तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंग्रन्थकार का परिचय
इस ग्रन्थ के लेखक श्री आचार्य्य विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि, एम० ए०, गुरुकुल
विश्वविद्यालय, वृन्दावनके प्रतिष्ठित स्नातक हैं और सम्प्रति वहाँ के 'श्रीरामदास-दर्शन-पीठ'
के अध्यक्ष तथा गुरुकुल के आचार्य्य पद पर कार्य कर रहे हैं। आप मूलतः उत्तर प्रदेश के
पीलीभीत जिले के मकतुल ग्राम के रहने वाले हैं। गुरुकुल की शिक्षा समाप्त करनेके बाद
उच्चतर अध्ययन के लिए आप काशी गये और वहाँ रहकर आपने काशी के सुप्रसिद्ध
विद्वानों से भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र का विधिवत् विशेष अध्ययन किया ।
लेखन की प्रवृत्ति आप में प्रारम्भ से ही रही है। भारतीय दर्शन-शास्त्र को हिन्दी
भाषा में प्रस्तुत करने की आपने विशाल आयोजना बनाई हुई है। 'तर्क-भाषा' की
शैली पर ही आपने श्री उदयनाचार्य के ईश्वर-सिद्धि-विषयक प्रसिद्ध ग्रन्थ 'न्यायकुसुमाञ्जलि'
की हरिदासीय विवृति पर विस्तृत हिन्दी व्याख्या लिखी हैं। इस 'न्यायकुसुमाञ्जलि' की
व्याख्या पर 'श्री हरजीमल डालमिया पुरस्कार समिति' दिल्ली की ओर से आपको एक
सहस्र रुपये का 'दर्शन-पुरस्कार' प्राप्त हुआ है।
दर्शन के अतिरिक्त साहित्य शास्त्र के चुने हुए प्रमुख ग्रन्थों की हिन्दी व्याख्याएँ
प्रस्तुत करने की योजना भी आपने बनाई हुई है। इस योजना के अनुसार 'आनन्दवर्धना-
चार्य' के ध्वन्यालोक', 'वामन' की 'काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति' तथा 'कुन्तक' के 'वक्रोक्ति-
जीवित' की हिन्दी व्याख्याएँ आप तैयार कर चुके हैं। 'हिन्दी ध्वन्यालोक' पर उत्तर-
प्रदेशके राजकीय शिक्षाविभाग ने ८००) का पुरस्कार देकर आपको सम्मानित किया है।
लेखक की अन्य कृतियाँ
'महात्मा ईसा' और 'प्रपञ्च-परिचय' लेखक की विद्यार्थी जीवन की प्रारम्भिक कृतियाँ
हैं। 'महात्मा ईसा' में माहात्मा ईसा की जीवन झाँकी के साथ उनकी धार्मिक भावनाओं
का तुलनात्मक विवेचन हैं। 'प्रपञ्च-परिचय' ईश्वर, जीव और प्रकृति विषयक दार्शनिक
मन्तव्यों से सम्बन्ध रखने वाला उच्च कोटि का दार्शनिक ग्रन्थ है।
पिछले दिनों आपने बौद्ध दर्शन के विषय में 'बौद्धदर्शन का उदय और अस्त' नामक
एक विशाल ग्रन्थ लिखा है।
संस्कृत-रचनाएँ
हिन्दी के साथ आप संस्कृत भाषा में भी ग्रन्थप्रणयन में लीन है। इधर आपने संस्कृत
में भी कई प्रौढ़ ग्रन्थों की रचना की हैं। आप की 'दर्शन-मीमांसा' दर्शन-शास्त्र के विषय
में नवीन दृष्टिकोण से लिखी गई एक महत्वपूर्ण कृति है। संस्कृत की कारिका प्रणाली में
इसकी रचना की गई हैं। इसके अतिरिक्त आपने फिलसफी के एथिक्स तथा साइकालोजी
विषयों पर क्रमशः 'नीति-शास्त्रम्' तथा 'मनोविज्ञान-शास्त्रम्' नामक दो पुस्तकें गद्यात्मक
संस्कृत में लिखी हैं। अधिकांशों विद्वानों ने इनकी अत्यधिक प्रशंसा की है।
संस्कृत में कारिकात्मक शैली से ही 'साहित्य मीमांसा' 'वैदिक साहित्य कौमुदी' तथा
'पाश्चात्यं तर्कशास्त्रम्' नामक तीन प्रौढ़ ग्रन्थ आपने और लिखे हैं। 'साहित्य मीमांसा' में
प्राचीन तथा आधुनिक आलोचना तथा साहित्य के रस, ध्वनि, वक्रोक्ति आदि समस्त
सम्प्रदायों का परिचय दिया गया है और 'वैदिक साहित्य कौमुदी' में वेद, ब्राह्मण,
आरण्यकार, उपनिषद्, कल्पसूत्र, आदि के साहित्य का परिचय दिया है।
भारतीय दर्शन तथा साहित्य शास्त्र पर मौलिक ग्रन्थ लेखन तथा संस्कृत वाङ्मयके चुने
हुए कुछ अन्य ग्रन्थों की विशद हिन्दी-व्याख्याएँ प्रस्तुत करने की योजना आपके हाथ में है।