तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 10, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंदो शब्द
हिन्दी आज हमारी 'राष्ट्रभाषा' है। उसको विश्व की अन्य समृद्ध भाषाओं
के समान विश्वजनीन एवं वैभवशालिनी बनाने के लिए उसके साहित्यिक भण्डार
को सर्वाङ्गपूर्ण बनाना प्रत्येक भारतीय विद्वान् का कर्तव्य है। इस उद्देश्य की
पूर्ति के लिए जहाँ उपार्जित वैभव के रूप में आज के आधुनिक कला एवं विज्ञान
आदि विषयों पर साहित्यनिर्माण की आवश्यकता है वहां इस राष्ट्रभाषा की
जननी देवभाषा संस्कृत के परम्परागत साहित्यिक वैभव को हिन्दी के माध्यम
के द्वारा आज के समाज के सामने सुन्दर और भव्य रूप में प्रस्तुत करना भी
आवश्यक ही है। इसी दृष्टि से संस्कृत साहित्य एवं दर्शन के कुछ चुने हुए प्रथम
श्रेणी के ग्रन्थों पर विस्तृत हिन्दी व्याख्याएं प्रस्तुत करने की एक सुसम्बद्ध
योजना बनाई गई है ओर उस पर कार्य हो रहा है। इस योजना के अन्तर्गत
श्री आनन्दवर्धनाचार्य के साहित्य शास्त्र के महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ 'ध्वन्यालोक' की
हिन्दी व्याख्या गतवर्ष प्रकाशित हो चुकी है। उसी ग्रन्थमाला के द्वितीय पुष्प
के रूप में आज 'तर्कभाषा' की यह हिन्दी व्याख्या प्रकाशित हुई है। 'वामन'
की 'काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति' तथा कुन्तक के 'वक्रोक्तिजीवितम्' की हिन्दी व्याख्या
छप रही है और उदयनाचार्य की 'न्यायकुसुमाञ्जलि' की हरिदासी विवृति की
हिन्दी व्याख्या प्रेस में जा रही है।
'तर्कभाषा' न्यायशास्त्र का—जो भारतीय दर्शन का प्रवेश द्वार है—
प्रारम्भिक ग्रन्थ है। इसलिए उसको वस्तुतः भारतीय दर्शन का प्रवेश द्वार भी
कहा जा सकता है। जिस प्रकार भवन निर्माण में वास्तु कलाकार उसके प्रवेश
द्वार को सुरुचिपूर्ण बनाने का विशेष प्रयत्न करता है इसी प्रकार इस दार्शनिक
प्रवेश द्वार के निर्माता श्री केशवमिश्र ने इसको अत्यन्त सुन्दर एवं उपयोगी
बनाने का प्रयत्न किया है। इस विषय पर 'तर्कसंग्रह' आदि जितने भी ग्रन्थ
लिखे गये हैं, 'तर्कभाषा' उन सब में सबसे सुन्दर ग्रन्थ है।
यों तो 'तर्कभाषा' मुख्यतः न्याय का ग्रन्थ है परन्तु उसमें अन्य शास्त्रों की
चर्चा भी अनेक स्थानों पर हुई है। वैशेषिक दर्शन तो न्यायदर्शन का 'समान
तन्त्र' ही कहा जाता है। इसलिए इसमें उसके सिद्धान्तों का पूर्णरूप से वर्णन किया
गया है। परन्तु उसके अतिरिक्त वेदान्त, मीमांसा तथा बौद्धदर्शन के सिद्धान्तों
की चर्चा भी की गई है। इस संक्षिप्त ग्रन्थ में केशवमिश्र ने जहाँ तहाँ सारांशरूप
में अन्य दर्शनों के सिद्धान्तों का अनुवाद करके 'युक्तिलेशोक्तिपूर्वक' उनका जो
खण्डन किया है वह बड़ा ही सुन्दर बन पड़ा है। केशवमिश्र की लेखनशैली यों
भी बड़ी मनोहर और हृदयग्राहिणी है। उस पर उनकी इस तुलनात्मक एवं
आलोचनात्मक विवेचनशैली ने उनकी इस कृति को 'चार चांद' लगा दिये हैं।