन्थ के वैभव के
अनुरूप नहीं हो सकती थी। अत एव इन सब ही बातों का यथेष्ट ध्यान रखते
हुए ही यह हिन्दी व्याख्या प्रस्तुत की गई है।
इस हिन्दी व्याख्या की एक बड़ी विशेषता यह है कि विशेष महत्वपूर्ण
तुलनात्मक स्थलों पर व्याख्याकार ने विषय को अपनी स्वरचित संस्कृतकारि-
काओं में संगृहीत कर दिया है। इस प्रकार की कुल २३१ कारिकाएं भी इसमें
सम्मिलित हो गई हैं। यह कारिकाएं व्याख्याकार के ‘दर्शनमीमांसा’ नामक
दूसरे ग्रन्थ का अंश हैं। इन कारिकाओं से विषय को समझने में तथा स्मरण
रखने में विशेष सहायता मिलने की आशा है।
पाठकों की सुविधा के लिए ग्रन्थ के मुद्रण में मूल ग्रन्थ के अनुवाद भाग
तथा व्याख्या भाग को अलग-अलग टाइपों में छापा गया है। अनुवाद भाग
की प्रधानता को ध्यान में रख कर उसको इटैलिक टाइप में और शेष व्याख्या
भाग को पाइका टाइप में छापा गया है। इस दो प्रकार के टाइप के प्रयोग से
ग्रन्थ पढ़ते समय पाठकों को विशेष सुविधा होगी। जो पाठक मूल ग्रन्थ का
केवल अनुवाद भाग पढ़ना चाहेंगे वह केवल इटैलिक टाइप में छपे भाग को
बड़ी सुविधा से पढ़ सकेंगे और जो व्याख्या भाग से लाभ उठाना चाहेंगे वह
भी इसमें सरलता अनुभव करेंगे।
इस ग्रन्थ के प्रकाशन का भार ‘चौखम्बा संस्कृत पुस्तकालय बनारस’ के
अध्यक्ष श्री जयकृष्णदास जी गुप्त ने स्वीकार कर इसे सुन्दर रूप में प्रकाशित
करने का प्रयत्न किया है, इसके लिए वे धन्यवाद के अधिकारी हैं। पुस्तक का
प्रूफ देखने में पर्याप्त सावधान रहने पर भी कहीं-कहीं अनर्थकर अशुद्धियाँ रह ही
गई हैं। इसका हमें बहुत खेद है। अगले संस्करण में उन सब त्रुटियों को दूर
करने का प्रयत्न किया जायगा।
गुरुकुल विश्वविद्यालय, वृन्दावन ।
७ अक्टूबर १९५३ } विश्वेश्वरसिद्धान्तशिरोमणि