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स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

20 ग्रंथ और ग्रंथकार
मल्लिषेण हरिभद्रसूरिकी कोटिके सरल प्रकृतिके उदार और मध्यस्थ विचारोंके विद्वान थे । सिद्धसेन
आदि जैन विद्वानोंकी तरह मल्लिषेण भी 'सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंके समूहको जैनदर्शन' प्रतिपादित कर 'अन्ध-
गजन्याय' का उपयोग करते हैं । अन्य दर्शनोंके विद्वानोंके लिये पशु, वृषभ आदि असभ्य शब्दोंका प्रयोग न
कर वेदान्तियोंका सम्यग्दृष्टि, व्यासका ऋषि, कपिलका परमर्षि, उदयनका प्रामाणिकप्रकाण्ड रूपसे उल्लेख
करना, तथा श्वेताम्बर परंपराके अनुयायी होते हुए भी समंतभद्र, विद्यानन्द आदि दिगम्बर विद्वानोंके उद्धरण
निःसंकोच भावसे प्रस्तुत करना मल्लिषेणकी धार्मिक सहिष्णुताके साथ उनके समदर्शीपनेको प्रमाणित करता
है । स्याद्वादमंजरीमें सर्वज्ञसिद्धिकी चर्चाके प्रसंगपर भी मल्लिषेण स्त्रीमुक्ति और केवलिमुक्ति जैसे दिगम्बर
और श्वेताम्बर सम्प्रदायके विवादस्थ प्रश्नोंके विषयमें मौन रहते हैं, इससे भी प्रतीत होता है कि अन्य दिग-
म्बर एवं श्वेताम्बर आचार्योंकी तरह मल्लिषेणको साम्प्रदायिक चर्चाओंमें रस नहीं था । अनेक वृक्षोंसे पुष्पों-
को चुनने के समान, अनेक दर्शन संबंधी शास्त्रोंसे प्रमेयोंको चुन-चुनकर, निस्सन्देह मल्लिषेणसूरिने 'अकृत्रिम-
बहुमति' स्याद्वादमंजरी नामकी माला गूंथकर जैनन्यायको समलंकृत किया है ।
स्याद्वादमंजरीका विहंगावलोकन
श्लोक १-३
ये श्लोक स्तुतिरूप हैं । इनमें चार अतिशयों सहित भगवानके यथार्थवादका प्ररूपण करते हुए उनके
शासनको सर्वोत्कृष्टता बताई गई है ।
श्लोक ४-१०
इन छह श्लोकोंमें न्याय-वैशेषिकोंके निम्न सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) सामान्य और विशेष भिन्न पदार्थ नहीं हैं ।
( २ ) वस्तुको एकान्त-नित्य अथवा एकान्त-अनित्य मानना न्यायसंगत नहीं है ।
( ३ ) एक, सर्वव्यापी, सर्वज्ञ, स्वतंत्र और नित्य ईश्वर जगतका कर्ता नहीं हो सकता ।
( ४ ) धर्म-धर्मीमें समवाय संबंध नहीं बन सकता ।
( ५ ) सत्ता ( सामान्य ) भिन्न पदार्थ नहीं है ।
( ६ ) ज्ञान आत्मासे भिन्न नहीं है ।
( ७ ) आत्माके बुद्धि आदि गुणोंके नाश होनेको मोक्ष नहीं कह सकते ।
( ८ ) आत्मा सर्वव्यापक नहीं हो सकती ।
( ९ ) छल, जाति, निग्रहस्थान आदि तत्त्व मोक्षके कारण नहीं हो सकते ।
तथा—
( क ) तम ( अंधकार ) अभावरूप नहीं है, वह आकाशकी तरह स्वतंत्र द्रव्य है, और पौद्गलिक है।
( ख ) 'अप्रच्युत, अनुत्पन्न और सदास्थिरत्व' नित्यका लक्षण मानना ठीक नहीं । 'पदार्थके स्वरूप-
का नाश नहीं होना' ही नित्यका लक्षण ठीक हो सकता है ।
( ग ) किरणें गुणरूप नहीं हैं, उन्हें तैजस पुद्गलरूप मानना चाहिये ।
( घ ) नैयायिकोंके प्रमाण, प्रमेय आदिके लक्षण दोषपूर्ण हैं ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( अ ) जैनदृष्टिसे आकाश आदिमें नित्यानित्यत्व,
( ब ) पतंजलि, प्रशस्तकार और बौद्धोंके अनुसार वस्तुओंका नित्यानित्यत्व,
( स ) अनित्यैकान्तवादी बौद्धोंके क्षणिकवादमें दूषण,

टीकाकार मल्लिषेण 21
( ड ) वैदिकसंहिता, स्मृति आदिके वाक्योंमें पूर्वापरविरोध, तथा
( इ ) केवलिसमुद्घात अवस्थामें जैनसिद्धान्तके अनुसार आत्म-व्यापकताकी संगतिका प्ररूपण किया
गया है ।
श्लोक ११-१२
इन श्लोकोंमें पूर्वमीमांसकोंके निम्न सिद्धान्तोंपर विचार किया गया है—
( १ ) वेदोंमें प्रतिपादित हिंसा धर्मका कारण नहीं हो सकती ।
( २ ) श्राद्ध करनेसे पितरोंकी तृप्ति नहीं होती ।
( ३ ) अपौरुषेय वेदको प्रमाण नहीं मान सकते ।
( ४ ) ज्ञानको स्वपरप्रकाशक न माननेसे अनेक दूषण आते हैं, इसलिये ज्ञानको स्व और परका
प्रकाशक मानना चाहिये ।
इसके अतिरिक्त इन श्लोकोंमें—
( क ) जिनमंदिरके निर्माण करनेका विधान,
( ख ) सांख्य, वेदान्त और व्यास ऋषि द्वारा याज्ञिक हिंसाका विरोध, तथा
( ग ) ज्ञानको अनुव्यवसायगम्य माननेवाले न्याय-वैशेषिकोंका खंडन किया गया है ।
श्लोक १३
इस श्लोकमें ब्रह्माद्वैतवादियोंके मायावादका खंडन है । यहांपर प्रत्यक्ष प्रमाणको विधि और निषेध
रूप प्रतिपादन किया है ।
श्लोक १४
इस श्लोकमें एकान्त-सामान्य और एकान्त-विशेष वाच्य-वाचक भावका खंडन करते हुए कथंचित्
सामान्य और कथंचित् विशेष वाच्य-वाचक भावका समर्थन किया गया है । इस श्लोकमें निम्न महत्वपूर्ण
विषयों का प्रतिपादन है—
( १ ) केवल द्रव्यास्तिकनय अथवा संग्रहनयको माननेवाले अद्वैतवादी, सांख्य और मीमांसकोंका
सामान्यैकान्तवाद मानना युक्तियुक्त नहीं है ।
( २ ) केवल पर्यायास्तिकनयको माननेवाले बौद्धोंका विशेषैकान्तवाद ठीक नहीं है ।
( ३ ) केवल नैगमनयको स्वीकार करनेवाले न्याय-वैशेषिकोंका स्वतन्त्र और परस्पर निरपेक्ष
सामान्य-विशेषवाद मानना ठीक नहीं है ।
तथा—
( क ) शब्द आकाशका गुण नहीं है, वह पौद्गलिक है, और सामान्य-विशेष दोनों रूप है ।
( ख ) आत्मा भी कथंचित् पौद्गलिक है ।
( ग ) अपोह, सामान्य अथवा विधिको शब्दार्थ नहीं मान सकते ।
श्लोक १५
इस श्लोकमें सांख्योंकी निम्न मान्यताओंकी समीक्षा की गई है—
( १ ) चित्शक्ति ( पुरुष ) को ज्ञानसे शून्य मानना परस्पर विरुद्ध है ।
( २ ) बुद्धि ( महत् ) का जड़ मानना ठीक नहीं है । अहंकारको भी आत्माका ही गुण मानना
चाहिये, बुद्धिका नहीं ।

२४ ग्रंथ और ग्रंथकार
( ३ ) सत्कार्यवाद माननेवाले सांख्य लोगोंका आकाश आदिका पांच तन्मात्राओंसे उत्पत्ति मानना
असंगत है ।
( ४ ) बंध पुरुषके ही मानना चाहिये, प्रकृतिके नहीं ।
( ५ ) वाक्, पाणि आदिको पृथक् इन्द्रिय नहीं कह सकते, इसलिये पांच ही इन्द्रियां माननी चाहिये ।
( ६ ) केवल ज्ञानमात्रसे मोक्ष नहीं हो सकता ।
श्लोक १६-१९
इन श्लोकोंमें बौद्धोंके निम्न मुख्य सिद्धांतोंपर विचार किया गया है—
( १ ) प्रमाण और प्रमाणके फलको सर्वथा अभिन्न न मानकर कथंचित् भिन्नाभिन्न मानना चाहिये ।
( २ ) सम्पूर्ण पदार्थोंको एकान्त रूपसे क्षणध्वंसी न मानकर उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य सहित स्वी-
कार करना चाहिये ।
( ३ ) पदार्थोंके ज्ञानमें तदुत्पत्ति और तदाकारताको कारण न मानकर क्षयोपशम रूप योग्यताको ही
कारण मानना चाहिये ।
( ४ ) विज्ञानवादी बौद्धोंका विज्ञानाद्वैत मानना ठीक नहीं है ।
( ५ ) प्रमाता, प्रमेय आदि प्रत्यक्ष आदि प्रमाणोंसे सिद्ध होते हैं, इसलिये माध्यमिक बौद्धोंका शून्य-
वाद युक्तिसंगत नहीं है ।
( ६ ) बौद्धोंके क्षणभंगवादमें अनेक दोष आते हैं, अतः क्षणभंगवादका सिद्धांत दोषपूर्ण है ।
( ७ ) क्षणभंगवादकी सिद्धिके लिये नाना क्षणोंकी परम्परारूप वासना अथवा संतानको मानना भी
ठीक नहीं ।
तथा—
( क ) नैयायिकोंके प्रमाण और प्रमितिमें एकान्त-भेद नहीं बन सकता ।
( ख ) आत्माकी सिद्धि ।
( ग ) सर्वज्ञकी सिद्धि ।
श्लोक २०
इस श्लोकमें चार्वाक मतके सिद्धांतोंका खण्डन किया गया है ।
श्लोक २०-२९
इन श्लोकोंमें स्वपक्षका समर्थन करते हुए स्याद्वादकी सिद्धि की गई है । इन श्लोकोंमें निम्न सिद्धां-
तोंका प्रतिपादन किया गया है—
( १ ) प्रत्येक वस्तु उत्पाद, व्यय और ध्रौव्यसे युक्त है । द्रव्यकी अपेक्षा वस्तुमें ध्रौव्य और पर्यायकी
अपेक्षा सदा उत्पाद और व्यय होता है । उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य परस्पर सापेक्ष हैं ।
( २ ) आत्मा, धर्मास्तिकाय, अधर्मास्तिकाय आदि सम्पूर्ण द्रव्योंमें नाना अपेक्षाओंसे नाना धर्म रहते
हैं, अतएव प्रत्येक वस्तुको अनन्तधर्मात्मक मानना चाहिये । जो वस्तु अनन्तधर्मात्मक नहीं होती, वह वस्तु
सत् भी नहीं होती ।
( ३ ) प्रमाणवाक्य और नयवाक्यसे वस्तुमें अनन्त धर्मोंकी सिद्धि होती है । प्रमाणवाक्यको सकला-
देश और नयवाक्यको विकलादेश कहते हैं । पदार्थके धर्मोंका काल, आत्मरूप, अर्थ, संबंध, उपकार गुणिदेश,
संसर्ग और शब्दकी अपेक्षा अभेदरूप कथन करना सकलादेश; तथा काल, आत्मरूप आदिकी भेदविवक्षासे
पदार्थोंके धर्मोंका प्रतिपादन करना विकलादेश है । स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादवक्तव्य, स्यादस्तिअवक्तव्य,

टीकाकार मल्लिषेण 23
स्यान्नास्तिअवक्तव्य, और स्यादस्तिनास्तिअवक्तव्यके भेदसे सकलादेश और विकलादेश प्रमाणसप्तभंगी और
नयसप्तभंगीके सात सात भेदोंमें विभक्त है ।
( ४ ) स्याद्वादियोंके मतमें स्व द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा वस्तुमें अस्तित्व और पर द्रव्य,
क्षेत्र, काल और भावकी अपेक्षा नास्तित्व है । जिस अपेक्षासे वस्तुमें अस्तित्व है, उसी अपेक्षासे वस्तुमें
नास्तित्व नहीं है । अतएव सप्तभंगी नयमें विरोध, वैयधिकरण्य, अनवस्था, संकर, व्यतिकर, संशय, अप्रतिपत्ति
और अभाव नामक दोष नहीं आ सकते ।
( ५ ) द्रव्यार्थिक नयकी अपेक्षा वस्तु नित्य, सामान्य, अवाच्य, और सत् है, तथा पर्यायार्थिक नयकी
अपेक्षा अनित्य, विशेष, वाच्य और असत् है । अतएव नित्यानित्यवाद, सामान्यविशेषवाद, अभिलाप्यानभि-
लाप्यवाद तथा सदसद्वाद इन चारों वादोंका स्याद्वादमें समावेश हो जाता है ।
( ६ ) नयरूप समस्त एकांतवादोंका समन्वय करनेवाला स्याद्वादका सिद्धांत ही सर्वमान्य हो सकता है।
( ७ ) भावाभाव, द्वैताद्वैत, नित्यानित्य आदि एकांतवादोंमें सुख-दुख, पुण्य-पाप, बन्ध-मोक्ष आदिकी
व्यवस्था नहीं बनती ।
( ८ ) वस्तुके अनन्त धर्मोंमेंसे एक समयमें किसी एक धर्मकी अपेक्षा लेकर वस्तुके प्रतिपादन करने-
को नय कहते हैं। इसलिये जितने तरहके वचन होते हैं, उतने ही नय हो सकते हैं। नयके एकसे लेकर
संख्यात भेद तक हो सकते हैं। सामान्यसे नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवंभूत ये
सात भेद किये जाते हैं। न्याय-वैशेषिक केवल नैगमनयके, अद्वैतवादी और सांख्य केवल संग्रहनयके, चार्वाक
केवल व्यवहारनयके, बौद्ध केवल ऋजुसूत्रनयके, और वैयाकरण केवल शब्दनयके माननेवाले हैं । प्रमाण
सम्पूर्ण नयरूप होता है । नयवाक्योंमें स्यात् शब्द लगाकर बोलनेको प्रमाण कहते हैं । प्रत्यक्ष और परोक्षके
भेदसे प्रमाणके दो भेद होते हैं ।
( ९ ) जितने जीव व्यवहारराशिसे मोक्ष जाते हैं, उतने ही जीव अनादि निगोदकी अव्यवहार-
राशिसे निकलकर व्यवहारराशिमें आ जाते हैं, और यह अव्यवहारराशि आदिरहित है, इसलिये जीवोंके
सतत मोक्ष जाते रहनेपर भी संसार जीवोंसे कभी खाली नहीं हो सकता ।
( १० ) पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पतिमें जीवत्वकी सिद्धि ।
( ११ ) प्रत्येक दर्शन नयवादमें गर्भित होता है । जिस समय नयरूप दर्शन परस्पर निरपेक्ष भावसे
वस्तुका प्रतिपादन करते हैं, उस समय ये दर्शन परसमय कहे जाते हैं। जिस प्रकार सम्पूर्ण नदियां एक समुद्रमें
जाकर मिलती है, उसी तरह अनेकांत दर्शनमें सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय होता है, इसलिये जैनदर्शन
स्वसमय है ।
श्लोक ३०-३२
यहाँ महावीर भगवानकी स्तुतिका उपसंहार करते हुए अनेकांतवादसे ही जगतका उद्धार होनेकी
शक्यताका प्रतिपादन किया गया है ।

जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान
एकेनाकर्षन्ती श्लथयन्ती वस्तुत्वमितरेण ।
अन्तेन जयति जैनी नीतिमन्थानमिव गोपी ।। ( अमृतचन्द्र )
स्याद्वादका मौलिक रूप और उसका रहस्य—विज्ञानने इस बातको भले प्रकार सिद्ध कर दिया
है कि जिस पदार्थको हम नित्य और ठोस समझते हैं, वह पदार्थ बड़े वेगसे गति कर रहा है, जो हमें काले, पीले,
लाल आदि रंग दिखाई पड़ते है, वे सब सफेद रंगके रूपान्तर हैं, जो सूर्य हमें छोटासा और बिलकुल पास
दिखाई देता है, वह पृथिवी मंडलसे साढ़े बारह लाख गुना बड़ा और यहाँसे नौ करोड़ तीस लाख मीलकी
ऊँचाईपर है ! इससे सहज ही अनुमान किया जा सकता है कि हम अनन्त समय बीत जानेपर भी ब्रह्माण्ड-
की छोटीसे छोटी वस्तुओंका भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त नहीं कर सके, तो जिसको हम दार्शनिक भाषामें पूर्ण सत्य
( Absolute ) कहते हैं, उसका साक्षात्कार करना कितना दुष्कर होना चाहिये । भारतके प्राचीन तत्त्व-
वेत्ताओंने तत्त्वज्ञान संबंधी इस रहस्यका ठीक-ठीक अनुभव किया था । इसीलिये जब कभी आत्मा, परब्रह्म,
पूर्ण सत्य आदिके विषयमें पूर्वकालकी परिषदोंमें प्रश्नोंकी चर्चा उठती, तो 'नैषा तर्केण मतिरापनेया ( कठ ),
'नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन' ( मुण्डक ), 'सव्वे सरा नियट्टंति तक्का तत्थ न विज्जइ'
( आचारांग ), 'परमार्थो हि आर्याणां तूष्णींभावः ( चन्द्रकीर्ति )—'वह केवल अनुभवगम्य है, वह वाणी
और मनके अगोचर है, वहाँ जिह्वा रुक जाती है, और तर्क काम नहीं करती, वास्तवमें तूष्णींभाव ही परमार्थ
सत्य है', आदि वाक्योंसे इन शंकाओंका समाधान किया जाता था १ । इसका मतलब यह नहीं कि भारतीय
ऋषि अज्ञानवादी थे, अथवा उनको पूर्ण सत्यका यथार्थ ज्ञान नहीं था । किन्तु इस प्रकारके समाधान प्रस्तुत
करनेसे उनका अभिप्राय था कि पूर्ण सत्य तक पहुँचना तलवारकी धार पर चलने के समान है, अतएव
इसकी प्राप्तिके लिये अधिकसे अधिक साधनाकी आवश्यकता है । वास्तवमें जितना-जितना हम पदार्थोंका
विचार करते हैं, उतने ही पदार्थ विशीर्यमाण दृष्टिगोचर होते हैं । महर्षि सुकरातके शब्दोंमें, हम जितना-
जितना शास्त्रोंका अवलोकन करते हैं, हमें उतना ही अपनी मूर्खताका अधिकाधिक आभास होता है ।
जैनदर्शनका स्याद्वाद भी इसी तत्त्वका समर्थन करता है । जैन दार्शनिकोंका सिद्धांत है कि मनुष्यकी
शक्ति बहुत अल्प है, और बुद्धि बहुत परिमित है । इसलिये हम अपनी छद्मस्थ दशामें हजारों-लाखों प्रयत्न
करनेपर भी ब्रह्माण्डके असंख्य पदार्थोंका ज्ञान करनेमें असमर्थ रहते हैं । हम विज्ञानको ही लें । विज्ञान
अनन्त समयसे विविध रूपमें प्रकृतिका अभ्यास करनेमें जुटा है, परन्तु हम अभी तक प्रकृतिके एक अंश मात्र-
को भी पूर्णतया नहीं जान सके । दर्शनशास्त्रकी भी यही दशा है । सृष्टिके आरंभसे आज तक अनेक ऋषि-
महर्षियोंने तत्त्वज्ञान संबंधी अनेक प्रकारके नये-नये विचारोंकी खोज की, परन्तु हमारी दार्शनिक गुत्थियां
आज भी पहलेकी तरह उलझी पड़ी हुई हैं । स्याद्वाद यही प्रतिपादन करता है कि हमारा ज्ञान
पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता, वह पदार्थोंकी अमुक अपेक्षाको लेकर ही होता है, इसलिये हमारा ज्ञान
आपेक्षिक सत्य है । प्रत्येक पदार्थमें अनन्त धर्म हैं । इन अनन्त धर्मोंमेंसे हम एक समयमें कुछ धर्मोंका
ही ज्ञान कर सकते हैं, और दूसरोंको भी कुछ धर्मोंका ही प्रतिपादन कर सकते हैं । जैन तत्त्ववेत्ताओंका
कथन है कि जिस प्रकार कई अंधे मनुष्य किसी हाथीके भिन्न भिन्न अवयवोंकी हाथसे टटोलकर
हाथीके उन भिन्न-भिन्न अवयवोंको ही पूर्ण हाथी समझकर परस्पर विवाद उत्पन्न करते हैं, इसी
प्रकार संसारका प्रत्येक दार्शनिक सत्यके केवल अंशमात्रको ही जानता है, और सत्यके इस अंशमात्रको
सम्पूर्ण सत्य समझकर परस्पर विवाद और वितण्डा खड़ा करता है । यदि संसारके दार्शनिक अपने एकान्त
१. पश्चिमके विचारक ब्रैडले ( Bradley ), बर्गसाँ ( Bergson ) आदि विद्वानोंने भी सत्यको बुद्धि
और तर्कके बाह्य कहकर उसे Experience और Intution का विषय बताया है ।

जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 25
आग्रहको छोड़कर अनेकान्त अथवा स्याद्वाददृष्टिसे काम लेने लगें, तो हमारे जीवनके बहुतसे प्रश्न सहजमें ही
हल हो सकते हैं । वास्तवमें सत्य एक है, केवल सत्यकी प्राप्तिके मार्ग जुदा-जुदा हैं । अल्प शक्तिवाले छद्मस्थ
जीव इस सत्यका पूर्ण रूपसे ज्ञान करनेमें असमर्थ है, इसलिये उनका सम्पूर्ण ज्ञान आपेक्षिक सत्य ही कह जाता
है। यही जैन दर्शनकी अनेकांत दृष्टिका गूढ़ रहस्य है।
यहाँ शंका हा सकती है कि इस सिद्धांतके अनुसार हमें केवल आपेक्षिक अथवा अर्ध सत्यका ही ज्ञान
हो सकता है, स्याद्वादसे हम पूर्ण सत्य नहीं जान सकते । दूसरे शब्दोंमें कहा जा सकता है कि स्याद्वाद हमें
अर्ध सत्योंके पास ले जाकर पटक देता है, और इन्हीं अर्ध सत्योंको पूर्ण सत्य मान लेनेकी हमें प्रेरणा करता
है । परन्तु केवल निश्चित-अनिश्चित अर्ध सत्योंको मिलाकर एक साथ रख देनेसे वह पूर्ण सत्य नहीं कहा जा
सकता । तथा किसी न किसी रूपमें पूर्ण सत्यको माने बिना कोई भी दर्शन पूर्ण कहे जानेका अधिकारी नहीं
है। इस भावको भारतके प्रसिद्ध विचारक विद्वान् प्रो० राधाकृष्णनने निम्न प्रकारसे उपस्थित किया है—
The theory of Relativity cannot be logically sustained without the hypo-
thesis of an absolute............The Jains admit that things are one in their unive-
rsal aspect ( Jati or Karana ) and many in their partcular aspect ( vyakti or
karya ). Both these, according to them, are partial points of view. A plurality
of reals is admittedly a relative truth. We must rise to the complete point of
view and took at the whole with all the wealth of its attitudes. If Jainism stops
short with plurality, which is at best a relative and partial truth, and does not
ask whether there is any higher truth pointing to a one which particularises
itself in the objects of the world, connected with one another, vitally, essentially
and imminently, it throws overboard its own logic and exalts a relative truth
into an absolute one.¹
इस शंकाका समाधान स्पष्ट है। वह यह है, जैसा कि ऊपर बताया गया है कि स्याद्वाद
पदार्थोंके जाननेकी एक दृष्टि मात्र है। स्याद्वाद स्वयं अंतिम सत्य नहीं है। यह हमें अन्तिम सत्य तक पहुँ-
चानेके लिये केवल मार्गदर्शकका काम करता है। स्याद्वादसे केवल व्यवहार सत्यके जाननेमें उपस्थित होनेवाले
विरोधोंका ही समन्वय किया जा सकता है, इसीलिये जैन दर्शनकारोंने स्याद्वादको व्यवहार सत्य माना२ है ।
१. इन्डियन फिलासफी जि. १, पृ. ३०५-६ । इसी प्रकारके विचार ‘इन्डियन फिलॉसफिकल कांग्रेसके किसी
अधिवेशनके समय Jain Instrumental theory of knowledge नामक लेखमें, संभवतः हनुमंतराव
एम. ए. ने प्रगट किये हैं। लेखका कुछ अंश निम्न प्रकरसे है—
Its great defect lies in the fact that it ( the doctrine of Syadvada )
yields to the temptation of an easy compromise without overcoming the con-
tradictions inherent in the opposed standpoints in a higher synthesis........
........It takes care to show that the truths of science and of every day exper-
ience are relative and one-sided, but it leaves us in the end with the view
that truth is a sum of relative truths. A mere putting together of half truths
definite-indefinite cannot give us the whole truth.
२. स्याद्वादसे ही लोकव्यवहार चल सकता है, इस बातको सिद्धसेन दिवाकरने निम्न गाथामें व्यक्त किया है—
जेण विणा लोगस्सवि ववहारो सव्वहा न निव्वडइ ।
तस्स भुवणेक्कगुरुणो णमो अणेगंतवायस ।।
४

26 ग्रंथ और ग्रंथकार
व्यवहार सत्यके आगे भी जैनसिद्धान्तमें निरपेक्ष सत्य माना गया है, जिसे जैन पारिभाषिक शब्दोंमें केवलज्ञान
के नामसे कहा जाता है । स्याद्वादमें सम्पूर्ण पदार्थोंका क्रम-क्रमसे ज्ञान होता है, परन्तु केवलज्ञान सत्यप्राप्तिकी
वह उत्कृष्ट दशा है, जिसमें सम्पूर्ण पदार्थ और उन पदार्थोंकी अनन्त पर्यायोंका एक साथ ज्ञान होता है ।
स्याद्वाद परोक्षज्ञानमें गर्भित होता है, इसलिये स्याद्वादसे केवल इन्द्रियजन्य पदार्थ ही जाने जा सकते हैं, किन्तु
केवलज्ञान पारमार्थिक प्रत्यक्ष है, अतः केवलज्ञानमें भूत, भविष्य और वर्तमान सम्पूर्ण पदार्थ प्रतिभासित
होते १ हैं । अतएव स्याद्वाद हमें केवल जैसे-तैसे अर्ध सत्योंको ही पूर्ण सत्य मान लेनेके लिये बाध्य नहीं करता ।
किन्तु वह सत्यका दर्शन करनेके लिये अनेक मार्गोंकी खोज करता है । स्याद्वादका कहना है कि
मनुष्यकी शक्ति सीमित है, इसलिये वह आपेक्षिक सत्यको ही जान सकता है । पहले हमें व्यावहारिक
विरोधोंका समन्वय करके आपेक्षिक सत्यको प्राप्त करना चाहिये । आपेक्षिक सत्यके जाननेके बाद हम पूर्ण
सत्य-केवलज्ञान-का साक्षात्कार करनेके अधिकारी हैं ।
स्याद्वादपर एक ऐतिहासिक दृष्टि—अहिंसा और अनेकान्त ये जैनधर्मके दो मूल सिद्धांत हैं । महावीर
भगवानने इन्हीं दो मूल सिद्धांतोंपर अधिक भार दिया था । महावीर शारीरिक अहिंसाके पालन करनेके साथ
मानसिक अहिंसा (intellectual toleration) के ऊपर भी उतना ही जोर देते हैं । महावीरका कहना
था कि उपशम वृत्तिसे ही मनुष्यका कल्याण हो सकता है, और यही वृत्ति मोक्षका साधन है । भगवानका
उपदेश था कि प्रत्येक महान् पुरुष भिन्न-भिन्न द्रव्य, क्षेत्र, काल और भावके अनुसार ही सत्यकी प्राप्ति करता
है । इसलिये प्रत्येक दर्शनके सिद्धांत किसी अपेक्षासे सत्य हैं । हमारा कर्तव्य है कि हम व्यर्थके वाद-विवादमें
न पड़कर अहिंसा और शांतिमय जीवन यापन करें । हम प्रत्येक वस्तुको प्रतिक्षण उत्पन्न होती
हुई और नष्ट होती हुई देखते हैं, और साथ ही इस वस्तुके नित्यत्वका भी अनुभव करते हैं, अतएव
प्रत्येक पदार्थ किसी अपेक्षासे नित्य और सत्, और किसी अपेक्षासे अनित्य और असत् आदि
अनेक धर्मोंसे युक्त है । अनेकांतवाद सम्बन्धी इस प्रकारके विचार प्रायः प्राचीन आगम ग्रंथोंमें
देखनेमें आते हैं । गौतम गणधर महावीर भगवान्‌से पूछते हैं—'आत्मा ज्ञान स्वरूप है, अथवा
अज्ञान स्वरूप ?' भगवान उत्तर देते हैं—'आत्मा नियमसे ज्ञान स्वरूप है । क्योंकि ज्ञानके बिना
आत्माकी वृत्ति नहीं देखी जातीं । परन्तु आत्मा ज्ञान रूप भी है और अज्ञानरूप भी है२ ।
१. समंतभद्रने आप्तमीमांसामें स्याद्वाद और केवलज्ञानके भेदको स्पष्ट रूपसे निम्न श्लोकोंमें प्रतिपादन
किया है—
तत्त्वज्ञानं प्रमाणं ते युगपत्सर्वभासनं ।
क्रमभावि च यज्ज्ञानं स्याद्वादनयसंस्कृतं ॥ १०१ ॥
उपेक्षाफलमाद्यस्य शेषस्यादानहानधीः ।
पूर्वं वाऽज्ञाननाशो वा सर्वस्यास्य गोचरे ॥ १०२ ॥
स्याद्वादकेवलज्ञाने सर्वतत्त्वप्रकाशने ।
भेदः साक्षादसाक्षाच्च ह्यवस्त्वन्यतमं भवेत् ॥ १०५ ॥
तथा देखिये अष्टसहस्री, पृ. २७५-२८८
२. सर्वेनयानां जिनप्रवचनस्यैव निबंधनत्वात् । किमस्य निबंधनमिति चेत् । उच्यते । निबंधनं चास्य 'आय
भन्ते नाणे अन्नाणे' इति स्वामी गौतमस्वामिना पृष्टो व्याकरोति--'गोदमा णाणे णियमा' अतो ज्ञानं
नियमादात्मनि । ज्ञानस्यान्यव्यतिरेकेण वृत्त्यदर्शनात् । नयचक्र, हस्तलिखित ।
( जैनसाहित्यसंशोधक १-४, पृ. १४६ )

के रूपमें ही पाया जाता है। स्याद्वादको प्रस्फुटित करनेवाले जैन आचार्योंमें ईसवी सन्‌को
Wait, look at "सन्‌को" or "सन्‌ की" or "सन्‌को"?
"ईसवी सन्‌को" -> wait, look at the matra: "ईसवी सन्‌को" or "सन्‌ की"?
It is "सन्‌को": स + न् + क + ो = सन्‌को. Yes!

Line 17:
चौथी शताब्दीके विद्वान् सिद्धसेन दिवाकर और समंतभद्रका नाम सबसे महत्वपूर्ण है। ये दोनों अपूर्व प्रतिभा-

Line 18:
शाली उच्च कोटिके दार्शनिक विद्वान थे। इन विद्वानोंने जैन तर्कशास्त्रपर सन्मतितर्क, न्यायावतार, युक्त्यनु-

Line 19:
शासन, आप्तमीमांसा आदि स्वतंत्र ग्रन्थोंकी रचना की। सिद्धसेन और समंतभद्रने अनेक प्रकारके

Line 20:
दृष्टांतोंसे और नयोंके सापेक्ष वर्णनसे स्याद्वादका अभूतपूर्व ढंगसे प्रतिपादन किया, तथा जैनेतर सम्पूर्ण दृष्टियों

Line 21:
को अनेकान्त दृष्टिके अंशमात्र प्रतिपादन कर३ मिथ्यादर्शनोंके समूहको जैनदर्शन बताते हुए४ अपनी सर्वसमन्व-
Notice कर३ and हुए४ have supers

28 ग्रंथ और ग्रंथकार
समझे जाते थे । इन्होंने अनेकांतवादका प्रतिपादन करनेके लिये नयचक्र आदि ग्रन्थोंकी रचना की । जिन-
भद्रगणि श्वेताम्बर आगमोंके मर्मज्ञ पण्डित थे, इन्होंने विशेषावश्यकभाष्य आदि शास्त्रोंकी रचना की । जिन-
भद्रने प्रायः सिद्धसेन दिवाकरकी शैलीका ही अनुसरण किया । इन विद्वानोंके पश्चात् ईसाकी आठवीं-नौवीं
शताब्दीमें अकलंक और हरिभद्रका नाम विशेष रूपसे उल्लेखनीय है । इन विद्वानोंने स्याद्वादका नाना प्रकार-
से ऊहापोहात्मक सूक्ष्मातिसूक्ष्मातिसूक्ष्म विवेचन कर स्याद्वादको सांगोपांग परिपूर्ण बनाया । १ इस समय
प्रतिपक्षी लोग अनेकांतवादपर अनेक प्रहार करने करने लगे थे । कोई लोग अनेकांतको संशय कहते
थे, कोई केवल छलका रूपान्तर कहते थे, और कोई इसमें विरोध, अनवस्था आदि दोषोंका प्रतिपादन इसका
खंडन करते थे । ऐसे समयमें अकलंक और हरिभद्रने तत्त्वार्थराजवार्तिक, सिद्धिविनिश्चय, अनेकांतजयपताका,
शास्त्रवार्तासमुच्चय आदि ग्रन्थोंका निर्माण कर योग्यतापूर्वक उक्त दोषोंका निवारण किया, और
अनेकांतकी जयपताका फहराई । ईसाकी नौवीं शताब्दीमें विद्यानन्द और माणक्यनन्दि सुविख्यात दिगम्बर
विद्वान् हो गये हैं । विद्यानन्द अपने समयके बड़े भारी नैयायिक थे । इन्होंने कुमारिल आदि वैदिक विद्वानोंके
जैनदर्शनपर होनेवाले आक्षेपोंका बड़ी योग्यतासे परिहार किया है । विद्यानन्दने तत्त्वार्थश्लोकवार्तिक, अष्ट-
सहस्री, आप्तपरीक्षा आदि ग्रन्थोंको लिखकर अनेक प्रकारसे तार्किक शैलीद्वारा स्याद्वादका प्रतिपादन और
समर्थन किया है । माणक्यनन्दिने सर्वप्रथम जैन न्यायको परीक्षामुखके सूत्रोंमें गूंथ अपनी अलौकिक प्रतिभा-
का परिचय देकर जैनन्यायको समुन्नत बनाया है । ईसाकी दसवीं-ग्यारहवी शताब्दीमें होनेवाले प्रभाचन्द्र और
अभयदेव महान तार्किक विद्वान थे । इन विद्वानोंने सन्मतितर्कटीका (वादमहार्णव), प्रमेयकमलमार्तण्ड, न्याय-
कुमुदचन्द्रोदय आदि जैनन्यायके ग्रन्थोंकी रचना कर जैनदर्शनकी महान सेवा की है । इन विद्वानोंने सौत्रां-
तिक, वैभाषिक, विज्ञानवाद, शून्यवाद, ब्रह्माद्वैत, शब्दाद्वैत आदि वादोंका समन्वय करके स्याद्वादका नैयायिक
पद्धतिसे प्रतिपादन किया है । इनके पश्चात् ईसाकी बारहवीं शताब्दीमें वादिदेवसूरि और कलिकालसर्वज्ञ
हेमचन्द्रका नाम आता है । वादिदेव वादशक्तिमें असाधारण माने जाते थे । वादिदेवने स्याद्वादका स्पष्ट विवेचन
करनेके लिए प्रमाणनयतत्त्वालोकालंकार, स्याद्वादरत्नाकर आदि ग्रन्थ लिखे हैं । हेमचन्द्र अपने समयके असा-
धारण पुरुष थे । इन्होंने अन्ययोगव्यवच्छेदिका, अयोगव्यवच्छेदिका, प्रमाणमीमांसा आदि ग्रन्थ लिखकर
अपूर्व ढंगसे स्याद्वादकी सिद्धिकर जैनदर्शनके सिद्धांतोंको पल्लवित किया है । ईसवी सन्की सतरहवीं-अठारहवीं
शताब्दीमें उपाध्याय यशोविजय और पंडित विमलदास जैनदर्शनके अन्तिम विद्वान हो गये हैं । उपाध्याय
यशोविजयजी जैन परम्परामे लोकोत्तर प्रतिभाके धारक असाधारण विद्वान थे । इन्होंने योग, साहित्य, प्राची-
न न्याय आदिका गंभीर पांडित्य प्राप्त करनेके साथ नव्य न्यायका भी पारायण किया था । स्याद्वादके द्वारा
अभूतपूर्व ढंगसे सम्पूर्ण दर्शनोंका समन्वय करके स्याद्वादको 'सार्वतांत्रिक' सिद्ध करना, यह उपाध्याय-
जीकी ही प्रतिभाका सूचक है । २ यशोविजयजीने शास्त्रवार्तासमुच्चयकी स्याद्वादकल्पलताटीका, नयोपदेश,
नयरहस्य, नयप्रदीप, न्यायखंडखाद्य, न्यायालोक, अष्टसहस्रीटीका आदि अनेक ग्रंथोंकी रचना की है ।
पं. विमलदास दिगम्बर विद्वान थे । इन्होंने नव्य न्यायको अनुकरण करनेवाली भाषामें सप्तभंगीतरंगिणी नामक
स्वतंत्र ग्रंथकी संक्षिप्त और सरल भाषामें रचना करके एक महान क्षति की पूर्ति की है ।
स्याद्वादका जैनेतर साहित्यमें स्थान — किसी वस्तुको भिन्न भिन्न अपेक्षाओंसे विविध रूपमें दर्शन
करनेके स्याद्वादसे मिलते जुलते सिद्धांत जैन साहित्यके अतिरिक्त अन्यत्र भी उपलब्ध होते हैं । ऋग्वेदमें कहा
१. देखिये तत्त्वार्थराजवार्तिकमें 'प्रमाणनयैरधिगमः' सूत्रकी व्याख्या, तथा अनेकांतजयपताका ।
२. तुलनीय—ब्रुवाणा भिन्नभिन्नार्थान्नयभेदव्यपेक्षया ।
प्रतिक्षेपैर्यनो वेदाः स्याद्वाद्वं सार्वतांत्रिकम् ।। ५१ ।। अध्यात्मसार ।

in line 37:कम्hasक+म्. In line 31: तद्विलक्षणम् ।hasण+म्. In line 32: वदन्ननुभवोचितम् ।Wait, let's look at line 32:जातिव्यक्त्वात्मकं वस्तु वदन्ननुभवोचितम् ।It's definitelyवदन्ननुभवोचितम् ।(orवदन्ननुभवोचिम्४? No, look at चितम्: it's चि+त+म्). It is चितम्where the printing was slightly smudged. Line 33:भट्टो वापि मुरारिर्वा नानेकान्तं प्रतिक्षिपेत् ॥Line 34:अबद्धं परमार्थेन बद्धं च व्यवहारतः ।Line 35:ब्रुवाणो ब्रह्मवेदान्ती नानेकान्तं प्रतिक्षिपेत् ॥Line 36:ब्रुवाणा भिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया ।Wait, let's re-verifyभिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया: Is it भिन्नभिन्नान्धीन्नियतभेदव्यपेक्षया? Wait, look at न्धी`: does it have an anusvara?
Above the letter,

30 ग्रन्थ और ग्रन्थकार
परिवर्तन ( relative change ) स्वीकार किया है। १ ग्रीकके महान् विचारक प्लेटोने भी इसी प्रकारके
विचार प्रगट किये है २। पश्चिमके आधुनिक दर्शनमें भी इस प्रकारके समान विचारोंकी कमी नहीं है।
उदाहरणके लिये, जर्मनीके प्रकाण्ड तत्त्ववेत्ता हेगेल ( Hegel ) का कथन है कि विरुद्धधर्मात्मकता ही
संसारका मूल है। किसी वस्तुका यथार्थ वर्णन करनेके लिये हमें उस वस्तु संबंधी संपूर्ण सत्य कहनेके साथ
उस वस्तुके विरुद्ध धर्मोंका किस प्रकार समन्वय हो सकता है, यह प्रतिपादन करना चाहिये ३। नये विज्ञानवाद
( New Idealism ) के प्रतिपादक ब्रैडलेके अनुसार, प्रत्येक वस्तु दूसरी वस्तुओंसे तुलना किये जानेपर
आवश्यक और अनावश्यक दोनों सिद्ध होती है। संसार कोई भी पदार्थ नगण्य अथवा अकिंचित्कर नहीं
कहा जा सकता। अतएव प्रत्येक तुच्छसे तुच्छ विचारमें और छोटीसे छोटी सत्तामें सत्यता विद्यमान हैं ४ ।
आधुनिक दार्शनिक जोअचिम (Joachim) का कहना है कि कोई भी विचार स्वतः ही, दूसरे विचारसे सर्वथा
अनपेक्षित होकर केवल अपनी ही अपेक्षासे सत्य नहीं कहा जा सकता। उदाहरणके लिये, तीनसे तीनको गुणा
करनेपर नौ होता है ( ३ × ३ = ९), यह सिद्धान्त एक बालकके लिये सर्वथा निष्प्रयोजन है, परन्तु इसे पढ़-
कर एक विज्ञानवेत्ताके सामने गणितशास्त्रके विज्ञानका सारा नक्शा सामने आ जाता है ५। मानसशास्त्र
१. There are beings or particles of rerlity that are permanent, original, impe-
rishable, underived, and these can not change into anything else. They are
what they are and must remain so, just as the Eleatic school maintains.
These beings, of particles of realies howeveer, can be combined, and separatu,
that is, form bodies that can again be resolved into their elements. The
original bits of reality can not be created or destroyed or ehange thejr
nature, but they can change their relations in respect to each other. And
that is what we mean by change.
Thilly : History of Philosophy, पृ. ३२ ।
२. When we speak of not being, we speak, I suppose not of something opposed
to being, but only different.—Dialogues of Plato.
३. Reality is now this, now that; in this sense it is full of negations, contradi-
ctions, and oppositons : the plant germinates, blooms, withers and dies;
man is young mature and old. To do a thing justice, we must tell the
whole truth about it, predicate all those contradictions of it, and show how
they are reconciled and preserved in the articulated whole which we call
the life of the thing.
Thilly : History of Philosophy, पृ. ४६७ ।
४. Everything is essentiral and everything worthless in comparison with other.
Now where is there even a slngle fact so fragmentary and so poor that to
the univeres it does not matter. There is truth in every idea however false,
there is reality in every existence however slight.
Appearance and Reality पृ० ४८७ ।
५. No judgment is true in itself and by itself. Every judgment as a piece of
concrete thinking is informed, conditioned to some extent, constituted by
the apperceipient character of the mind. Nature of Truth, अ. ३., पृ. ९२-३ ।

जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 31
वेत्ता प्रो. विलियम जेम्स ( W. James ) ने भी लिखा है, हमारी अनेक दुनिया हैं । साधारण मनुष्य इन
सब दुनियाओंका एक दूसरेसे असम्बद्ध तथा अनपेक्षित रूपसे ज्ञान करता है। पूर्ण तत्त्ववेत्ता वही है, जो
सम्पूर्ण दुनियाओंसे एक दूसरेसे सम्बन्ध और अपेक्षित रूपमें जानता है१। इसी प्रकारके विचार पेरी२
( Perry ), नैयायिक जोसेर्फ ( Joseph ), एड्मन्ड होम्स३ ( Edmund Holms ) प्रभृति विद्वानोंने
प्रकट किये हैं४ ।
स्याद्वाद और समन्वय दृष्टि—स्याद्वाद सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय करता है । जैन दर्शनकारों-
का कथन है कि सम्पूर्ण दर्शन नयवादमें गर्भित हो जाते हैं, अतएव सम्पूर्ण दर्शन नयकी अपेक्षासे सत्य हैं ।
उदाहरणके लिये, ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा बौद्ध, संग्रहनयकी अपेक्षा वेदान्त, नैगमनयकी अपेक्षा न्याय-वैशेषिक,
शब्दनयकी अपेक्षा शब्दब्रह्मवादी, तथा व्यवहारनयकी अपेक्षा चार्वाक दर्शनोंको सत्य कहा जा सकता५ है ।
ये नयरूप समस्त दर्शन परस्पर विरुद्ध होकर भी समुदित होकर सम्यक्त्व रूप कहे जाते हैं। जिस प्रकार भिन्न-
भिन्न

32 ग्रन्थ और ग्रन्थकार
शास्त्रोंके पढ़ जानेसे भी कोई लाभ नहीं।"१ निस्सन्देह सच्चा स्याद्वादी सहिष्णु होता है, वह राग-द्वेषरूप
आत्माके विकारों पर विजय प्राप्त करनेका सतत प्रयत्न करता है। वह दूसरोंके सिद्धांतोंको आदरकी दृष्टिसे
देखता है, और मध्यस्थ भावसे सम्पूर्ण विरोधोंका समन्वय करता है। सिद्धसेन दिवाकरने वेद, सांख्य, न्याय-
वैशेषिक, बौद्ध आदि दर्शनोंपर द्वात्रिंशिकाओंकी रचना करके, और हरिभद्रसूरिने षड्दर्शनसमुच्चयमें छह
दर्शनोंकी निष्पक्ष समालोचना करके इसी उदार वृत्तिका परिचय दिया है। मल्लवादि, हरिभद्रसूरि, 'रत्नशेखर,
पं० आशाधर, उ. यशोविजय आदि अनेक जैन विद्वानोंने वैदिक और बौद्ध ग्रंथोंपर टीकाटिप्पणियां लिखकर अपनी
गुणग्राहिता, समन्वयवृत्ति और हृदयकी विशालताको स्पष्टरूपसे प्रमाणित किया है२ ।
वास्तवमें देखा जाय तो सत्य एक है तथा वैदिक, जैन और बौद्ध दर्शनोंमें कोई परस्पर विरोध नहीं।
प्रत्येक दार्शनिक भिन्न-भिन्न देश और कालकी परिस्थितिके अनुसार सत्यके केवल अंश मात्रको ग्रहण करता
है। वैदिक धर्म व्यवहारप्रधान है, बौद्ध धर्मको श्रवणप्रधान, और जैनधर्मको कर्त्तव्यप्रधान कहा जा सकता
है।३ एक दर्शन कर्म, उपासना और ज्ञानको मोक्षका प्रधान कारण कहता है; दूसरा शील, समाधि और प्रज्ञा-
को; तथा तीसरा सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रको मोक्ष प्रधानका कारण मानता है, परन्तु ध्येय सबका एक
ही है। जिस प्रकार सरल और टेढ़े मार्गसे जानेवाली भिन्न-भिन्न नदियाँ अन्तमें जाकर एक ही समुद्रमें मिलती
हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न रुचियोंके कारण उद्भव होनेवाले समस्त दर्शन एक ही पूर्ण सत्यमें समाविष्ट हो जाते
हैं।४ षड्दर्शनोंको जिनेन्द्रके अंग कहकर परमयोगी आनंदघनजीने आनन्दघनचौवीसीमें इस भावको निम्न
रूप में व्यक्त किया है—
पट्दरसण जिन अंग भणीजे । न्याय पड़ंग जो साधे रे ।
नमिजिनवरना चरण उपासक । पट्दर्शन आराधे रे ॥ १ ॥
जिनसुर पादप पाय बखाणुं । सांख्यजोग दोय भेदें रे ।
आतम सत्ता विवरण करता । ल्हो दुग अंग अखेदें रे ॥ २ ॥
१. यस्य सर्वत्र समता नयेषु तनयेष्विव ।
तस्यानेकान्तवादस्य क्व न्यूनाधिकशेमपी ॥ ६१ ॥
तेन स्याद्वादमालंब्य सर्वदर्शनतुल्यतां ।
मोक्षोद्देशाविशेषेण यः पश्यति सः शास्त्रवित् ॥ ७० ॥
माध्यस्थ्यमेव शास्त्रार्थो येन तच्चारु सिध्यति ।
स एव धर्मवादः स्यादन्यद्बालिशवल्गनम् ॥ ७२ ॥
माध्यस्थ्यसहितं ह्येकपदज्ञानमपि प्रमा ।
शास्त्रकोटिः वृथैवान्या तथा चोक्तं महात्मना ॥ ७३ ॥ अध्यात्मसार ।
२. सुना गया है कि गुजरातमें जैन विद्वानोंकी ओरसे ब्राह्मणोंके वेदको अपनानेका भी प्रयत्न हुआ था ।
३. श्रोतव्यो सौगतो धर्मः कर्तव्यः पुनरार्हतः ।
वैदिको व्यवहर्त्तव्यो ध्यातव्यः परमः शिवः ॥ हरिभद्र ॥
४. त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यात् ऋजुकुटिलनानापथजुषां ।
नृणामेको गम्यत् त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ शिवमहिम्न स्तोत्र ।

जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 33
भेद अभेद सुगत मीमांसक । जिनवर दोय कर भारी रे ।
लोकालोक अवलंबन भजिये । गुरुगमथी अवधारी रे ॥ ३ ॥
लोकायतिक कूख जिनवरनी । अंशविचार जो कीजे ।
तत्त्वविचार सुधारस धारा । गुरुगम विण केम पीजे ॥ ४ ॥
जैन जिनेश्वर उत्तम अंग । अंतरंग बहिरंगे रे ।
अक्षरन्यास घरा आराधक । आराधे घरी संगे रे ॥ ५ ॥
इस प्रकार एकतामें विविधता और विविधतामें एकताका दर्शन कर जैन आचार्योंने भारतीय
संस्कृतिको समुन्नत बनाया है ।

६२ न्यायमञ्जरीपरिशिष्टे
ऽपि नियतं प्रति नश्यति । कल्पते हेतुभावेन यद्वा
॥ १ ॥ वैचित्र्यस्य विनाशस्य । हेतुत्वेऽपि न विस्मयः
। विधिं विधातुमशक्यत्वात् । किञ्चिदेवोपपद्यते
॥ २ ॥ हेतुं प्रति ततो ज्ञानम् । जायते न तु कल्पितम्
। येनैवेह प्रवृत्तस्य । तदेवोपयुज्यते हि
॥ ३ ॥ हेतुं विना न सिद्धिः स्यात् । कल्प्यतेऽतो विचारतः
प्रतिपाद्य विनिर्णयः कृतोऽत्र विद्वद्भिः सम्यक् विचार्यैव यत्नतः
। इति प्रथमः कल्पः समाप्तः

श्रीमद् राजचंद्र ।
जन्म - ववाणीआ देहोत्सर्ग - राजकोट
संवत १९२४ कारतक सुद १५ संवत १९५७ चैत्र वद ५

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...'? No.
It is: 'खद्योतवत्सद्देष्टारो हा द्योतन्ते क्वचित्क्वचित्'
Wait, let me look at line 3 again very carefully:
'ख' - 'द्यो' - 'त' - 'व' - 'त्' - 'स' - 'द्दे' - 'ष्टा' - 'रो'
Yes, that's exactly 9 letters:
ख dyo ta va tsa dde ṣṭā ro!
Wait, is there a halanta under त?
"खद्योतवत्" -> 'त्' has halanta!
Then space?
No, 'सद्देष्टारो' is joined or separate?
Wait, look at: 'खद्योतवत्' then 'स' is right next to it, sharing the shirorekha!
Wait, in Devanagari, 'त्' with halant doesn't join with 'स' into 'त्स'?
Wait, look at the image:
'ख' 'द्यो' 'त' 'व' 'त्' 'स'...
Wait, is that a 'त्' with halant?
Look at the character:
'त' with halanta? No, wait!
Is that 'त' with halant, or is it 'त्' + 'स' = 'त्स'?
Look at line 3:
'ख' (1)
'द्यो' (2)
'त' (3)
'व

[ २ ]
श्मशान भूमिमें जला देवेंगे।' इतना सुनकर राजचन्द्रजी थोड़ी देर तो घरमें इधर-उधर घूमते रहे, बादमें चुपचापं
तालाबके पास गये और वहाँ बबूलके एक वृक्षपर चढ़कर देखा तो सचमुच कुटुम्बके लोग उसके शरीरको
जला रहे हैं। इस प्रकार एक परिचित और सज्जन व्यक्तिको जलाता देखकर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ और वे
विचारने लगे कि यह सब क्या है ! उनके अन्तरमें विचारोंकी तीव्र खलबली-सी मच गई और वे गहन
विचारमें डूब गये। इसी समय अचानक चित्तपरसे भारी आवरण हट गया और उन्हें पूर्व भवोंकी स्मृति हो
आई। बाद में एक बार वे जूनागढ़का किला देखने गये तब पूर्व स्मृतिज्ञानकी विशेष वृद्धि हुई¹। इस पूर्व-
स्मृतिरूप-ज्ञानने उनके जीवनमें प्रेरणाका अपूर्व नवीन-अध्याय जोड़ा। श्रीमद्जीकी पढ़ाई विशेष नहीं हो
पाई थी फिर भी, वे संस्कृत, प्राकृत आदि भाषाओंके ज्ञाता थे एवं जैन आगमोंके असाधारण वेत्ता और मर्मज्ञ
थे। उनको क्षयोपशम-शक्ति इतनी विशाल थी कि जिस काव्य या सूत्रका मर्म बड़े-बड़े विद्वान् लोग नहीं बता
सकते थे उसका यथार्थ विश्लेषण उन्होंने सहजरूपमें किया है²। किसी भी विषयका सांगोपांग विवेचन
करना उनके अधिकारकी बात थी³। उन्हें अल्प-वयमें ही तत्त्वज्ञानकी प्राप्ति हो गई थी, जैसा कि उन्होंने
स्वयं एक काव्यमें लिखा है—
लघुवयथी अद्भुत थयो, तत्त्वज्ञाननो बोध।
एज सूचवे एम के, गति आगति कां शोध ?
जे संस्कार थवा घटे, अति अभ्यासे कांय,
विना परिश्रम ते थयो, भवशंका शी त्यांय ?
—अर्थात् छोटी अवस्थामें मुझे अद्भुत तत्त्वज्ञानका बोध हुआ है, यही सूचित करता है कि अब
पुनर्जन्मके शोधकी क्या आवश्यकता है ? और जो संस्कार अत्यन्त अभ्यासके द्वारा उत्पन्न होते हैं वे मुझे
बिना किसी परिश्रमके ही प्राप्त हो गये हैं, फिर वहाँ भव-शंकाका क्या काम ? ( पूर्वभवके ज्ञानसे आत्माकी
श्रद्धा निश्चल हो गई है।)
अवधान-प्रयोग, स्पर्शनशक्ति
श्रीमद्जीकी स्मरणशक्ति अत्यन्त तीव्र थी। वे जो कुछ भी एक बार पढ़ लेते, उन्हें ज्यों
का त्यों याद रह जाता था। इस स्मरणशक्तिके कारण वे छोटी अवस्थामें ही अवधान-प्रयोग करने लगे थे।
धीरे-धीरे वे सौ अवधान तक पहुँच गये थे। वि० सं० १९४३ में १९ वर्षकी अवस्थामें उन्होंने बम्बईकी
एक सार्वजनिक सभामें डॉ० पिटर्सनके सभापतित्वमें सौ अवधानोंका प्रयोग बताकर बड़े-बड़े लोगोंको
आश्चर्यमें डाल दिया था। उस समय उपस्थित जनताने उन्हें 'सुवर्णचन्द्रक' प्रदान किया, साथही 'साक्षात्
सरस्वती' के पदसे भी विभूषित किया था। ई० सन् १८८६-८७ में 'मुंबई समाचार' 'जामे जमशेद'
'गुजराती' 'पायोनियर' 'इण्डियन स्पॅक्टेटर' 'टाइम्स ऑफ इण्डिया' आदि गुजराती एवं अंग्रेजी पत्रोंमें
श्रीमद्जीकी अद्भुत शक्तियोंके बारेमें भारी प्रशंसात्मक लेख छपे थे। शतावधानमें शतरंज खेलते जाना,
मालाके दाने गिनते जाना, जोड़ बाकी गुणा करते जाना, आठ भिन्न-भिन्न समस्याओंकी पूर्ति करते जाना,
सोलह भाषाओंके भिन्न-भिन्न क्रमसे उलटे-सीधे नम्बरोंके साथ शब्दोंको याद रखकर वाक्य बनाते जाना, दो
कोठोंमें लिखे हुए उलटे-सीधे अक्षरोंसे कविता करते जाना, कितने ही अलंकारोंका विचार करते जाना, इत्यादि
सौ कामोंको एक ही साथ कर सकते थे।
१. इस प्रसंगकी चर्चा कच्छके एक वणिक बंधु पदमशीभाई ठाकरशीके पूछनेपर बम्बईमें भूलेश्वरके दि०
जैन मन्दिरमें सं० १९४२ में श्रीमद्जीने की ।
२. देखिए पं० बनारसीदासजीके 'समता रमता उरधता०' पद्यका विवेचन 'श्रीमद्राजचन्द्र' ( गुजराती )
पत्रांक ४३८ ।
३. आनंदघन चौबीसीके कुछ पद्योंका विवेचन उपरोक्त ग्रन्थ में पत्रांक ७५३ ।

[ ३ ]
श्रीमद्जीकी स्पर्शनशक्ति भी अत्यन्त विलक्षण थी । उपरोक्त सभामें ही उन्हें भिन्न-भिन्न प्रकारके
बारह ग्रन्थ दिये गये और उनके नाम भी उन्हें पढ़कर सुना दिये गये । बादमें उनकी आँखों पर पट्टी बाँध-
कर जो-जो ग्रन्थ उनके हाथ पर रखे गये उन सब ग्रन्थोंके नाम हाथोंसे टटोलकर उन्होंने बता दिये ।
श्रीमद्जीकी इस अद्भुतशक्तिसे प्रभावित होकर उस समयके बम्बई हाईकोर्टके मुख्य न्यायाधीश सर
चार्ल्स सारजंटने उन्हें विलायत चलकर अवधान-प्रयोग दिखानेकी इच्छा प्रगट की थी, परन्तु श्रीमद्जीने इसे
स्वीकार नहीं किया । उन्हें कीर्तिकी इच्छा नहीं थी, बल्कि ऐसी प्रवृत्तियोंको आत्मकल्याणके मार्गमें बाधक
जानकर फिर उन्होंने अवधान-प्रयोग नहीं किये ।
महात्मा गाँधी ने कहा था—
महात्मा गांधीने उनकी स्मरणशक्ति और आत्मज्ञानसे जो अपूर्व प्रेरणा प्राप्त की वह संक्षेपमें
उन्हींके शब्दोंमें—
“रायचन्द्रभाईके साथ मेरी भेंट जुलाई सन् १८९१ में उस दिन हुई जब मैं विलायतसे बम्बई
वापिस लौटा । इन दिनों समुद्रमें तूफान आया करता है इस कारण जहाज रातको देरीसे पहुँचा । मैं डाक्टर
बैरिस्टर और अब रंगूनके प्रख्यात जौहरी प्राणजीवनदास महेताके घर उतरा था । रायचन्द्रभाई उनके बड़े
भाईके जमाई होते थे । डॉक्टर सा० ( प्राणजीवनदास ) ने ही परिचय कराया । उनके दूसरे बड़े भाई
झवेरी रेवाशंकर जगजीवनदासकी पहचान भी उसी दिन हुई । डाक्टर सा० ने रायचन्द्रभाईका 'कवि'
कहकर परिचय कराया और कहा, 'कवि' होते हुए भी आप हमारे साथ व्यापारमें हैं, आप ज्ञानी और
शतावधानी हैं । किसीने सूचना की कि मैं उन्हें कुछ शब्द सुनाऊँ, और वे शब्द चाहे किसी भी भाषाके हों,
जिस क्रमसे मैं बोलूँगा उसी क्रमसे वे दोहरा जावेंगे, मुझे यह सुनकर आश्चर्य हुआ । मैं तो उस समय जवान
और विलायतसे लौटा था; मुझे भाषाज्ञानका भी अभिमान था । मुझे विलायतकी हवा भी कम नहीं लगी
थी । उन दिनों विलायतसे आया मानों आकाशसे उतरा था ! मैंने अपना समस्त ज्ञान उलट दिया और अलग-
अलग भाषाओंके शब्द पहले तो मैंने लिख लिये, क्योंकि मुझे वह क्रम कहाँ याद रहने वाला था ? और
बादमें उन शब्दोंको मैं बाँच गया । उसी क्रमसे रायचंदभाईने धीरेसे एकेके बाद एक सब शब्द कह सुनाये ।
मैं राजी हुआ, चकित हुआ और कविकी स्मरणशक्तिके विषयमें मेरा उच्च विचार हुआ । विलायतकी हवाका
असर कम पड़नेके लिए यह सुन्दर अनुभव हुआ कहा जा सकता है ।........कविके साथ यह परिचय बहुत
आगे बढ़ा........कवि संस्कारी ज्ञानी थे ।
मुझपर तीन पुरुषोंने गहरा प्रभाव डाला है—टाल्सटॉय, रस्किन और रायचंदभाई ! टाल्सटॉयने अपनी
पुस्तकों द्वारा और उनके साथ थोडे पत्रव्यवहारसे, रस्किनने अपनी एक ही पुस्तक 'अन्टु दिस लास्ट' से—
जिसका गुजराती नाम मैंने 'सर्वोदय' रखा है, और रायचन्दभाईने अपने गाढ़ परिचयसे । जब मुझे हिन्दूधर्ममें
शंका पैदा हुई उस समय उसके निवारण करनेमें मदद करने वाले रायचन्दभाई थे । सन् १८९३ में दक्षिण
अफ्रीकामें मैं कुछ क्रिश्चियन सज्जनोंके विशेष सम्पर्कमें आया । उनका जीवन स्वच्छ था । वे चुस्त धर्मात्मा
थे । अन्य-धर्मियोंको क्रिश्चियन होनेके लिए समझाना उनका मुख्य व्यवसाय था । यद्यपि मेरा और उनका
सम्बन्ध व्यावहारिक कार्यको लेकर हो हुआ था, तो भी उन्होंने मेरे आत्माके कल्याणके लिये चिन्ता करना
शुरू कर दिया । उस समय मैं अपना एक ही कर्तव्य समझ सका कि जब तक मैं हिन्दूधर्मके रहस्यको पूरी
तौरसे न जान लूँ और उससे मेरे आत्माको असंतोष न हो जाय, तबतक मुझे अपना कुलधर्म कभी नहीं
छोड़ना चाहिये । इसलिये मैंने हिन्दूधर्म और अन्य धर्मोंकी पुस्तकें पढ़ना शुरू कर दीं । क्रिश्चियन और
इस्लामधर्मकी पुस्तकें पढ़ीं । विलायतसे अंग्रेज मित्रोंके साथ पत्रव्यवहार किया । उनके समक्ष अपनी शंकायें
रखीं तथा हिन्दुस्तानमें जिनके ऊपर मुझे कुछ भी श्रद्धा थी उनसे पत्रव्यवहार किया । उनमें रायचन्दभाई
मुख्य थे । उनके साथ तो मेरा अच्छा सम्बन्ध हो चुका था, उनके प्रति मान भी था, इसलिए उनसे जो भी