स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)

स्याद्वादमञ्जरी (आचार्य मल्लिषेण सूरि - डॉ. जगदीशचन्द्र जैन सविस्तार हिन्दी अनुवाद सटीक)
Syadvadamanjari of Mallishena Suri with Hindi Commentary
आचार्य मल्लिषेण सूरि (अनुवादक: डॉ. जगदीशचन्द्र जैन) द्वारा
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जैनदर्शनमें स्याद्वादका स्थान 33
भेद अभेद सुगत मीमांसक । जिनवर दोय कर भारी रे ।
लोकालोक अवलंबन भजिये । गुरुगमथी अवधारी रे ॥ ३ ॥
लोकायतिक कूख जिनवरनी । अंशविचार जो कीजे ।
तत्त्वविचार सुधारस धारा । गुरुगम विण केम पीजे ॥ ४ ॥
जैन जिनेश्वर उत्तम अंग । अंतरंग बहिरंगे रे ।
अक्षरन्यास घरा आराधक । आराधे घरी संगे रे ॥ ५ ॥
इस प्रकार एकतामें विविधता और विविधतामें एकताका दर्शन कर जैन आचार्योंने भारतीय
संस्कृतिको समुन्नत बनाया है ।