सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)

सुन्दर विलास (सन्त सुन्दरदास जी - अद्वैत वेदान्त एवं ज्ञान-भक्ति काव्य सटीक)
Sundar Vilas of Sant Sundardas with Hindi Commentary
सन्त सुन्दरदास जी द्वारा
DevanagariHindipublished284 पृष्ठ
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॥ ज्ञानी को अंग ॥ [ २२७
देखत है पै कछू नही देखत,
बोलत है नही बोल बखानै ।
सूघत है नही सूघत घ्रान,
सुनै सब है न सुनै यह मानै ॥
भक्ष करै अरु नाहि भखै कछु,
भेटत है नहि भेटत प्रानै ।
लेत है देत है देत न लेत है,
सुन्दर ज्ञानी की ज्ञानी ही जानै ॥५॥
काज अकाज भलौ न बुरौ कछु,
उत्तम मद्धिम दृष्टि न आवै ।
कायिक वाचिक मानस कर्म सु,
आपु विषै न तिन्है ठहरावै ॥
हौ करि हौ न कियौ न करौ अब,
यौ मन इद्रिनि कौ बरतावै ।
दीसत है विवहार विषै नित,
सुन्दर ज्ञानी को कोउ न पावै ॥६॥
देखत ब्रह्म सुनै पुनि ब्रह्म हि,
बोलत है सोऊ ब्रह्म हि बानी ।
भूमि हु नीर हु तेज हु वायु हु,
व्योम हु ब्रह्म जहा लगि प्रानी ॥