स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 31
वेत्ता प्रो. विलियम जेम्स ( W. James ) ने भी लिखा है, हमारी अनेक दुनिया हैं । साधारण मनुष्य इन
सब दुनियाओंका एक दूसरेसे असम्बद्ध तथा अनपेक्षित रूपसे ज्ञान करता है। पूर्ण तत्त्ववेत्ता वही है, जो
सम्पूर्ण दुनियाओंसे एक दूसरेसे सम्बन्ध और अपेक्षित रूपमें जानता है१। इसी प्रकारके विचार पेरी२
( Perry ), नैयायिक जोसेर्फ ( Joseph ), एड्मन्ड होम्स३ ( Edmund Holms ) प्रभृति विद्वानोंने
प्रकट किये हैं४ ।
स्याद्वाद और समन्वय दृष्टि—स्याद्वाद सम्पूर्ण जैनेतर दर्शनोंका समन्वय करता है । जैन दर्शनकारों-
का कथन है कि सम्पूर्ण दर्शन नयवादमें गर्भित हो जाते हैं, अतएव सम्पूर्ण दर्शन नयकी अपेक्षासे सत्य हैं ।
उदाहरणके लिये, ऋजुसूत्रनयकी अपेक्षा बौद्ध, संग्रहनयकी अपेक्षा वेदान्त, नैगमनयकी अपेक्षा न्याय-वैशेषिक,
शब्दनयकी अपेक्षा शब्दब्रह्मवादी, तथा व्यवहारनयकी अपेक्षा चार्वाक दर्शनोंको सत्य कहा जा सकता५ है ।
ये नयरूप समस्त दर्शन परस्पर विरुद्ध होकर भी समुदित होकर सम्यक्त्व रूप कहे जाते हैं। जिस प्रकार भिन्न-
भिन्न