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सर्वकोश
स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary

आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा

DevanagariHindipublished458 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 458 में से

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32 ग्रन्थ और ग्रन्थकार
शास्त्रोंके पढ़ जानेसे भी कोई लाभ नहीं।"१ निस्सन्देह सच्चा स्याद्वादी सहिष्णु होता है, वह राग-द्वेषरूप
आत्माके विकारों पर विजय प्राप्त करनेका सतत प्रयत्न करता है। वह दूसरोंके सिद्धांतोंको आदरकी दृष्टिसे
देखता है, और मध्यस्थ भावसे सम्पूर्ण विरोधोंका समन्वय करता है। सिद्धसेन दिवाकरने वेद, सांख्य, न्याय-
वैशेषिक, बौद्ध आदि दर्शनोंपर द्वात्रिंशिकाओंकी रचना करके, और हरिभद्रसूरिने षड्दर्शनसमुच्चयमें छह
दर्शनोंकी निष्पक्ष समालोचना करके इसी उदार वृत्तिका परिचय दिया है। मल्लवादि, हरिभद्रसूरि, 'रत्नशेखर,
पं० आशाधर, उ. यशोविजय आदि अनेक जैन विद्वानोंने वैदिक और बौद्ध ग्रंथोंपर टीकाटिप्पणियां लिखकर अपनी
गुणग्राहिता, समन्वयवृत्ति और हृदयकी विशालताको स्पष्टरूपसे प्रमाणित किया है२ ।
वास्तवमें देखा जाय तो सत्य एक है तथा वैदिक, जैन और बौद्ध दर्शनोंमें कोई परस्पर विरोध नहीं।
प्रत्येक दार्शनिक भिन्न-भिन्न देश और कालकी परिस्थितिके अनुसार सत्यके केवल अंश मात्रको ग्रहण करता
है। वैदिक धर्म व्यवहारप्रधान है, बौद्ध धर्मको श्रवणप्रधान, और जैनधर्मको कर्त्तव्यप्रधान कहा जा सकता
है।३ एक दर्शन कर्म, उपासना और ज्ञानको मोक्षका प्रधान कारण कहता है; दूसरा शील, समाधि और प्रज्ञा-
को; तथा तीसरा सम्यग्दर्शन, ज्ञान और चारित्रको मोक्ष प्रधानका कारण मानता है, परन्तु ध्येय सबका एक
ही है। जिस प्रकार सरल और टेढ़े मार्गसे जानेवाली भिन्न-भिन्न नदियाँ अन्तमें जाकर एक ही समुद्रमें मिलती
हैं, उसी तरह भिन्न-भिन्न रुचियोंके कारण उद्भव होनेवाले समस्त दर्शन एक ही पूर्ण सत्यमें समाविष्ट हो जाते
हैं।४ षड्दर्शनोंको जिनेन्द्रके अंग कहकर परमयोगी आनंदघनजीने आनन्दघनचौवीसीमें इस भावको निम्न
रूप में व्यक्त किया है—
पट्दरसण जिन अंग भणीजे । न्याय पड़ंग जो साधे रे ।
नमिजिनवरना चरण उपासक । पट्दर्शन आराधे रे ॥ १ ॥
जिनसुर पादप पाय बखाणुं । सांख्यजोग दोय भेदें रे ।
आतम सत्ता विवरण करता । ल्हो दुग अंग अखेदें रे ॥ २ ॥
१. यस्य सर्वत्र समता नयेषु तनयेष्विव ।
तस्यानेकान्तवादस्य क्व न्यूनाधिकशेमपी ॥ ६१ ॥
तेन स्याद्वादमालंब्य सर्वदर्शनतुल्यतां ।
मोक्षोद्देशाविशेषेण यः पश्यति सः शास्त्रवित् ॥ ७० ॥
माध्यस्थ्यमेव शास्त्रार्थो येन तच्चारु सिध्यति ।
स एव धर्मवादः स्यादन्यद्बालिशवल्गनम् ॥ ७२ ॥
माध्यस्थ्यसहितं ह्येकपदज्ञानमपि प्रमा ।
शास्त्रकोटिः वृथैवान्या तथा चोक्तं महात्मना ॥ ७३ ॥ अध्यात्मसार ।
२. सुना गया है कि गुजरातमें जैन विद्वानोंकी ओरसे ब्राह्मणोंके वेदको अपनानेका भी प्रयत्न हुआ था ।
३. श्रोतव्यो सौगतो धर्मः कर्तव्यः पुनरार्हतः ।
वैदिको व्यवहर्त्तव्यो ध्यातव्यः परमः शिवः ॥ हरिभद्र ॥
४. त्रयी सांख्यं योगः पशुपतिमतं वैष्णवमिति ।
प्रभिन्ने प्रस्थाने परमिदमदः पथ्यमिति च ।
रुचीनां वैचित्र्यात् ऋजुकुटिलनानापथजुषां ।
नृणामेको गम्यत् त्वमसि पयसामर्णव इव ॥ शिवमहिम्न स्तोत्र ।

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